प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ९)
निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन।

मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण
अग्नि शिखा (भाग - ९)


पूर्व कथा
राजा पुरूरवा एक सय आठम अश्वमेध यज्ञ के लेल आवश्यक निर्देशन लेमय के वास्ते ऋषि अगस्त्य के आश्रम में अपन प्रधान आमात्य के संग जाई छथि,आ हुनका संs निर्देशन लैत छथि ।

आब आगू
यज्ञक घोड़ा जंबूद्वीप के निर्विघ्न पार कs गेल छल । आब ओ शाकद्वीप में आगू बढ़ल जाईत छल l ईहो द्वीप निर्विघ्न पार कs लेलक l एहि तरहें क्रौंच द्वीप,शाल्मल द्वीप,गोमेदक द्वीप आ पुष्कर द्वीप के पार करैत ओ श्याम कर्ण अश्व आब कुश द्वीपक सीमा के अंतर्गत विशाल सागर के पार करैत आगू बढ़ल l
एतवा में पताल लोक संs दानव राज केशि निकसि पड़ल l ओकर एक गोट सहयोगी विरोचन यज्ञक अश्व के लगाम थामि लेल,आ ओहि अश्व के लs कs पताल लोक दिस विदा भेल l ओकरा पाछू पुरूरवा के सभ योद्धा भागल l तलवारक खनखनाहट संग भाला बरछीक ठन-ठनाहट संs दिग दिगंत् गुंजित भs उठल । देखिते देखैत दानवक जत्थाक जत्था उमड़ि गेल l दानव राज केशि पुरूरवा के युद्धक निमित्त ललकारलक l दानव गणक सम्मिलित भयंकर निनाद संs पृथ्वी एवं गगन मंडल गुंजित भs उठल l गदा लs पुरूरवा केशि राज संs युद्धरत भेलाह l दानव राज केशि कुड़हड़ि लs द्वंद युद्ध करs लागल l
एम्हर मुसड़ि एवं प्रास लs शंकु दानव गण केंs हsर संs झीक झीक कs एहि प्रकारें नष्ट करय लगलाह किंवा न्यायप्रिय मंत्री कोनो अनाचारी अपराधी के अन्त करैत होय । तलवार आ ढाल धारण कएने वीर पुण्य दंत दैत्य एवं दानव गण पर प्रहार कs रहल छलाह । ओ केकरो दू दू आ केकरो तीन-तीन टुकड़ी में विभक्त करैत चलि गेलाह । कतेको दानव के अनेक खंड में विभक्त कs देलथि ओ l
पिंगल दंड उठाकs जतह-जतह दौड़लथि,ओतह-ओतह दैत्य के शवक ढेरी लागैत गेल | पञ्चशिख मुग्दर घुमाs घुमाs बलपूर्वक शत्रु सबहक संहार करैत छलाह l ओ प्रबल वेगवान् गिरि भेदी थप्पड़क भीषण प्रहार कs ओकर आघाते संs सवार सहित हाथी एवँ रथी सहित रथ के चूर्ण-विचूर्ण करs लगलाह | बलवान नाड़ी जंघ, पएर, मुष्टि प्रहार एवं वज्र के समान ठेहुनक प्रहार संs असुर के मारय लागलाह l अपन असीम सेना दल के पराजय संs डेराएल केशि सेनापति बना जम्भ के पठौलक l ओकर सेनापतित्व में युद्ध आर भयंकर भs गेल l जम्भ दानवी मायाक सहारा लेल l चहुं दिश घनघोर अन्हार पसरि गेल l ई देख मतिमान आग्नेयास्त्रक प्रयोग केलथि l चतुर्दिक् तीव्र प्रकाश संs झमकि गेल छल l एहि में अनेक मानव आ दानव दुनुक भीषण संहार भेल l जम्भक माया संs आकाश मार्ग संs मांसक लोथड़ा आ रुधिरक वर्षा होमय लागल l
पुरूरवा के प्रोत्साहन संs कुमार कृतु के सेनापतित्व में सर्पास्त्रक प्रयोग कएल गेल,जाहि संs सर्पक वृष्टि होमय लागल l अनेक सर्प दानवगण के अपन ग्रास बनबs लागल । एम्हर जम्भ जृम्भक अस्त्र केंs प्रयोग केलक । फल स्वरुप सभ मानव योद्धा में आलस्य भाव आबि गेल,ओ निद्राक अनुभव करय लागल । ई देखि कुमार कृतु सभ वीर के प्रोत्साहित केलथि। हुनक प्रोत्साहन के सकारात्मक प्रभाव परल,निद्रा के झटकि पुरूरवाक शूरवीर राक्षस सभ पर प्रहार करय लागल l मायावी राक्षस मायायुद्ध प्रारंभ केलक, जाहि संs आब एकहि गोट राक्षस अनेक संख्या में दृष्टिगोचर होमय लागल l एहि मायायुद्ध के कुजम्भ तोड़लथि l एहि प्रकारें ई मायावी युद्ध पन्द्रह दिन तक होइत रहल l
बहुतायत में अपन असुर सैनिक के हताहत होईत देखि दानव राज केशि युद्ध छोड़ि कs समुद्र मार्ग सs पाताल लोक चलि गेल l अपन राजा के एहि तरहें युद्ध भूमि संs कायर सन पड़ाइत देख कs हताश भs शेष दानव योद्धा अपन राजा के अनुगामी भेल । ओहो सभ श्याम कर्ण अश्व के छोड़ि कs भागि पड़ायल । दानव राज केशि जे देवराज इंद्र केंs पराजित कएने छल,ओ पुरूरवा संs हारि गेल l
यज्ञक अश्व आब निर्विघ्न कुश द्वीप में आगू बढ़s लागल l आब किनको ओहि अश्व के रोकवाक हिम्मत नहि भेलनि l
तत्पश्चात निर्विघ्न पृथ्वीक परिभ्रमण कs ओ अश्व सात माह उपरान्त यज्ञ सभा में उपस्थित भेल l ऋषिगण विधिवत् यज्ञक पूर्णाहुति देलनि l तत्पश्चात विशाल रंगारंग कार्यक्रमक आयोजन भेल,जाहि में राजा पुरूरवा के सातो द्वीपक चक्रवर्ती महान सम्राट घोषित कएल गेल l देवर्षि नारद विशेष रूप संs प्रसन्नता व्यक्त केलनि l ओ ऋषिगण के प्रति श्रद्धा ज्ञापित केलनि l सम्पूर्ण महिपाल उचित व्यक्ति के सम्राट बनई सs ईर्ष्या रहित भाव संs अत्यन्त प्रसन्न छलाह l एहि अवसर पर गंधर्व,किन्नर,अप्सरा,आदि आकाश के विभिन्न दिशा संs आबि पुष्प वर्षा करs लगलाह l
भगवान विष्णु पर्यंत आकाश मार्ग में अपन रथ पर आरूढ़ भय स्वस्ति वाचन कएलाह । हुनका स्वस्ति वाचन करैत देखि ब्रह्मा एवम भगवान शंकर स्वयं आबि राजा पुरूरवा के आशीर्वाद देलनि l उत्सव समाप्त भs गेल l सभ आगत अतिथि अपन-अपन निवास स्थलक दिशा में चलि भेलथि l आई पुरूरवाक मनोकामना पूर्ण भेल,भगवान विष्णु के कृपा संs ओ सातो द्वीप सहित संपूर्ण पृथ्वीक सम्राट घोषित भs गेल छलाह l तीनू लोकक ऎश्वर्य हुनका भेट गेल छलनि l


क्रमशः

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