प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.
 

विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं-
१. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी

Videha_01_09_2016

२. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

VIDEHA_353

३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

VIDEHA_354
ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:-
१.कपिलेश्वर राउत
२.उमेश मण्डल
३.राम विलास साहु
४.राजदेव मण्डल
५.नन्द विलास राय
६.जगदीश प्रसाद मण्डल
७.दुर्गानन्द मण्डल
८.रामानन्द मण्डल

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राम विलास साहुक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक

राम विलास साहु केर पाँचटा कथा

कथा १
 

कमतिया हबेली

जानकी घोलाति आ मधुमाछी जकाँ भनभनाइत रस्ता धेने घर जाइ छेली। रस्ते कातमे मदीना दादी बैस किनको बाट जोहि रहल छेली। मदीना दादी झुनकुट बुढ़, सौंसे गामक लोक दादी कहि उद्बोधन करै छैन। नजैर पड़िते मदीना दादी जानकीसँ पुछि देलखिन-

"जानकी केतए-सँ अबै छहक। एकटा काज कऽ दाए तखन जइहह।"

जानकी बजली-

"दादी एकटा की दू-चारिटा कऽ देब मुदा घरपर कियो नइए आ ओसरापर चिल्हकाकेँ सुता कऽ गेल छेलौं। बहुत अबेर भऽ गेल, कनैत हएत।"

मदीना दादी बजली-

"हइ, तूँ बड़ हड़बड़िया छह, एतेक देर तोरा कोनो चिन्ते ने छेलह आ हम टोकि देलियह तँ हड़बड़ी लगि गेलह! हमरो घरपर कियो नइए, हमरा चाह पीबैक मन भऽ गेल। चुल्हिपर पानि खोला दूध दऽ चाहक पत्ती देलिऐ, चीनीक डिब्बा खोलि जखन चीनी दैतिऐ तँ चीनीए नहि। लेधुरिया सभ डिब्बा खोलि सभटा चीनी खा गेल। तूँ कनी चुल्हबा दोकानसँ दू टकाक चीनी लाबि दाएह। चाह बनिते अछि हमहूँ पीब आ तोहू पीबि लिहह।"

जानकी बजली-

"दादी, दोकान दूर अछि हम अपने ऐठीम जाइ छी चिल्हको लऽ लेब आ चीनीओं नेने अबै छी, तखने बैस गप्पो करब आ चाहो पीब।"

मदीना दादी निराश नइ भऽ आश भरल नजैरसँ निहारैत बजली-

"जा तूँ कोनो कम गहींरगर छह।एके तीरे दूटा शिकार करए चाहै छह।"

जानकी रमकैत-दमकैत घर दिश विदा भेली। घरसँ दूरे छेली कि चिल्हकाकेँ कनैक अवाज सुनली। अवाज अकानिते दुलकी दैत आँगन जाधैर पहुँचली ताधैर चिल्हका कनैत फफचीहारि काटि, उनैट-पुनैट ओसारसँ निच्चा आँगनमे गिर गेल छल। हाँइ-हाँइ नूनू बौआ कहि जानकी कोरामे लऽ छातीसँ सटा दूध पीबए लगली। चिल्हका दूध पीबिते अलिसा गेल। कागतक टुकड़ीमे चीनीक पुड़िया बना एक हाथमे लऽ चिल्हकाकेँ कोरामे सम्हारि-पकैड़ मदीना दादीक घर दिश विदा भेली।

मदीना दादी चुल्हिपर कखनो चाहो निहारैत आ कखनो रस्तोपर नजैर दौड़बैत रहैथ जे जानकी कखनी चीनी लऽ कऽ आएत जे चाह बनत।

जानकीकेँ कनी देरी भेलासँ चुल्हिपर चाहो उधिया-उधिया अधजरू भऽ गेल। मदीना दादी आश लगौने ने अगुतेली आ ने घबड़ेली। ओ जनै छेली जे जानकी चिल्हकौर छी चिल्हकाक लटारममे लगि गेली।

मदीना दादीक मन खुद-बुद होइते छेलैन कि जानकी हहाइते पहुँचली आ बजली-

"दादी की कहू, कनियोँ अँगना जाइमे देरी होइतए तँ हमर चिल्हका प्राण तियागि दइतए। ओकरे सम्हारैमे लटारम भऽ गेल, तँए देरी लगल।" 

