विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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२.११.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- कथ्य, तथ्य आ सत्यक चिन्तन

 

जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'

कथ्य, तथ्य आ सत्यक चिन्तन

बात-बातपर बात सीरीजक अंतर्गत 63 ,48,4032  पृष्ठक चारिटा पोथीक कुल 183  पृष्ठमे लेखकक जीवनक व्यथा-कथा अथवा संस्मरणात्मक निबंध अछि.

शास्त्र कहैत अछि, ग्यानी लोकनि कहैत छथि जे जीवनमे जतेक दुख हम सभ  भोगैत छी  से अपन अग्यानताक कारणे आ जतेक सुख पबैत छी  से परमात्मा अथवा अस्तित्वक प्रसाद अछि.

पोथी पढैत काल कतेक ठाम किछु प्रश्न मोनमे उठैत अछि.

किछु बात पढ़िक' लगैत अछि जे एना कोना भ' सकैत छैक,अवश्य कतहु सम्वादहीनताक स्थिति आएल हेतैक, कतहु-कतहु लगैत अछि जे अतिशयोक्ति अलंकारक प्रयोग भेल अछि. एहने-सन किछु प्रसंगक उल्लेख एकटा पाठकक रूपमे हम करय चाहैत छी.

1, अपन वाल्यावस्थाक चर्च करैत कहैत छथि जे पिताजीकें मिथिला मिहिरक व्यस्तता तते रहैत छलनि जे हमरा सभकें प्रातःकाल जगबासँ  पहिने निकलि जाथि आ रातिमे जखन सूति रही तखन ओ घर आबथि, हम सभ हुनका रविदिन किछु काल देखियनि. ( पृष्ठ : IV / 26    )

पटनामे आवास आ कार्यालय दुनू रहनि तखन कहियो-कहियो एहेन स्थिति आएब स्वाभाविक भ' सकैत छैक मुदा तीन बरख धरि एहेन स्थिति रहब अस्वाभाविक लगैत अछि.

2. एकठाम कहल गेल अछि जे पेट नहि होइतैक त मनुष्य व कोनो जीव-जंतु संघर्ष नहि करैत,कोनो काज नहि करैत. ( पृष्ठ : II / 42  )

देखल गेल अछि जे जकरा भोजनक समस्या नहि छैक,सेहो विना कोनो काज केने नहि रहि सकैत अछि.भोजन मात्र जीवनक खगता नहि छैक.

3.एक ठाम कहल गेल अछि जे हमरासँ जुड़ल 95 प्रतिशत लोक हमरासँ घृणा करैत अछि. ( पृष्ठ : II / 41  )

ओही ठाम ईहो कहल गेल अछि 'हम अपना जनैत ककरो विषयमे ने खराब सोचैत छी आ ने अपन क्रियासँ ककरो अहित करैत छी '. ( पृष्ठ : II  / 41  )

ई दूनू बात परस्पर विरोधी अछि.

शास्त्र कहैत अछि, चिन्तक लोकनि कहैत छथि जे जँ अहाँ ककरो विषयमे ने खराब सोचैत छी, ने करैत छी त अहूँक लेल ककरो मोनमे खराब भावना  नहि आबि सकैत छैक. तें हमरा जनैत ई 95  प्रतिशतक गनना अशुद्ध अथवा अतिशयोक्ति अछि.

4.एक ठाम कहल गेल अछि 'हमर प्रयास रहैत अछि जे शान्ति भावमे रही, मनोवल उच्च बनल रहय, सकारात्मक सोच बनल रहय, सुखक अभिलाषा नहि,सुविधाक पाछाँ भागब स्वभाव नहि तैयो शान्ति दूर अछि, ई किए अछि? ई ककरासँ पूछू ? ( पृष्ठ : II /40  )

एहने प्रश्न कुरुक्षेत्रक मैदानमे अर्जुनक मोनमे उठल रहनि आ आइयो सभ मनुक्खक अथवा अधिकतर लोकक मोनमे ई प्रश्न उठैत छैक, तकर समाधान गीतामे भगवान द्वारा देल जा चुकल अछि.

5.कहल गेल अछि जे अनुचितक प्रति क्रोध उत्पन्न होइछ. ( पृष्ठ : II / 30  )

प्रश्न उठैत अछि जे अनुचित की अछि ?

की हम जकरा अनुचित बुझैत छी सैह अनुचित अछि ?

भ' सकैत छैक, हम जकरा अनुचित बुझैत छी से बहुतोक लेल उचित होइ.

शास्त्रमे त क्रोधक कारण कामनाक पूर्तिमे उत्पन्न बाधाकें कहल गेल अछि.

