
परमानन्द लाल कर्ण
सीख
अरे हमर बौआ, कानू नहि ! दादी तुरंत अहाँक दूधक बोतल लावि रहल छथि । लीलाजीक पुकार भनसा घरक दिवार सँ टकराइत घर मे गूंजि रहल छल । हुनका हाथ मे दूधक बोतल छल जाहि मे सिरगरम दूध राखैत छलीह आ सोझा मे फर्श पर बैसल हुनक पोता रोहन कानैत छल । लीलाजी आवाज दऽ रोहन के फुसलाव’क कोशीश कऽ रहल छलीह । मुदा रोहन चुप होवाक नाम नहि लैत छल । लीलाजी कहैत छलीह - बस हमर लाल ! चुप भऽ जाउ ! दूध गरम भऽ गेल अछि । बस आवि गेलहुँ । लीलाजी बोतल मे दूध गरम कऽ आवि रहल छलीह कि कड़क आवाज मे हुनकर पुतोहु कहलनि - माँ जी ! अहाँ की कऽ रहल छी ? हद भऽ गेल । एकहु टा काज अहाँ ढंग सँ नहि करैत छी । देखू तऽ रोहन केना कानि रहल अछि । रोहन के कोरा मे लऽ अपना सासु माँ पर जोर-जोर सँ कहऽ लगलीह । लीला जी कहलनि - “ कनिया ! बौआक भूख लागल छल तें हम भनसा घर मे बौआक लेल दूध गरम करैत छलहुँ । देखू दूधक बोतल हमरा हाथहि मे अछि । एहि पर सुषमाजी कहलनि, “कनि देखू तऽ बच्चाक की हालत भऽ गेल अछि। नीचा मे लोरे झोरे कोना कानि रहल अछि ।हमरा पाछू मे बच्चा पर अहाँ की ध्यान दैत छी पता नहि ? लीलाजीक चेहरा लटकि गेल आ ओ किछु कहऽ चाहैत छलीह तखनहि सुषमाजी कहलनि - माँ जी, अहाँ के सफाई देवाक कोनो जरूरत नहि अछि । लीलाजी कहलनि - नहि कनिया ! कनि सोचू तऽ हम भनसा घर मे बौआक लेल दूध गरम करवाक लेल गेल छलहुँ तें पलंग सँ नीचा रखने छलहुँ । पलंग पर सँ गिरवाक डर छल । हम नीचा मे चटाई बिछा कऽ बैसेने छलहुँ ,मुदा ओ चटाई पर सँ बाहर खेलऽ लागल । बच्चा अछि तऽ हाथ पाइर तऽ मारबे करतैक । केकरो नहि देखलक तऽ कानऽ लागल । सुषमाजीक नजरि घरक एक कोन मे राखल बच्चाक कपड़ा पर गेल । तुरंत ओ कहलनि - “माँजी ! आन दिन तऽ रोहनक छोट-छोट कपड़ा अहाँ सेहो साफ कऽ सुखा दैत छलहुँ मुदा आई तऽ अहाँ ओहो छोड़ि देलहुँ अछि । सभटा कपड़ा ओहिना राखल अछि । हमरा तऽ समझ मे नहि आवि रहल अछि जे भिनसर हम सभटा काम निपटा कऽ जायत छी । दिन भरि अहाँ की करैत छी ? एकटा छोट नेना के नहि संभालि पावैत छी।सुषमाक कटु वचन सुनि लीलाजीक दिल पर गहींर चोट लगलनि । हुनका मन मे एक तूफान उठि रहल छल । लीलाजी कहलनि - “ कनियाँ ! अहाँ ई की कहि रहल छी ? अहाँ के पता अछि जे दिन भरि कोन-कोन काज होयत अछि ? असगरे कखनहु बौआक लेल दलिया बना के दैत छी तऽ कखनहु रागी बना कऽ व कखनहु दूध दैत छी । बच्चाक मालिश करनाई, नहेनाई सभ असगर करैत छी । अहाँ कोना समझव जे असगरे ई काम कतेक कठिन सँ होयत अछि । सुषमाजी कहलनि -”माँजी ! बस करु,हमरा सभ पता अछि जे भरि दिन कतेक काज होयत अछि । घरक झाड़ू पोछाक लेल दाई राखि देने छी । भिनसरक नाश्ता आ तरकारी हम बना कऽ जायत छी । फेर अहाँक लेल कोन काम बांचल रहैत अछि । देखू तऽ आई बच्चाक की हाल भेल अछि। लागैत