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२.४.कल्पना झा- मैथिली साहित्यक सेवक नहि, मैथिली भाषाक सेवकः शरदिन्दु चौधरी

कल्पना झा

मैथिली साहित्यक सेवक नहि, मैथिली भाषाक सेवकः शरदिन्दु चौधरी

एही बर्ख (२०२२)१६ सँ १९ अप्रैल धरि, तृतीय "चेतना रंग उत्सव"क आयोजन चेतना समिति पटना द्वारा विद्यापति भवनमे कएल गेल छलए,जे सुधांशु शेखर चौधरी जीकेँ समर्पित छलनि। एहि आयोजनक प्रचार-प्रसार किछु साहित्यिक व्हाट्सएप समूह सभमे देखलहुँ,त' हमरो मोन लोभाएल। सुधांशु शेखर जी द्वारा रचित नाटक सभक मंचन सेहो होएबाक घोषणा छलैक। एही "रंग उत्सव"मे हमरा पहिल बेर शरदिन्दु सरकेँ दर्शन भेल। फेसबुक पर मित्र-सूचीमे छलाह,शेखर प्रकाशनमे कोनो पर्टिकुलर पोथीक उपलब्धता अछि वा नहि,ताहि संदर्भमे गप्प सेहो भेल छलए मुदा दर्शन नहि भेल छलए।

ओहि रंग उत्सव आ तकरा उपरान्त "उपमान" पत्रिकाक विमोचनक अवसर पर,आ फेर एक-दू बेर विद्यापति भवनमे दर्शन भेल,शरदिन्दु सरकेँ। जतबा काल  देखलियनि,सुनलियनि,एकटा बात गौर केलहुँ हम,जे शरदिन्दु सर बाजैत कम छथि,सुनैत बेसी छथि। सोझाँ बैसल लोकक आ वस्तु-स्थितिक ऑब्जर्वेशन करैत रहैत छथि आ सभ किछु जेना मोन-मस्तिष्कमे स्टोर करैत जाइत छथि। एकदम साधारण पहिरन-ओढ़न। कोनो तरहक दिखावा नहि,ने ब्रांडेड कपड़ा-जुत्ताक,ने अपन ज्ञान-बुद्धिक। जखन कि एहि कलयुगमे जतबा रहैत छै,ताहि सँ बेसीक दिखावा करबाक चलन छै,चाहे ओ धन-वित्त होअए कि ज्ञान-बुद्धि।

एमहर जखन शरदिन्दु चौधरी जी पर विशेषांक निकालबाक घोषणा सोझाँ आएल(फेसबुक पर),त' हुनकर रचना सभ ताकि ताकि पढ़ब शुरु केलहुँ। एहिलेल 'विदेह' टीम साधुवादक पात्र छथि,जे उपेक्षित रचनाकार सभपर विशेषांक निकालबाक पहल केलनि अछि।एहि सँ लोक ताकि ताकि क' ओहन रचनाकार लोकनिक रचना सभ पढ़ए लागैत अछि। हुनकर रचना पर किछु लिखथि  वा नहि लिखथि,से बादक बात।

 हँ,त' कहि रहल छलहुँ जे शरदिन्दु जीक सभटा रचना,बात- बात पर बात(१-४),बड़ अजगुत देखल,जँ हम जनितहुँ,करिया कक्काक कोरामिन,गोबरगणेश, बेरा-बेरी पढ़ि गेलहुँ। हुनकर रचना सभ पढ़लाक उपरान्त हुनकर ओहने व्यक्तित्वक झलक भेटल,जेहन हुनकर दर्शन क' मोनमे धारणा बनल छलए। शरदिन्दु जीक अधिकांश रचना चूँकि संस्मरणात्मक छनि,तैँ सत्य पर आधारित छनि आ हुनकर व्यक्तित्वक परिचय सेहो दैत छनि।