6. कहल गेल अछि जे हम अपन अधिकारसँ बेसी कर्तव्यकें श्रेष्ठ मानलहुँ अछि तें प्रायः आजुक समाजमे अपनाकें अनफिट पबैत छी आ बरमहल असहज स्थितिमे आबि जाइत छी. ( पृष्ठ : II / 26  )

कर्त्तव्यकें श्रेष्ठ मानब आ अपनाकें अनफिट अथवा असहज स्थितिमे पायब दुनू एक दोसरक विरोधी लगैत अछि.

असहज स्थितिमे अयबाक दोसर कोनो कारण भ' सकैत अछि.

7. कहल गेल अछि जे एकटा पड़ोसी रिक्शाबला टेम्पू लेब' चाहैत छल, ओकरा बैंकसँ लोन नै भेटलै त अपना  नामपर लोन ल'क' ऑटो रिक्शा ओकरा दिया  देलिऐ ओकर उपयोग करबाक लेल आ तीन सालमे लोन चुका देबाक लेल, मुदा दू सालक बाद ओ लोन चुकयबामे आनाकानी करय लागल, ओहि लेल डटलिऐ त तमसाक' ऑटो हमरा दलानपर लगाक' चल गेल आ अंततः हमरा एक लाखसँ बेसी लोन चुकाब' पड़ल.  ( पृष्ठ : II / 22-23  )

कोन योजनामे ई लोन नेने रहथिन से लीखल नहि छैक, जँ शासकीय योजनाक अंतर्गत नेने हेथिन त  बैंकक नियमानुसार ई अनुचित अछि, तें परिणाम मनोनुकूल नहिए हेबाक छलनि.

जँ गैर-शासकीय योजनामे लोन नेने हेथिन, त एहिमे व्यवसायक रूपमे अतिरिक्त सावधानी, देख-रेख आ नियंत्रणक आवश्यकता छलै जे नहि भ सकल हेतनि !

जकरा प्रति सहानुभूति रखैत मदति केलखिन आ ओ विश्वासक रक्षा नहि केलकनि, ओकरो अपन कृत्यक फल भेटिए गेलै जे ओ फेर रिक्शा चलब' लागल.

8. कहल गेल अछि जे विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा पत्रकारिताक क्षेत्रमे सेवाक लेल हमरो नामक घोषणा केलक,प्रेस विज्ञप्ति  जारी भेलै, सभ अखबारमे सम्मानक लेल चयनित लोक सबहक नाम छपलै, तकर बाद अध्यक्ष महोदय कहलखिन जे सम्मानक सूचीसँ जँ शरदिंदु चौधरीक नाम नहि हटाओल जाएत त हम जहर खा लेब आ हारिक' सचिव महोदय द्वारा नाम वापस ल' लेल गेल.     ( पृष्ठ : I / 31-32    )

एहि कथ्यपर जखन विचार करैछी त प्रश्न उठैए जे विना अध्यक्षक सहमतिसँ सम्मानक सूची कोना अखबारमे प्रकाशित भ' गेलै.

ईहो प्रश्न उठैए जे अध्यक्ष महोदय जे मैथिलीक एकटा प्रतिष्ठित व्यक्ति छलाह  से एहन बात किए कहलखिन जे हम जहर खा लेब !

लगैत अछि जे तथ्य आ सत्य किछु दोसर छल हेतै जे प्रकाशमे नहि एलै.

9.कहल गेल अछि जे पुरस्कार आ सम्मानक लोभमे एहनो लोक शामिल भ' गेलाह जिनका योग्यताक आगाँ साहित्य अकादमी पुरस्कार तुच्छ अछि.(पृष्ठ:I /56-57)   

सुनैछी देवतो सभ भावक अर्थात सम्मानक भूखल होइत छथि, तें योग्य व्यक्तिकें एकर लोभ होयब अनुचित नहि कहल जा सकैछ, परन्तु ई त अतिशयोक्ति लगैछ जे पुरस्कार व सम्मान नहि भेटबाक कारणें ओ मैथिली बजनाइ छोड़ि देलनि आ कहने भेल घुरथि  'मैथिली बईमानो की भाषा है !'

10. धार्मिक पत्रिका 'कामाख्या सन्देश'क तीनटा अंकक छपाइ आदिक  खर्च तीस हजार नहि भेटलनि. ( पृष्ठ : I /59 )

पहिल अंकक बकायाक बाद सावधान होयब आवश्यक छलनि. तीन अंक तक बकाया रहबामे व्यवस्थापकीय असावधानीकें स्वीकार करबाक चाही.

बकायाक वसूली हेतु दोसर व्यक्तिक माध्यमसँ नहि, सम्बंधित व्यक्तिसँ प्रत्यक्ष पत्राचार करबाक प्रक्रियाक अनदेखी भेल.

