प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन

अग्नि शिखा (भाग - ६)

मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण/ मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण


त्रिभुवन के दिग-दिगंत् में पसैर गेल छल जे राजा पुरूरवा अश्वमेध यज्ञक विराट आयोजन कs रहल छथि l सभ ऋषि-मुनि आमंत्रित कएल गेलाह l सभ देवता के आमंत्रित कएल गेलनि l देवर्षि नारद यज्ञ दिवस के पूर्वहि राज भवन में आबि गेलाह l हुनक आगमन केँ शुभ समाचार ज्ञात भेला पर पुरूरवा प्रसन्नता सs पुलकि भs उठल l ओ विधिपूर्वक हुनक सेवा-सत्कार कएलक l तदुपरांत देवर्षि नारदक धीर-गंभीर वाणी प्रस्फुटित भेल - "नृपति,यज्ञक हेतु श्रेष्ठ अश्व केँ आवश्यकता होयतह l सर्वप्रथम तोंs एकर व्यवस्था करह"|
उत्साहित होइत पुरूरवा बाजल -
"देवर्षि हमर अश्वशाला में बहुतो श्रेष्ठ अश्व बंधायल परल अछि l कृपया अपनहि ओहि में सँs सर्वोचित अश्वक चयन कs लेल जाय"|
देवर्षि नारद स्वयँ अश्व शाला के देखलन्हि l वास्तव में ओतह अनेको अद्भुत अश्व छल l ओहन अश्व एतेक सँख्या में अन्यत्र भेटनाई असम्भव नहि तखन कठिन अवश्य छल l परंच यज्ञ के निमित्त श्याम कर्ण अश्व केँ आवश्यकता छल,जे गिनती में मात्र पाँच रहैक l ओहि में सँs एक अश्व केर चयन कय देवर्षि अलग कs लेलथि l यज्ञक अश्व केर रक्षाक भार स्वयं पुरूरवा उठौलक l
नियत दिवस कs सभ आमंत्रित व्यक्ति,ऋषि,देवगण,तथा ऋत्विज आबि गेलाह l सबहक ओ खूब नीक सँs सेवा सत्कार कयलक l पाराशर,देवल,च्यवन,याज्ञवल्क्य,वृहस्पति,अगस्त्य,वामदेव,मैत्रेय लोमश,शुक्राचार्य, जैमिनी,भृगु,अकृतवर्ण,जावालि,पुलसत्य, पुलह,मरीचि,जमदग्नि,कश्यप,भारद्वाज, अत्रि,मुनि वशिष्ठ,विश्वामित्र आदि ऋत्विज उपस्थित भेलाह l पुरूरवा सबहक पूजन कयलक l तदनंतर ब्रह्मा जीक आज्ञा सँs बहुतों ब्राह्मण मीलि सोना केर हर सँs यज्ञक भूमि जोतलथि,एवँ पिंडारक तीर्थक निकट विधिपूर्वक राजा केँ यज्ञक दीक्षा देल गेल l
चार योजन धरि विशाल भूमि के जोतवायल गेल,तखन राजा पुरूरवा ओतs यज्ञक वास्ते मंडप बनबाओल l योनि एवँ मेखला सँs युक्त मध्य कुण्डक निर्माण कय ओहि में विधि पूर्वक अग्नि देवक स्थापना भेल l तत्पश्चात शस्त्र-धारी कतेको शूरवीर सबहक संग राजा पुरूरवा अश्व शाला में जा स्वर्ण-सांकल सँs बंधायल श्याम कर्ण अश्व केँ बंधन मुक्त कएल l ओ अश्व मंथर गति सँs चलैत यज्ञशालाक दिशा में बढ़य लागल l ओहि अश्व के मुख लाल नाङ्गरि पीयर आ कान श्याम वर्णक छल l मुक्ता फलक अनेकानेक माला सँs सुशोभित ओ दिव्य अश्व अत्यंत मनोहर बुझना जाइत छल l ओ श्वेत छत्र सँs युक्त एवँ चामर सँs अलंकृत छल l
