विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.

२.१२.अजित कुमार झा- 'समय-साल' केँ अकानैत: शरदिन्दुजीक संपादन ओ संपादकीय

 

अजित कुमार झा

'समय-साल' केँ अकानैत: शरदिन्दुजीक संपादन ओ संपादकीय

मैथिलीक द्वैमासिक पत्रिका 'समय-साल' केर जून- जुलाई 2004 अंक मे प्रतिक्रिया स्तंभ मे ' एकटा उपराग: संपादकक नाम' छपल छल। उपराग एतबहि छल जे ओहि लेखक केर कोनो एकटा कथा केँ अहि पत्रिका मे स्थान नहि भेटल छलै। लेखक केँ ओहि कथाक भविष्यक चिन्ता छलनि। खैर किछु हद तक स्वाभाविको छैक ई चिन्ता किएक त' जाहि लेख केँ स्थान नहि भेटैत छैक ओकरा लौटाबय केर प्रथा नहि अछि। खैर पुनः ओहि उपराग दिस आबी जे कि पूरा एक पृष्ठक छल आ अगिला पन्ना मे संपादक जी अर्थात् श्री शरदिन्दु  चौधरी जी केर जवाब छलनि। ओहि मे सँ किछु पाँती उद्धृत करय चाहब:

'अपनेक उपराग हमरा प्रेरित एवं उत्साहित कयलक अछि मुदा हमर किछु विवशता सेहो अछि।..............

दोसर बात ई जे 'समय-साल' साहित्यिक पत्रिका नहि थिक से एकर मुखपृष्ठे कहैत अछि। तथापि अपने लोकनिक एकरा प्रति अगाध प्रेमे अछि जे प्रेमवस उपराग दैत छी। उपराग हमरा नीक लगैत अछि तैँ एकरा हम सार्वजनिक क' रहल छी।

मैथिलीक लेखक-प्राध्यापक सर्वज्ञ, सर्वगुण सम्पन्न एवं सर्वकालिक होइत छथि आ प्राय: तेँ सभठामक आसन सुलभ प्राप्त करय चाहैत छथि। मुदा पत्रकारिता एकटा एहन विधा छैक जाहि मे बड़ त्याग तपस्या आ उपेक्षा भेटैत छैक। एही कारणे प्राध्यापक प्रवर लोकनि साहित्यकार, लेखक तँ होयबाक सख पोसैत छथि मुदा अपने बलें पत्रिका चलयबाक साहस नहि क' पबैत छथि। अतिथि संपादक बनि सत्कार पाबि गद्गद् रहैत छथि। एहू सब पर सोची से आग्रह। अपनेक कथाक मादे कि कही - अपने लोकनिक कथा सँ मैथिली कतेक सशक्त भेल अछि से कि कथाक इतिहास नहि कहैत अछि?'

वास्तव मे कोनो  पत्रिकाक संपादन बड्ड दुरुह कार्य थिक ओहू मे मैथिलीक। हमरा पास कोनो आँकड़ा त' नहि अछि मुदा जतेक बुझबा मे अबैत अछि ताहि केँ आधार पर कहि सकैत छी जे मैथिली मे कथा, कविता, गीत, गजल, नाटक एवं आलेख केर पोथी त धुरझार छपि रहल अछि मुदा पत्रिका आँगुरे पर गनय लायक। मैथिली पत्रिका सब विशेष रूप सँ अल्प जीवी होइत अछि। पाठक केर संख्या लगभग नगण्य कहल जाय। ओहि सँ बेसी संख्या लेखक केर रहैत अछि। पत्रिका छपैत त' अछि मुदा बिकाइत नहि अछि। एहन मे आखिर कोना कोनो पत्रिका दीर्घ जीवी होयत? अपन संतुष्टि हेतु अपन पोथी त' लोग बिलहैते छथि  मुदा पत्रिका कोना बिलहल जाओ। मंगनी मे देबैक आ लोग पढ़ि लेताह सेहो नहि होइत छैक। जौँ संभव होइतैक त' एकटा सर्वे करबा क' देखबाक चाही जे भारतवर्ष मे मैथिलीक कतेक प्राध्यापक छथि आ छोट छिन सँ ल' ' नामी गिरामी कतेक लेखक मैथिली केँ क्षेत्र मे कार्य क' रहल छथि? अहि सँ इएह जानकारी प्राप्त करबाक अछि जे कि अपन सबहक कोनो भी मैथिली पत्रिका केर ओतेक प्रति बिकाइतो छैक कि नगण्य ही सही किछु त' विशुद्ध रूप सँ पाठको केर संख्या हेतैक? हमर कहबाक तात्पर्य इएह अछि जे पत्रिकाक संपादन निश्चित रूप सँ बड्ड कठिन कार्य अछि आ अहि कठिन कार्य केँ तन्मयता सँ करैत रहलनि हँ श्री शरदिन्दु चौधरी जी। एहन नहि जे ओ अपन पोथी नहि लिखलनि।

