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प्रणव कुमार झा

अपनइति!

बात 21म सदी के पहिल दसक के छी। आनंद एखन लखनऊक एकटा सरकारी महकमा मे कार्यरत रहथि। तीन बरख पहिने हिनका ई नौकरी भेटल छलैन्ह। आनंद एकटा अतिसाधारण परिवार सं अबै छथि। पिताजी कानपुरक एकटा मील मे काज करै छलाह, मुदा किछु साल पहिनहे ओ मील बंद भऽ गेल, जकरा संगहि हुनक रोजी-रोटी सेहो बिला गेल। किछु दिन दिल्ली-पंजाब मे हाथ-पैर मारलखिन्ह, मुदा कतौ बात नै जमलैक। अंततः हारि-दारि क गाम पकड़ला। मुदा गामों मे की करितथिन! खेती-बाड़ी नई ओत्ते छलनि आ नै कहियो केने छ्लाह। गाय-गोरू, आटा-चक्की, दोकान-दौरी कै टा आइडिया आबईन मुदा कोना की करी किछु समझ नै आबय। फटेहाली आ भविष्यक चिंता हुनक मानसिक संतुलन डोलबय लागल छल। ओ बताह जेना करय लागल छलाह।

मुदा आनंदक माय  धैर्यक प्रतिमूर्ति छलीह। बेसी पढ़ल-लिखल नै छलीह, मुदा संकट कें एहि कालासागर मे ओ परिवारक पतवार केँ थामने रहलीह। आनंद ओहि समय इंटर मे छलाह। दशमा मे प्रथम श्रेणी सं उत्तीर्ण भेला कऽ बाद विज्ञानक छात्र बनल छलाह। कोनो सामान्य कानपुरिया छात्रक जेकां हुनक ऑंखि मे सेहो आईआईटी कानपुरक विशाल गेट झलकैत छलैक। मुदा बिना कोनो कार्पोरेट कोचिंगक ओहि दुर्ग केँ भेदब अत्यंत कठिन छल। बापक नौकरी छूटल तऽ कोचिंगक आस सेहो गेल। सरकारी इंटर कॉलेजक पढ़ाई तऽ बस कागजी खानापूर्ति छल। तथापि, माय कतहु-कतहु सं पाईक जोगाड़ कऽ छोट-मोट ट्यूशनक प्रबंध कऽ देलखिन्ह।

आनंद इंटर पास केलखिन्ह आ किछु दोस्त सबहक देखादेखी आईआईटी आ एआईट्रिपलई (AIEEE) क फॉर्म सेहो भरलखिन्ह। आईआईटी तऽ नै भेल, मुदा एआईट्रिपलई मे काउंसलिंगक बुलावा आयल। कोनो एनआईटी भेटबाक नंबर तऽ नै छल, मुदा देशक नामी प्राइवेट कॉलेज आ डीम्ड यूनिवर्सिटी सभक कट-ऑफ लिस्ट मे आनंदक नाम चमकल। मुदा ओहि चमक मे अन्हार बेसी छल - फीसक अन्हार। एहन नै छल जे आनंद ऐ से बेहतर रिजल्ट नै कऽ सकाय छलाह, मुदा किछु परिवारक स्थिति आ कुछ दिशाहीनता के प्रभाव सेहो ऐ रिजल्ट पर छल। 

शुरू मे त नै मुदा आनंद आ माय के जिद्द आ उत्साह पर बाबू गामक जमीन बेचि कऽ एडमिशन कराबय लेल तैयार भेलाह, मुदा गामक हितैषी सब अपन असली रंग देखा देलखिन्ह। केओ जमीन कीनय लेल तैयार नै भेल, उलटे ताना मारय लागल— "बेटा तोरा फुसिया रहल छौ, बाप बेरोजगार छै आ ई डोनेशन दऽ कऽ इंजीनियर बनत? कतौ दिल्ली-ढाका जाय कमाय नहि करैत ग!" अंततः इंजीनियरिंगक सपना ओहि ठाम दम तोडि देलक। आनंदक किछु सहपाठी इंजीनियरिंग मे एडमिशन लेलाह त किछु दिल्ली पकड़ि रहल छलाह। देखा-देखी आनंद के सेहो एकटा आस लागलैन जे नै इंजीनियरिंग त किछु समकक्ष पढ़ाई लेल दिल्ली जाय। हुनक एकटा मामा दिल्ली रहय छलखिन। आनंद माय के कहलक।  माय अपन भाय (आनंदक मामा) क नाम एकटा मार्मिक चिठ्ठी लिखलखिन्ह। ओ चिठ्ठी अपन बेटा के भविष्य लेल एकटा बहिनक अपन भाय सं कयल गेल अंतिम अनुनय छल। आनंदक माय नियत दिन मे ओ चिट्ठी आ अपन सिरमा मे राखल अंतिम पाँच सैया नोट जे ओ गामक मिशर पंडीजी से उधार मांगने छलिह आनंद के पकड़ा देलखिन। आनंद ओही चिठ्ठी केँ संजो कऽ एकटा पेटी मे किछु किताब आ कपड़ा लऽ कऽ दिल्ली के ट्रेन के जनरल बोगी के कचरमबद्ध मे सवार भऽ गेलाह। दिल्लीक अजनबी भीड़ मे पुछईत पाछईत अंततः मामाक डेरा आगाँ जा ठाढ़ भेलाह।