मदीना दादी बजली-

"से तँ तूँ बड़ होशियारि-सुतिहारनी छह। जे मनमे ठानै छह से कए कऽ दम मारै छह। लाबह चिल्हकाकेँ हम पकड़ै छी, तूँ चाहमे चीनी दऽ छानि दूटा गिलासमे नेने आबह। चाहो पीअब आ गप्पो करब।"

जानकी चुल्हिपर चाह देखलक तँ ओ खदैक-खदैक कऽ अधजरू भऽ गेल छल। सुगन्धो चहाइन-चहाइन, जल्दीसँ तीन-चारि चुटकी चीनी दऽ हिला-मिला कऽ उताइर दूटा गिलासमे लऽ मदीना दादी लग एली।

एक गिलास मदीना दादीकेँ आ दोसर गिलास अपने लेली। चाह तँ जरि कऽ जराइन भऽ गेल छल मुदा पीबैमे सुअदगर रहइ। दू-चारि घोंट लैत मदीना दादी जानकीकेँ टोकलखिन-

"जानकी तूँ तखनी केतए-सँ अबै छेलहक से तँ नै बजलह?"

जानकी बजली-

"दादी, की कहू! अपन हारल, हाथतर गेने कहैमे अपने संकोच होइए। मुदा हिनका नै कहबैन से उचित हएत। जा कहब नै ता समाधानो केना हएत। बहुत दिनक बाद मालिकक हबेली गेल छेलौं।"

बिच्चेमे मदीना दादी बजली-

"की कोनो पैघ बात वा काज छेलए की?"

जानकी बजली-

"दादी, हमरासँ तँ बेसी अनुभव हबेलीक अहींकेँ हएत।"

मदीना दादी बजली-

"हबेलीकेँ तँ हम आब नाओं चर्च नै करै छी। ओकरे मारल तँ तीन पीढ़ीसँ दुख काटि रहल छी। पहिने तूँ कहऽ ने जे हबेली किए गेल छेलह?"

जानकी बजली-

"दादी, अहूँ खैन-खा कऽ हमरेपर लगल छी। कहुना छी तँ गामक मालिकक हबेली छी किने, जँ कनियोँ बाजबमे हुसि जाएब तँ गामोमे ने बास हुअ देत।"

मदीना दादी बजली-

"तोरा ने डर होइ छह, हम तँ हबेली कहियो ने मानलिऐ आ ने मानै छिऐ। ओइसँ नीक तँ गामक गरीब-दुखिया जे जाइते मातर टुटलोहो ओछाइन बिछा आदरसँ बैसा कऽ हाल-चाल पुछबो करैए आ एक गिलास पानि-चाह पीआ कऽ विदा करैए। दुखो-सुखक धड़ीमे सोझहा आबि मदैत करैए। मुदा जेकरा तूँ हबेली कहै छहक आ आनो सभ कहै छै तेकरा हम कमतिया बुझै छी।"

जानकी बजली-

"से केना दादी! जे गामक मालिक जमीन्दार छैथ ओ कमतिया केना भेल?"

मदीना दादी बजली-

"तूँ बुझबहक केना, तोहर उमेरे की भेलह हेन। ओ की गामक डीहबासू छी। ओ तँ बाहरसँ आबि गाममे बसि कऽ सबहक जमीन हरैप जमीनदार बनि गेल आ गामक लोककेँ गुलाम जकाँ दिन-राति खटबए लगल। जेतेक शोषण आ दुख ने कमतिया सभ समाजक लोककेँ देलकै जे समाज टुटि छिड़िया गेल। तेकर नाम तोँ ऊँचगर करै छह, तोरा अखनी परिचय नै लगलह हेन।"

जानकीक मोनमे जिज्ञासा बढ़लै आ अचरज सेहो भेलै तखने मदीना दादीसँ पुछि पड़ली-

"दादी नै बुझलौं कमतिया हबेलीक किरदानी। कनी फरिछा कऽ बता दिअ।"

