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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक स्त्री कोना

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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निर्मला कर्ण

ममताक सम्मान करु

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माय के वन्दन के करथि,

 माय के अभिनन्दन के करथि |

 सब स्वार्थ में छथि भेल दृष्टिहीन,

 माय के अवलंबन के बनथि |

 माय के रुधिर सँ सिञ्चित भेलथि,

 आ रूप मनोहर पाबि लेलथि |

 मातृ-स्नेह सँ सज्जित भs क,

 प्रज्ञा जखनि निखारि लेलथि |

 पाबि जगत सँ सम्मान तखनि,

 बिसरा गेल मायक अँचरा छनि |

 लक्ष्य अपन पौलथि जखने,

 आब कोनो जोकरक नहि ममता छनि |

 भूलल बिसरल स्मृति में माय,

  एक कोन में आब परल रहली |

 अपने सन्तानक सम्मुख माय,

 हिरणी सँ भीत बनल रहली |

 माय के सुधि लेमय वाला,

 नहि आई छथि कोनो सपूत |

 मायक दुःख करता की,

 देख पराई छथि ओ कपूत |

 मायक स्नेह बिसारि अहाँ,

 पायब अपन पहचान कहाँ |

 किछु श्रेष्ठ जगत के दs पाबी,

 आब ततेक रहब ऊर्जावान कहाँ |

 जड़-मूल नष्ट तs कय लेलहुँ,

 शाख कहाँ रहि पाओत आब |

 सब पात तना फल सूखि जायत,

 झरि माटि में मिलि जायत आब |

 आबहु चेतू आबहु सम्हरु,

 ममता के नहि अपमान करु |

 माय छथि गँगा जमुना ओ सरस्वती,

 एहि सलिल-सँगम में स्नान करु |

 ममता छूटत तs जग रुसत,

 ओ स्नेह कहाँ फेर पायब मनु |

 ईश्वर छथि मायक ममता में,

  से कहियो धरि बिसरायब जनु |

 माता आओर धरती माता,

 दूनू छथि जग के जीवन-दायिनि |

 हिनकर रक्षा में तत्पर रहि कs,

 रोकब अपना सबहक जीवन-हानि |

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