विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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२.१४.शिवशंकर श्रीनिवास- जेहने मधुर तेहने दृढ़

 

शिवशंकर श्रीनिवास

जेहने मधुर तेहने दृढ़

ओहि दिनमे शरदिन्दु चौधरी मिथिला-मिहिरक संपादक मंडलीमे रहथि।

१९८२-८३ केर गप्प छियै। तहिया मिथिला-मिहिर साप्ताहिक प्रकाशित होइत रहै। ओहि समयमे मिहिर कथा विशेषांक प्रकाशित करैत रहए। दू-तीन मास पहिनेसँ ओहि विशेषांक लेल प्रचार-प्रसार होइत रहै। कथाकार लोकनि कथा पठबै जाथिन। ओहि विशेषांकमे कथा प्रकाशित हएत ई बात ओहि काल हमरा सन कथाकारक लेल बहुत प्रसन्नताक विषय रहै। एकटा उत्कंठा पहिने होइ जे हमर कथा आबि रहलैए कि नहि।

हम पटना गेल रही। मिथिला-मिहिरक कार्यालय गेल रही। देखलहुँ गोर-नार छड़हरे सुंदर युवक बैसल किछु लिखैत हमरा दिस तकैत कहलनि- "आउ श्रीनिवासजी"। ओ युवक आर केओ नहि शरदिन्दु चौधरी रहथि।

ओना हमरा शरदिन्दुजीसँ भेंट-घाँट छल। हमरा चिन्हैत छलाह। किछु-किछु कएलाक बाद पुछलियनि-कथाक अंक आबि रहलैए? ओ उत्तर देलाह- हँ अगिला सप्ताह बहरा जाएत। मुदा, एखन ई नहि कहब जे कोन-कोन आ किनकर-किनकर कथा आबि रहलैए।

"नहि कहू", हम पुनः पुछलियनि- हमर कथा भेटल की? ओ बिहुँसि उठलाह। शरदिन्दुजीक बिहुँसब ई सहजहि प्रतीत करा देत जे ओ अपन भंगिमासँ स्नेह प्रकट भऽ रहलाह। आ वएह भंगिमासँ कहलनि-नीक कथा अछि। कथाक कथ्य सेहो मार्मिक अछि "आ...."। हमरा हुनक एहि "आ.."पर अटकब हमर उत्कंठा बढ़ा देलक। हम पुछलियनि-की? ओ कहलनि-"जाहि कथाक प्रत्येक पंक्ति कथाकेँ आगू बढ़ाएब ओ कथा पढ़बामे ओतेक रुचि दैत अछि। एहन कथाक पाठकीयता बढ़ि जाइत अछि। से अहाँक कथामे अछि। हमरा नीक लागल"।

शरदिन्दुजीक उक्त उक्ति हमरा बहुत मार्मिक लागल। ओ बात-बातमे कथाक विशेषताक बहुत बात कहि गेलाह। हम आगू कथाक उक्त बात धेआन रखैत रहलहुँ। कथा लिखैत काल अनायासे हमरा हुनक ओ "बात" आ "ओ" मोन पड़ि जाइत रहलाह।

हमरा लगैए ई आलोचना विधामे जँ लिखतथि तँ मैथिली आलोचना साहित्यकेँ बहुत लाभ होइत। एक बेर नहि आनेको बेर ओ एहन गप कहने हेता जाहि आधारपर हम ई कहै छी।

एक बेर ओ कहलनि जे कोनो लेखककेँ एक बेर सुच्चा पाठक रूपमे अपन रचनाकेँ पढ़क चाही, ओ पढ़लाक बाद अपने अपन रचनाक प्रति निर्णय करथि।

शरदिन्दु सदा हमरा गंभीर आ सचेतन लगलाह।

एक बेर हमरा ओ कहलनि जे अहाँ गोविन्द दासक जतेक पद छनि ओकर व्याख्या कऽ कऽ दिअ। पोथी रूपमे आबि जेतै तँ छात्र सभकेँ बड़ उपकार हेतै। 

