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२.१५.केदार कानन- हमर शरदू भैया

 

केदार कानन

हमर शरदू भैया

के लिखताह अहाँ पर शरदू भैया? सबहक तँ थौआ उठौने छियै अहाँ। बिढ़नीक खोता आ सांपक बिल मे जानि-बूझि केँ के हाथ देतै। सभक भीतर डर... साहित्य मे जे सभ अपन कल्ला अलगौने छथि, बड़का-बड़का मठ पर सँ जे डाकनि दऽ रहल छथि आइ, अहाँ ओकर आदि अन्त केँ जनैत छी। सबहक बारे मे खुल्लम-खुल्ला लिखने छी, जतऽ बजबाक अवसरि भेटल, ततय ठांहि-पठांहि कहने छी।

तेँ के लिखताह अहाँ पर। अपने पयर पर कुड़हरि चलौने छी। हम की कहब आ की लिखब?

ओ कहैत छथि, राम-राम! की शरदू-फरदू पर लिखब अहाँ? कोनो दोसर काज नहि अछि अहाँ केँ?

नहि भाइ, एखन कोनो दोसर काज नहि अछि हमरा। शरदू भैया पर जँ नहि लिखब, तँ आत्मा धिक्कारैत रहत हमरा। तेँ हुनका पर लिखब हमरा लेल आवश्यक अछि।

आइये भोरमे अपन मित्र आ व्यंग्यकार वैद्यनाथ विमल जी सँ गप होइत छल। हम कहलियनि जे शरदू भाइ पर लिखलह? ओ कहलनि जे ओ हमर ततेक आत्मीय स्वजन छथि जे हमरा सँ लिखले नहि हैत। कतऽ सँ शुरू करब, कतय खतम करब। एक तरहेँ बात ओ ठीके कहैत छथि।

मोन पड़ैत अछि जे १९८०-८१ क आसपास हुनका सँ परिचय भेल छल। जखन पटना मे पढ़ैत रही। कहियो काल ओ अभरथि। ओना सघन-सामीप्य तँ बहुत बाद मे भेल। आ जखन भेल तँ हुनक सूचीभेद्य अन्हार मे डूबल सीढ़ी पर सँ होइत जखन ऊपर जाइ तँ शेखर प्रकाशन सँ पहिने सिलाइ मशीनक घर्र-घर्र मे गोंतल दू-तीन टा मानुष केँ देखी। ओ सभ अपन मूड़ी निहुरौने सिलाइ-फराइक काज मे लागल रहै छल। ठीक तकर बाद बला कोठली मे शेखर प्रकाशनक बोर्ड।

अन्हार मे डूबल ओहि सतरह टा सीढ़ीकेँ पार करैत ऊपर मे इजोते-इजोत सँ अहाँक भेँट होइत। ज्ञान आ विद्या-वैभवक इजोत। चारूकात किताबक रैक आ बीच मे कुरसी पर उज्जर दाढ़ी-मोंछ मे बैसल शरदू भाइ। आउ, आउ- कहि स्वागत करैत। आत्मीयता मे बोरल शब्द, मिठास भरल। बिस्कुट-चाह मंगबैत छी। चटकी सँ उठि ओहि कोठली सँ लागल दोसर कोठलीक रेलिंग पर सँ बिस्कुट-चाहक आर्डर।

एकटा दुब्बर-पातर सनक छौंड़ा चाह आ बिस्कुट लेने हाजिर। पहिने, बहुत पहिने शीशाक गिलास मे चाह अनैत छल बाद मे कागत बला कप मे आबऽ लागल।

जहिना-जहिना साँझ गहराइ, लेखक लोकनिक (जिनक संख्या कमे होइ) अबरजात शुरू होइ। ओतहि हमरा अनेक खेप भाइ वैद्यनाथ विमल, डॉ. योगानन्द झा, बच्चा ठाकुर जी, जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल जी सँ भेंट होइ। बच्चा ठाकुर जी बरमहल भेटैत छलाह। ओ लगभग प्रतिदिन अबैत छलाह। हुनक ओजस्वी भाषण हिन्दी, मैथिली, अंगरेजीमे धाराप्रवाह। बीच-बीच मे संस्कृतक पुट। हम चकित रही, हुनका एहि चारू भाषाक कतेक रास कविता यादि रहनि। ओ कतहु अटकैत-रुकैत नहि छलाह। अलबत्त।

ई सब किछु शरदू भाइक सान्निध्य-लाभक सौजन्यसँ हमरा सहजहि प्राप्त भऽ जाइत छल।

प्राथमिक शिक्षा प्रशिक्षण महाविद्यालय, बाढ़ मे कार्यरत रही। प्रतिदिन बाढ़-पटना आ पटना सँ बाढ़। दू-अढ़ाइ बर्खक अबरजात। पटना रेलवे स्टेशन पर उतरि सोझे शेखर प्रकाशन पहुँचैत रही। लगभग प्रतिदिन। शनि-रवि तँ गाम चलि जाइत रही।

