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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक स्त्री कोना

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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निर्मला कर्ण

 

नारीक सम्मान

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पापी संसार ई सदिखन सँ,

  नारी के छथि अपमान केने |

सब छलने छथि हुनका हरदम ,

  आ हुनके छथि बदनाम केने |

मानव-दानव के बात छोड़ू,

  देवो तs छथि यैह काज केने |

  छलना नारी के संग केलनि ,

आ रक्षा सृष्टि के नाम देलनि |

 नारी नहीं केलनि भूल मगर ,

सब हक दोषी ओ भs  गेली |

पाप केलनि कोई आन मगर ,

 नारी पापिन बुझना गेली |

वृंदा के पातिव्रत्य जखनि,

 स्वर्गक गर्वत्व हरण केलनि |

 पतिव्रत्य हरण के हेतु तखन,

 वृन्दा संग गुरुतर छल भेलनि |

 क्षण भर के लेल हरि के मन में ,

  नहिं वृंदा लेल सन्ताप कोनो |

अपने भक्तक संग छलना में ,

हरि के बुझना नहिं पाप कोनो |

वृंदा के संग छल कs क,

 हुनकर पति के संहार केलनि |

जलंधर के रण में वध करवा ,

मानवता के उपकार केलनि |

प्रभु के वरदान पाबि वृंदा ,

प्रातः स्मरणीया देवि भेली |

प्रभु के पटरानी होईतो धरि,

 वृन्दा जग में पथभ्रष्टा नाम पेली |

  रणनीति बनाक छल केलनि ,

तखनो प्रभु के किछु दोष नहिं |

 पावन, सती,अबला वृन्दा के ,

  ई जग कहलक निर्दोष नहिं |

 हे अखिल विश्व के रचयिता ,

स्वीकार करू करबद्ध नमन |

 विनती सुनियौ हे जगतपिता ,

 हमर सम्मान राखु हे कमलनयन |

 हम सब नारी छी सृष्टि कर्ता ,

निर्देश अहाँ सs पाबि प्रभु |

  ई गुरुतर हम भार लेलहुँ,

  आदेश अहिं के मानि प्रभु |

बस एक प्रार्थना अछि प्रभुवर ,

 निर्दोषे दण्ड ने पाबी हम |

  अनकर पापकर्म कलुषित ,

 के बोझ ने आब उठाबी हम |

हे जगत नियंता सुनु विनय ,

जग में वितरित करु दिव्यज्ञान |

  अहिं सन जग में न्याय होए ,

 धरती के नर होय नारायण |

 

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