यथार्थ लिखब माने सत्य लिखब,बड़ कठिन काज छै,कारण सत्य अधिक काल कटुए होइत छै।आ तेँ ई काज बहुत कम लोक करैत छथि। शरदिन्दु सर अपन संस्मरणात्मक  पोथी "बात-बात पर बात" चारू भागमे आ हास्य व्यंग्य "जँ हम जनितहुँ"मे समाजसँ जुड़ल(विशेष रूपसँ साहित्यिक जगतक) सत्यकेँ त'  उजागर कएनहि छथि,कोनो व्यक्ति विशेषक नामक संग हुनकर कुकृत्यकेँ देखार करबामे सेहो संकोच नहि कएलनि अछि। आ एतबे नहि,अपना विषयमे सेहो सभटा स्पष्ट कहि देलनि अछि, "साक्षात्" शीर्षक पोथीमे।अपन दिनचर्या पर्यन्त बेझिझक पाठकक सोझाँ कहि देलनि अछि, घरक साफ-सफाइक बात होअए, कि गंदा बरतन सिंकमे राखि साफ करबाक बात,किछु सार्वजनिक करैत संकोच नहि कएलनि अछि।एहन स्पष्टवादी लोक भेटब कठिने नहि असंभव बात छै एखनुक दिखावायुक्त समयमे।

शरदिन्दु जी रचित सभटा पोथी पढ़लाक उपरान्त सोचमे पड़ि गेलहुँ, जे कोन पोथी पर समीक्षात्मक आलेख लिखल जाए। यथार्थ लिखैत बहुत रास रहस्योद्घाटन सेहो कएल गेल अछि पोथी सभमे,जाहि पर बहुत किछु लिखल जा सकैछ।मैथिली संस्था सभक पोल खोलल गेल अछि,महान साहित्यकार लोकनिक किरदानीक चर्चा भेल अछि।एतेक रास मुद्दा देखि/पढ़ि मोन उलबुका सन गेल।अंततः हम निर्णय नहिए क' सकलहुँ आ शरदिन्दु सरकेँ जतबा बुझि सकलियनि,हुनक लेखनीक माध्यमसँ आ हुनका साक्षात् देखि/सुनि,ताही आधार पर अपन मोनमे आएल भावक अभिव्यक्ति क' रहल छी, संक्षेपमे।

 "बात-बात पर बात-१"मे मैथिली-भाषा,साहित्य आ प्रकाशनसँ अपन बात शुरु करैत अपन मान्यता स्पष्ट रूपेँ रखलनि आछि,जे-"मैथिले मैथिलीक बाधक अछि-दुनू स्तरपर,भाषाक स्तरपर आ साहित्यक स्तरपर।"आ हमर मान्यता अछि जे हिनक एहि मान्यतासँ बहुत लोक सहमति रखताह,हम त' पूर्णतः सहमति राखैत छी।

तहिना "मूर्खक लाठी माझ कपार"मे मैथिली साहित्यक दुर्भाग्यक समीचीन विवरण देलनि अछि आ एकर कारण ओ निवारण पर सेहो विचार केलनि अछि। अक्षरशः सत्य लिखलनि अछि-"हमर मैथिलीक दुर्भाग्य अछि जे जकरा शब्दक ज्ञान नहि छैक सेहो सभ महान साहित्यकारक कोटिमे आबिक' बैसि जाइत छथि आ हुनक चारण भ' क' ज्ञानी लोक सभ ओत' उपस्थित रहैत छथि।"

मैथिली साहित्यक एही दुर्गतिक कारणेँ प्रायः हुनक भाव किछु एना बहार भेल छनि-"हमरा एकोरत्ती कचोट नहि अछि जे हम मैथिली साहित्यक सेवक नहि छी। हमरा गर्व अछि जे हम मैथिली भाषाक सेवक छी।"

 

  राजनीतिमे जतेक राजनीति नहि होइत छै,ततेक राजनीति मैथिली साहित्यिक जगतमे व्याप्त छै,पुरस्कार लोलुपतामे कोन तरहक खेल सभ होइत छै,से सभ बहुत लोक देखैत-सुनैत-बुझैत गबदी मारने रहैए। मुदा शरदिन्दु सर ई सभ देखि/सुनि चुप नहि रहि सकलाह। किंवा ई सभ देखि/सुनि आहत भेल हेताह,तखनहि एना लिखबालेल विवश भेल हेताह। असहनीय स्थिति भ' जाइत छै,तखन मोनक बात स्वतः बहरा जाइत छै। बुद्धिजीवी लोकक संकीर्ण मानसिकताकेँ देखार करैत लिखैत छथि- "सौतिया डाहो सँ बेसी एक-दोसराकेँ देखबाक प्रवृत्ति, अपन रचनाकेँ मीठ,अनकर रचनाकेँ तीत कहबाक रीति आ गोधियाँवाद,संबंधवाद,गुटवाद पर साहित्यकेँ गीजबाक-मथबाक जे नीति चलल अछि, से साहित्यक संग संग समाजकेँ सेहो पाताले दिस ल' जा रहल अछि।"