मामाक मदैत सं इग्नू (IGNOU) मे बीसीए मे नाम लिखायल गेल। येन केन प्रकारें तत्काल लेल आनंद कें ओहि सामाजिक अपमान सं सुरक्षा भेटलैक जे नौकरी नहि करबाक कारणे गाम मे सहय पड़ितैक। आनंद ट्यूशन पढ़ा कऽ अपन गुजर-बसर करय लागलाह आ किछु समय बाद अपन एकटा साथीक संग शेयरिंग रूम मे शिफ्ट भऽ गेलाह।

बीसीए पूर्ण भेला कऽ बाद असली संघर्ष शुरू भेल। आब घरक स्थिति आ समाजक प्रेशर दुनु आनंद के कन्हा पर नौकरी के उम्मीद मे सवार भेल छल । आनंदक देह पर पहिरल कपड़ा साफ तऽ छल, मुदा हुनक कॉन्फिडेंस आ संवाद कौशल ओहि चकाचौंध भरल ऑफिस सभक लेल पर्याप्त नै छलैक। रेफेरेंसक अभाव आ कमजोर पर्सनालिटीक कारणे एक के बाद एक इंटरव्यू सं निराशा हाथ लगैत छलैक। प्रत्येक बुधवार कऽ अखबार सं वैकेंसीक कतरन काटब, डीटीसी बसक पास बनबा कऽ रौद  मे दिल्लीक कोना-कोना बौएनाइ आनंदक दिनचर्या बनि गेल छल। दिल्लीक करोल बाग सं लऽ कऽ नेहरू प्लेस धरि, आनंदक लेल ई शहर एकटा विशाल अजगर जकाँ छल। इंटरव्यू मे जखन आनंद सं अंगरेजी मे पुछल जाइत छल - "Tell us about yourself," तऽ आनंदक जीह पर अपना हिसाबे यंत्रवत रटल जवाब त अबैत छलैक, मुदा ओहि कॉरपोरेट दुनियाक फर्राटा अंगरेजी नहि। हुनक कमजोर पर्सनालिटी देखि कऽ इंटरव्यू लेनिहार मुसकैत अक्सर कहय छल OK Mr. Anand, You have good logics and coding skills. We will call you latter for the results मुदा ककरो कॉल नै आबय। ककरो हुनक कोडिंग स्किल सं मतलब नै छल, सभक मतलब हुनक पॉलिश कयल जूता आ कॉर्पोरेट एक्सेंट सं छल। कॉलक आस मे आनंद एकटा मोबाइल फोन सेहो लऽ नेने छलाह। तथापि ओहि मोबाइल पर नौकरी ज्वाइन करबाक लेल कॉल एखन धरि नै आयल छल।

एही बीच एकटा कंप्यूटर इंस्टीट्यूट मे नौकरी भेटल, मुदा ओतय नौकरी सं बेसी शोषण छल। हुनक काज छल भोरे दस बजे से राति आठ बजे धरि बच्चा सभ केँ एमएस-ऑफिस से लऽ कऽ सी-प्लस-प्लस आ जावा सिखायब, आ जखन कोनो स्टाफ नै रहय, तखन रिसेप्शन सेहो सम्हारब। महिनाक अंत मे जखन आनंद अपन दरमाहा मांगय छलाह, तऽ मालिक हुनका कोनो ने कोनो बहाना बनाबय आ हुनक काज मे खोट गिनाबाय। ऊपर से उपदेश दै - "अखनो अहाँक आवाज मे ओ प्रोफेशनलिज्म नै अछि। क्लाइंट सं कोना बात कयल जाइत अछि, से तऽ सीखू!" आनंद तिलमिला के रहि जाय छलाह। हुनक भीतरक इंजीनियर एहि स्थिति पर विषादित होइत छलैक।

गाम-समाज सं कोनो संबल नै, कोनो रेफेरेंस नै भेट रहल छल। एक बेर आनंद गामक एकटा पैघ लोक के फ्लैट पर गेलाह - ई सोचि कऽ जे शायद कतौ कोनो नीक नौकरीक रेफरेंस भेट जाय। गोर लागला पर ओ भलमानुष आनंद के एना के ताकला जेना कोनो म्यूजियम मे राखल वर्तमान मे अनुपयोगी अतीत के कोनो संजोगल वस्तु कें देखल जाइत अछि। ओ कहलखिन्ह - "आनंद, तोहर बाप तऽ कानपुर मे मील मे छलाह ने? ओहने किछु काज देखि लेतहिं। ई आईटी-फायटी तोरा बुते नै हेतौ। ई इंजीनियर बनबाक शौक कथी लेल पोसलह?"