मदीना दादीक मनमे जेना उमकी एलैन तहिना उमकैते बजली-

"तूँ बुझबहक केना! भरि दिन तँ अपन दुख-धन्धामे लगल रहै छहक, ओइसँ जे समय भेटै छह तँ फहरदवाल मारि ऐ अँगनासँ ओइ अँगना गाल बजबै छहक। कहियो ई भेलह जे गामक बुढ़-बुजुर्गक लगमे बसि गामक बितलाहा दिनक चर्च करी आ ओहन-ओहन बातक कान धरी जे आगू काज देत।"

जानकी बजली-

"दादी, जहियेसँ होश आ बोध हएत तहियेसँ ने सीखब-बुझब। एतेक दिन तँ गरीबीए-मे दिन काटलौं, अखैन धीए-पुतामे ओझराएल रहै छी। जहियासँ हबेली छोड़ि दुनू परानी अपन काजकेँ गहि कऽ पकड़लौं तहियासँ महड़ा भादोकेँ खाइ छी। घरबला छह मास घरक काज करैए आ छह मास परदेश कमा लबैए, तँए दू सेर अन्नो देखै छी आ दूटा रूपैओ।"

मदीना दादी बजली-

"हबेलीक काज किए छोड़ि पड़ेलह?"

जानकी बजली-

"की कहबैन दादी, जाबे हबेलीक काज करै छेलौं ताबे पेटो ने भरए। काजक मजूरीबला काज कम, बेगारीए बेसी खटै छेलौं। दुपहरिया लगा कऽ दुनू परानी खटै छेलौं आ बोइन तँ दूर रहए, पनपिआइयो ने भरि बुत्ता भेटै छेलए। खेतीक काज करै छेलौं तँ बोइनो ऐ सालक पौंरुका, पौंरुकाबला बोइन तेंसरा झझमझेसँ दइ छेलए। कहियो भाभंस नै भेल जे दुनू साँझ चुल्हि पजारितौं।"

मदीना दादी बजली-

"आइ किए, कथी-ले कमतिया ऐठीम गेल छेलहक से ने कहह।"

जानकी बजली-

"दादी, अहाँसँ छाम की। हमरा तँ मन जरैए। जँ अहाँकेँ कहब तँ सुनिते अहूँकेँ देहमे आगि नेसि देत।"

मदीना दादी बजली-

"तूँ की कहबह कमतियाक किरदानी, हम तँ सभ खेल-बेल देखने-भोगने छी आ देह लगा मारने छी। मुदा बताबह ने तोरा की भेलह।"

जानकी बजली-

"दादी, पौंरुका साल अखाढ़-सौनमे हबेलीबला मालिक दुहारिक माटि बुझू खाए गेल। भोरमे अन्हरौखे आबि निहोरा करैत कहै लगल जे हमर खेत अफारे रहि जाएत। गोरहा खेत छी कहुना धनरोपनी कऽ दएह। चास नहि लगत तँ बास केना हएत। सुनि हमरो मन ढलि गेल। हमर घरबला हर जोति गजार-कादो करए आ हम किछु बोनिहारक संगे धनरोपनी कऽ देलिऐ। एक दू दिन नै दुनू परानी बीस दिन खटि देलिऐ। बीस दुनी चालीस पेसरी बोइन भेल। माने पाँच मन भेल। पाँच मनमे तीन मन तँ कहुना कहि-सुनि देलैन मुदा दू मन धान अखन धरि नै देलक। सालसँ बेसी भऽ गेल। एक तँ आसीन-कातिक मास अहुना सालक तेरहम मास होइए, तहुमे एतेक रास पाबैन-तिहार...। खर्चे-खर्च...।

घरबला बाहर कमाइले जाएत। सोचलौं हबेलीमे दू मन धान कमाएल बोनि अछिए, आनि कऽ एक पसेरी धान चूड़ा-ले ताड़ि देबै आ एक पसेरी धान भाड़ि-ताड़ि कऽ मुरहीक चाउर बना लेब। हाथे मुसरे चूड़ा कुटि लेब दोसर दिन मुरही भुजि देबै जे घरबलाक बटखर्चा दऽ देबइ। जे धान बँचत तेकरा उसैन सुखा कुटि लेब। ओइ चाउरसँ कातिक खेप जाएत।"

मदिना दादी बजली-

"की भेलह, देलकह आकि नै देलकह?"