हिनकर प्रकाशित पोथी केर नाम छन्हि ' जँ हम जनितहुँ' , बड़ अजगुत देखल, गोबरगणेश आ करिया कक्काक कोरामिन' । बस व्यंग्य संग्रह " करिया कक्काक कोरामिन' हमरा पढ़बाक अवसर भेटल। श्री शरदिन्दु चौधरी जी सन् 1981 सँ निरन्तर पत्रकारिता क्षेत्र सँ जुड़ल छथि। 'मिथिला मिहिर लेल कार्य कयलनि एवं ओहि केँ पश्चात हिन्दी दैनिक ' आर्यावर्त ' मे फीचर संपादक केँ रुप मे कार्य कयलनि। एखनधरि लगभग बीसटा सँ बेसी स्मारिकाक संपादन कयलनि अछि। गुवाहाटीक मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समितिक पत्रिका ' पूर्वोत्तर मैथिल ' केर संपादन सँ जुड़ल रहलाह। आजुक चर्चाक हमर मुख्य विषय अछि मैथिली द्वैमासिक पत्रिका ' समय-साल ' जकर संपादक छलथि श्री शरदिन्दु चौधरी जी। एक तरहें कहल जाय त' संपादन कला हिनका विरासत मे भेटल छन्हि।  10 फरवरी 2000 केँ  मैथिली द्वैमासिक पत्रिका "समय-साल' केर पहिल अंक केर प्रकाशन केर साथ मैथिली पत्रकारिता मे एकटा न'ब अध्याय जुड़ि गेल छल।  सन् 2003 सँ ल' ' 2008 धरि अहि पत्रिकाक हम नियमित पाठक छलहुँ। प्रतिक्रिया, संपादकीय, यत्र-तत्र-सर्वत्र, समसामयिक, खेल, सिनेमा, पोथी परिचय एवं स्तरीय आलेख सब अहि पत्रिकाक मुख्य आकर्षण छल। मैथिली मे सामाजिक एवं राजनैतिक चेतनाक संवाहक छल ई पत्रिका। एहन नहि छैक जे अहि पत्रिका मे हमरा सब किछु नीँके बुझायल मुदा तखन इहो सही छैक जे नीँक बेजाय किनको व्यक्तिगत सोच होइत छैक। जे हमरा नीँक लगैत अछि से सबकेँ नीँक लगतन आ जे हमरा बेजाय लगैत अछि से सबकेँ बेजाय लगतन से त' संभव नहि छैक। मुदा एत्तह हम अपना नजरि मे जे नीँक बुझायल तकरा नीँक कहब आ जे बेजाय बुझायल तकरा बेजाय कहब। विभिन्न तरहक कथा-कहानी, गीत-गजल, समसामयिक विषय पर आलेख आ संपादकीय अद्भुत लागल। तखन राजनीतिक रुप सँ एकटा पार्टी केर प्रति झुकाव सेहो बुझायल। प्रतिक्रिया मे किछु अहि विषय पर पत्र सेहो समय-समय पर अभरल। हम  'समय-साल' केँ मात्र सामाजिक एवं राजनैतिक चेतनाक संवाहकेटा नहि मुदा एकटा पारिवारिक पत्रिका सेहो बुझैत छी आ हमरा ख्याल सँ एहन पत्रिका मे निधोख भ' ' अश्लील छवि त' रहिते छल मुदा अंतिम पृष्ठक आलेख सेहो अश्लीलता सँ भरल रहैत छल। 'लतिका' संभवतः छद्म नाम रहल होयत जाहि नाम सँ ई आलेख अबैत छल। ई आम पाठक केर पसन्द छल आ कि एहि तरहक नियमित स्तंभ कोनो मजबूरीवश छल से नहि जानि। हमरा ख्याल सँ एहन सामग्री एवं छवि अहि पत्रिकाक मान-सम्मान केर अनुरूप नहि छल। ओना नीँक अथवा बेजाय ई किनको भी व्यक्तिगत सोच होइत छैक।