अछि जे अहाँ बौआ के आई नेहेवो नहि केलहुँ अछि । बौआ आई ओहिना गंदा कपड़ा पहिरने अछि । भरि दिन मे अहाँ एकटा कपड़ो नहि बदलि सकलहुँ । ई सभ सुनि लीलाजी के नहि रहल गेलनि । ओ कहलनि - “कनिया ! आई भिनसरे सँ हमर शरीर बोखार सँ टूटि रहल अछि । एहि दशा मे बच्चाके संभलनाई कतेक कठिन होयत अछि से अहाँ नहि बुझैत छी की ?” ई सुनि सुषमाजी कहलनि - “माँजी ! बस करु , जखन सुनु तखन कोनो ने कोनो बहाना बना दैत छी । काम करवाक इच्छा नहि होयत अछि तहन कहु हम रोहन के डे-केयर मे राखि दैत छी ।” ई कहि रोहन के कोरा मे लऽ के अपना कोठरी मे चलि गेलीह । भनसाघर मे लीलाजीक आँखि सँ ढ़व-ढ़व नोर गिरऽ लागल । बुझल मन सँ ओ अपना कोठरी मे बिछौना पर लेट गेलीह । आई भिनसरे सँ लीलाजीक तबीयत खराब छल तैयो भरि दिन रोहनक पाछु-पाछु दौड़ैत छलीह । एहि हाल मे सुषमाजी एकहु बेर नहि कहलखिन जे अहाँ कोनो दवाई लेलहुँ अछि कि नहि ? ओना ई नव बात नहि छल । लीलाजीक मन ठीक रहे व खराब सुषमाजी ताना मारऽ मे कोनो कसरि नहि छोड़ैत छलीह ।
सुषमाजी रोहन के अपना कोठरी मे लऽ जा के पूरा कपड़ा बदलि देलखिन । कपड़ा बदलि पलना पर लेटा देलखिन आ दूधक बोतल ओकर हाथ मे पकड़ा देलखिन । रोहन के दूधक बोतल पकड़ा कऽ अपना बिछौना पर लेट गेलीह आ सभ दिन जकाँ फोन पर अपना माय सँ कहलखिन, “ माय अखन घर एलहुँ अछि तऽ फेर आई घर मे तमाशा छल । बौआ फर्श पर भूख सँ तड़पि रहल छल । जोर-जोर सँ कनैत छल ।आई तऽ आओरो हद भऽ गेल, आई रोहन के कपड़ो नहि बदलल गेल छल । हम की करु? ओ नहि तऽ बच्चाक ख्याल राखैत छथिन आ नहि घरक कोनो काम करैत छथिन । सुषमाक माय कहलनि - बुढ़िया भरि दिन मोबाईल चलावैत हेतीह नहि तऽ सुतैत हेतीह । बच्चाक देखभालक जिम्मेवारी तऽ दादी पर रहैत अछि खास कऽ जेकर माय नौकरी करैत अछि । किएक तऽ ओ भरि दिन अपने ओफिस मे रहैत छथि आ साँझ मे थकल मारल घर आवैत अछि । सुषमाजी अपन भड़ास निकालैत छलीह आ माय सँ कहैत छलीह जे माय आव हम की करी ? भिनसरे नाश्ता बना कऽ आ दाई के काम समझा कऽ अपना नौकरी पर भागू । नौकरी पर सँ घर आवैत छी तहन माँजीक बहाना सुनैत छी ।सभ दिन ओ कोनो ने कोनो बहाना जरुर बतावैत छथि । आई देह तोड़ि रहल अछि तऽ आई बोखार भऽ गेल अछि । सब दिन इएह ड्रामा लागल रहैत अछि । एहि पर सुषमाजीक माय कहलखिन - अरे बेटा ! ई सव बहाना होयत रहैत अछि । अच्छा ई बताऊ जे पाहुनक तबीयत सब ठीक ठाक अछि ने ? एहि पर सुषमाजी कहलनि - हाँ माँ , ठीक अछि मुदा आई ओफिसक काम सँ बाहर गेल छथि । लगभग एक घंटा दूनु माय-धी सब दिन फोन पर बात करैत छलीह । भरि दिन की भेल तकर पूरा जानकारी देलाक बाद मोबाईल बन्द होयत छल । सुषमाजीक माय अपना रिश्तेदारी मे कहैत छलीह जे हमर बेटी सासुर मे कतेक मेहनत करैत अछि । घर संभालनाई ओफिस जेनाई कोनो आसान बात नहि अछि ।
