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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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डॉ. ललन कुमार झा

म.म. उमापति ओ शुद्धि निर्णय

म. म. उमापति विरचितशुद्धि निर्णय मैथिल धर्मशास्त्र निवन्ध ग्रन्थमे महत्वपूर्ण स्थान रहैत अछि। विद्वान् लोकनिक द्वारा आदृत एहि ग्रन्थमे वर्णाश्रम धर्मानुसार जनन, मरणाशौच आओर ओकर शुद्धि सार रूपमे निरुपित कएल गेल अछि। शास्त्रमे व्यापक दृष्टिसँ सकल देशाचारक अनुसारेँ व्यवस्था देल जाइत अछि जाहिमे अपन देशक व्यवस्थाक अनुसारेँ आचरण करए इएह मर्यादा अछि। आन देशीय व्यवस्था शास्त्रानुकूल भेलोपर त्याज्य अछि। एहि ग्रन्थमे शास्त्रानुकूल सेहो कनेको व्यवस्था मिथिलाक व्यवहारक विरुद्ध अछि जकर टिप्पणी करणक चर्चा सेहो कएलन्हि अछि आओर समाधान सेहो निकालल गेल अछि। एहिसँ प्रकृत ग्रन्थक उपयोगिता बढ़ि गेल अछि। कतए अशौच होइत अछि कतए नहि होइत अछि, कतेक समयमे आओर कोन विधिसँ ओकर शुद्धि होअए, एहि सम्बन्धमे ई पुस्तक निश्चयत: प्रामाणिक अछि। एहिठाम अनेक धर्मशास्त्रक बचनक जालकेँ छोड़ि कऽ सार रूपसँ एक निर्णयक उपस्थापना कएल गेल अछि आओर ओकरा विषयमे अनेक विषय सेहो संक्षेपमे कहल गेल अछि।

प्रकृत ग्रन्थमे निम्नलिखित विषयक प्रतिपादन भेल अछि- चातुर्वर्ण्याशौचम्, सपिण्डादिलक्षणम्, अशौचसंस्कार, विदेशस्याशौचम्, बालापशौचम्, स्त्र्यशौचम्, गर्भस्रावाशौचम्, मृत्युविशेषाशौचम्, सपिण्डाद्यशौचम्, निर्हाणाद्यशौचम्, अथाधिकारिण:, अनधिकारिण:, उदाकानर्हा/, सन्यासिनाम् एकोदिष्ट विचार:।

 

चातुर्वर्ण्याशौचम् :-

सपिण्ड ब्रह्मणक मृत्यु भेलापर ब्राह्मण दशशन्तिमे शुद्धि प्राप्त करैत अछि। एहि तरहेँ क्षत्रिय बारह, वैश्य पन्द्रह तथा शुद्र एक मासमे शुद्ध होइत अछि। चारू वर्णमे सकुल्यक मरलापर तीन राति, कुलजक मरलापर पक्षिणी तथा गोत्रजक मरलापर स्नान मात्रसँ शुद्धि होइत अछि।

 

सपिण्डादिलक्षणम् :-

सपिण्डा: सप्तपुरुषावध्य: - एकर भाव स्पष्ट करैत टिप्पणीकार श्री कृष्ण ठाकुर कहैत छथि जे बीजी पुरुषसँ आरम्भ कऽ सप्तम पुरुष पर्यन्त सभ संततिवला तथा सन्ततिक सपिण्ड्य होइत अछि। अपन वंशक सप्तम पीढ़ीसँ बादवला दश पुरुष धरि सकुल्य कहबैत अछि। ओकर पश्चात् जन्म आओर नामक ज्ञान भेला धरि कुलज कहबैत अछि। दश- पुरुषान्तर गोत्रज मात्र कहबैत अछि। कुमारि कन्याक सापिण्ड्य पिताक संग तथा विवाहिताक पतिक संग होइत अछि।

 

अशौचसंस्कार :-

दस दिन पर्यन्त अशौचक अवधिमे पॉंचम दिन पर्यन्त सजातीय दस दिवसीय अशौच आबि जाए तँ पूर्व अशौचक संग ओकर शुद्धि होइत अछि। ओकर पश्चात् नवम दिन धरि जँ इएह स्थिति आबए तँ द्वितीय अशौचान्तक संग ओ युक्त भऽ जाइत अछि। दसम दिन जँ पुन: सजातीय अशौच भऽ जाए तँ ओहि दिनक बाद  दुइये दिनमे शुद्धि भऽ जाइत अछि। दशम दिन राति शेष रहलापर अरुणोदय बेला धरि जँ अशौच प्राप्त होअए तँ सूर्योदयक पश्चात् तीन रातिक शुद्धि होइत अछि। एहि तरहेँ क्षत्रियादिक अशौचापगमन होइत अछि। जननाशौचक अन्तसँ जननाशौच समाप्त होइत अछि, भनहि अल्पेदिनमे मरणाशौचान्त किएक नहि होअए।