जानकी बजली-

"की कहूँ दादी, कोनो की एक दिन बोइन-ले हबेली गेलौं हेन। जाइत-जाइत टॉंग टुटि गेल। बोइन जोखैमे घिघरी कटबैए। अखैन तक नै देलक। जखन जाइ छी तँ बेगारीए काज अढ़ा दइए। कहु ने हम अपने चिल्हकौर छी। सक-बुत्ता लगबे ने करैए, केना भिरगर काज कऽ देबइ। अही खातिर हमर घरबला आनठाम काज करैए मुदा हबेलीक काज नै करैले जाए चाहैए।"

मदीना दादी बजली-

"आब तूँ बुझि गेलह, बोइन आनैमे तेरह डिबिया तेल जरि जेतह। हमरो घरबला ऐ कमतिया हबेलीक अढ़ौती आ बेगारी खटैत-खटैत दुनियाँसँ चलि गेला। एक मन मरूआ आ दू मन धान कर्जामे नेने रही तेकर सुदिक सुदि जोड़ि कऽ कर्जे तरमे दस कट्ठा चौमास आ दू कट्ठा बासडीहो लिखा हरैप लेलक। ई जे हमर डीहबास देखै छहक से सरकारीए परती छिऐ। घरबलाक मुइला पछाइत जखन बास डीहपर सँ भगा देलक तखन हमर दुनू बेटा माथपर छिट्टामे माटि उघि-उघि भरि कऽ बाँस-खुट्टा ऐ समाजसँ मांगि-चांगि कऽ घर बनौलक आ हमहूँ बुढ़ारीमे राति दिन संग देलिऐ। दुनू बेटा कमतिया हबेली आइ धरि घुमि नै गेल। काजे ने एतेक सीखौने छी जे कहियो बैस नै खाइए। काजक लूरि रहने काजे चढ़ल रहैए। तूँ हबेलीक फेरमे लगले छह।"

बिच्चेमे जानकी बजली-

"दादी, हम कमेलहा बोइन नै छोड़बै। हमरोसँ सूदिक सूदि जोड़ि नेने अछि। आइ जँ हमहूँ कहिये देलिऐ जे बोइन राखू दू मनक तीन मन असूल कऽ लेब, अहाँक अन्नो-पानि दुना-तिगुना बढ़ि जाइए आ गरीबक बोइन जे छह मास, साल भरिक पछाइत देबै तँ ओकर सूदि नइ हेतइ। हमहूँ सूदि लगा कऽ लेब।"

मदीना दादी बजली-

"सुना कऽ कहलहक की नहि?"

जानकी बजली-

"सुना कऽ! चिकैर कऽ कहलिऐ। जहाँ ने कि सुनलक कि जेना बिढ़नी कटलापर लोक छिटपिटा उठैए तहिना छिटपिटा लगल। मुदा किछु कहैक साहस नै भेलइ। जँ किछु बजितए तँ समाजसँ दस बेकतीकेँ बजा पानि उताइर दैतिऐ।"

मदीना दादी बजली-

"साँझ पड़ि गेल। छोड़ह अखैन हबेलीक गप-सप्प। जेते काल ओझराएल रहब तेते काल घरक काज पाछु पड़ि जाएत। सौंझुका पहर बीतल जाइए, पहिने घरमे साँझ-बाती देखा लइ छी।"

जानकी बजली-

"दादी, हमहूँ जाइ छी साँझ-बाती दइले। अबेर भऽ गेल। चिल्हको सम्हारब आ भानस-भात करब। काजपर सँ घरबला अबै छैथ तँ सबेरे खा कऽ सुतै छैथ। मुदा कमतिया हबेलीक किरदानी कहियो फलिसँ सुना देब।"

मदीना दादी बजली-

"कहियो किए बजलह, आइ अबेर भऽ गेल आ अखन गपक बेर नै काजक बेर छी तँए, अखन तहूँ जा काल्हिये दुपहरियामे अबिहह फलिसँ सभ गप सुना देबह।"