लीलाजी अखन माथ पकड़ने बिछौना पर लेटल छलीह । जखन सुषमाजी अपना माय सँ बात करैत छलीह तखन ओ सब बात सुनैत छलीह । मुदा अपना दिल पर हाथ राखि चुपचाप छलीह । अचानक हुनका दिमाग़ मे आयल जे अपन बेटा मनोज सँ सभटा बात कही । फेर हुनका दिमाग मे आयल जे बेटाक कहला सँ किछु नहि होयत । ओ अपना घरवालीक बात सुनत नहि कि हमर । हमरा बात पर हुनका विश्वास हेतनि की नहि ? लीलाजीक आव एहसास भेलनि जे हम कतबहु घर मे काज करब हमर कोनो कदरि नहि होयत । आई तऽ देह तोड़ि रहल अछि आ बोखार सेहो अछि तैयो रोहन के भरि दिन संभालहु । घरक काम केलहुँ मुदा कनिया के तऽ हमर गलती देखा दैत छैन । कतेको बेर मन भेलनि जे एहि ठाम सँ दोसर ठाम चलि जाउ मुदा फेर सोचैत छलीह जे गाम मे सेहो घर ठीक ठाक नहि अछि कोन ठाम जाय ? ई सोचि चुपचाप बेटा-पुतोहु लग मन मारी रहैत छलीह ।
एक दिनक बात अछि सुषमाजीक ओफिस बन्द छल ओ घर पर छलीह । रोहन अपना माय लग खेलाइत छल । लीलाजी अपना घर मे बैसल छलीह तखन हुनका पुरान बात यादि आवऽ लागल जे एकटा समय छल जखन ख्वाव देखैत छलथि जे बच्चा जखन पैघ भऽ जायत आ अपन माथ उठा लेत तहन हम तीर्थ वगैरह जायव । ओना लीलाजी के घुमवाक बड्ड शौक छलनि मुदा घरक जिम्मेवारी हुनका बान्हने रहैत छल । जखन बच्चा छलीह तखन हुनकर माय कहैत छलखिन जे अखन पढू, पढ़ाई पूरा कऽ लीअ विआहक बाद घुमव । माय बाबुजीक देख-रेख मे पढ़ाई नीक जकाँ केने छलीह । विआहक बाद हुनका नौकरी करवाक इच्छा भेलनि, मुदा सास- ससुर नौकरीक लेल साफ मना कऽ देलखिन । विआहक बाद जिम्मेदारी ख्वावक जगह लऽ लेलक । सासुर मे साउसक ताना, घरक काज, रिश्तेदारक अपेक्षा आ पतिक फरमाईश धीरे-धीरे लीलाजी के अन्हार कोठरी मे धकेल देने छल । भिनसर सँ साँझ धरि काम करैत-करैत थकि जायत छलीह ।बेटाक जन्म भेलाक बाद घरक काज आ बेटाक देखभाल मे समय बीतैत छल । बेटा जखन विआहक लायक भेल तहन हुनक विआह नीक खान दान मे केलीह । हुनका बेटी नहि छलनि तें सदिखन मलाल छलनि जे हमरा बेटी नहि अछि । ओ सोचैत छलीह जे बेटी नहि अछि मुदा बेटा तऽ अछि । विआहक बाद बेटी जरूर मिल जायत । बहुक हम बेटी जकाँ राखब । मुदा लीलाजीक ई अरमान सुषमा के एलाक बाद टूटि गेल। ओ तऽ अपना दुनिया मे मस्त छलीह । सासुर मे सुषमा एकटा स्कूल मे काज करऽ लगलीह आ अपना दुनिया मे मस्त रहैत छलीह । भिनसरक किछु काम कऽ टिफिन मे अपन खाना पैक कऽ लैत छलीह आ साँझ के आवैत छलीह । साँझ मे घर एलाक बाद फोन पर अपना माय सँ घंटों बात करैत छलीह । घरक सव काज लीलाजी पर छल। सुषमाजीक एलाक पहिले तऽ हुनका किछु राहत छल । कखनो सत्संग मे चलि जायत छलीह तऽ कखनहु अरोस-पड़ोस मे बात कऽ लैत छलीह । मुदा आव पोताक जन्म भेलाक बाद सभटा जिम्मेदारी लीलाजी पर आवि गेल छल । बच्चा के मालिश करनाई, नेहेनाई,ओकर कपड़ा साफ करनाई आ खाना खिलेनाई सभटा काज हिनका पर छलनि।