 

विदेशस्याशौचम् :-

बिनु बीतल अशौच कालावधिमे विदेशस्थ व्यक्तिक मृत्युक सूचना प्राप्त भऽ जाए तँ जतेक दिन बँचल अछि ओहिमे अशौचान्त भऽ जाएत। सम्पूर्णाशौच कालक व्यतीत भऽ गेलापर छ: मासक भीतर सपिण्डण मरणक सूचना भेटए तँ तीन रातिमे शुद्धि होअए। नवम मास पर्यन्त एक राति, ओकर बाद एक वर्ष यावत् एक दिन-राति तथा वर्षानन्तर स्नानोदक दान मात्रसँ अशौच समाप्त भऽ जाइत अछि। एक दिनमे जाहि स्थानक समाचार प्राप्त नहि होअए ओ विदेश कहबैत अछि। साठि योजन (240 कोस)क दूरीवला देशान्तर कहबैत अछि। साठि योजनक अभ्यन्तर: सेहो भाषा, भेद-पहाड़, महानदी प्रभृति व्यवधान भेलापर देशान्तर कहाबए लगैत अछि। ओहिठाम मृत्यु भेलापर सद्य: शौच होइत अछि।

 

बालाद्यशौचम् :-

छ: मासक भीतर बालकक मृत्यु भेलापर सद्य: शौच होइत अछि। सप्तम मासक आरम्भ भऽ गेलापर तथा दुइ वर्ष धरि ब्राह्मणमे अहोरात्र अशौच लगैत अछि। उपनयनसँ पूर्व मृत्यु भेलापर तीन राति अशौचक लेल मानल जाइत अछि। क्षत्रियमे सात माससँ दुइ वर्ष धरि मृत्यु भेलापर तीन दिन, तीनसँ छ: वर्ष धरि छ: दिन आओर एकर बाद बारह दिन पर्यन्त अशौच होइत अछि। वैश्यमे सात माससँ दुइ वर्ष पर्यन्त मरलापर तीन दिन ओकर वाद पॉंच वर्ष धरि मृत्यु भेलापर नौ दिन आओर ओकर वाद पन्द्रह दिन अशौच रहैत अछि। शुद्रमे सात माससँ दुइ वर्ष धरि पॉंच दिन ओकर बाद सोलह वर्ष धरि अविवाहितक मृत्यु भेलापर बारह दिन, विवाह भऽ गेलापर आठमे वर्षसँ मासावधि अशौच मान्य अछि। एहि तरहेँ कन्याशौचक व्यवस्था देल गेल अछि।

 

स्त्र्यशौचम् :-

सम वर्णमे दुइ वर्षक कन्याक मृत्यु भेलापर सद्य: शौच होइत अछि। ओकर बाद विवाह पर्यन्त एक अहोरात्र तथा पतिक कुलमे सम्पूर्ण अशौच लगैत अछि। वागदत्ता कन्याक मृत्यु भऽ गेलापर पति आओर पिता दुनू कुलमे त्रिरात्र अशौच होइत अछि। म. म. उमापति विवाहिताक पितृ कुलमे मरब अथवा प्रसव कएलापर माता-पिताक लेल त्रिरात्र अशौच मानलन्हि अछि जँ साम्प्रतिक मैथिल व्यवहारानुसार मातामह पितामह कुलमे पड़एवला सभक लेल त्रिरात्राशौच मान्य अछि। एक परिवारमे रहएवला सहोदर, वैमात्रेय अथवा चाचाक पुत्रक लेल एक रात्राशौचक नाम अछि। पिताक आश्रमसँ भिन्न रहएवला पुत्रक लेल अशौच नहि मानलन्हि अछि :-

पितृर्भिन्ना श्रमवासिनां पुत्रादीनाम् अशौचं न भवति।कन्याक गोत्र पाणिग्रहक गोत्रे होइत अछि। मुदा पाणिग्रहण भऽ गेलापर जँ सप्तपदी, अश्मारोहण समाप्त भेलासँ पूर्वे कन्या वलात् दोसर द्वारा उपहरण कऽ लेल जाइत अछि तँ स्वामीक गोत्र पाणिग्रहणक गोत्र मानल जाएत। पाणिग्रहण आदि वैवाहिक कर्म समाप्त भेलासँ पूर्वे बलात्कारक द्वारा अपृत जाधरि ओकर प्रसव नहि भऽ जाइत अछि ताधरि पितृ गोत्रे मान्य रहैत अछि। प्रसबक पश्चात् पूर्व कृत स्वामीक प्रसव मरणजन्य त्रिरात्राशौच होइत अछि।

