विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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२.१६.आशीष अनचिन्हार- मैथिली साहित्यमे शरदिन्दु चौधरी केर योगदान

 

आशीष अनचिन्हार

मैथिली साहित्यमे शरदिन्दु चौधरी केर योगदान

जखन कोनो नौकरी करए बला, वा कि बिजनेस करए बला वा कि घूस लेबए बला सरकारी अफसर सभ रचना लीखि कऽ लेखक कहा लैत अछि ठीक तखने पोथी केर मुद्रण, प्रकाशन आ वितरण करए बला शरदिन्दु चौधरीक रचनाकेँ कात कऽ ई कहि देल जाए जे साहित्यमे हिनकर योगदान किछु नै छनि मुदा पोथी जल्दी उपल्बध करबा दै छथि। तखन हम ई सोचबा लेल बाध्य भऽ जाइत छी जे आखिर लेखक हेबाक परिभाषा की छै?

आ शरदिन्दु चौधरीक साहित्यिक योगदान किछु नै छनि से हमरा स्थापित लेखक सभ कहलाह जखन हम एहि विशेषांक लेल हुनकासँ शरदिन्दुजीपर लेख मँगलियनि। ई आर बेसी खतरनाक प्रवृति छै। तँइ हम आन विषयपर लीखब छोड़ि मात्र इएह लीखब जे मैथिली साहित्यमे शरदिन्दु चौधरी केर योगदान की छै आ से हम दुइए-चारि प्वांइटमे देब।

१) मैथिली साहित्यमे नव प्रवृतिकेँ जन्म देनाइ- प्रायः साहित्यिक रचनामे पात्र केर असल नाम दऽ ओकर खंडन नै कएल जाइत छै। संस्मरणमे असल नाम देल जाइत छै मुदा ओहिमे जिनकापर संस्मरण छै तिनकर नकारात्मक पक्ष नै लीखल जाइत छै। शरदिन्दु चौधरी अपन पात्र केर असले नाम रखलाह अपन संस्मरणमे आ जिनकापर संस्मरण छनि तिनकर श्यामपक्षकेँ खूब लिखने छथि। एकटा बैमानी हम उजागर कऽ रहल छी एहि संदर्भमे। २००४ मे हिंदी भाषामे काशीनाथ सिंह केर पोथी छपलनि "काशी का अस्सी", एहि पोथीक सभ पात्र असल नामक संग छल आ सेहो वास्तविक भाषा ओ वास्तविक करनी संग। आ ई छपिते हिंदीमे अनघोल मचि गेलै। एकरा नव प्रवृति मानल गेलै आ मानए बलामे मैथिलीक लेखक आ हिंदी-मैथिलीक उभय लेखक सभ छलाह वा छथि मुदा काशी का अस्सीसँ ठीक दू वर्ष पहिने २००२ मे शरदिन्दु चौधरी केर पोथी आएल "जँ हम जनितहुँ" मुदा वएह मैथिल लेखक सभ चुप भेल छथि। काशीनाथ सिंह जे प्रयोग हिंदीमे केलाह से प्रयोग मैथिलीमे शरदिन्दु चौधरी पहिनहि केलथि। श्रेय देबाक बदला मैथिली आ मैथिली-हिंदीक उभय लेखक सभ शरदिन्दु चौधरीक योगदाने मानबासँ अस्वीकार कऽ रहल अछि। जेना बहुत मामिलामे मैथिली हिंदीसँ आगू अछि ठीक अहू तरहक साहित्यमे मैथिली आगू अछि आ एकर एकमात्र श्रेय शरदिन्दु चौधरीकेँ जाइत छनि। 

२) सच ओ साहस केर दुर्लभ संयोग-साहित्यमे सच ओ साहस तँ हेबाके चाही। मुदा दिक्कत ई जे एहि सच ओ साहसकेँ नपबाक एखन धरि कोनो मापदंड नै अछि। शरदिन्दुजीक सच ओ साहस जनबाक लेल हम एकटा नव फर्मूला (सूत्र) दऽ रहल छी। ई सूत्र मात्र शरदिन्दुएजी नै सभ लेखक केर रचना लेल समान रूपसँ काज करत। हमर एहि सूत्र लेल तीन टा तत्व रहत, पहिल) जँ रचना व्यक्ति केंद्रित अछि, दोसर) जँ रचना कोनो विषय केंद्रित अछि, तेसर) जँ रचना तथ्य केंद्रित अछि। आब एहि तीनू तत्वकेँ फरिछाबैत छी-