मदीना दादीकेँ गोर लागि जानकी अपन घर दिस विदा भेली। कमतिया हबेलीक किरदानी बुझैक जिज्ञासा मनमे बढ़िये गेल छेलैन। मनमे होइत रहैन जे कखनी राति बितत जे काल्हि दुपहरमे दादी लग जाएब। सभ काज सम्हारि भानस-भात कऽ पतिकेँ खीआ अपनो खा कऽ सुति रहली। भिनसरे उठि हाँइ-हाँइ काज कऽ पनपिआइ आ खेनाइ बना काजसँ निवृत्त भऽ गेली। चिल्हका नेने दुपहरियेमे दादी लग पहुँचली।

मदीना दादी नहा-खा हुक्कामे चिलम बोझि सोंट मारि सुनगबै छेली। दादी जानकीकेँ अबैत देख बजली-

"कनियाँ, पुबरिये ओसरापर बैसह। किए तँ तोरा कोरामे चिल्हका छह एतए बच्चाकेँ हुक्काक धुइयाँ लगि जेतह। हमहूँ उठि कऽ पुबरिये ओसरपर अबै छी। अखैन कोनो काजो नहियेँ अछि। निचेनसँ गप-सप्प करब।"

जानकी बजली-

"दादी, अहाँ ने काजसँ निचेन छी मुदा हम तँ असगरूआ छी, बहुत काज पछुआएल अछि। तोहूमे अपने परदेश जाइबला छैथ। हुनको ओरियान करए पड़त। हम तँ कमतिया हबेलीक किरदानी जनैले अहाँ लग एलौं हेन। काल्हि ने हमरा आ ने अहाँकेँ समय रहए जे बता दइतौं।"

मदिना दादी बजली-

"चटपट नै करह कनियाँ, पहिने कनी हुक्का पीअ दएह तखन निचेनसँ गप करब।"

मदीना दादी जोर-जोरसँ सोंट मारि हुक्का पीबए लगली। चिलमक कंकर जरि गेल तखन हुक्का मोख लग गड़ लगा ठाढ़ कऽ पुबरिया ओसारपर आबि चटकुनी बिछा बैसली।

दुनू गोरेमे चौबगलीक गप-सप्प शुरू भेल। जानकी चारू कातक गपक भूमिका बान्हि कमतिया हबेलीक केन्द्र बिन्दु बना मदीना दादीसँ पुछि देलखिन।

मदीना दादी बजली- 

"जखन भागवतक कथा जकाँ कहबह तँ सुनबहक तँ मुदा एक कानसँ सुनबहक आ दोसर कानसँ बोहि जेतह। से नहि तँ तपसी जकाँ धियान लगा सुनबहक तखने किछु जानबो करबहक आ हमरा मुइला पछाइत गाममे तोहू ने दादी हेबहक, जेना आइ हम छी। गाममे केहेन-केहेन कारनामा सभ भेल मुदा लोक सहैत रहल, ने कियो बुझैले तैयार आ ने कियो विरोध केलक। मुदा आजुक दिन किछु बदैल गेल आ लोकोमे विचारो बदललैए। जे नजायजकेँ विरोध करए लगलैए। तैयो समाजमे पछुआएलकेँ मौजरे केतेक छै जे विरोध करत। अखनेा गरीब लोकक डेग-डेगपर शोषण होइ छै आ ओ देह लगा सहैत रहैए, ओकर संगो दइबला कियो ने तैयार होइ छइ।"

कनखरल जानकी बिच्चेमे पुछि देलखिन-

"दादी, की गरीबक मुँहमे बोली नै छै, की विवेकक कमी छै जे एतेक दुख सहितो शोषित होइए। आखिर एकर कारण की अछि?"