 

गर्भस्रावाशौचम् :-

गर्भ स्त्राव भऽ गेलापर सेहो ब्राह्मणादि वर्णक लेल अशौच कहल गेल अछि। मुदा प्रतिकूल साम्प्रतिक समयमे परम्पराक क्रमश: लोप भेल जा रहल अछि।

 

मृत्युविशेषाशौचम् :-

साम्प्रतिक समयमे असमय मृत्युक घटना घटि रहल अछि, जकर अशौचान्त दशमे दिन होइत अछि। मुदा उमापति एकरा विषयमे विशेष व्यवस्था देलन्हि अछि जकरा अनुसारेँ शौच आचमनादि काजमेवृद्ध जे असाध्य रोगसँ ग्रस्त अछि; मरणक इच्छासँ अग्नि-जलादिमे प्रवेश कऽ मृत्यु प्राप्त कऽ जाइत अछि, एहन सपिण्डक मृत्यु भेलापर त्रिरात्र अशौच कहलन्हि अछि। तत्काल अग्नि आदिमे प्रवेश कएलोपर मृत्यु नहि भऽ कऽ बादमे मृत्यु भऽ जाइत अछि तँ त्रिरात्र मात्रक अशौच कहल गेल अछि। रोगादिक कारणेँ अथवा पुत्रादि शोकामिभूत भऽ जँ केओ जलमे प्रवेश कऽ मरि जाए तँ ओकर अग्निदाह तथा तन्जन्य अशौच सेहो निषिद्ध कहलनि अछि। मुदा असावधानी अग्नि, व्रजादिसँ मृत्यु भऽ जाए तँ सम्पूर्ण अशौच मानल जाएत। मुक्का-मुक्की, शस्त्र शून्य झगड़ामे मृत्यु भऽ गेलापर सद्य: शौच कहलन्हि अछि। एहि तरहेँ निवन्धकार अनेक प्रकारक मृत्युमे अशौच नहि मानलन्हि अछि। मुदा आजुक समयमे दशदिनमा शौचक व्यवस्था देखाए पड़ैत अछि।

 

सपिण्डाअशौचम् :-

शुद्धि निर्णयमे सपिण्डमरणे दशाहमशौचंई धर्मशास्त्रीय तत्त्व सर्वत्र आदृत अछि, मुदा सिद्धान्त मात्रसँ।सकुल्यमरणे त्रिरात्रम्। ज्ञातिमरणे पक्षिणी। गोत्रजे मृते स्नानमात्रम्- तँ वृद्ध मुखसँ सुनल दन्तकथा जेना लगैत अछि। उमापति आचार्य मरणे तत्संस्कारकर्त्तु: शिष्यस्य दशरात्रम्। यदि संस्कारं न करोति तदा त्रिरात्रम्। आचार्य पत्नीमरणे तत्पुत्रमरणे गुरुकुलस्यितस्य शिष्यस्य त्रिरात्रम्- सेहो धर्मशास्त्र ग्रन्थोक्त मात्र लगैत अछि। वस्तुत: आइ आचार्य होएब आओर केश वपन कठिन विषय अछि। एहि लेल एहन स्थितिमे विचार करब प्रासंगिक नहि रहि गेल अछि। मुदा उमापति आन जाहि बिन्दुपर विचार कएलन्हि अछि ओहिपर ध्यान देब सामाजिक रूपसँ आवश्यक अछि। उदाहरणक लेल ग्रन्थकार मातामहक मृत्यु भेलापर दौहित्रक लेल त्रिरात्र मातामहीक मरलापर पक्षिणी, मामा, मौसी, ममियौत, दौहित्र, भागिन इत्यादिक मृत्यु भेलापर पक्षिणी अशौचक विधान कएलन्हि अछि। मुदा मातामहकेँ छोड़ि आनक विषयमे जे पक्ष राखल गेल अछि से आइ प्रचलित नहि अछि।

 

निर्हाणाद्यशौचम् :-

धर्मवृद्धिसँ अनाथ मृत ब्राह्मणक शवकेँ उघब आ अन्त्येष्टिमे भाग लेलापर स्नान मात्रसँ शुद्धि कहल गेल अछि, मुदा सम्प्रति ईहो व्यावहारिक नहि अछि। एतए ब्राह्मणादि कोनो वर्णकेँ त्रिरात्र अशौच लगैत अछि। ओना राजनीतिक व्यक्तिक मरलापर, शव उघव एवं संस्कारमे भाग लेलापर केश कर्तनक व्यवस्था शिथिल देखाए पड़ैत अछि। दहादिक पश्चात् मृत सम्बन्धीक घरपर रहब तथा सिद्धान्न खएला पर त्रिरात्र अथवा दश दिनमे शुद्ध होइत अछि।