अ) व्यक्ति केंद्रित रचना केर दू भाग भेल पहिल समकालीन व्यक्ति आ दोसर पूर्वज। समकालीन मने जे लेखन कालमे आ ओकर बादो जिंदा छथि। जँ रचना समकालीन व्यक्ति केंद्रित छै तखन ई देखल जेबाक चाही जे लीखए बला लेखक आ जकरापर लीखल गेल छै तकर दूरी कतेक छै, दूरी मतलब प्रभाव पड़बाक संदर्भमे। कम दूरी बला लेखक बेसी दुर्दशा भोगत आ बेसी दूरी बला दुर्दशा नै भोगत। उदाहरण दैत छी मानि लिअ लेखक लिखलाह जे यूक्रेनपर हमला अमानवीय छै आ पुतिन खलनायक अछि। आब सोचियौ जे एहि प्रकारक रचनासँ पुतिनकेँ की फर्क पड़तै? किछु नै। लेखक तँ ई लीखि अपनाकेँ साहसी साबित करबा लेला। मुदा जखन पुतिनपर लीखए बला वएह लेखक लिखता जे वीणा ठाकुर वा कि अशोक अविचल केर समयमे खराप पोथी चूनल गेलै तँ लेखक अकादेमीसँ बहिष्कृत कऽ देल जेता कारण एहिमे कम दूरी छै। एकर दोसर उदाहरण अछि हरेक ठाम पत्रकारक हत्या। एहन हत्या बिहारोमे भेल छै। किएक? एकर एक मात्र कारण छै जे पत्रकारक जे सच छलै आ जकरापर लीखल गेल रहै तकर दूरी कम रहै। ओही ठाम दक्षिण आ महाराष्ट्रमे किछु लेखक केर सेहो हत्या भेलै। बिहारमे एकौटा लेखक केर हत्या नै भेलै आ ओहिमे मैथिली केर लेखक सेहो अछि। तँ जाहि रचनामे लेखक ओ जकरापर लीखल गेल छै ओहिमे जँ दूरी कम छै तँ लेखककेँ साहसी ओ सच लीखए बला मानल जेबाक चाही, आ जँ दूरी बहुत छै तँ ओकरा मात्र भाँज पुरा लेब मानल जेबाक चाही। जँ कोनो लेखक अपन पूर्वजपर लीखि रहल छथि तँ जँ ओ प्रमाण दऽ कऽ लीखै छथि तँ हुनका साहसी ओ सच लीखए बला मानल जेतनि।

आ) जँ रचना विषय केंद्रित छै-- जँ कोनो लेखक अपन भाषामे अप्रचलित विषय वा विधाकेँ प्रमाणिक ओ लोकप्रिय बना देलकै तँ ओकरा साहसी मानल जेबाक चाही। जँ ओ ओहिमे तथ्य राखि देकलै तँ ओकरा सच लीखए बला सेहो मानल जेबाक चाही। 

इ) जँ रचना तथ्य केंद्रित अछि-- एहि कोटिमे प्रमाण ओ असल नाम दूनू महत्वपूर्ण छै। जँ एकौटा गाएब तँ साहस ओ सच केर अभाव मानल जाएत।

ई तत्व सभ लेखन केर हरेम माध्यम जेना प्रिंट, इंटरनेट आदि लेल समान रूपसँ लागू अछि। संगे-संग रचनामे कथित मानवतावाद नपबाक लेल इएह सूत्र काज करत।

आब हम शरदिन्दुजीक रचना सभकेँ उपरमे देल गेल तत्वसँ जाँच कऽ रहल छी। "जँ हम जनितहुँ" नामक पोथीमे शरदिन्दुजी प्रायः अपन समकालीन लेखक सभहक नाम लैत लिखने छथि आ ओहिमेसँ अधिकांश एखनो जिबैत छथि। मतलब एहि तत्वमे "साहस ओ सच केर एहि मापदंड" शरदिन्दुजीक रचना पास भेल अछि। संस्मरण विधाकेँ प्रमाणिक बनेबाक श्रेय हिनके छनि आ ई एकटा कठिन काज छलै। मैथिलीमे तँ संस्मरणक रूप एहन बना देल गेल छलै जेना कोनो काल्पनिक कथा लिखा रहल हो। संस्मरणक बहन्ने अपनाकेँ महान कहबाक प्रचलन बहुत भेल। मुदा शदिन्दुजी संस्मरण विधाकेँ मर्यादामे अनलाह। एहू अधारपर शरदिन्दुजीक रचना "साहस ओ सच केर एहि मापदंड"पर पास भेल अछि। संस्मरण शरदिन्दुजीक मूल विधा बनि कऽ आएल अछि ओ जकरा व्यंग्य कहैत छथिन सेहो सभ अपने-आप संस्मरण बनि गेल छै आ एहि संस्मरण सभमे शरदिन्दुजी असल नामक संग पूरा तथ्य अपन समकालीन सभहक नाम लैत लिखने छथि। के पोथी छपा कऽ पाइ नै देलकनि आ के कोन घात केलकनि से सभ किछु। "साहस ओ सच केर एहि मापदंड" शरदिन्दुजीक रचना सभ पास भेल अछि। अधिकांश लेखक केर रचनामे सच ओ साहस केर अभाव रहैत छै। मैथिलीक ई सौभाग्य जे एकरा शरदिन्दु चौधरी सन लेखक भेटल छै जिनकामे सच ओ साहस दूनू छनि आ से पहिल दिनसँ लऽ कऽ एखन धरि। पत्रिकारितामे तँ शरीरक हत्या भऽ जाइत छै। साहित्यमे शरीरक नहि योग्यता, बाजिब चर्चा केर हत्या होइत छै आ शरदिन्दुजीक योग्यता, बाजिब चर्चा केर हत्या भेल अछि।

