वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका B R E A K the Language Barrier - Read in your own script
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१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
४.“रेहनपर
रग्घू”-
श्री
काशीनाथ
सिंह (हिन्दीसँ
मैथिली
अनुवाद
श्री
विनीत
उत्पल)
५.असगर वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत
उत्पल द्वारा-

४.
“रेहनपर
रग्घू”-
श्री
काशीनाथ
सिंह (हिन्दीसँ
मैथिली
अनुवाद
श्री
विनीत
उत्पल)
श्री काशीनाथ सिंह: जन्म:०१ जनवरी १९३७, कथा संग्रह: कहनी उपखान , उपन्यास- अपना मोर्चा , काशी का अस्सी, रेहन पर रग्घू । संस्मरण: घर का जोगी जोगड़ा , याद हो कि न याद हो , नाटक: घोआस
विनीत उत्पल:विनीत
उत्पल (जन्म: 7 अप्रैल, 1978, ननिहाल पूर्णिया जिलाक सुखसेना गाममे)।
पैत्रिक घर: आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षा मुंगेर जिला अंतर्गत
रणग्राम आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर सँ गणित
विषय मे बी.एस.सी. (आनर्स), मारवाड़ी
कॉलेज, भागलपुर। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली क हिंदी विभाग सँ
जनसंचार आ रचनात्मक लेखन मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। भारतीय विद्या भवन, नई
दिल्ली सँ अंग्रेजी पत्रकारिता मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। गुरु जम्भेश्वर
विश्वविद्यालय, हिसार सँ जनसंचार मे मास्टर डिग्री। जामिया मिल्लिया
इस्लामिया, नई दिल्ली क नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कानफ्लीक्ट
रिजोल्यूलशन क पहिल बैचक छात्र आ सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवन,
नई दिल्ली सँ फ्रेंच भाषाक शिक्षा। छात्र जीवनमे रोट्रेक्ट क्लब, भागलपुर (रोटरी
इंटरनेशनलक युवा शाखा) सँ जुड़ल, कएकटा संबद्ध पत्र-पत्रिकाक संपादन। जामिया
मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीक हिन्दी विभागमे अध्ययनक दौरान 'हमारी पहचान"
नामक पाक्षिक समाचार पत्रक संपादक मंडलक सदस्य। दिल्लीसँ प्रकाशित कएकटा
राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्रमे ग्रामीण विकासक खबरिक विश्लेषण, हिन्दीक
प्रचार-प्रसारमे केंद्रीय वित्त मंत्रालयकेँ योगदानक अलावा गुजरात दंगामे
अंग्रेजी आ गुजराती मीडियाक भूमिकापर लघुशोध। हिन्दी, मैथिली, अंग्रेजी
भाषामे विपुल लेखन आ सुनीता नारायण, शशि थरूर, महेश रंगराजन आदिक लेख सभक
अंग्रेजीसँ हिन्दीमे अनुवाद। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन द्वारा संपादित 'लोकतंत्र
का नया लोक" मे उपलब्ध द्वैपायन भट्टाचार्य, जी.कोटेश्वर प्रसाद आ नलिनी
रंजन मोहंतीक अंग्रेजी लेख सभक अनुवाद आ पुनर्लेखन। अनियमितकालीन कला
पत्रिका 'कैनवास" मे समन्वय संपादक।मैथिली कविता संग्रह 'हम पुछैत छी"
प्रकाशित।
साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदयप्रकाशक दीर्घ-कथा/
उपन्यास 'मोहनदास" क मैथिली अनुवाद।पत्रकार, लेखक, कवि आ अनुवादक विनीत
उत्पल, दैनिक भास्कर, दिल्ली प्रेस, हिन्दुस्तान, देशबंधुमे पत्रकारिताक
बाद आइ-काल्हि राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्लीमे वरिष्ठ उपसंपादकक पदपर कार्यरत
छथि।
रेहनपर रग्घू
(पछिला अंकसँ आगाँ)
एहेन मुसीबतमे रघुनाथकेँ किओ आन नै हुनकर अप्पन बेटे धऽ देने छल।
बेटोमे संजय! संजय टा!
आ ई नम्हर खिस्सा अछि- राँचीसँ कैलिफोर्निया धरि पसरल।
संजय प्रेम केने छल सोनलसँ! ई प्रेम कोनो चौौबटियापर घुमैत लफुआ छौड़ाक अनगढ़ प्रेम नै छलै, ऐमे गुणा-भाग सेहो रहै आ जोड़-घटा सेहो! जतेक गहींर छल ततबे व्यापक।
संजयक सोनल प्रोफेसर सक्सेनाक बेटी छल।
सदिखन प्रथम श्रेणी, व्याख्याताक योग्यता परीक्षा पास आ दर्शनशास्त्रसँ पी.एच.डी.। नौकरी तँ पक्का छल, बनारसक विश्वविद्यालयमे, जतय ओकर माय कुलपति छल, मुदा ओइमे अखन देरी छलै, तखनि धरि बियाहक बाट तकबाक छल!