ओत्तहि एकदिन साँझ मे पहुँचलहुँ तँ शरदू भाइ सूचना देलनि जे महाप्रकाश जी अस्वस्थ भऽ कऽ एकटा प्राइवेट अस्पताल मे भरती छथि। फेर ओत्तहिसँ, हुनके संग महाप्रकाश जी केँ देखय गेल छलहुँ।

मोन पड़ैत अछि माया बाबूक अस्वस्थताक खबरि वैह देने रहथि। हुनक हृदयक तार सब लेखक सँ जुड़ल रहनि। हुनक संवेदनशीलताक अनेक खिस्सा मोन पड़ैत अछि। ओ सबहक लेल फिफिरिया कटैत रहथि।

सुनल अछि जे मार्कण्डेय प्रवासीजीक स्थायी अड्डा शेखरे प्रकाशन छलनि अन्तिम समयमे। हुनका लेल शेखर प्रकाशनक दोसर कोठलीमे बजाप्ता एकटा खटिया आ ओछाइनक प्रबन्ध शरदू भाइ कऽ देने छलाह, जतय दूपहरक बाद हारल-थाकल प्रवासी जी आबि कऽ आराम करैत छलाह।

शरदू भाइ सबहक सोह रखैत छथि। वैचारिक भिन्नताक बात अलग थिक, ओतय ओ कोनो प्रकारक समझौता नहि करताह। हुनका दिमागमे जे बात सही लगतनि, ओ सैह करताह। एकदम अडिग-अविचल। हुनक रीढ़क हड्डी तनल रहतनि, झुकबा लेल तैयार नहि।

कतेक रास मैथिलीक लेखक हुनक पाइ मारि लेलकनि, पोथी छपबाय पाइ नहि देलकनि। चालीस-पैंतालीस फर्मा टाइप करबा लेलकनि, भुगतान नहि केलकनि। किछु गोटेकेँ जीवनक तन्नुक क्षणमे बढ़ि-चढ़िकेँ सहयोग केलनि, मुदा सहयोग लऽ कऽ ओ सब विमुख भऽ गेलाह। आब शरदू भाइकेँ के पूछैत अछि? ओ अपन घर, ई अपन घर।

मुदा, सहयोग करबाक जकरा लुतुक लागल छैक, ओ मानय बला नहि। एखनो सहयोगक मुद्रा मे ओ बैसल रहैत छथि।

ओ एकान्त सेवक जकाँ मैथिलीक सेवा मे अहर्निश लागल छथि। शरीर आ स्वास्थ्य संग नहि दैत छनि मुदा तखनो ओ मैथिलीएक चिन्ता मे अपस्यांत रहताह।

मैथिली पढ़य बला लेल, बी.पी.एस.सी.; यू.पी.एस.सी.क तैयारी करय बला छात्र सबहक लेल तँ ओ ठीके सब सँ बेसी सोचैत आ करैत छथि।

हुनक रपट सब सँ आहत भेल, सत्यक उद्घाटन करैत रपट सँ पीड़ित अनेक संस्था आ लेखक-मित्र लोकनि केँ ओ फुटलीयो आँखि नहि सोहाइत छथिन। मुदा, ताहि सँ की? ओ अपन अनुभव मे कोनो हिस्सेदारी नहि चाहैत छथि।

कर्जा सँ लदल रहितो ओ अपन पिताक लगभग सबटा कृति केँ नव साज-सज्जा मे प्रकाशित करौलनि। अनेक अप्रकाशित कृति केँ मैथिली पाठक लेल प्रकाश मे अनलनि। ई हुनक महत्त्वपूर्ण योगदान थिक। 

अपनहुँ अनेक व्यंग्य रचना लिखलनि। प्रकाशन जगतक भयावह आ अन्हार दुनिया केँ प्रकाश मे अनलनि। अपन जीवनक कटु-मधु अनुभवकेँ बेबाकीसँ लिखलनि। ई सब हुनक साहसक परिचायक थिक। जे काज आन नहि कऽ सकैत अछि, तकरा ओ सहजतापूर्वक कयलनि।

हुनक व्यक्तिगत दुनिया आ जीवन अन्हार मे डूबल छनि मुदा ओ सबहक लेल प्रकाशक संधान मे लागल छथि। 

कतेक रास बात मोन मे औनाइत अछि। कतेक रास बात ठोर पर आबि-आबि हुलकी मारैत अछि। मुदा, तकरा फेर लिखब भैया।

एखन एतबे कहब जे दुनिया भरिक झंझट सँ अनथक संघर्ष करैत अहाँ जे प्राप्त कयलहुँ अछि, से दोसराक लेल चुनौती जकाँ ठाढ़ रहतै। अहाँक संघर्ष आ अहाँक समर्पणक प्रति नत भेल छी।     

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