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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक स्त्री कोना

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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आभा झा

पिघलैत हिमखण्ड

हिमानी दुरागमन भ' क' अयलीह शिशिरक संग। स्वाभाविक छलै जे गीतनाद होइतै,अरिछन- परिछन होइतै, मुदा से सभ कत'?दुआरि पर ठाढ़ छलै सात बरखक बेटा आ खबासिनी!उत्सुक दू जोड़ी आंखि दिस देखबा सॅं बचैत हिमानी शिशिरक पाछू शयनकक्ष धरि एलीह। शिशिरक किछु कहबा सॅं पहिनहिं बजलीह- "हम बहुत थाकल छी,सूतब।जयबा काल केबाड़ ओठगंबैत जायब।"

"किछु खा लितहुॅं।खेनाइ बनौने होयत सुशीला!भिनसरे बिदा भेलहुॅं,बाटो मे किछु नञि खेलहुॅं अहाॅं!"

"नञि,भूख नञि अछि।"

हिमानीक सपाट स्वरक आगाॅं किछु कहबाक साहस नञि भेलनि शिशिर केॅं। चुपचाप बहरेलाह,बेटा केॅं दुलार- मलार केलखिन्ह,ओकर उत्सुक प्रश्न सभहक उत्तर दैत रहलखिन्ह आ भोजन कय बेटे संग सूति रहलाह!

एम्हर हिमानी-पाथर जकाॅं छत दिस तकैत अपन जीवनक एहि नाटकीय मोड़ पर क्षुब्ध छलीह! नञि चाहितो पाॅंच बर्ख पूर्वक ओ दिन मोन पड़ि गेलनि जाहि मे सजलि- धजलि कतेक उमंगक संग विनोदक प्रतीक्षा क' रहल छलीह! मुदा विनोद-ओ त' कोनो न कोनो बहन्ने हिमानी सॅं दूर रहथि!पूछथि ककरा हिमानी?न समवयस ननदि,न दियादिनी!बूढ़ सासु सॅं की पूछथि,कोना पूछथि? एवंक्रमेण दू मास बीतल,जाहि मे आफिसियल टूर पर दू बेर भ' अयलाह विनोद!आब धीरज टुटि गेलनि हिमानीक,एक दिन ठाढ़ भ' गेलीह सोझां,जखन विनोद आफिस स' आबि चाह- जलखै क' फेर खेलबा लेल बहार भ' रहल छलाह ,ओ स्पष्टत: कारण पुछलखिन।

पहिने बहाना,फेर धमकी,मुदा अंततः जे सत्य बहरायल ओ बहुत भयाओन छल! हिमानी आ विनोदक चिकरा- चिकरी सुनि सासुओ सभ गप बुझि गेलखिन आ पश्चात्तापक संग अपन अनभिज्ञता बुझबैत,नैहर पठा देलखिन।

साल भरि विवाह- विच्छेदक प्रक्रिया चलल।किछु कादो हिनका पर, किछु विनोद पर पड़ल, मुदा ई मुक्त भेलीह।तकर बाद कोनो तरहें अपना केॅं सम्हारि पढ़ाई पूरा केलनि आ एकटा प्राइवेट स्कूल मे नोकरी कर' लगलीह।जीवन किछु किछु सामान्य होमय लागल छलनि, तखने बड़की काकीक भतीजाक प्रस्ताव पर हिनकर जीवन मे भूकंप आबि गेलनि।हिनक सभ प्रतिरोध मायक नोरक बहाव मे बहि गेल आ ई यन्त्रवत् सभटा सम्पादित करैत,सुखल आंखिए आबि गेलीह समस्तीपुर सॅं पुणे।

मुदा उल्लसित मोने नञि,एकटा मातृहीन बच्चाक माय बनि।

अगिला दिन सॅं फेर मशीनी जिंदगी शुरू भेल।शिशिर अपनहिं सॅं प्रभात केॅं तैयार क' स्कूल पठौलनि,अपनहुॅं जलखै क' आफिस बहरेलाह। हिमानी कनेक फ्री भ' सुशीलाक सहायता सॅं घरक काजदान बुझलनि आ हफ्ता भरि मे घरक व्यवस्था संभारि लेलनि।मुदा मोन!ओ त' शुष्क पाषाण बनल छल!

धीरे- धीरे प्रभातक सभ दायित्व हिमानी संभारि लेलनि, ओहो धीरे-धीरे दोस्ती कर' लागल किन्तु अन्तरंगता कत'? हिमानी केॅं किछु अनुभवे कहाॅं होइन? ओ त' ड्यूटी क' रहल छलीह! शिशिर सभ टा देखैत छलाह, किन्तु ओ मौका देब' चाहै छलखिन!

जीवन जॅं खायब, पीयब,सुतब,उठब,काज करब, नोकरी  बजायब होइ छै त' नीक जकाॅं चलि रहल छलनि दूनूक!

एकदिन प्रभात सीढ़ी पर सॅं खसि अचेत भ' गेल आ हिमानीक हाथ पैर सुन्न भ' गेलनि।कत' ल' जेथिन,हुनका त' किछु बुझले नञि छलनि पुणे के बारे मे।कहुना खबासिनीक सहायता सॅं लगीचक अस्पताल मे ल' गेलखिन। सीटी स्कैन आदि मे जखन किछु विशेष चोट नञि बुझेलै,त' कने होश मे अयलीह आ सुशीला केॅं कहलखिन सर केॅं खबरि देबा लेल।

जखने प्रभात आंखि फोललक,तखने ओकरा मुंह सॅं मम्मी बहरेलै आ हिमानी ओकरा कसि क' छाती सॅं लगा कान' लगलीह।हुनक आंखि सॅं बहैत अजस्र अश्रुधार जेना युगयुगक संचित पीड़ा बहा रहल हो।ओम्हर खबासिनीक फोन सुनि हड़बड़ायल एलाह शिशिर माय बेटाक ई अन्तरंग मिलन देखि थकमकायल रहि गेलाह,हुनका बुझा गेलनि हिमखण्ड पिघलि रहल छैक….. 

 

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