प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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परमानन्द लाल कर्ण                                                                         

बाबुजीक  सबक

मोहनलाल जी अपना कोठरी मे राखल कुर्सी पर बैसल छलाह । हुनकर बड़की पुतोहु राखी हुनका कोठरी मे आवि रूखल आवाज मे कहलनि - बाबुजी, अपनेक चाय राखि  देलहुँ अछि । चाय पी लेव, नहि तऽ सरा  जायत । मोहनलालजी धीरे-धीरे उठलाह आ चायक कप हाथ मे लेलथि । एक घूँट चाय पीव फेर चायक कप राखि देलखिन किएक  तऽ चाय मे चीनी बेसी पड़ि गेल छल, ओ सदिखन कम चीनीक चाय पीवैत छलाह । हुनकर मन उदास भऽ गेल । ओ चुपचाप अपना कोठरी सँ निकलि भनसाघर मे गेलाह, जाहि ठाम हुनकर पुतोहु काम कऽ रहल छलीह । धीरे सँ ओ कहलनि - कनिया , अहाँ जानैत छी जे हमरा शुगरक बीमारी अछि तैयो एतेक मीठ चाय बना कऽ हमरा देलहुँ  । ई  सुनि ओ कहलनि - बाबुजी, हमरा लग एतेक काम रहैत अछि, हम कोन-कोन बातक ध्यान राखी ? चाय के लेल अहाँ छोटकी कनिया के सेहो कहि सकैत छी । घरक सभटा  जिम्मेवारी हमही उठा लेलहुँ अछि । मोहनलालजी किछु कहऽ चाहैत छलीह तखनहि  छोटकी पुतोहु  जेकर नाम रश्मी छल,ओहि ठाम आवि गेलीह आ कहलनि - वाह दीदी ! अहाँ भरि  दिन कोन पहाड़ तोड़ैत रहैत छी ? भिनसर आ रातिक भनसा अहाँ करैत छी आ बाकी सभटा काम तऽ हमही करैत छी । भनसा घरक माहौल अचानक भारी भऽ गेल आ एक बेर घर मे जंगक शुरुआत भऽ गेल छल । दूनु दिआदीनक बीच बाताबाती होमय लागल । छोट-छोट शिकायत ताना मे बदलि गेल आ ताना झगड़ा मे बदलि गेल । बड़की दिआदनी ऊँच आवाज मे अपन जिम्मेवारी गिनावैत लागल तहन छोटकी दिआदनी कहाँ पाछु रहऽवाली छलीह । ओ हुनकर सव बातक उलाहना दैत छलीह । ई बाताबाती सुनि मोहनलालजीक मन आओर भारी भऽ गेल आ अपना कोठरी मे आवि गेलाह । हुनकर डेग भारी छल आ मन भरल छल, जे सव दिनक दिनचर्या छल ।

 

राति मे दूनु भाई आशीष आ सुमन भोजनक लेल बैसलाह । एक कौर खेलाक बाद सुमन कहलनि - भाभी, आई तरकारी मे नून देनाई भुलि  गेलहुँ अछि । राखी किछु कहऽ चाहैत छलीह तखनहि  छोटकी दिआदिनी तंज कसैत कहलनि - दीदी के ध्यान रहनि तहन ने नून डालथिन । हिनकर ध्यान तऽ सदिखन झगड़ा झंझट पर रहैत छैन । ई  बात सुनैत राखीक मुँह गुस्सा सँ लाल भऽ गेल आ कहलनि -  बौआ, अहाँ अपना घरवाली के समझा दियौन नहि तऽ काल्हि सँ भानस अपने बना लेव । ई सुनि छोटकी दिआदिनी  जेकर नाम रश्मी छल ओ कहलनि - हाँ दीदी, हम बना लेव आ अहाँ सँ नीक जकाँ बना कऽ देखा देव । ई सभ सुनैत पैघ भाई आशीष कहलनि - अहाँ दूनुक उतराचौरी कखनहु खत्म नहि होयत । जखन देखू तखन शुरू भऽ जायत छी । सुमन सेहो ई सभ सुनि खाना नहि खेलथि आ उठि कऽ बाहर चलि गेलाह । मोहनलालजी ई सब देखैत चुप -चाप अपना कोठरी मे आवि गेलाह ।

 

