
परमानन्द लाल कर्ण
बेटाक विवशता
राति के दस बजि रहल छल, बाहर जोरदार बरखा भऽ रहल छल । खिड़कीक शीशा पर पानिक छींटा गिर रहल छल मानु केओ खिड़की थपथपा रहल अछि ।कखनो-कखनो बिजली चमकि रहल छल जेकर उज्जर रोशनी घर मे आवैत छल थोड़े देरक बाद चारु दिश अन्हार भऽ जायत छल । रश्मिजी बिछौना पर बैसल-बैसल बेचैन भऽ रहल छलीह । थोड़ेक-थोड़ेक देर पर घड़ी देखैत छलीह फेर खिड़की दिश देखैत छलीह । मन मे एकटा चिंता सता रहल छलैन जे मोहन अखन धरि किएक नहि एलाह । रश्मिजी घबराईत घरक किवाड़ लग आवैत छलीह आ फेर मायूस भऽ बिछौना पर बैसि जायत छलीह । थोड़े देरक बाद घरक दरवाजाक कुंडी खटखटायल । अन्हार मे घरक दरवाजा खोललथि तहन देखैत छथिन जे हुनकर पुतोहु लीला छलखिन । एहि पर रश्मिजी कहलखिन - कनिया, बौआ नहि एलाह अछि ? लीला कहलनि - माँ जी अहाँ नहि घबराऊ, ओ जाम मे फँसि गेल हेताह । रश्मिजी राहतक साँस लेलनि, मुदा दिलक धड़कन अखनहु तेज छल । दोसर दिश मोहन मेट्रो मे बैसल सोचि रहल छलाह जे आई बड्ड देर भऽ गेल अछि आ फोन सेहो बंद भऽ गेल अछि । बाहर पानि सेहो पड़ैत अछि, ई सोचि बेचैन छलाह कि मेट्रो स्टेशन पर आवि गाड़ी रुकि गेल । मोहन अपन बैग लऽ उतरि गेलाह । प्लेटफार्म पर उतरला तहन हुनकर एकटा पुरान संगी सुमन हुनकर कान्ह पर हाथ राखलथि । ओ चौंक गेलाह जे पाछु सँ के हाथ राखि रहल अछि । पाछु मुड़ि के देखलनि जे के छथि, तहन ओ देखैत छथिन जे हमर पुरान संगी मोहन छथि । दूनु एक दोसर के हाल चाल पुछैत प्लेटफार्म सँ बाहर एलाह । बरखाक पानि आओर तेज भऽ गेल छल । रिक्शा पकड़ि घर एलाह, ता धरि ओ भींग गेल छलथि । रिक्शा सँ उतरि घरक घंटी बजौलनि । लीला दौड़ैत आवि घरक किवाड़ खोललखिन । मोहन के देखैत अनायास हुनका मुँह सँ नीकलल जे भगवानक लाख -लाख शुक्र अछि, एहि पानि मे आवि गेलहुँ अछि ।आवाज सुनि रश्मिजी सेहो अपना कोठरी सँ बाहर एलीह आ कहलनि - बौआ, हम दूनु गोटे तऽ परेशान भऽ गेल छलहुँ । अहाँ तऽ भींग गेल छी , चलु कपड़ा बदलू । मोहन कहलनि - माँ, आई बरखा भेलाक कारण मेट्रो मे भीड़ छल जाहि सँ दू-तीन टा मेट्रो छोड़ि देलहुँ । बरखाक कारण थोड़े देरक लेल मेट्रो सेहो बंद भऽ गेल छल,तें थोड़े देर भऽ गेल । लीला तखन एकटा तौलिया दैत कहलनि - अहाँ कपड़ा बदलू, हम खाना निकालैत छी । मोहन सोफा पर बैसि गेलाह । बाहर बरखा रुकैक नाम नहि लैत छल । लीला खाना निकालि मेज पर राखलथि । दूनु गोटे खाना खा कऽ बिस्तर पर गेलाह तहन लीला सँ कहलनि - लीला,आई मेट्रो मे हमर कालेजक संगी सुमन मिलल छल । ओ एहि शहर मे रहैत छथि । हमर विचार अछि जे हुनका सँ मिलवाक लेल अहुँ चलु । ई सुनैत लीला कहलनि - अहाँक पुरान संगी छथि पहिले अहाँ हुनका सँ मिल आवु, एकहि शहर मे छथि बाद मे हम मिल लेव । मोहन सुमनजीक घर पर गेलाह तऽ हुनकर व्यवस्था देखि दंग रहि गेलाह । मोहन कहलनि - अहाँ तऽ नीक नौकरी करैत छी , अहाँक बराबर हम नहि कऽ सकैत छी । एहि पर सुमनजी कहलनि - अहाँ तऽ हमरा सँ नीक जकाँ पढ़ैत छलहुँ, अहाँक जानकारी सेहो नीक अछि । जौं अहाँ चाहव तऽ हमरा सँ नीक कमा सकैत छी । जाहि कम्पनी मे हम काम करैत छी, ताहि मे जौं काम करी तऽ हम पता लगवैत छी जे अहाँक लायक कोनो काम होयत तहन हम कहव । ओना हम एहि कम्पनी के छोड़ऽ चाहैत छी । हमरा एहि सँ बेसी पेकैजक ऑफर लेटर आवि गेल अछि । तीन मासक बाद हम ई कम्पनी छोड़ि देव । मोहन कहलनि - जखन हम अपना कम्पनी मे दरमाहा बढ़ावऽ लेल कहैत छी, तहन सीधे नकारि दैत अछि । हमहुँ चाहि रहल छी जे ई कम्पनी छोड़ि दोसर कम्पनी पकड़ि ली । ओना ईश्वरक इच्छा । अपना संगी सँ मिल जुलि के घर एलाह ।
किछु दिनक बाद एक कम्पनी मे नव नियुक्ति हेतु विज्ञापन देखलथि, जाहि मे आवेदन दऽ इंटरव्यू देलखिन । एहि कम्पनी मे मोहन के मैनेजर पदक लेल चयन भऽ गेल । मोहन कम्पनी मे अपन योगदान दऽ देलथि । आव हुनक दरमाहा सेहो बढ़ि गेलनि । मोहन नीक जकाँ अपन जीवन वसर करैत छलाह । मोहन लीला दूनु नौकरी करैत छलाह आ रश्मिजी हुनक बालक रोहनक देखभाल करैत छलीह । रोहन जखन छोट छल तहन हुनकर सभ नेकरपन रश्मि जी करैत छलीह । रोहन जखन पाँच बरीख के भेल तहन हुनकर नाम एक स्कूल मे लिखा देलखिन । आव रोहन के स्कूल लीलाजी पहुँचा दैत छलखिन, मुदा स्कूल सँ घर पर आनवाक भार रश्मिजी पर छल । समय नीक जकाँ बीत रहल छल । लीला सेहो अपना भरि मिहनत करैत छलीह । धीरे- धीरे रश्मिजीक उमिर अधिक भऽ गेलाक कारण रोहनक देखभाल ठीक सँ नहि कऽ पाबैत छलखिन । एक दिन मोहन के कहलनि - बौआ, हमर मन खराव रहैत अछि , एहि दशा मे रोहन के स्कूल सँ आनऽ मे दिक्कत होयत अछि । कोनो दोसर व्यवस्था कऽ लेतहुँ तऽ ठीक छल । एहि पर मोहन कहलनि - ठीक अछि माँ, हम कोनो व्यवस्था करैत छी । एहि पर लीलाजी कहलनि - माँ जी, रोहनक स्कूल तऽ बगले मे अछि, कोनो दूर जयवाक तऽ अछि नहि, जे नहि होयत । रश्मिजी चुप भऽ गेलीह, जेना होयत छलैन, ओ करैत छलीह ।रोहन के अपना माय-बाबुजी सँ बेसी दादी सँ लगाव छलनि । रोहन पढ़ाई पुरा केलाक बाद विदेश मे नौकरी करऽ लगलाह, मुदा दादी सँ सव दिन जरूर बात करैत छलथि ।
