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१.
प्रो.
राजकुमार नीलकंठ २.
राजदेव
मण्डल
१
प्रो.
राजकुमार नीलकंठ
अवकाश प्राप्त प्रोफेसर
हिन्दी विभाग
िनर्मली महाविद्यालय, िनर्मली।
गाम- बेलही
जिला- सुपौल।
कविता-
स्रष्टा
अहाँ
जतऽ कतहु जनमलहु
अपनहि शवकेँ
गुरू-चरण तर दबाए
ऊर्जित-उत्तनित यष्टि
अानत मुख, नमित दृष्टि
ठाढ़ रहलहु एक िनर्मम प्रश्नवाचक।
आ, फेरसँ
शून्यमे पसरि गेल
दिगस्तत्व–सहस्र-दल
नव रङे रंजित
नव नामे संज्ञित,
अहाँक सर्प-यज्ञमे
देशसँ, देशान्तरसँ
ससरि-ससरि, छिहुलि-छिहुलि
आयब अनिवार्य भेल
होयब अनिवार्य भेल अनर्थकेँ अहाँसँ
उत्तरित अहाँसँ
अन्तत: अहाँसँ अमुक्त।
ठाढ़ रहलहु अहाँ
तोड़लहु तँ किछु नहि
टूटि गेल सभ अपनहि-आप
अपनहि अनुत्तरक नागफणि वनमे
लोटि-अरूछा कऽ,
जोड़लहु तँ किछु नहि
सभ जुटि गेल अपनहि-आप
अपनहि ववर्तसँ
अपनहि नाङरिक पाछाँ-पाछाँ धावित।
अहाँक होयब मात्रसँ
नग्रता भेल पूर्ण।
अहींक दृष्टि-आवरणसँ पुन:
छँपि गेल सम्पूर्ण।
एक तीक्ष्ण अटकनपर
चितकाबर केचुआ उतारि
ससरि गेल शंकित ओ-
अनिर्वचनीय वृद्ध अजगर
स्यात् कोनो अन्य घाटीक खोजमे
शापित करए सुख-मग्र तृरीतिया।
साभार- मिथिला मिहिर, जून, 1969ईं.
२
राजदेव मण्डलक
कविता-
कुहेस
कतौ ने किछु बचल अछि शेष
चारूभर पसरल कुहेस
कठुआ गेल देह भीजल अछि केश
अधभिज्जू सन भेल सभटा भेष
घुरिया रहल छी ठामहि-ठाम
कियो ने दैत अछि समैपर काम
टूटल जा रहल सभ आस
ऊपरसँ लगि गेल दिशाँस
कुहेस आर भऽ गेल सघन
इजोत लगैत अछि टीका सन
खेत-खरिहान, घर जंगल-झाड़
सभटाकेँ घोंटि गेल अन्हार
उनटि गेल जेना माथ
छूटि गेल सभ संग-साथ
नै भेटैत अछि बाट
नै अपन घाट
लगे-लग औनाइत
मन भेल उच्चाट
सभ गोटे धऽ लेने छी खाट
देखा दिअ जाएब कोन बाट
कहिया फटत ई कुहेस
भेटत अपन घर परिवेश
हे सुरूज किरणकेँ जगाऊ
आबो तँ ऐ कुहेसकेँ भगाऊ।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