राति के एक बजि  रहल छल सव लोकनि सुतल छलाह, मुदा मोहनलालजीक  आँखि सँ नीन गायब छल । बेर-बेर करोर फेरैत छलाह, धीरे सँ ओ उठि बत्ती जला कऽ बिछौना पर बैसि गेलाह । सोझा मे हुनकर घरवाली शांतिक फोटो टांगल छल, ठाढ़ भऽ मने-मन कहलथि - शांति अहाँ देखैत छी ने ? एहि घर मे शांतिक छोड़ि सव किछु अछि । आई  बेटा थारी पर सँ बिना खेने उठि गेल आ दूनु पुतोहु एक दोसर सँ नीचा देखावऽ मे कनिको कसर नहि छोड़लथि । अहाँ कहैत छलहुँ जे घर ईंट पाथर सँ नहि आपसी प्रेम सँ बनैत अछि । आई  एहि घर मे प्रेम खत्म भऽ गेल अछि । हमरा बुझना जायत अछि जे हम एहि ठाम बेसी दिन नहि सहि सकव । तखनहि मन मे ख्याल एलनि जे शांति सदिखन कहैत छलीह जे जखन घर अशांत भऽ जाय तहन चुप-चाप नहि बैसवाक चाही । घर मे अमन कायम करवाक लेल किछु ने किछु जरुर करवाक चाही । ओ अपन पुरान कपड़ा झोरा उठेलथि जाहि मे किछु कागज - पतर, किछु नुआ आ दवाई लेलथि । विछौनाक नीचा सँ चप्पल निकालि पहिरलथि । अपना कोठरी सँ धीरे धीरे बाहर आवि गेलाह । मोहनलालजी अपन कान्ह पर झोरा टाँगि अन्हरिया राति मे गली सँ बाहर आवि गेलाह । घर मे ककरहु कोनो खबर नहि भेल । भिनसर जखन घरक लोकनि जागलथि आ मोहनलालक पुतोहु एक कप मे कम चीनीक चाय बना कऽ भरल मन सँ मोहनलालजीक  कोठरी मे एलथि तहन ओ देखैत छथिन जे कोठरीक  दरवाजा थोड़ेक खुलल अछि । कोठरीक अंदर आवि मेज पर चायक  कप राखैत ओ कहलनि - बाबुजी, अहाँक चाय अछि, मुदा कोनो जबाव नहि मिलल तहन बिछौना पर नजरि घुमा कऽ देखैत छथिन जे हुनकर ससुरजी बिछौना पर नहि छथि । हुनकर झोरा सेहो नहि टांगल छल । राखीक माथ पर चिंताक लकीर उभरि गेल । ओ जोर सँ अपना घरवाला  के आवाज देलखिन - सुनै छी ? बाबुजी घर मे नहि छथि।देखू कोन ठाम गेलथि ? आशीष कहलनि जे एतेक भिनसर कोन ठाम गेल हेताह ? बाहर घुमवाक लेल गेल हेथिन थोड़ेक देर मे आवि जेताह । भऽ सकैत अछि कोनो मंदिर व पार्क मे गेल हेताह । बुढ़ मे नीन सेहो कम आवैत अछि ।

 

मोहनलालजी राति मे एकटा होटल मे रुकि गेलाह । भिनसरे अपन संगी जिनकर नाम रमेश छल हुनका घर पर आवि अपन जायदादक सम्बन्ध मे बात केलनि । रमेश ओहि ठामक  नामी वकील छलाह । मोहनलालजी कहलनि हमरा जीता जिनगी हमर जायदाद पर किनको हक नहि होय तकर व्यवस्था कऽ दिअ आ एकर बाद एकटा वसीयत बना दिअ ताकि हमर दूनु बेटा आपसी ताल मेल सँ जीवन वसर कऽ सके । एहि बात पर वकील साहब कहलनि - ठीक अछि , हम कागज तैयार कऽ देव । चूँकि अहाँक सभटा  जायदाद स्वअर्जित अछि तें अहाँक जीता जिनगी किनको अधिकार नहि छैन । जहाँ धरि वसीयतक  सम्बन्ध अछि हम बना देव  । हुनका सँ बातचीत कऽ ओ घर पर चलि एलाह । चूँकि ओ गुस्सा मे राति मे घर सँ बाहर गेल छलाह तें ओ चुप-चाप अपना कोठरी मे आवि गेलाह । घर एला पर राखी कहलनि - बाबुजी, भिनसरे चाय लऽ के आयल छलहुँ तहन अहाँ नहि छलहुँ । कोन ठाम गेल छलहुँ  ? एहि पर मोहनलालजी कहलनि - की कहु कनिया, अहाँ सभहक  उतारा चौरी सँ हम परेशान भऽ गेलहुँ अछि । घर अशांत भऽ रहल अछि ।हम की करी जे घरक सव लोकनि नीक जकाँ रहैथि । ई सुनि राखी चुप-चाप रहि  गेलीह । मोहनलालजी के लेल चाय बना कऽ देलखिन, चाय मे कम चीनी छल । मोहनलालजी चाय पीव अपना बिछौना पर बैसि रहलाह ।

 

किछु दिनक बाद मोहनलालजी अपन बड़का बेटा आशीष के बजेलखिन आ कहलनि - बौआ, हम बड्ड चिंतित छी जे एहि घर मे ककरो सँ कोनो मेल जोल नहि रहैत अछि ताहि सँ हम चिंतित छी । एहि पर आशीषजी कहलनि - बाबुजी, की कएल जाय ? केओ कोनो बात मानवाक लेल तैयार नहि छथि । मोहनलालजी कहलनि - ठीक अछि, जौं अहाँक बात नहि केओ मानैत छथि तहन हम कोनो ने कोनो उपाय अवश्य करव । अहाँ पैघ छी तें अहाँ सँ कहि रहल छी ।अहाँ एक बेर सव सँ कहु, जौं अहाँक बात नहि मानताह  तहन हम सोचव ।