रोहन के चलि गेलाक बाद रश्मि अकेले रहैत छलीह । मोहन दूनु प्राणी अपना काम पर चलि जायत छलथि आ साँझ मे घर आवैत छलाह । आव रश्मिजी से भानस भात मे सेहो दिक्कत होयत छलैन । दिन मे कहुना तऽ बना लैत छलीह मुदा राति मे हुनका सँ भानस नहि भऽ पावैत छल । लीला अपना ऑफिस सँ आवैत छलीह तहन भानस होयत छल । कहियो- कहियो तऽ एहन भऽ जायत छल जे मोहन दूनु प्राणी बाहर सँ देर राति घर आवैत छलाह, आ भानस नहि बनैत छल । एक समयक बात अछि रश्मिजी भानस नहि भेलाक कारण भूखल सुति रहलीह । भिनसर मे मोहन सँ कहलनि - बौआ, राति हम बिना खेने सुति रहल छलहुँ । जौं अहाँ सव देर राति मे आवि तऽ दिन मे कनि बेसी खाना बनवा लिअ हम वएह राति मे खा लेव । एहि पर लीलाजी कहलनि - माँजी, भरि दिन घर पर रहैत छी । घर मे कतेको सामान रहैत अछि, अहाँ किछु खा सकैत छी । रश्मिजी ई बात सुनि चुप रहि गेलीह ।
एक दिन मोहन के घरवाली कहलखिन - सुनै छी, हमरा गंगा स्नान करवाक इच्छा अछि। जौं हरिद्वार गंगा स्नानक लेल चलितहुँ तऽ नीक होयत । एहि पर मोहन कहलनि - गंगा स्नान कोना जायव । माँ एहि ठाम अकेले कोना रहथिन । हिनका कोन ठाम राखव । अखन ई सभ छोड़ु हमरा सवहक लेल एहि ठाम गंगा अछि । ई सुनि लीलाजी आगि बबूला भऽ गेलीह । ओ कहलनि - एहि सँ अहाँ के हम किछु नहि कहऽ चाहैत छी । कहियो किछु कहलहुँ अछि, कतेक दिन पर इच्छा भेल तैयो अहाँ बहाना बना रहल छी । अहाँ सँ किछु नहि कही, सएह नीक । मोहन बाबू चुप रहि गेलाह । ओहि दिन लीला जी गुस्सा सँ भानस नहि बनेलखिन । मोहन दूनु प्राणीक ई बातचीत अपना कोठरी मे बैसल रश्मिजी सुनि रहल छलीह । तखन ओ मोहन सँ किछु नहि कहलखिन मुदा दोसर दिन मोहन सँ कहलनि - बौआ,कनिया गंगा स्नानक लेल कहैत छलखिन तहन अहाँ मना किएक कऽ देलहुँ । अहाँ दूनु गोटे जाउ गंगा स्नान कऽ आवु । एहि पर मोहन कहलखिन - माँ, हुनकर इच्छा छैन जे हरिद्वार जा के गंगा स्नान करी । हरिद्वार मे गंगा स्नान करवा मे कम सँ कम एक सप्ताह समय लागत । ट्रेन मे तुरत टिकट सेहो नहि मिलत आ अहाँ के असगरे छोड़ि हम कोना जायव । एहि पर रश्मि जी कहलनि - बौआ हमर चिंता छोड़ि दिअ, हम केहुना रहि जायव । अच्छा माय सोचैत छी जे की कएल जाय । साँझ मे लीला जी मोहन सँ कहलनि - हम एकटा एजेंट सँ बात केलहुँ अछि टिकट मिल जायत । माँ के एक सप्ताहक लेल कतहुँ राखि दियौ । हम सव आयव तहन हुनका लऽ आयव ।