बियाहमे बाधा भऽ रहल छल, ओकर ठोढ़सँ बाहर आएल दाँत आ सटल नाक जकर क्षतिपूर्ति ओ अप्पन सर्टिफिकेटसँ करैत छल। छूटल-बढ़ल कसरि पूरा कऽ रहल छल सक्सेनाक पसारल ई फूस कि हुनका एकटा एहेन कलामी सॉफ्टवेअर अभियन्ताक आवश्यकता छन्हि जे अमेरिकाक एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनीक तीन बर्खक कान्ट्रेक्टपर कैलीफोर्निया जा सकए। ऐ आवश्यकताक अनुभव सम्पूर्ण इन्स्टीट्यूट बुझैत छल।
संजय अन्तिम परीक्षा दऽ देने छल, रिजल्टक घोषणा बाकी छल!
एम्हर कतेक बेर माँ-बापक संदेश आएल छल जे आबू, लड़कीकेँ देखि लियौ। लड़कीकेँ की देखब, ओ तँ देखले छल! रघुनाथ जइ कॉलेजमे पढ़बैत छल, पूर्व विधायकक बेटी तकर मैनेजर छल। गोर, नमछुरुक, सुन्नर आ आकर्षक। एम.ए.। नीक गृहणी। मैनेजर पुरान जमानाक जमीन्दार, अथाह सम्पत्तिक मालिक। रघुनाथक कोनो हैसियत नै छलै ओकर आगू। नहिये नीक सन घर दुआर, नहिये जमीन-जत्था। आठ बिगहा खेत आ हरक जोत। नेनपन आ युवावस्था बड्ड तंगीमे बितलै। बच्चा सभकेँ पढ़ेलक तँ खेतकेँ बन्हकी लगा कऽ आ कॉलेजसँ ऋण लऽ कऽ। स्पष्ट छल, मैनेजर “सॉफ्टवेअर अभियन्ता” केँ देखने छल, अप्पन कॉलेजक मास्टर रघुनाथकेँ नै।
ई सम्बन्ध रघुनाथक लेल सपनासँ आगूक चीज छल । फाएदे-फाएदा छल ऐसँ! जिलामे पहिचान आ प्रतिष्ठा जे भेटतिऐ, से अलग। ओ कीसँ की भेल जा रहल छल।
तँ गाम आबैसँ पहिने सक्सेना सर सँ बिदा लै लेल गेल छल संजय।
एकरा अहिनो कहि सकैत छी जे ओकरा सक्सेना सर डिनरपर बजेने छल।
गर्मीक साँझ। अप्पन लॉनमे सक्सेना बेंतक कुर्सीपर चुपचाप बैसल छल। माली गमलामे पाइन दऽ रहल छल। बंगलाक भीतरक बत्ती जड़ि रहल छल। कोनो कोठलीसँ संगीतक धुन आबि रहल छल। अवकाश प्राप्तिक करीब, हृदयक मरीज प्रो. सक्सेना संजयक एबासँ अनजान चुपचाप बैसल छला आ आगू देखि रहल छला। बड़ी कालक बाद ओ पुछलक, “कोन इन्स्ट्रूमेन्ट अछि”।
संजय बिना बुझने माथ हिलेलक।
“आ राग? कोन राग अछि?”
संजय निरुत्तर, फेर माथ हिलेलक।
ओ ससरि गेल आ ऊँच अबाजमे बजेलक- “सोनू”।
जीन्सक पेंट आ टी-शर्टमे कूदैत सोनू आएल- “हँ पापा”।
संजय ठाढ़ भऽ गेल। सक्सेना मुस्की देलक, पहिने संजयकेँ देखलक, फेर सोनलकेँ। सोनल सेहो मुस्की देलक। संजय सोनलसँ भेँट तँ कते बेर केने छल मुदा देखने पहिलुके बेर छल। ओकरा लगलै जे कोनो छौड़ीकेँ टुकड़ीमे नै “सम्पूर्णता”मे देखबाक चाही। कतेक फर्क पड़ि जाइत छै। संगे संग छौड़ी आ कनियाँकेँ एक तरहेँ नै देखबाक चाही। रूप-रंग, ढीब-ढाब, मान-मनौअलि छौड़ीमे देखल जाइत अछि, कनियाँमे नै! ई सभटा पुरान धारणा अछि, हमर पापा-मम्मीक जमानाक, हमर नै।
सक्सेना गुम्मी तोड़लक- “ई अछि सोनम, जइमे हमर प्राण बसैत अछि। सितार, सरोद, संतूर माने सोनल। सोनल माने संगीत। चीपनेस एकरा पसिन्न नै। फिल्मी गीतकेँ ई गीत नै मानैत अछि। किएक तँ ई अपने कथक नृत्यांगना रहल अछि। तँ की खुआ रहल छी हमरा सभकेँ आइ?”