 

अथाधिकारिण :-

मृत व्यक्तिक तीन क्रिया होइत अछि- पूर्वा, मध्या आओर उत्तर। दाह संस्कारसँ आरम्भ कऽअशौचान्त धरि पिण्डदानादि क्रिया पूर्वा अछि। अशौचान्तक पश्चात् सपिण्डीकरणक पर्यन्त मध्यमा क्रिया अछि तथा ओकर पश्चात् एक्रोदिष्टादि क्रिया उत्तरा कहबैत अछि। एहिठाम प्राचीन व्यवहारानुसार तेरहो पुत्रक अधिकार कहल गेल अछि। मुदा टीकाकार श्री कृष्ण ठाकुर कहलन्हि अछि एहि कलियुगमे औरस, पुत्रिकापुत्र, देत्तक आओर कृत्रिमे पुत्रकेँ श्राद्ध करबाक अधिकार अछि। एहि चारूक अतिरिक्त पुत्रक श्राद्धाधिकार सम्मत नहि अछि। शूद्रमे पौनर्भव (अन्यसँ विवाहिताक पुत्र) पुत्रक सेहो अधिकार देखाओल गेल अछि-

कलौ औरस- पुत्रिकापुत्र- दत्तक- कृत्रिमाणामेव- श्राद्धेऽधिकार:।

एतच्चतुष्टयभिन्ना: पुत्रा ब्राह्मणैर्न कर्त्तव्या: निषेधात्।

अत्र शूद्रस्य पौनर्भवपुत्रोऽव्यधिकारीति विशेष:।।

-शुद्धि निर्णय पृ.- 45

जे स्त्री परित्यक्त अछि अथवा जकर पतिक मृत्यु भऽ गेल अछि अथवा स्वेच्छासँ जे पति छोड़ि दोसर पुरुषक भार्या बनि कऽ पुत्रोत्पन्न कएलक अछि से पौनर्भव नामक पुत्र अछि।

 

अनधिकारिण :-

पतित, वेदक प्रामाणिकताकेँ स्वीकार नहि करएवला, अपन जातिसँ भिन्न, सम्पत्ति चोरी करएवला, समयातीत उपनयन करएवला, आलस्य वा अश्रद्धासँ स्वकर्मच्युत, मद्य पीबएवला, अपन गर्भ तथा स्वामीसँ द्रोह कएनिहारि स्त्री श्राद्धधिकारी नहि होइछ।

 

उदाकानर्हा :-

अकृत संस्कार, वेद निषिद्ध सन्यासी, मद्यपायी सन्यासी पुत्रादि मृतक क्रियाक हेतु अयोग्य होइत अछि।

 

संन्यासिनाम् एकोछिष्ट विचार :-

सन्यासीक पुत्रक द्वारा सांवत्सरिक एकोदिष्ट पार्वण आभ्युदयिक तीर्थ श्राद्ध कर्त्तव्य अछि। एहि मतक अनेक विरोधी वचन प्राप्त होइत अछि। जेना-

एकोछिष्टं न कुवींतं संन्यासिनां चैव सर्वदा।

अहन्येकादशे प्राप्ते पार्वणंतु विधीयते।।

एकोछिष्टं यतेर्नास्ति त्रिदण्ड ग्रहणादिति।

सपिण्डीकरणाभावत् पार्वणश्राद्धमिण्यते।।

संसास ग्रहणादेव प्रेतत्वं नैव जायते।।

- शुद्धि निर्णय पृ.- 49

एहि वचनसँ सन्यासी लोकनिक श्राद्ध सेहो होइत अछि। स्मृतिकार शातातप सन्यासी श्राद्ध सेहो निषिद्ध मानलन्हि अछि। अत: हिनक एकोदिष्ट सेहो समीचीन नहि अछि। दत्तात्रेयक सेहो इएह मत अछि। एहिठाम किछु गोटे एकोदिष्ट करैत छथि आ किछु गोटे नहियोँ करैत अछि। शास्त्रकार लोकनि ओकर एकोदिष्ट सेहो सामान्य रूपमे करवाक लेल कहलन्हि अछि। मैथिल निबन्धकार सपिण्डीकरणादि कर्त्तव्यक दिस संकेत कएलन्हि अछि, मुदाआन पार्वणक निशेध तँ करितहि छथि।

एहि तरहेँ करमहावंशीय म. म. उमापति धर्मशास्त्रानुमोदित सामयिक व्यवहारक वर्णन कऽ मिथिलाक संस्कृतिक उच्चता ओ प्रवणताक तरफ ध्यानाकृष्ट कएलन्हि अछि।

ग्राम+पोस्ट- रहुआ

थाना- सौर बाजार

जिला सहरसा, 852127

 

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