मोहन कहलनि - अखन किनका लग माँ के राखल जाय से बताऊ । एहि पर लीलाजी कहलनि - माँ के एक सप्ताहक लेल वृद्धा आश्रम मे राखि दियौ । हम सव गंगा स्नान सँ आयव तहन हुनका लऽ आयव । ठीक अछि माय सँ पुछैत छी हुनकर की विचार छैन, तहन हम किछु कहव । दोसर दिन मोहन अपना माय सँ कहलनि - माय, अहाँक पुतोहु गंगा स्नान जयवाक ले जिद्द ठानने छथि, ओ कहैत छथिन जे माय के वृद्धा आश्रम मे एक सप्ताहक लेल राखि दियौ आ गंगा स्नान कऽ के आयव तहन एहि ठाम लऽ आयव । हम की करी से नहि बुझना जायत अछि । एहि पर रश्मि जी कहलनि - ठीक अछि। हमरा वृद्धा आश्रम मे पहुँचा दिअ अहाँ सव घुमि आवु । मोहन कहलनि - माय, अहुँ चलु गंगा स्नान कऽ लेव । एहि पर रश्मिजी कहलनि - अहाँ सव घुमि आवु बाद मे देखल जायत । दोसर दिश लीलाजी हरिद्वारक टिकट लऽ आनलथि आ कहलनि जे ओही ठाम सँ हम दूनु आदमी ऋषिकेश जायव आ तकर आगु नीलकंठ महादेव मंदिर सेहो जायव अहाँ अपना ऑफिस सँ १५ दिनक छुट्टी लऽ लेव । मोहन बाबू विवश भऽ ऑफिस सँ १५ दिनक छुट्टी स्वीकृत करेलथि । हरिद्वार जाय सँ पहिने ओ रश्मिजी के वृद्धा आश्रम पहुँचा देलखिन । दूनु प्राणी हरिद्वार चलि गेलथि ।
हरिद्वार सँ लौटलाक उपरांत मोहन लीला सँ कहलखिन - आव माय के वृद्धा आश्रम सँ लऽ आनैत छी । एहि पर लीलाजी कहलनि - पहिले माँ के देख आवु खुश सँ छथि की नहि जौं खुश सँ हेथिन तहन हुनका ओहि ठाम रहऽ देव । जौं कोनो प्रकारक कष्ट होनि तहन लऽ आनव किएक तऽ एहि ठाम भरि दिन अकेले रहैत छथि, हम दूनु आदमी तऽ चलि जायत छी, दोसर दिश हम सव बाहर सँ कोनो पार्टी कऽ के आवैत छी तहन ओ भूखले रहि जायत छथि । सव बात सोचि कऽ कोनो निर्णय लेव । रवि के छुट्टी भेला पर मोहन बाबू वृद्धा आश्रम माय के लावऽ गेलथि । माय के गोर लागि कहलनि - माय, चलु आव हम सव हरिद्वार सँ आवि गेलहुँ अछि । एहि रश्मिजी साफ मना कऽ देलखिन जे बौआ घर सँ नीक हम एहि ठाम रहैत छी । अहाँ दूनु गोटे तऽ काम पर चलि जायत छी, हम असगरे टौआति रहैत छी । एहि ठाम बुढ़ सवसँ बातचीत करैत दिन काटि जायत अछि ।मोहन निराश भऽ घर लौटि एलाह । लीला सँ कहलनि - माय, वृद्धा आश्रम छोड़ि एहि ठाम नहि एतीह । ओ कहलनि जे हम एहि ठाम ठीक छी। मोहन बाबू विवश भऽ रहि गेलाह ।
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