ओकर किछु दिनक बाद हम से करऽ लगलहुँ। किन्तु किछु दिनपर किशोर केशव कहलनि जे "गोविन्द दासपर लीखि कऽ दिअ"। शरदिन्दुजीसँ हमरा गप भेल अछि अहाँ लिखै छी"। हम कहलियनि- हँ, किन्तु हम तँ हुनक प्रत्येक पदक व्याख्या करैत रहल छी। किशोर कहलनि- नहि एखन आलेख दिअ। आ से हम हुनका लीखि पठा देलियनि आ ओ अक्षर-पुरषमे छपल, किन्तु ओ व्याख्या अनठा गेल।शरदिन्दुजीसँ अहाँक कतबो मधुर संबंध अछि, यदि अहावक रचना नीक नहि अछि तँ ओ नहि छपताह। जखन ओ "समय साल" केर संपादक रहथि तँ कतेको रचनाकार अपन रचना नहि छपबाक कारणे हुनका पत्र लिखथिन। ओहि पत्रकेँ ओ पाठकीय कॅालममे प्रकाशित करथि आ ओकर उत्तर सेहो देथि। अपन निर्णयपर ई सदा दृढ़ रहऽ बला लोक रहलाह। कोनो स्वार्थसँ उपर ई साहित्य ओ साहित्य जगत कार्यकेँ रखलनि। हिनक सभसँ खूबी अछि जे हिनकासँ जँ कोनो चूक भेलनि तँ ओ ओहि चूककेँ सार्वजनिक करैत क्षमा मँगैमे सेहो ई नहि हिचकता। एहन कतेको उदाहरण देखल-सुनल अछि। हिनक पोथी " हमर अभागः हुनक नहि दोष" पढ़ि सेहो ई बात बुझि सकै छी।

एक बेरक गप्प कहै छी, हिनक संपादित पोथी "मैथिली गद्य गौरव" हम एकटा विद्यार्थीक हाथमे देखलियै। ओ लऽ हम  पढऽ लगलहुँ तँ देखलहुँ कथापर एकटा आलेख अछि। लेखक एकटा प्रसिद्ध लेखक छथि। ओ लेख पढ़ैत लागल जे ई तँ हमर लेख छी। हम तात्काल शरदिन्दुजीकेँ कहलियनि जे एना किएक?

ओ कहलनि अहाँक लेख छी तकर प्रमाण?

"हमर ई लेख नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडियासँ प्रकाशित पोथीक संपादकीय अंश थिक" ओ कहलनि- हम थोड़े कालमे फोन करै छी, एखन राखू।

किछु कालक बाद हुनक फोन आएल जे "ठीके अँहीक रचना छी। हमरासँ गलती भेल. जे कही।

हम कहलियनि- गलती एहिना भऽ जाइ छै। कोनो बात नहि। एकरा ठीक कऽ दियौ।

"ओ ठीक भऽ जेतै। किन्तु जाहि व्यक्तिक नाम एहिपर छनि हुनका पोथी देलियनि तँ धन्यवाद दैत रचना देखलीह आ पोथी राखि लेलनि। किछु कहलनि नहि। अद्भुत अछि"।

हमरा हँसी लागल।

ओ कहलनि- अहाँ हँसै छी श्रीमान। हम तँ लज्जित छी।

नहि ई कहि हम गपइ बदलि देल किन्तु ओ बेर-बेर एही गपपर अबैत रहलाह।

एक सप्ताहक बाद हम हुनक प्रकाशन गेलहुँ तँ देखल जे हमर नाम छापि पोथीक ओहि आलेखक लेखक क्रममे साटि देने छलाह। बादक संग्रहमे तँ सहजहिं हमर नाम आबि गेल। कहबाक जे एतेक तत्पर आ उचित निर्णयकेँ कार्यान्वित करबाक क्षमता जे हुनकामे छनि से कदाचिते लोकमे भेटत।

शेखर प्रकाशन कहू वा हुनक पोथी विक्रय केंद्र, ओतऽ जहिया गेलहुँ तहिया ओ ततेक हिलसि कऽ स्वागत केलनि जे बुझाएल हमहूँ लेखक छी। अद्भुत स्नेह आ से तेहन जे सतत स्वजनक बोध होइत रहल। ई असलमे हुनक भाषा-साहित्यक प्रति प्रबल प्रेम अछि।

हुनका जीवनमे नीक नौकरी भेल रहनि किन्तु ओ नहि गेलाह, ओ अपना लेल उक्त बात (आर्थिक दृष्टिएँ) नीक नहि केलनि किन्तु मैथिली साहित्यिक विकास लेल हुनक ओहि नौकरीमे नहि जाएब बहुत फलदायी भेल। खास कऽ कऽ छात्र सभहक लेल हुनक प्रकाशन जतेक कार्य केलक अछि ओ प्रसंशनीय अछि।

शरदिन्दु चौधरी माने स्नेहसँ भरल लोक। एकटा एहन लोकजेँ अपन भाषा-साहित्य संवर्धन लेल अपब भविष्यकेँ बुझितो अपन पूरा जीवन लगा देलनि।

एहन सत-पुरुषकेँ अभिननंदन करैत हुनक स्वस्थ जीवनक शुभकामना करैत छी।

 

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