मदीना दादी जोरसँ हुंकार भरैत बजली-

"सुनह तेकर कारण कोनो एकेटा छै जे झब-दे कहि देबह। बहुत रास कारण छै। एकरा लग महाभारतो फेल अछि। मुदा हमरा जे बुझल आ अनुभव कएल अछि तेकर एकटा अंश कहै छिअ। पहिने- राजा महाराजाक शासन चलै छेलै हुनका सबहक कानून बड़ कठोर! छोट-छोट गलती करैबलाकेँ नमहर-नमहर सजा भेटै छेलइ। लोक ओइ कठोर दण्डक डरसँ विलाइ बनल रहै छल। खेतक मलगुजारी बड़ करगर छेलइ। जइ साल उपजा होइ छेलै तइ साल तँ कहुना लोक मलगुजारी दइये दइ छेलै मुदा जइ साल रौदी वा दाही होइ छेलै तँ मलगुजारी चुकता नै कऽ पबै छेलइ। पहिने खेतीक अलावा ने दोसर कोनो साधन छल आ ने कोनो रोजगार, जइसँ लोक कमा कऽ पेट भरैत। गामक गाममे भुखमरी होइ छेलइ। गरीब लोक सभ बाल-बच्चा आ अपन घर-परिवार छोड़ि ढाका-मुंगेर, मोरंग कमाइले चलि जाइ छल। गामक जमीनदार कर्जे तरमे गरीबक सभटा जमीन लिखा हड़ैप लेलक। मलगुजारी नइ देलापर राजा सेहो खेत सभकेँ निलाम कऽ लइ छल। ओ जमीन सभ अपन लगुआ-भगुआ सभकेँ दऽ दइ छल। ओही निलामीबला जमीनक जागीर बना केतेको जमीनदार बनल। किछु लोक मुंशी-मनेजर आ शर्कलक हाकीमसँ मिलि कऽ गरीब आ किसानक जमीन जे निलाम होइ छेलै ओ कनी-मनी रूपैआ दऽ अपना-नामसँ जमीनक पट्टा बना लइ छेलइ। ऐ तरहेँ मिथिलाचंलक मूलवासी गरीब भऽ गेल। बहुतो डीहबासु सभ भूमिहीन बनि बिलैट गेल। जे जमीनबला छेलै से गरीब मजदूर भऽ गेल आ बाहरसँ आबि कमतिया सभ जमीनदार भऽ गेल। ओ सभ अपन-अपन कामत बना रहए लगल। ऐठामक भूमिहीन मजदूर पेटक खातिर कमतिया सबहक खेतमे मजदूरी, बेकारी, नोकरी-चाकरी करै छल। कमतिया सबहक धिया-पुता पढ़ि-लिख आनठाम हाकिम-हुकाम बनि शहरमे रहैए आ कामतक जमीनक उपजासँ नेहाल भऽ गेल। तैयो संतोख नै भेलै। ऐठामक गरीब-मजदूरकेँ कर्जेतरे बेगारी खटैत-खटैत कहियो पर नइ भेलै जे विरोध करितै। जखन देश अजाद भेल तेकर किछु बर्खक पछाइत गरीब-मजदूरक यूनियन बनलै। कम्युनिष्ट पार्टीक लोक सह देलकै। गामे-गाम कमतिया सबहक जमीनपर लाल झंडा गारि डंका बजा-बजा चुनौती देलकै। खेतक उपजाकेँ लूटिस करौलक। तखन किछु कमतियाकेँ कमेदाममे जमीन बेचए पड़लै। मुदा जे कमतिया अपना सबहक समाजमे हिल-मिल रहए लगल ओ सभ कोठा-सोफा बना डीहबासु भऽ गेल। मुदा चालि-चलैन पूर्णत: नै बदललै। कहबी छै- चालि, प्रकृति आ बेमाए ई तीनू मुइने जाए। लोक सभ जे कहौ मुदा हम तँ सभ दिन कमतिया कहलिऐ आ अखनो कहै छिऐ। तूँ सभ ने धनिक आ कोठा-सोफा देख हबेली कहै छहक।"

बिच्चेमे जानकी बजली-

"दादी, अहाँक बात सुनि बहुत जानलौं मुदा अहाँ कमतिया कहै छिऐ आ हम हबेली कहै दिऐ, तखन दुनू जोड़ि कऽ कमतिया हबेली बाजब नीक नै हएत की?"

मदीना दादी बजली-

"बजबाक लेल मुँहक कोनो भाड़ा-खर्चा लगै छै, जे मन हुअ से बाजह मुदा उचित बुझि बाजबह तखन ने समाजोक लोक सीखत। इएह उनटा-पुनटा भेने ने आइ मिथिलाक लोक आनठामसँ बेसी गरीब अछि। जेकर सुधि आइ धरि कियो ने लेलक।"



 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।