प्रणव कुमार झा
उजरका मुर्गा
होलीक सीजन रहय। खस्सी-पाठा सभक बीच अनिश्चितता आ अफरा-तफरीक माहौल बनल छल। कतहु खस्सी त कतहु पाठाक संहार भऽ रहल छल। आब त पाठी-बकरी सेहो अछूत नै छल। ओतहि बगलक गोटैक देसी मुर्गाक टोलियो मे एहि आपातकाल पर चर्चा-परिचर्चा चलि रहल छल।
एहि कोलाहलक बीच, एकटा मुर्गा फार्मक बाड़ा लग फार्मक मालिकक दोस्त ठाढ़ भऽ उजरा मुर्गा सभ केँ संबोधित करैत कहलथिन - देखही रे! ओहि खस्सी-पाठी सभक हाल देखही, केहन त्राहि-त्राहि मचल छैक। केकर गर्दन कखय रेत देल जेतै, केकरो ठिकाना नै। आ तो सभ कतेक नीक जकाँ अपन बाड़ा मे निश्चिंत बैसल छही। समय पर दाना भेटि रहल छौ, शीतल पानि छौ, आ दुपहरिया मे सुखद निन्दो मारि रहल छहि। तोरा सभ केँ त अपन मालिकक गुण गाबय केँ चाही, जे तोरा सभ केँ एहन सुरक्षित जीवन देलथिन अछि।
ओतहि ठाढ़ दू-चारि टा पैकार सेहो हुनकर दही मे सही मिलाबैत बाजल - हँ भाय जी! एकदम टका गप्प कहलहुँ। देखियौ ने, एकरा सभ केँ फोकट मे माल खिया-पिया कऽ पोसल जा रहल छैक। ई सभ त एकर मालिकक रहमो-करम अछि जे ई सभ एतेक मौज मे अछि! एहि बीच दू टा पैकार के टेंपू पर मुर्गा लदा गेल छल, आ टेंपू शनैः शनैः आगा बढ़य लागल छल।
ओहि ठाम बगल मे महींस चरा रहल ललटूनमा के कान मे सेहो ई गप्प-सप्प जा रहल छल। ई सभ सुनि ओकरा मोन पड़ि गेल मास्टर साहेब के पढ़ाओल बात देसी मुर्गा के देखने हेबहक रोज भोरे उठि बाङ्ग देतौ। अपना भड़ि खूब दिमाग लगेतौ । पकड़बहक त जल्दी हाथ नै एतौ। मुदा ई उजरका मुर्गा मस्त मजा मे रहतौ। किएकि एकरा सभ के एकटा विशेष प्रयोगशाला मे तैयार कैल गेल छैक। एकरा सभ के दिमाग के ऐ तरह से कुंद कऽ देल गेल छैक जे ई सभ साँस लेबऽ आ दाना खेबा भरिए के विकास बुझईत छैक। ओकरा ई पता नै छैक जे ई दाना ओकर सेवा लेल नै, बल्कि ओकर ओजन बढ़बै लेल देल जा रहल छैक। ओकर बुद्धि के एहि लेल हरि लेल गेल छैक जे ओकर मालिक के कारोबार मे बेसी परेशान नै करय आ ओकर ओजन जल्दी से जल्दी बढय।
-प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।