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१.
जगदीश
चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.
जगदानंद झा 'मनु'
-गीत-गजल
१
जगदीश
चन्द्र ठाकुर ’अनिल’
गजल
१
गीत गजलमे लागल छी
ओ बुझैत छथि पागल छी ।
हम रातिकें राति कहै छी
तें भरि गामसं बारल छी ।
अहां बाढिएसं तबाह छी
हम रौदी केर मारल छी ।
हम स्वयंकें नहि चिन्हलौं
देखू केहेन अभागल छी ।
अहां कहैछी कविता सूनू
हम यात्राक झमारल छी ।
ऐ खेलाके यैह नियम छै
सब जीतल आ हारल छी ।
पाइ प्रतिष्ठा पद नै चाही
प्रेमक हम पियासल छी ।
२
कुदने की, फनने की
अन्हराकें जगने की ।
सडक आ ने बिजली
कुरसी पकडने की ।
पाप बढि गेल अछि
गंगाजीकें बहने की ।
शासन बहीर अछि
कहने की,सुनने की ।
मोन अछि झमेलामे
राम राम रटने की ।
सब ठाम सुखराम
अन्नाजीकें सहने की ।
शीलक विचार करू
कुंडली टा देखने की ।
२.
जगदानंद झा 'मनु',
पिता- श्री राज कुमार झा, जन्म स्थान आ पैत्रिक गाम : हरिपुर डिहटोल ,जिला मधुबनी, शिक्षा :प्राथमिक -ग्राम हरिपुर डिहटोल मे, माध्यमिक आ उच्च माध्यमिक -सी बी एस ई, दिल्ली, स्नातक -देशबंधु कालेज ,दिल्ली बिश्वविद्यालय
गजल -१
अहाँक चमकैत बिजली सन काया ओई अन्हरिया राति में
आह ! कपार हमहुँ की पयलौंह मिलल जए छाति छाति में
सुन्नर सलोनी मुंह अहाँ कए, कारी घटा घनघोर केशक
होस गबा बैसलौंह हम अपन, पैस गेल हमर छाति में
बिसरि नहि पाबी सुतलो-जैगतो, ध्यान में हरदम अहीं के
अहाँक कमलिनी सुन्नर आँखि, देखलौं जए नशिली राति में
ओ बनेला निचैन सँ अहाँ के, पठबै सँ पहिले धरती पर
मिलन अहाँ कए अंग-अंग में जे, नहि अछि दीप आ बाति में
सुन्नर अहाँ छी सुन्नर अछि काया अंग-अंग सुन्नर अहाँ के
नहि कैह सकैछी एहि सँ बेसी अहाँक बर्णन हम पांति में
***जगदानंद झा 'मनु'
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गजल-२
लाल-दाई के ललना लाले लाल लगैत छथि
लाली अपन माय के चोरा कs लजाबैत छथि
छैन आँखि में हिनकर काजरक बिजुडिया
माइयो सँ सुन्नर झिलमिल झलकैत छथि
लटकल माथ पर सुन्नर लत हिनकर
देखु-देखु चंद्रमा कए इ त नुकाबैत छथि
सुनि-सुनि बहिना सब हिनकर किलकाडि
कियो खेलाबैत कियो हिनका झुलाबैत छथि
रंग-रूप चाल-चलन सबटा निहाल छैन
मुस्की सँ इ अपन मनु कए लुभाबैत छथि
***जगदानंद झा 'मनु'
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गजल-३
टीस उठैए करेज में कोना कहु बितैए की
कोन लगन लगेलौं अहाँ सँ याद अबैए की
जतय देखु जिम्हर देखु अहाँ कए देखै छी
कोना बितत दिन-राति कोना कय बितैए की
रहि-रहि याद अहाँ के हमरा बड आबैए
कि करू कोना करू आब नै किछ फुराईए की
प्रियतम मनु के किएक इना तरपाबै छी
मोन में लहर उठल से अहुँ के लगैए की
***
जगदानंद झा
'मनु'
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गजल-४
निर्धन जानि अहुँ बिसरलौन्ह माँ
कोन अपराध हम कएलौन्ह माँ
निर्धन छी हम हमर नै गलती
इ निक सनेस अहीं दएलौन्ह माँ
मुल्यक तराजू में नै हमरा तौलु
ममता कए प्यासल रहलौन्ह माँ
दर-दर भटकैत खाक छनै छी
आँचर अहाँक नहि पएलौन्ह माँ
मनु के नै अपन स्नेह देलौं किछु
चरणों सँ आब दूर कएलौन्ह माँ
***जगदानंद झा 'मनु'
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गजल-५
कि-कि बनब चाहै छलौं हम की बनि गेलौंह
सुगंधा अहीं कए स्नेह में हम सनि गेलौंह
आस हमर करेज के करेजे में रहि गेल
अहाँ के छोइर दुनियाँ में कतौ जुनि गेलौंह
रहल नहि होश हमरा दुनियाँ के गम के
अहाँ कए स्नेह में भय पागल कनि गेलौंह
सैदखन ख्याल में अहीं कए बसेने रहै छी
सब कुछ हम अपन अहीं के मनि गेलौंह
हमर स्नेह जे अहाँ सँ स्नेह नहि रहि गेल
हमर मोन में बसि अहाँ प्राण बनि गेलौंह
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