11. एकटा साहित्यकारसँ (जे  साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त छथि ) एकटा पोथीक प्रकाशनमे 1675  टाका प्राप्त नहि भेलनि. ( पृष्ठ : I /61  )

दोसर व्यक्ति द्वारा कहबयबाक स्थानपर जँ स्वयं हुनकासँ पत्राचार कएल गेल रहितनि त हमरा नै लगैए जे समाधान नै भेल रहितनि,

बकाया रहबाक आनो किछु उदाहरण सभमे इएह लगैत अछि जे व्यवसायक किछु नियमक पालन नहि भेलासँ परिणाम अप्रिय भेल.

12. मैथिली अकादमीमे एकटा विशेषांकक प्रकाशनक समय दू टा प्रिय लोकक कह्लापर सम्पादनक काज देखलनि लेकिन ने नाम भेलनि ने उचित पारिश्रमिक भेटलनि. ( पृष्ठ : III /12 )

संस्थाक काजमे मौखिक नहि, लिखित सभ किछु होइ  छै, अकादमी पत्रिकाक सम्पादनक काज बिना कोनो अधिकारीक आदेशपर करबाक परिणाम जे  भ' सकैत छैक सैह भेलनि.कोनो कर्मचारीक व्यक्तिगत  अनुरोधक सरकारी काजमे की महत्व भ' सकैत छनि ! 280  रु.के चेक भ' सकैए मार्ग व्ययक नामपर द' देल गेल हेतनि.

13.एकटा प्राध्यापक मैथिली विभाग हेतु 5000 रु.  के पोथी ल'क' बिल पर राशि पावतीक रूपमे हिनक हस्ताक्षर ल'क' गेलखिन ई कहिक' जे तुरत राशि पठा देब, मुदा बिसरि गेलखिन.  ( पृष्ठ : III /39 )

एतेक उच्च पदपर आसीन व्यक्तिस वसूली नहि भेलनि से आश्चर्यजनक बात लगैत  अछि. पन्द्रह साल बाद भेंट भेलापर स्मरण करौलाक बादो राशि नहि प्राप्त भेलननि .  होइत अछि जे हुनकासँ लगातार पत्राचार कयल गेल रहितनि त ओ अबस्से पठा देने रहितथिन. भ' सकै छै दू बेर अथवा तीन बेर पत्राचार करय पड़ितनि.

एके तरहक गलती बेर-बेर कयल गेल आ तें आनो कय ठाम बकाया राशि बढैत चल गेलनि. ( III /25 )

पहिल बेर बकायाक अनुभवसँ आगाँ बढल रहितथि त बकाया एतेक  नहि बढल रहितनि.

14. कहैत छथि : लेखन कालमे जिनकापर हमर कलम चलैत अछि हुनक श्याम पक्षपर केन्द्रित अवश्य रहैत अछि मुदा हुनका अपमानित करबाक चेष्टा कथमपि नहि.हम मुद्दा आधारित विरोध करैत छियनि चाहे कियो होथि. जीवित छथि तिनकर सोच,व्यवहार-व्यसनपर अवश्य लीखल जयबाक चाही जाहिसँ ओ अपन श्वेत आ श्याम दुनू पक्ष अपन आँखिए देखि सकथि आ अन्तिमो समयमे सन्मार्गक  अनुशरण क' सकथि. ( पृष्ठ :  III / 8 )

 

श्याम पक्ष भेल राति, अन्हार, निन्नमे चल जायब, सूति रहब. जँ समयपर पत्राचार द्वारा अथवा व्यक्तिगत संपर्क द्वारा अपन प्रिय ग्राहक साहित्यकार लोकनिकें   जगौने रहितथि त कोनो साहित्यकार-ग्राहकसँ शिकायत नहि रहितनि.

लेखक अपनाकें पत्रकार मानैत छथि, पत्रकारक काज होइछ लोककें समयपर जगयबाक. यदि स्वयं समयपर अपन चूककर्ता साहित्यकार-ग्राहक लोकनिकें अपन प्रभावी पत्राचार द्वारा जगौने रहितथि त अपनो हानिसँ बचि जैतथि आ हुनको लोकनिकें एकटा कलंकसँ बचा लीतथि.

कय बरखक बाद एहि बातकें प्रकाशमे अनबाक मतलब भेल संख फूकिक' लोककें जगायब. जँ एखनो किनको निन्न नहि टुटलनि त मान' पड़तनि जे पछिला कोनो जन्ममे हिनका लोकनिसँ किछु कर्ज नेने छल हेथिन जे चुका देलनि !

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