एक दिनक बात अछि लीलाजी अपना पुतोहु सँ कहलखिन - कनिया छुट्टीक दिन घरक काज मे किछु हाथ बटा देतहुँ तहन हमरा किछु आराम मिल जायत । भरि दिन काज करैत-करैत थकि जायत छी । एहि पर सुषमाजी कहलखिन - माँ जी,अहाँ तऽ जानवे करैत छी भरि काज करैत-करैत हम थाकि जायत छी आ सप्ताह मे एक दिन तऽ आराम करवाक लेल छुट्टी मिलैत अछि । अहु दिन आराम नहि करी तऽ फेर आगु कोना काज करव ।अहाँ तऽ भरि दिन घर पर रहैत छी । अहाँ तऽ घरक काज संभालि सकैत छी । सुषमाजीक ई बात हुनका तीर जकाँ लागल । ओ सोचैत छलीह जे नौकरी करनाई के काज कहल जायत अछि आ घरक काज के कोनो अहमियत नहि अछि की ? आव तऽ लीलाजी बहुक लेल नौकरानी भऽ गेल छलीह । भरि दिन काज करैत रहु जाहि मे कोनो गलती भऽ गेल तहन बात सुनु । मन खराव रहै वा नीक घरक सभटा काज करनाई आवश्यक छल । मन खराब रहलाक वावजूद भरि दिन रोहनक देखभाल करनाई, रोहनक खाना बनेनाई आदि सभटा काजक जिम्मेदारी लीलाजी पर छल । रातिक खानाक बाद रोहन हिनका लग सुतैत छल किएक तऽ राति मे ओ दूध पीवाक लेल उठैत छल । एक रातिक बात अछि रोहन नीन मे छल मुदा लीलाजीक आँखि सँ नीन गायव छल । बिछौना पर लेटल किछु सोचि रहल छलीह । लीलाजी सोचैत छलीह जे आव वर्दाश्त नहि भऽ रहल अछि । आव हमरा अपने किछु निर्णय लिअ पड़त । हमरहुँ जीवनक किछु मोल अछि । ई साबित करनाई हमर कर्त्तव्य अछि । हम सुषमाक कतेक तिरस्कार सही ? ओ सोचि रहल छलीह जे रिश्ता के जबरदस्ती बाँधि के रखनाई नीक नहि होयत अछि । जखन कि एक पक्ष रिश्ता राखऽ चाहैत अछि आ दोसर पक्ष ओकर मोल नहि दैत अछि । लीलाजीक सब्रक बाँध टुटि गेल छल । आव ओ सोचलथि जे हम एहि घर मे नौकरानीक जीवन नहि जिअव । आव सुषमा के सीख देनाई आवश्यक अछि ।
एक दिनक बात अछि भिनसरे लीलाजीक फोनक घंटी बाजल । मोबाईल पर अपन सहेलीक नाम देखलखिन । फोन देखि ओ कहलनि आई भोरे-भोर फोन केलहुँ अछि, कोनो खास बात तऽ नहि अछि ? एहि पर ओ कहलनि - लीला, हम सव गंगा स्नानक लेल बनारस जा रहल छी । हमरा आँगन सँ आओर लोकनि जेथिन । अहुँ चलव की ? ओना तऽ अहाँ सव बेर कहैत छी जे हम कोना जायव ? घर के संभालत ? तैयो हम सोचलहुँ जे अहाँ सँ पुछि ली । संग चलव तऽ दूनु गोटे काशी- विश्वनाथक दर्शन कऽ लेव । ई सुनि लीलाजीक माथ ठनकल । गंगा स्नान केला कतेक दिन भऽ गेल अछि । घरक काज, रोहनक जिम्मेदारी आ कनियाक ताना सभ जिनगी के बोझ बना देने छल, मुदा आई सखीक आवाज सुनि बिना ओ किछु सोचने लीलाजी कहलीह - हाँ सखी, हम चलव । ठीक अछि काल्हि हम सव गंगा स्नानक लेल बनारस जायव । दूनु गोटे बनारस जयवाक लेल तैयार भऽ गेलीह । फोन राखि ओ सुषमा सँ कहलखिन - कनिया, गंगा स्नानक अहाँक छुट्टी अछि की नहि ? ओहि पर सुषमा कहलनि - हाँ माँ जी, अखन गंगा स्नान आ रवि लगा कऽ लगातार तीन दिनक छुट्टी अछि । ई सुनि लीलाजी कहलनि - कनिया , हमर इच्छा होयत अछि जे गंगा स्नान कऽ आवि । कनिया काकीक आँगन सँ कतेको लोकनि जा रहल अछि । आई भिनसरे हमर सखी फोन केने छलीह । हुनके सवहक संगे हम बनारस जा रहल छी । बौआ के सेहो छुट्टी होयत दूनु प्राणी मिल रोहन के संभालि लेव । एहि पर सुषमाजी कहलनि - ठीक अछि माँ जी, एक दुई दिनक तऽ बात अछि, ओहुना हम घर पर रहव । अहाँ जाउ गंगा स्नान कऽ आवु । सुषमाजी मने मन सोचि रहल छलीह जे चलु एक-दुई दिन तऽ घर मे शान्ति रहत । रोहन के संभालनाई कोनो पैघ बात नहि अछि । माँजी छुट्टीक दिन सेहो हमरा सुतऽ नहि दैत छथि । आव दू दिन देर धरि सुतव । लीलाजी के साँझ मे ट्रेन छल । दिन मे रोहन के संभालैत अपन यात्राक तैयारी केलथि । साँझ मे ट्रेन पकड़वाक लेल स्टेशन चलि एलीह ।
दोसर दिश सुषमाजी फोन पर अपना माय सँ बात करैत छलीह तखन रोहन सुति रहल । रातिक भानस बनल छल । सुषमाजी भनसा घर गेलीह तऽ देखैत छथिन जे रातिक भानस भेल अछि । ओ खाना खा लेलथि । देर राति हुनकर पतिदेव घर एलाह तहन सुषमा जी गहींर नीन मे छलीह ।बहुत घंटी बजेलाक बाद उठलीह । अधनीने किवाड़ खोललथि । पतिदेवक एलाक बाद सुषमाजी पूछलखिन - खाना खायव गरम कऽ दी ? एहि पर ओ कहलनि - खाना गरम भऽ जायत तहन नीक रहत । खाना खा कऽ ओ सुति रहलाह । थोड़े देरक बाद रोहन जोर-जोर सँ कानऽ लागल । राति मे ओ खाना खा के नहि सुतल छल ताहि सँ भूखे ओ कानि रहल छल । ओना तऽ रोहन राति के दादी लग सुतैत छल । राति मे रोहन के दूध देवाक जिम्मेदारी दादी पर छल, मुदा आई दादी के नहि रहलाक कारण ई जिम्मेदारी सुषमाजी पर आवि गेल छल ।सुषमाजी दूध गरम कऽ रोहन के बोतल थमा देलखिन । रोहन दूध पीव बिछौना पर खेलऽ लागल । रोहन के नहि सुतलाक कारण सुषमाजी सेहो नहि सुतलथि । भोरवा मे फेर रोहन सुतल तहन सुषमाजी के चैन मिलल ।तहन सुषमाजी सेहो सूति रहलीह, मुदा थोड़े देरक बाद घरक घंटी बजल । सुषमाजी चिरचिरा कऽ मने मन कहलखिन - पता नहि एते भिनसरे के छथि ? विछौना पर सँ उठि किवाड़ खोललथि तऽ देखलखिन जे दूधवाला ठाढ़ अछि। दूध लऽ के चूल्हा पर गरम होयवाक लेल राखि देलखिन । आ बिछौना पर आवि लेट गेलथि । चूँकि राति मे ओ नहि सुतल छलीह तें हुनका नीन आवि गेल । झपकी लागैत छल कि दाई घरक घंटी बजेलक । किवाड़ खोललाक बाद यादि एलेन जे दूध चूल्हा पर राखल छल । भनसा घर गेलखिन तऽ देखैत छथिन जे दूध उबालि कऽ चूल्हा पर गिरल अछि । सुषमाजी दाई सँ ओ साफ करेलथि । सुषमाजी मुँह हाथ धो के चाय बना कऽ घरवाला के उठेलथि । मुदा ओ कहलखिन - हम अखन चाय नहि पीयव, हमरा अखन सुतऽ दिअ, ई कहि ओ सुति रहलाह । ओ अकेले चाय पीव भानस बनयवाक लेल तरकारी काटैत छलीह तखन रोहन जागि गेल आ जोर जोर सँ कानऽ लागल । तरकारी बनेनाई छोड़ि सुषमाजी रोहन के कोरा मे लेलखिन, मुदा ओ चुप नहि भेल । तहन रोहन के कोरा मे लऽ के घुमावैत छलीह, तैयो ओ चुप नहि भेल । एकर बाद सुषमाजी अपना घरवाला सँ कहलखिन - सुनै छी ? कनि बौआके देखू हम एकरा लेल दलिया बना दैत छी, ओ खा लेत तहन चुप भऽ जायत । एहि पर ओ गुस्सा सँ कहलखिन - हमरा सुतऽ दिअ नीन लागल अछि । ई कहि ओ सुति रहलाह । सुषमाजी रोहन के कोरा मे नेने भनसा घर मे आवि दलिया बनेलथि आ ओकरा खुआ देलखिन । तकर बाद सुषमाजी तरकारी बनाव’क लेल बैसलीह मुदा रोहन बेर-बेर हुनका लग आवि तरकारी नहि काटऽ देलक ।थोड़े देरक बाद हुनकर घरवाला उठलथि तऽ कहलनि- चाय मिलत की नहि ? सुषमाजी कहलनि जे रोहन के देखू तहन हम चाय बना दैत छी । ई कोनो काज नहि करऽ दैत अछि । सुषमाजी चाय बना कऽ देलखिन । एकर बाद रोहन पोट्टी केलक ताहि लेल साफ करवाक लेल बाथरूम मे गेलथि । रोहन ततेक हाथ पाइर मारैत छल जे अकेले साफ करवा मे बड्ड परेशानी भेलनि । रोहन आ सुषमाजीक सभटा कपड़ा भींग गेल । बाथ रूम सँ बाहर आवि पहिले रोहनक कपड़ा बदलि देलखिन तकर बाद ओ स्नान करऽ चलि गेलीह । रोहन के बाथ रूम के सोझा मे बैसा देलखिन । नहेलाक बाद हुनका भूख लगलनि, मुदा भानस नहि बनल छल । मोबाईल सँ खाना आर्डर केलनि तहन खाना खेलथि । तकर बाद घरक काज मे जुटि गेलीह । भरि दिन कोना बीतल तकर पता नहि चलल । रोहन के पाछु-पाछु लागल पुरा दिन बीत गेल । साँझ मे सुषमाक माय सव दिन जकाँ फोन केलखिन मुदा हुनका समय नहि मिलल जे फोन पर बात करथिन । फोन उठा कऽ माय सँ कहलखिन - माय ! आई हमर सासु माँ नहि छथिन, ओ गंगा स्नान गेल छथि ताहि सँ समय नहि अछि जे बेसी बात करव । आई परेशानी बेसी भऽ गेल अछि, दिन मे खाना सेहो नहि बनेने छलहुँ । रोहन के सुता रहल छी, ओ सुतत तहन भानस होयत । रोहन के सुता कऽ सुषमाजी भानस केलथि । दूनु प्राणी खा रहल छलीह कि रोहन उठि गेल आ कानऽ लागल । सुषमाजी खाना छोड़ि रोहन के कोरा मे लेलनि आ पतिदेव सँ कहलनि - अहाँ पहिले खाना खा लिअ तहन हम खाना खायव । घरवाला के खाना खेलाक बाद ओ खाना खेलीह । सुतऽ सँ पहिले ओ रोहन के खाना बना कऽ खिलेलथि । रोहन खाना खेलाक बाद बिछौना पर खेलऽ लागल । सुषमाजीक लाख प्रयासक बादहु रोहन नहि सुतल । राति के १२ बजि गेल मुदा रोहन नहि सुतल । रोहन के जागलाक कारण सुषमा सेहो नहि सुतैत छलीह । काल्हि राति सेहो ढंग सँ नहि सुतल छलीह । आव हुनका एहसास भेलनि जे हुनकर सासु माँ कतेक कठिन सँ रोहन के लालन-पालन करैत छथि । दोसर दिन फेर वएह दिनचर्या भेल दुई दिन मे सुषमाजी परेशान भऽ गेलीह । दुई दिनक बाद सुषमाजी गंगा स्नान सँ एलीह तहन हुनका आराम मिलल । तकर बाद सुषमाजी घरक काज मे हाथ बटावऽ लागलीह ।
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