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१.
राजदेव मंडल-
सिर बिहून धड़
२.कालीनाथ ठाकुर-
एक अभिशाप बापक पाप
१
राजदेव मंडल
सिर बिहून धड़
गौंआ-घरुआ आओर बरियात
कियो नहि बुझि रहल अछि बात
किएक नहि वर कऽ रहल सिन्दूर दान
कि कियो कएलक हुनक अपमान
बराती सभ तोड़ए तान
केहेन अछि ओछहा खानदान
बन्न भऽ गेल अछि मंगल गान
सिनूर लेने ठाढ़
दूल्हा भेल अवाक
नाचि रहल अछि माथक चाक
फानि रहल सभ कातहिं कात
कन्याकेँ कहाँ अछि माथ
सिन्दूर कतए देल जाएत
देखतहि तँ सभ गोटे पड़ाएत
सिर बिहून धड़ बैसल अछि
मनमे संशय पैसल अछि
नहि अछि सौंथ नहि अछि मांग
पीने छह सभ गोटे भांग
कियो नहि देखि रहल अछि साइत
सिनूर कतए देल जाएत
बढ़ल जा रहल अन्हरिया राति
एक-दोसर दिशि रहल अछि ताकि
अकचकाइत
गौंआ पुछैत अछि
किएक रुसैत अछि
दूल्हा आर की लेताह
ओझा लेखे गाम बताह।
२
कालीनाथ ठाकुर
एक अभिशाप बापक पाप
पण्डितजी दण्डित
भेलाह जखनहि कन्या पाँच
पूर्व जन्म
के कर्म फल,
वा विधिक कोनो ई
जाँच।
विधिक कोनो
ई जाच,
यैह चर्चा भरि गामक
लाबथु नोट
निकालि जत्ते सम्पत्ति छन्हि मामक।
पनही
गेलन्हि खियाय,
कतौ नहि बसिलनि
गोरा
धन्यवाद क
पात्र छथि ”कलियुग”
के घोडा।
सत,
रज,
तम,
सभ व्यर्थ
थीक शिक्षा शील स्वभाव
गुण एकहि
अछि अर्थ गुण अवगुण अर्थाभाव
अवगुण
अर्थाभाव भाव नहि अछि गुण रूपक
कन्या कारी
,
गोर
,
मूर्ख वा
दिव्यस्वरूपक।
मायक दूध क
दाम जोडि गनबओता टाका
पुत्र हुनक
गामक गौरब से कहलथि काका
बीतल शुद्ध
आषाढ के अगहन
वैशाख।
पहिल
कुलच्छन बुझलनि,
जखनहि घुरि
अयला सौराठ॥
घुरि अयला
सौराठ हाट करथु बेचारे
विधिक लिखल
के मेटल आब रहि जेता कुमारे॥
छोरलनि बीस
हजार ,
लोभ मे तीस हजारक।
कए
रहला गणना
जोतखी,
एहि साल बजारक
सुनलनि जखनि
सुषेण सँ ,
दहेज निरोधी न्यूज
तखनहि जेना
दिमाग केर ढिबरी भय गेल फ्यूज
ढिबरी भय
गेल फ्यूज बराति कन्यागत दुनू
घटकैती के
करत घटक केर हाल न सूनू
बर क हाथ
कनिया बरियातीक हाथ हथकड,
सरियाी सभ
करथु दौडबडहा कचहरी।
लूटन झा त
लुटि गेला कए दूई कन्या दान
मोछ पिजौनहि
रहि गेलाह करता की बरदान?
करता की
बरदान चोट छन्हि नगदी नोटक
उजरल बरदक
हाट प्रथम ई बात कचोटक
घटक राज केर
संग करथु बरु तीर्थयात्रा
करथु
मन्त्रणा गुप्त मुक्त भय सफल सुयात्रा
जाति जनौ
बाँचत कोना?
कुल मर्यादा मान
अन्तर्जाति
ववाह में घोषित नकद ईनाम
घोषित नकद
ईनाम संग सर्विस सरकारी
कहय शास्त्र
ओ वेद मात्र द्विज छथि अधिकारी
करथु ग्रहण
ककरो कन्या हो डोम चमारक
मन डोललनि
पण्डित जी के जे उच्च विचारक
भेल मनन
मन्थन बहुत,
ई समाज केर पाप!!
की दहेज
बन्ले रहत समाजक अभिशाप!!
समाजक
अभिशाप ब्याज ई पूँजीवादक।
बेचि
आत्मसम्मान स्वांग धरि कुल मर्यादक
सिद्धान्त
नहि व्यवहारहु केर करू प्रदर्शन
तखनहि त भय
सकत रोग उन्मूलन॥