यज्ञशाला में मुनि गण सभ मीलि अश्वक स्थापना कयलनि l ओकरा पर केसर,चंदन,फूल माला एवँ चावल चढ़ाओल गेल l धूप निवेदित कएल l सुधा कुंडलिका आदि अन्यान्य खाद्य पदार्थक नैवेद्य लगायल l
अश्व के विधि पूर्वक पूजा करला उपरान्त आरती उतारल गेल l तत्पश्चात राजा पुरूरवा केँ दान करवा हेतु प्रेरित कएल गेल l प्रचुर दान पाबि सभ जन प्रसन्न भेलाह l अश्व के ललाट पर राजा के द्वारा स्वर्ण-पत्र बान्हल गेल l ओहि पत्र में राजा पुरूरवाक प्रशस्ति अंकित छल,संगहि अश्वमेध यज्ञक उद्देश्य सेहो अंकित छल l
आब वेद मन्त्रक उच्चारण ऋषि गण प्रारम्भ कयलनि एवँ अग्नि में आहुति देमs लगलाह l पुरूरवा के मन्त्रपाठ पूर्वक स्नान करायल गेल l ओकरो मन्त्र सँs अभिसिंचित कएल गेल l राजा के भाल पर मन्त्रोच्चार के मध्य तिलक लगायल गेल,तत्पश्चात अनेक प्रकारक अस्त्र-शस्त्र प्रदान कएल गेल l यज्ञाश्वक रक्षा के लेल ऋषि-मुनि मंगल पाठ कयलनि l
अनेको प्रकारक वाद्य यन्त्रक ध्वनि एवँ वेद-मन्त्रक घोष के संग यात्रा करैत राजा पुरूरवा अपन राजधानी के पार कयलक l ओकरा साथ में अनेकों वीर योद्धा छल l ओ विश्व के समस्त राजा सँs सम्मानित भेल l यदि केओ ओहि श्यामकर्ण अश्व के पकड़वाक साहस देखौलक,ओकरा सीधा यमपुरी पठायल गेल l
अनेक दानव राजा ओकर विरोध कयलक,फलस्वरूप ओकरा सभ सँs घमासान युद्ध भेल l दिग्विजय करैत काल कतेको राजा पुरूरवा सँs प्रसन्न भय अपन पुत्री के वरण करवाक प्रस्ताव ओकरा देलथि मुदा पुरूरवा ओ सभ आमंत्रण के अस्वीकृत केलक l ओ एखन विवाह-बंधन में पड़s नहि चाहैत छल l
अनेक राजकुमारी राजाक पुरुषोचित सौन्दर्य एवँ वीरता सँs मोहित भेलीह l राजाक अस्वीकृति सुनि ओ विरह ज्वाला में दग्ध भय मृत्यु के वरण कएलीह,परंच पुरूरवा केकरो दिशि दृष्टि उठाकs देखबो नहि केलक l
अनेक बाधा विघ्न के झेलैत पुरूरवा अश्वमेध यज्ञ समाप्त केलक l अश्वमेध यज्ञ सँs राजा के ख्याति दिग्-दिगंत में पसरि गेल |
पुरूरवा के आब जेना नशा सन भs गेल रहैक दिग्विजय के l जखनि केओ राजा ओकर बराबरी करवाक प्रयास केलक,तखनहि मात्र ओकरहि सँs सीधा युद्ध नहि कए अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ कs दैत छल राजा पुरूरवा l ओ राजा अधीनता स्वीकार करिते छल,अन्य राजा ओकर शक्ति देखि पुनः ओकरा समक्ष ठाढ़ होई के हिम्मत नहि कs पाबै l एक प्रकार सँs अश्वमेध यज्ञ राजा पुरूरवाक वास्ते घोलका मालीक खेल भs गेल छल l सदिखन अश्वमेध यज्ञक आयोजन कs राजा पुरूरवा अपन शक्ति के प्रदर्शन करैत रहैत छल l

क्रमशः

(अनुवर्तते)

 

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