 

एक दिनक बात अछि आशीषजी सुमन सँ कहलनि - छोटे, बाबुजी हमरा सँ कहि रहल छलाह जे घर मे मेल-जोलक कमी अछि, तें हम चिंतित छी । हमरा विचार सँ अहुँ अपना कनिया सँ कहु जे घर मे कोनो तरहक झगरा झंझट नहि करथि । हमहु अहाँक भाभी सँ कहि रहल छी जे घर मे कोनो तरहक विवाद नहि करु । घर मे जतेक शांति रहत ततेक नीक रहत । सुमन कहलनि - ठीक अछि भैया हम कहैत छी । घर मे आवि सुमनजी अपना कनिया सँ सभटा बात कहलखिन । मुदा हुनकर कनिया उल्टे हुनका कहऽ लागलखिन जे दीदी भरि दिन बैसल रहैत छथिन आ हम भरि दिन खटैत रहैत छी । ई कोना होयत ? जौं दिक्कत अछि तहन दूनु आदमी अपन-अपन काम करु । दीदी केवल भानस करैत छथिन तकर बाद सभटा काम हमरा पर छोड़ि दैत छथिन । घर साफ करनाई, बरतन साफ करनाई, नुआ वाशिंग मशीन मे रखनाई आ सुखेनाई सभटा काज हम करैत छी तकर बाद कखनो-कखनो तरकारी सेहो बना दैत छी । हम एहि सँ बेसी नहि कऽ सकैत छी । रश्मिक ई बात सुनि सुमनबाबू  चुप रहि गेलाह । दोसर दिश आशीषजी अपना कनिया सँ कहलनि जे बाबुजी हमरा कहैत छलाह जे घर मे सदिखन षड़मंडल होयत रहैत अछि । तें हमर विचार अछि जे सव केओ मेल - मिलाप सँ रहु । एहि पर हुनकर कनिया कहलनि जे हम की करी ? भानस करनाई आ छोट बच्चाक  संभालनाई मे की परेशानी होयत अछि से हमही जानैत छी । छोटकी तऽ अखन अखुल्ला छथिन । भरि दिन फोन पर बात करैत रहैत छथि । हम बच्चाक लऽ के परेशान छी ।हमरा सँ जतेक सम्भव होयत अछि ततेक हम करव ।

 

एक दिनक बात अछि राखीक नैहर सँ किछु लोकनि आयल छल । राखी भानस बनावैत छलीह । तखन हुनक बालक कानऽ लागल, तहन राखी रश्मि सँ कहलखिन - कनिया कनि भनसा घर मे तरकारी चला देव नहि तऽ जरि जायत, हम बौआ के देखैत छी । एहि पर रश्मिजी कहलनि - दीदी, हम छत पर कपड़ा पसारऽ जायत छी । आँच कम कऽ दिअऊ तरकारी नहि जलत । ई  सुनि राखीक नैहरक  लोकनि कहलनि - बुच्ची अहाँक  दिआदिनी बड्ड ठस-ठस बाजैत  छथि । एहि  पर राखी चुप भऽ गेलीह । तखन तऽ कोनो बात नहि भेल मुदा जखन राखीक नैहरक लोकनि चलि गेलथि तहन ओ आशीष बाबू सँ कहलखिन - हम रश्मि संग नहि रहि  सकैत छी । दूनु आदमी अपन - अपन देखू । आव भानस अलग -अलग बनत एक ठाम आव सम्भव नहि अछि । एहि बातक  जानकारी मोहनलालजी के भेलनि तहन ओ आगि बाबुला भऽ गेलाह  । ओ अपना दूनु बालक के बैसा कऽ कहलनि - बौआ , हम की सुनि रहल छी ? दूनु कनिया कहैत छथिन जे अपन अपन चूल्हा अलग कऽ लिअ ।एहि पर सुमनजी कहलनि - हाँ बाबुजी, भाभी कहैत छलखिन जे जौं दिक्कत होयत अछि तहन चूल्हा अलग कऽ लिअ । मोहनलालजी कहलनि - हमरा जीता जिनगी ई नहि होयत । हमरा अछैत एहि घर मे दुईटा चूल्हा नहि  जलत । जिनका दिक्कत छैन ओ अपन किरायाक पर दोसर घर लऽ सकैत छथि । ई  बात सुनि  दूनु भाय परेशान भऽ गेलथि । ओ अपना अपना घरवाली सँ कहलनि - बाबुजी हमरा दूनु भाई के बुला कऽ ई  बात कहि रहल छलाह तें अहाँ सव मिलजुलि के रहु नहि तऽ बाबुजी अपन कोनो फैसला करताह । राखी आ रश्मि सोचलथि जे जौं एहि घर सँ बाबुजी निकालि देताह तहन कोन ठाम जायव ? ई  सोचि दूनु दिआदिन मिल-जुलि के रहऽ लगलीह ।

 

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