आनंदक मोन भेल जे कहि दियौक जे "कक्का, हमर स्किलसेट अहाँक बेटा सं नीके अछि," मुदा जेबी मे राखल डीटीसी बसक पास आ फटेहाल स्थिति हुनका चुप करा देलक। ओ निराश ओतहि सं बाहर निकलि एलाह। दिल्लीक सड़क पर चलैत आनंद कें लागल जे ओ अपनहिं समाज मे एकटा अछूत बनि गेल छथि। ओ अछूत जेकरा लग पैसा आ पावर नै अछि।

अंततः, एकटा सरकारी स्कूल मे टेम्परेरी कंप्यूटर टीचरक काज भेटल। ई हुनक मंजिल तऽ नै छल, मुदा एहि सं हुनक बाट अवश्य डाइवर्ट भऽ गेलैक। ओ देखलखिन्ह जे हुनक किछू संगी-साथी सरकारी नौकरीक तैयारी मे छथि। आनंद के रुझान सेहो एहि दिश होबय लागल। ओहो आब कॉर्पोरेट के छोड़ि सरकारी नौकरी के तैयारी केनाइ शुरू केलाह। स्कूल से बचल समय मे सेल्फ स्टडी करय लागलाह। आनंद मे मेधा छलवे छलैक, डेढ़ सालक तैयारी आ दर्जन भैर परीक्षा के बाद ओ सरकारी नौकरी प्राप्त कऽ लेलखिन्ह।

जेना-जेना ई खबरि गामक एकपैरिया सं होइत घरे-घर पहुँचल, लोकक मिजाज अचानक हिनक परिवार लेल मधुर आ अपनैती बला भऽ गेल। जे लोक कलंक लगबैत छलाह आ खिधांश करय छलाह, ओ बेटा-बेटा कहि कऽ अपनैती जतयबाक होड़ मे लागि गेलाह। वियाहक प्रस्ताविक बाढ़ि आबि गेल। कक्का, मौसा, गामक मुखिया, अधिकारी सभक लग अपन कोनो ने कोनो योग्य कन्या छल।

नियतिक चक्र अपन गति सं चलल। आनंदक वियाह भऽ गेल। विवाह मे खूब गाजा-बाजा भेलइक। समाजक खूब जुटानी, बर-बाराती, नाच-गान सभ भेल। गाम-समाज, सर-कुटुम सभ ठाम मान-दान अपनइति। आनंदक पिताजी के आनंद के कोनो सीमा नै छल। हुनका लागैन जेना हुनकर बिलायल सभटा सम्मान, सभटा खुशी सभटा अपनइति भेट गेल होईन। मुदा आनंद जे पिछला 8 साल के जिनगी देखने छलाह ओकर अनुभव के कारण हुनका एहि अपनइति मे किछू कृत्रिम लागि रहल छल। मुदा ओ ऐ पर ध्यान नै दऽ समयक धारा संगे बहल जा रहल छलह। 

वियाहक किछु समय बाद, गामक ओहि घर मे जतय आनंदक कोहबर भेल छल, चोरी भऽ गेल। अचम्भा तऽ तखन भेल, जखन ओहि अपनइति जतबय वाला भीड़ कें ऑंखि फेर सं पथरा गेल। जे रिश्तेदार वियाह लेल अपनइति देखबैत अड़ल छलाह आ आगा-पाछा करय छलह, ओ ई कहि कऽ उलहन देबय  लागलाह जे - "हम तऽ कहबे केने छलहुँ जे फलां जगह वियाह कऽ लिअ, मुदा नहि मानलखिन्ह। ई लड़की ठीक नै पकड़ेलई। कुटमईतियो ठीक नै छाईक।  आब भुगतू!"।  कियौ पुलिस-थाना मे रिपोर्ट मे सेहो मदद नै केलक, उल्टे आनंद चोरी के ऑनलाइन रिपोर्ट लिखेलखिन ओकरा लऽ कऽ सरपंच हुनम माय-बाप पर दवाब बनेलखिन जे जे हेबाक छल से भेलय। गाम मे पुलिस एने माहौल खराप हेतैक। ऐ सभ चक्कर मे नै पडू। लोक हुनक घरक चोरी पर चुस्की लैत चर्चा करय लागल। आनंद अपन ऑफिसक मेज पर बैसल विचार कऽ रहल छलाह: ई समाज कोनो व्यक्ति सं नै, हुनक समय सं प्रेम करैत अछि। समय नीक तऽ सभ अपन, समय खराब तऽ परछाई सेहो साथ छोड़ि दैत अछि। ओ गाम, ओ समाज जे किछू समय पहिने अप्पन होयबाक दंभ भरैत छल, आई ओ अपनइति कोना बिला गेलई! आनंद बुझि गेलाह जे ओ आईओ ओही ठाम ठाढ़ छथि, जतय सं ओ दिल्लीक ट्रेन पकड़ने छलाह - एकदम एकसरे। बस आनंदक पिताजी ई बात नै बुझि सकलाह।

-प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली

 

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