“ओ तँ तखने पता लागत जखन खाएब।” सोनल लजा कऽ भागि गेल।
“बैसू संजय।” ई कहैत सक्सेना सेहो मूड़ी झुका कऽ बैसि गेल। किछु सोचैत। टूटल स्वरमे बाजल- “कोना रहब एकर बिना, रहब कोना से नै बुझि पड़ैत अछि। ई चौदहे बर्खक छल जखन एकर माय गुजरि गेलै।”
तकर बाद ओकर आँखिसँ नोर खसऽ लगलै- “तीन चारि बरखसँ लगातार आबैत रहल अछि लड़का। एकसँ एक।
(जारी….)
५.
असगर वजाहत- हम हिन्दू छी
हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा

हम हिन्दू छी
एहेन कन्नारोहट जे मुर्दो कब्रमे ठाढ़ भऽ जाए। लागल जे अबाज सोझे कान लगसँ आएल अछि। ओइ स्थितिमे.. हम कूदि कऽ बिछौनपर बैसि गेलौं, अकासमे अखनो तरेगन छल.. किंशाइत रातिक तीन बाजल हएत। अब्बोजान उठि कऽ बैसि गेला। कन्नारोहट फेरसँ सुनाइ पड़ल। सैफ अपन अखड़ा खाटपर पड़ल चिकड़ि रहल छल। अंगनामे एक दिससँ सभक खाट लागल छलै।
'लाहौलविलाकुव्वत.
. .' अब्बाजान लाहौल पढ़लन्हि 'खुदा
नै जानि ई किए सुतलेमे चित्कार करऽ लगैए।'
अम्मा बजली।
“अम्मा एकरा राति भरि छौड़ा सभ डरबैत रहै छै.
. .” हम कहलिऐ।
“ओइ सरधुआ सभकेँ सेहो चेन नै पड़ै छै. . .लोक सभक जान आफदमे छै आ ओकरा सभकेँ बदमाशी सुझाइ छै”- अम्मा बजली।
सफिया चद्दरिसँ मुँह बहार कऽ बाजलि- “एकरा कहू छतपर सुतल करए।” सैफ अखन धरि नै जागल छल। हम ओकर पलंग लग गेलौं आ झुकि कऽ देखलौं जे ओकर मुँहपर घाम छलै। साँस खूब चलि रहल छलै आ देह थरथरा रहल छलै। केस घामसँ भीजल छलै आ किछु केस माथपर सटि गेल छलै। हम सैफकेँ देखैत रहलौं आ ओइ छौड़ा सभक प्रति मोनमे तामस घुरमैत रहल जे ओकरा डराबै छलै।
तखन दंगा एहेन नै होइत छल जेहेन आइ काल्हि होइए। दंगाक पाछाँ नुकाएल दर्शन, ईलम, काजक पद्धति आ गतिमे ढेर रास बदलेन आएल अछि। आइसँ पच्चीस-तीस साल पहिने नहिये लोककेँ जिबिते भकसी झोका कऽ मारल जाइ छलै आ नहिये सौंसे टोल-मोहल्लाकेँ सुनसान कएल जाइत छलै। ओइ जमानामे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आ मुख्यमंत्रीक आशीर्वाद सेहो दंगा करैबलाकेँ नै भेटै छलै। ई काज छोट-मोट स्थानीय नेता अपन स्थानीय आ क्षुद्र स्वार्थ पूरा करै लेल करै छला। व्यापारिक प्रतिद्वंद्व, जमीनपर कब्जा करैले, चुंगीक चुनावमे हिंदू वा मुस्लिम वोट समटैले इत्यादि उद्देश्य भेल करै छल। आब तँ दिल्ली दरबारपर कब्जा करबाक ई साधन बनि गेल अछि। सांप्रदायिक दंगा। संसारक सभसँ पैघ लोकतंत्रक मुँहमे जाबी वएह पहिरा सकैए जे सांप्रदायिक हिंसा आ घृणापर शोनितक धार बहा सकए।