ओना एहन बात मर्यादित भाषामे,ककरो अपमानित नहि करैत लिखब कठिन छै,तथापि भाषाकेँ संयमित रखबाक प्रयास केलनि अछि शरदिन्दु सर,से सराहनीय। मुदा संयमित भाषाक प्रयोगक प्रयास रहितहु कतहु कतहु कनि अमर्यादित भाषाक प्रयोग भ' गेल छनि,जकरा इग्नोर नहि कएल जा सकैए। बुद्धिजीवी लोकक द्वारा एहन भाषाक प्रयोग अशोभनीय छै। गारि आ मारिकेँ गप्प मूर्ख लोककेँ शोभा दैत छै। हम क्षमायाचनाक संग ई बात लिखि रहल छी। आदरणीय छथि आ सभदिन रहताह शरदिन्दु सर हमरालेल।

"जँ हम जनितहुँ"क "इहो पुरुष अलबत्ते"मे देखल जाए-"कते महानुभावक दाबी रहैत छनि जे वैह टा दूधक धोअल छथि आ शेष सभ पातकी।हुनका सँ गप्प होएत त' ओ एक्के लाड़निए अपना छोड़ि सभ वर्गक लोककेँ भ्रष्ट प्रमाणित क' देताह।गप्पक क्रममे हुनक वाक्पटुता, देहक संचालन आ विषयक प्रस्तुति देखि होएत, जे वस्तुतः महान छथि आ हुनक आक्रोशो उचिते छनि।मुदा जँ हुनक धोअल चरित्रक पता लागि जाएत,त' स्वतः थूक फेका जाएत...."सभटा गप्प सत्य लिखल अछि। वास्तवमे एहन लोक बहुतो छथि मुदा "थूक फेका जाएत..."कनि अभद्र सन लागल हमरा।

तहिना "हमर अभाग:हुनक नहि दोष"क "इर्ष्या, द्वेष नहि समन्वय चाही"मे ई लिखब कनि अमर्यादित सन लागल-"अहाँकेँ एहिठाम बाँसमे बान्हिक' पीटी त' कोनो हर्ज नहि ने।"

व्यंग्य वा कटाक्ष रूपमे ककरो किछु कहब क्षम्य छै,मुदा स्पष्ट रूपेँ ककरो नाम उजागर करैत एना पिटबाक बात कहब/लिखब एकरत्ती अशोभनीय कहल जाएत।

"साक्षात्" बात-बातपर बात-४ एकटा नब प्रयोग सन लागल।स्वयं द्वारा स्वयंकेँ साक्षात्कार लेब रोचक सेहो अछि। एकर भूमिकामे लिखने छथि - "कहैत छथि बिहारक अंग्रेजी पत्रकारिताक भीष्म पितामह पंडित स्व. दीनानाथ झा-इंटरव्यू लेनिहारकेँ बोर देबए पड़ैत छैक।जेहन बोर तेहन माछ।" एहि हिसाबेँ,स्वयंकेँ देल बोर सँ स्वयं माछ सन फँसब,रोचक। आगाँ एही भूमिकामे इहो बात कहने छथि - "प्रस्तुत साक्षात्कार स्वयं हम अपने लेने छी साक्षात्कार लेबाक अनुभवक कारणेँ। देखी सुतरैत आछि कि नहि।" खूब सुतरल अछि सर। एकदम बेबाक इंटरव्यू अछि।

एहि भूमिकामे एकटा निवेदन केलनि अछि जे सभ पत्र-पत्रिका मे एकटा साक्षात्कार अवश्य राखल जाए।

ई दर्पण जकाँ होइत छैक। से सत्ते।

हिनक निवेदनकेँ गम्भीरतासँ लेल जाए से हमर निवेदन ।

आ शरदिन्दु सरसँ निवेदन जे एहिना निर्भीकतापूर्वक आगाँ सेहो नब-नब संस्मरण लिखि पाठकक सोझाँ परसैत रहथि। साहित्यिक जगतमे व्याप्त राजनीति,पुरस्कार लोलुपताक खिस्सा सभसँ पाठकगणकेँ अवगत करबैत रहथि,जाहिमे मैथिलीक प्रतिष्ठित संस्था सभक सेहो संलिप्तता रहैत छै।

               

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