उपरमे जे हम सूत्र देलहुँ तकरासँ पाठक आनो लेखक केर रचनामे सच-साहस तकता से हमरा विश्वास अछि। ओना फेसबुकपर मजाके-मजाकमे हम एहि सूत्रकेँ अपने नामपर "अनचिन्हार फर्मूला" देलहुँ मुदा पाठक एकर जे नाम देबए चाहथि से दऽ सकै छथि।

३) समानान्तर धाराक संवाहक- हरेक समाज, हरेक भाषा, हरेक साहित्यमे सत्ता पक्ष केर सामने एकटा समानान्तर धारा रहैत छै आ से मैथिलियोमे रहलैक अछि। ओना तँ समानान्तर धारा शब्द विदेह पत्रिका (२००८) संगे समानान्तर धाराकेँ पुष्ट करबाक काजो विदेहे द्वारा भेल अछि। मुदा जहाँ धरि प्रवृतिमे समानान्तर धारा तकबै से मैथिलीमे विदेहसँ पहिनेसँ छै। बल्कि मैथिली भाषाक जन्मेसँ। आ ताही समानान्तर प्रवृतिक संवाहक छथि शरदिन्दु चौधरी। समानान्तर धाराकेँ अहाँ विपक्षी बूझि सकैत छी कारण साहित्यमे राजनीतियोसँ बेसी राजनीति होइत अछि। आ विपक्षी भेनाइए अपना-आपमे एकटा साहित्यिक योगदान छै। कारण विपक्षी हेबाक लेल साहस चाही आ जाहि लेखकमे साहस हेतै सएह नव-नव आयाम जोड़ि सकतै साहित्यमे। 

४) सनातन धर्ममे नारीकेँ पापक खान कहल गेल छै। नारीक प्रति ई द्वेष मात्र सनातने नै कबीर सन दलित ओ समानान्तर धाराक कवि सेहो केने छथि। कबीरक रचनामे नारीक प्रति भक्ति आ द्वेष दूनू छै। सनातनमे सेहो नारी लेल आदर ओ घृणा छै। की तुलसी, की कबीर सभ अपना-अपना ढंगे नारीकेँ केखनो नीक आ केखनो खराप कहने छथि।

पुरुष स्त्रीसँ जन्मैत अछि मुदा नारीकेँ अपवित्र मानैत अछि तेनाहिते लेखक पोथीक प्रकाशन लेल मुद्रक, प्रकाशक लग जाइए, पाठक धरि पहुँचेबाक लेल वितरक लग जाइए आ अंतमे कहैए जे मुद्रक-प्रकाशक-वितरक केर साहित्यमे की योगदान छै। शरदिन्दु चौधरी जँ लेखन नहियो केने रहितथि तँ हुनकर वितरण प्रणालीसँ मैथिलीक कतेक पाठक बढ़लै सएह साहित्यिक योगदान मानल जइतै। आ से शरदिन्दुए चौधरी किएक मैथिलीक पोथीक मुद्रण, प्रकाशन ओ वितरणमे जे-जे लागल छथि तिनको साहित्यिक योगदान रहबे करतनि।

कुल मिला कऽ मैथिली साहित्यमे शरदिन्दुजीक ओतबे योगदान छनि जतेक योगदान कोनो मौलिक आ बिना सोंगर बला लेखक केर होइत छै। कोनो सोंगर बला लेखक कि गुट आ कि कोनो मठ-मठाधीश हुनका इग्नोर कऽ सकैए मुदा शरदिन्दुजी लेखन हुनका सभ लेल सूर्यक समान रहत जकरा ओ सभ झाँपि ने सकताह।

 

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