संपादकीय निस्संदेह समसामयिक विषय पर निधोख लिखलनि अछि। संबंधित व्यक्ति केँ ठेस त' पहुँचल हेतनि मुदा एकटा संपादक जौँ उचित बात केँ निधोख भ' ' नहि लिखता त' फेर केहन पत्रकारिता? जहाँ मैथिली पत्रिका केँ अल्प जीवी होयबाक श्राप छैक ओत्तह लगातार चौदह वर्ष धरि 'समय-साल' केर प्रकाशन बिनु लगन आ मेहनत केर कोना संभव होइत? अहि दुरुह काज लेल हिनक जतेक प्रशंसा कयल जाय से थोड़बे होयत। विभिन्न अवसर पर विभिन्न विषय सँ संबंधित हिनकर संपादकीय केर किछु अंश बानगी के रुप मे अपने सबहक समक्ष प्रस्तुत क' रहल छी आ आशा करैत छी जे विविध विषय पर हिनक बेबाक टिप्पणी हृदय केँ झंकृत अवश्य क' देत।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार सभ बेर किछु तीत, किछु मीठ बात ल' ' अबैए मुदा अहि बेरक पुरस्कारक क्रम मे जे बात सभ सोझां आयल अछि से स्पष्ट क' देलक अछि जे पुरस्कारक प्रतिस्पर्धी सँ ल' ' निर्णायक मंडलक सदस्य लोकनि तक एके रंग मे रंगल सियार छथि जे सोझे डेगे चलिये ने सकैत छथि।

फरवरी-मार्च 2003

प्रायः क्रिकेट छोड़ि आन कोनो क्षेत्र नहि अछि जाहि मे कर्म सँ पहिने देबाक एहन अन्धाधुन घोषणा होइत हो। लसख टाका केँ के पूछय करोड़क करोड़ भारतक विभिन्न कम्पनी आ सरकार देबाक घोषणा पहिने क' देने छल। परिणाम ई भेल जे निर्णायक मैच मे  बेसी खेलाड़ी गेन्द नहि देखि करोड़ोक राशि देखय लागल छलाह मुदा जखन सपना टुटलनि तँ गेन्द विकेट उखाड़ि लेने छलनि आ ओ लोकनि अपन भाभट समेटि भारतीय दर्शकक अनुगूंज 'कम आन इंडिया' सुनि बिना कप नेने वापस आबि गेलाह।

अप्रैल-मइ 2003

जहिया-जहिया जनता जागल अछि तहिया-तहिया सरकार उलटल-पलटल अछि, प्रशासन नतमस्तक भेल अछि। सामाजिक परिवेश मे राजनीतिक गुंडागर्दीक विरोध मे जावत स्वयं जनता ठाढ़ नहि होयत तावत अहिना लाठी पर तेल पियबैत सरकार पर बैसल एहन-एहन नेता जनता केँ अपन सुख-सुविधा जुटयबा लेल डेंगबैत रहत आ शासन पर बैसि कुहैत रहत।

जून-जुलाई 2003

बिहार मे नेताक कमी नहि, अभिनेताक कमी नहि, चिकित्सक आ अभियंताक कमी नहि, बुद्धिजीवी महंथक कमी नहि अछि। मुदा करोड़ो लोकक बीच मे मनुक्खक कमी भ' गेल अछि जे अपन मातृभूमि, जन्मभूमिक विषय मे सोचि सकय, किछु क' सकय, ओकर रक्षा क' सकय।

अक्टूबर-नवम्बर 2003

ई कोनो न'ब घटना नहि अछि जाहि मे बिहारीक सभ तरहें मान-मर्दन भेल अछि, क्षति भेल अछि, बिहारी लोकक बलिदान भेल अछि। जँ बिहार सरकार अपन नागरिकक सुरक्षा अपन देश मे करयबाक लेल सक्षम नहि भ' सकत, बिहारी अस्मिताक रक्षा नहि क' सकत, अपन युवा सदक्तिक मान-अपमानक अनुभव नहि क' सकत तँ अहि सँ दुखद विषय की भ' सकैछ?

