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१.जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कविता
२.
डॉ.
शेफालिका वर्मा- विधाता
१
जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कविता-
1) फुसि
एहनो फुसि बजै छी
जइ ढेरीपर बैसल छी
ओ कहै छी, किछु ने अछि
अकर्म-विकर्मक बात िबनु
मुँह उघारि बजै छी
एहनो फुसि बजै छी
लेश मात्र जे अछि नहि
तेकरा ढेरि बुझै छी
ब्रह्मलोक, शूरलोक, देवलोकक
सदति बात बजै छी
एहनो फुसि बजै छी।
2) कमलाधार
कमल-नयनसँ उगैत अश्रुकण
संग मिलि धार बनल छी
समरस भऽ रंग-रूप बिसरि
नयन-कमल बनल छी
काटि-खोंटि एकबट्ट केनिहारि
करत उकठपन काम
सभ मिलि सोचि-विचारि कऽ
जपलौं कमला नाम।
२.
डॉ.
शेफालिका वर्मा
विधाता
हम नारी छी , ई अपराध हमर ते नहि
हँ हम नारी छी.
अहांक लेखनी हमरा संस्कृतिक
उत्कर्ष पर पहुंचा देलक धरतीक प्राणी नहि
देवी धरि बना देलक
किन्तु, अहाँ बनाय देलों
पातालक छाती विदीर्ण करय वाली
एकटा चीत्कार
प्रकृति-पटी पर उमढ़ैत कोसीक हाहाकार !
ठोर पर अबैत ऐछ कखनो
शरद-प्रात, कखनो
पूसक सर्द राति ;
दर्पण में जखन जखन अपन चेहरा देखैत छी
अचक्के सीताक व्यथित परछाही
पलकक कोर पर थरथरा जैत अछि
हमर आँचर चान तारा से नहि
राहु-केतु से भरी जायत अछि.
मुदा,
आब नै , आब हवा छुवी नारी के मैल
नै करत
हाड मांसक एही देह में किछ नै
जकरा से अहाँ बनल छी , हम बनल छी
प्रकृति कुसुमार बनल अछि
तखन दोषी हमही किएक ?
अहाँ निक हमहू निक
आब जमाना बदलि गेल , नारीक अंतर में
उतरि गेल एकटा तीव्र ,प्रखर रौद पसरी गेल.
घर-बाहर के जगमग करैत
आकाश छुवाक परिकल्पना से सिहरैत
परंपरा-अपरम्पारा के ध्वस्त करैत
नव निर्माणक अकास में नवल सूर्योदयक
रंग भरैत
नारी आगू बैढ़ रहल अछि
'अहम् ब्रह्मास्मिक' भाव स ग्रसित हमर
समर्पण अहाँ देखि नै पबैत छी
सब किछ सहैत जनम अहीं के देत छी .
सृजन हम करैत छी
विधाता अहाँ बनैत छी , तैं आय
पुरुष-विमर्श छोडि, नारी-विमर्श क गप करैत छी ....
