विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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२.१३.अशोक- शरदिन्दु जी

 

अशोक

शरदिन्दु जी

वर्ष १९८७ ई. के गप छी। शरदिन्दु जी ओहि समय मिथिला मिहिर मे उपसम्पादक रहथि। हम एकटा कथा मि. मि. मे प्रकाशन लेल पठौने रही। शरदिन्दु जी कहने रहथि जे ओ कथा छपि रहल अछि। मुदा ओ कथा हमरा भीतर एखन चलिए रहल छल। लगैत रहय जे कथाक अन्त ठीक नहि भेल अछि। ओहि मे हम चारि-पाँच पाँती आर जोड़बाक निर्णय लेलहुँ। एक दिन हम ओ पाँती सभ लीखि कऽ मिथिला मिहिर कार्यालय पहुँचलहुँ। शरदिन्दु जी बैसल रहथि। हुनका कहलियनि तऽ ओ कनेकाल लेल गुम भऽ गेला। कहलनि जे, 'आब तऽ पूरा अंकक प्रूफ फाइनल भऽ गेल अछि। छपै लेल चल गेल अछि।' हम फेर हुनकासँ कोनो उपाय निकालबाक अनुरोध केलहुँ। जँ कोनो गुंजाइश होइ तऽ देखिअउ। ओ कनेकाल सोचलनि आ कहलनि, 'ठीक छै। चलू प्रेसमे नींचा। जँ छपबाक प्रक्रिया शुरू नहि भेल हेतै तऽ ओहीठाम करेक्शन कऽ देबै।' हम सभ नीचामे प्रेसमे गेलहुँ। बड़का-बड़का मशीन सभ रहै। घर्र-घर्र आबाज भऽ रहल छल। ककरो आबाज सुनबामे दिक्कत होइत रहै। ओही बीचमे ओ कोनो कर्मचारी सँ बात कऽ देखलाहा प्रूफ के कागज हमरा आनि कऽ देलनि। देखलहुँ प्रूफ मे संशोधनक हिसाबसँ कम्पोजर द्वारा करेक्शन सेहो भऽ चुकल छैक। छपबाक प्रक्रियामे आब अगिला काज बाँकी रहै। हम ओहीठाम ठाढ़े-ठाढ़ कथाक अन्तमे पाँच-छहटा पाँती जोड़लहुँ। कम्पोजर लगले कम्पोज केलनि। शरदिन्दुजी प्रूफ देखि कऽ ओ.के. केलनि। ओ कथा रहय 'नचनियाँ', जे मिथिला मिहिरमे एहि प्रकारेँ प्रकाशित भेल।

शरदिन्दु जी सँ एहि घटनाक पुर्वेसँ परिचय-पात रहय। हमरा हुनकर सानिध्य आ बात-विचार नीक लगैत रहय। ओ एक पत्रकार के रूपमे साँच-साँच बात कहबाक आ लिखबाक पक्षपाती रहथि। ककरो ठकुरसुहाती करब, जेना ओ सिखनहि नहि छथि। सोझ-सोझ, साँच-साँच गप बाजब हुनका पसिन्न छनि। एहि कारण ओ बहुधा विभिन्न लोकक द्वारा निन्दा-आलोचना सुनैत रहला आ सहैत रहला अछि। कतेक लोक हुनकासँ दूरी बना लैत रहल। मुदा शरदिन्दु जी छथि जे बात हुनका अनसोंहात लगैत छनि, तेकरा ओ व्यक्त करैत रहैत छथि।

बाद के समयमे ओ इण्डियन नेशन संग निकलैत आर्यावर्त दैनिक अखबार आ मिथिला मिहिर मे सेहो काज केलनि। मिथिला मिहिर मे ओ अन्त धरि रहथि। ओकर बन्द हेबाक कारण सभसँ क्षुब्ध छला। अन्ततः हुनकर नोकरी सेहो एहि क्रममे छुटि गेलनि। वस्तुतः हुनका संग मैथिली साहित्य, ओकर विकासमे योगदानक जीवित इतिहास आ व्यक्तिक रूपमे स्प्ष्टवादिताक विरासत छलनि। एहि बात के ओ कहियो ने बिसरला। मैथिली साहित्यमे साहित्यकारक बहुत कम परिवारमे दोसर पीढ़ीक लोक सहज रूपमे ओहि विरासत पर गौरव-बोध करैत, ओकरा सम्हारि कऽ रखबाक लेल आ आगू बढ़ेबाक लेल प्रतिबद्ध रहला। शरदिन्दु जी एहन व्यक्ति छथि जे नहि केवल ओकरा सम्हारि कऽ रखलनि अपितु मनोयोगसँ ओकरा व्यापक बनेबाक लेल सचेष्ट रहला अछि। शेखर प्रकाशन ओकर प्रतिफल छी। मैथिली मे ई एक विरल उदाहरण थिक जे अपन पिता सुधांशु 'शेखर' चौधरीक बाद एक सुयोग्य पुत्र रूपमे शरदिन्दु जी समय के चिन्हैत, मैथिलीक प्रयोजन के गमैत तदनुसार काज करबाक लेल अपना के झोंकि देलनि। हुनकर आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहि रहनि। बहुतो अभाव सभ रहनि मुदा बिना कोनो समझौता के ओ परिवारक भरण-पोषण संग मैथिलीक काजमे लगातार लागल छथि। से सभ अपन शर्त पर।

शेखर प्रकाशन नामसँ ओ पटनामे मैथिली पोथीक दोकान सेहो खोललनि स्टेशन लग। एहि व्यवसायमे ओ सम्पूर्ण निष्ठाक संग लागल छथि। पोथी सभक प्रकाशन केलनि। विभिन्न प्रकाशक सभक पोथी के विक्री केलनि। जखन यू.पी.एस.सी. आ बी.पी.एस.सी. मे मैथिली साहित्य सम्मिलित भेल तऽ ओकर सिलेबस के अनुसार पोथी सभ प्रतियोगी छात्र सभ के उपलब्ध करौलनि। सिलेबसक हिसाबसँ पोथी सभ लिखबा कऽ वा सम्पादित करा कऽ ओकर प्रकाशन केलनि। जे पोथी 'आउट आफ प्रिंट' भऽ गेल छल, ओकर फोटो कॉपी बना के छात्र सभ के उपलब्ध करौलनि। कतेको छात्र सभ के उपयोगी सुझाओ सभ दऽ अथवा मार्गदर्शन कऽ परीक्षामे सफल हेबामे मदति केलनि। एहन किछु छात्र सभ केँ हम हुनका एहि लेल अपूर्व सम्मान दैत देखने छी।

शरदिन्दु जी मैथिली सँ जुड़ल सरकारी आ गैरसरकारी संस्था सभक अनटोटल बात सभ पर व्यवस्था सम्बन्धी कुप्रबन्ध सभ पर सदैव लिखैत रहला अछि। से चाहे साहित्य अकादेमी हो वा मैथिली अकादमी अथवा चेतना समिति, लेखक संघ हो। हुनकर तर्क सभ अचूक होइत छनि। ओ कोनो व्यक्तिक पाखण्ड वा अनटोटल काज पर विस्तार सँ लिखैत रहल छथि। से चाहे पत्रकारक रूपमे अथवा व्यंग्यकारक रूपमे। एहि सँ कखनहुँ के हमहूँ नहि बँचल छी। हमर एक लेखमे तैंतालीसटा सन्दर्भ-संकेत रहय। ओहि पर ओ चारि पाँतीक आलोचनात्मक कविता लीखि ओही पत्रिकामे पाठकीय पन्नामे छपौलनि। चेतना समितिक कोनो काजक क्रममे जँ हमर कोनो क्रियासँ हुनकर असहमति रहलनि तऽ अपन लेखमे ओकर चर्च केलनि। ई कहब जे एहिसँ हमरा कोनो दुख नहि होइत छल तऽ से बात नहि, दुख कनेकाल लेल अवश्य होइत छल। मुदा शरदिन्दु जी के हम चिन्हैत रहियनि, एहिमे हुनकर कोनो अन्यथा भाव नहि रहल करनि, तेँ हुनका संग बात-व्यवहारमे कोनो अन्तर कहियो नहि आयल। ओ हमरा कतेको अवसर पर सहायता सेहो खूब केने छथि। सुझाओ देने छथि। से बिना कोनो लाग-लपेट के। हमरा लगैत छल जे ओ उचित कहि रहल छथि। हमर मान-सम्मान लेल सेहो ओ गुप्त रूपसँ सक्रिय रहला अछि। अपना प्रसंगक ई सभ बात एहि कारणे कहि रहल छी जे एहि सँ शरदिन्दु जी केँ बूझल जा सकैत अछि।

ओ समाचार-विचारक पत्रिका 'समय-साल'क कतेको वर्ष धरि सम्पादन केलनि। मैथिली पत्रकारिता केहेन भऽ सकैत अछि, से उदाहरण एहि सँ ओ कायम केलनि। ओ पोथी सभक सम्पादन केलनि। व्यंग्य सभ लिखलनि। अपन जीवनानुभव के छोट-छोट टिप्पणीक रूपमे दर्ज कऽ किताब छपौलनि। बहुत दिन धरि हुन्दुस्तान अखबारमे 'ठाँहि-पठाँहि' कालममे मैथिलीमे व्यंग्य लिखैत रहला। एही संग ओ मैथिलीमे पत्रकारिता लेल नीक योगदान करबाक हेतु पत्रकार के सम्मानित करबाक उद्देश्यसँ 'शेखर पत्रकारिता सम्मान' सेहो दैत रहला अछि।

एम्हर ओ किछु दिन खूब अस्वस्थ रहला। कठिन परिश्रम नहि कयल होइत रहनि, तथापि जतबा सम्भव भेलनि मैथिलीक काजमे संलग्न रहबे केलाह। प्रयत्नशील रहला। हुनकर शेखर प्रकाशन सभ दिन साहित्यकार सभक लेल, पाठक ओ छात्र सभ लेल उपयोगी रहल अछि। पटनाक एकमात्र मैथिली लेल महत्वपूर्ण स्थान अछि शेखर प्रकाशनक ओ स्थान जतऽ शरदिन्दुजी बैसल रहैत छथि। बहुधा समय भेटला पर अथवा कोनो प्रयोजन भेला पर हम ओहिठाम जाइत रहल छी। गति-विधि सभ बुझैत रहल छी। शरदिन्दु जी के मनोयोगसँ सुनैत रहल छी। शेखर प्रकाशनक एहेन महत्ताक श्रेय शरदिन्दुजीक एहन व्यक्तित्व के जाइत छनि। हुनका संग चलैत विरासत के जाइत छैक। पटनाक जीवनमे, मैथिलीक कार्यकलापमे बहुतो व्यक्ति सभक सहभागिता-सहयोग हमरा भेटैत रहल अछि, से एक उचितवक्ता मित्र रूपमे शरदिन्दुजी सँ सेहो लगातार भेटैत रहल अछि। से हमरो लेल एक महत्वपूर्ण बात छी।

 

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