दिसम्बर-जनवरी 2003-04

ध्यान देबाक बात ई थिक जे जे नेता लोकनि पाँच वर्ष धरि जातिवाद, सम्प्रदाय, हिंसा, भ्रष्टाचार, वंशवाद आदिक विरुद्ध विषवमन करैत नीति, सिद्धांत, लोकाचार, विचारक बात एवं समाज सेवा अपना केँ सर्वश्रेष्ठ घोषित करैत छलाह से चुनावक देहरि र अबितहि देश, समाज, क्षेत्रक मान-सम्मानक परवाहि कयने बिना दल बदल सँ ल' ' सभ तरहक छल-छद्म अपना नीति-सिद्धांत केँ त्यागि विजय श्री पयबा लेल उताहुल छथि।

अप्रैल-मइ 2004

अपन भाषिक परिचिति बनल रहय ताहि हेतु हमरा लोकनि कनिकों चिन्तित नहि रहलहुँ, आबो नहि छी। परिणाम सभकेँ बूझल अछि। मिथिलाक्षर लुप्त भ' गेल आ सभ निश्चिंत छी। मैथिलीक साहित्यकारगण, प्रध्यापक लोकनि, शिक्षक लोकनि अथवा ई कही जे मैथिली लेखन सँ जुड़ल समाज मात्र साहित्य अकादेमी, मैथिली अकादेमी, भारतीय भाषा संस्थान आ अन्य मैथिली संस्था दिस चकभाउर दैत निश्चिंत भ' जाइत अछि। ................

मैथिली  बेर-बेर जे संकट मे पड़ैत अछि, सीता जँका कहियो अपहृत होइत अछि तँ कहियो बनवास भोगैत अछि तकर मूल कारण ई अछि जे मैथिली भाषी अपन मैथिली केँ हृदय सँ लगा क' रखबा मे अक्षम रहल अछि, लाभ लेबा लेल एकर उपयोग कयलक अछि, एकर परिचिति सँ अपन परिचिति बनयबाक प्रयास नहि कयलक अछि।

अप्रैल-मइ 2006

सवाल उठैत अछि जे सरकार बेर-बेर एहि आरक्षणेक मामिला ल' ' देशोद्धारक प्रयत्न किएक करय चाहैत अछि? जातिहीन, वर्गहीन आ धर्मनिरपेक्षताक असूल पर चलनिहारि नेता लोकनि किएक सार्वजनिक संस्थान मे जातिक आधार पर नामांकन अथवा नोकरीक पर्चा बटबाक लेल उताहुल रहैत छथि। आजुक स्पर्धात्मक युग मे विकासक एक्केटा मार्ग सुरक्षित छैक - मेधा शक्तिक सम्मान। आ जँ से नहि कयल जायत तँ ई शक्ति नकारात्मक पथक अनुसरण करत आ परिणाम होयत हिंसा, अशांति आ कानूनक उल्लंघन ।

जून-जुलाई 2006

विकासक आड़ मे प्रकृति सँ छेड़छाड़ करबाक कारणे आइ वर्षा ऋतु अपन चक्र बदलि रहल अछि, पानि पातालोन्मुखी भ' गेल अछि, जंगल आ पहाड़ अपन प्रवृति, प्रकृति आ स्वरूप त्यागि रहल अछि, सूर्य अपन ताप मे वृद्धि कयलक अछि तथा भूमि अपन उर्वरता केँ गमौने जा रहल अछि।

अप्रैल-मइ 2007

आब प्रश्न उठैत अछि जे जाहि देशक राष्ट्रपति महिला होअय, प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री सहित अनेक पद केँ महिला सुशोभित करय ताहि देशक युवती सामाजिक-पारिवारिक जीवन प्रारंभ करबाक पहिने अपना केँ मात्र एकटा वस्तुक रुप मे ठाढ़ पाबय ताहिठाम ई दंभ भरब जे नारीक उत्कर्ष चरमोत्कर्ष पर अछि, नारी शक्ति अलौकिक रूप मे प्रतिबिम्बित भ' रहल अछि - कतेक हास्यास्पद लगैत अछि।

अगस्त-सितम्बर 2007

- संपर्क-9472834926

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।