सैफकेँ जगाएल गेल। ओ बकरीक असहाय बच्चा सन चारू दिस ऐ तरहे देखि रहल छल जेना माँकेँ ताकि रहल हुअए। अब्बाजानक बेमात्रे भाइक सभसँ छोट सन्तान सैफुद्दीन प्रसिद्ध सैफ जखन अपन घरक सभ लोककेँ चारू दिस घेरने देखलक तँ ओ अकबका कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सैफक अब्बा कौसर चचाक मरबाक खबरि लेने कोनमे कटल ओ पोस्टकार्ड हमरा अखनो नीक जकाँ मोन अछि। गामक लोक सभ चिट्ठीमे कौसर चचाक मरबाके टाक खबरि नै देने छला संगमे ईहो लिखने छला जे हुनकर सभसँ छोट सन्तान सैफ आब ऐ दुनियामे असगर रहि गेल अछि। सैफक पैघ भाइ ओकरा अपना संग बम्बै नै लऽ गेल। ओ साफे कहि देलन्हि जे सैफ लेल ओ किछु नै कऽ सकै छथि। आब अब्बाजानक अलाबे ओकर ऐ दुनियामे कियो नै छै। कोन कटल पोस्ट कार्ड पकड़ि अब्बाजान बहुत काल धरि चुपचाप बैसल रहथि। अम्मांसँ कएक बेर झगड़ा केलाक बाद अब्बाजान पैतृक गाम धनवाखेड़ा गेलथि आ बचल जमीन बेचि, सैफकेँ संग लऽ घुरलथि। सैफकेँ देखि हमरा सभकें हँसी आएल रहए। कोनो देहाती बच्चाकेँ देखि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटीक स्कूलमे पढ़ैवाली सफियाक आर की प्रतिक्रिया भऽ सकैए, पहिले दिन ई बुझा गेल जे सैफ खाली देहातिये नै वरन् अर्द्ध-बताहसन सोझ वा मूर्ख छल। हम सभ ओकरा कबदाबैत आ फुचियाबैत रहै छलिऐ। एकर एकटा फाएदा सैफकेँ एना भेलै जे अब्बाजान आ अम्मांक हृदय ओ जीति लेलक। सैफ खूब मेहनति करए। काजसँ ओ देह नै नुकाबए। अम्मांकेँ ओकर ई व्यवहार खूब पसिन्न पड़ै। जँ दूटा रोटी बेसी खाइए तँ की? काज तँ सेहो देह झारि कऽ करैए। सालक साल बितैत गेलै आ सैफ हमर सभक जिनगीक अंग बनि गेल। हम सभ ओकरा संग सामान्य होइत गेलौं। आब मोहल्लाक कोनो बच्चा जँ ओकरा बताह कहि दै तँ हम ओकर मुँह नोंचि लै छलिऐ। हमर भाइ अछि ई, एकरा तूँ बताह कोना कहै छेँ? मुदा घरक भीतर सैफक की स्थिति रहै से हमरे सभ टाकेँ बुझल छल।
नग्रमे दंगा ओहिने शुरू
भेल छल जेना भेल करै छल, माने मस्जिदसँ ककरो एकटा पोटरी भेटलै, जइमे कोनो
प्रकारक माउस छलै आ माउसकेँ बिन देखने ई मानि लेल गेल छलै जे किएक तँ ई
माउस मस्जिदमे फेकल गेल छल तेँ ई सुग्गरक माउस हेबे टा करत। तकर बदलामे
मुगल टोलमे गाय काटि देल गेल आ दंगा शुरू भऽ गेल। किछु दोकान जड़ि गेल मुदा
बेसीकेँ लुटल गेल।छूरी-चक्कूक ढेर रास घटनामे मोटा-मोटी सात-आठ गोटे मुइलाह
आ प्रशासन एतेक संवेदनशील छल जे कर्फ्यू लगा देल गेल। आइ-काल्हिबला बात नै
छल जखन हजारक हजार लोकक मुइलाक बादो मुख्यमंत्री मोंछपर ताव दैत घुमैत छथि
आ कहैत छथि जे, जे किछु भेल ठीक भेल।
दंगा किएक तँ लगपासक गामोमे पसरि गेल छल तै दुआरे कर्फ्यू बढ़ा देल गेल छल। मुगलपुरा मुसलमानक सभसँ पैघ मोहल्ला छल से ओतऽ कर्फ्यूक प्रभाव छल आ जिहाद सन वातावरण सेहो बनि गेल छल। मोहल्लामे तँ गली-कूची होइते छै मुदा कएकटा दंगाक बाद ई अनुभव कएल गेल जे घरक भीतरसँ सेहो रस्ता हेबाक चाही। माने आप्तकालक व्यवस्था। से घरक भीतरसँ, छतक ऊपरसँ देबार फांगैत किछु एहेनो रस्ता बनि गेल छलै जे कियो जँ ओइ रस्ताकेँ चिन्हैत होइक तँ मोहल्लाक एक कोनसँ दोसर कोन धरि निधोके जा सकैत छल। मोहल्लाक तैयारी युद्धक लेल कएल तैयारीक बरोबरि छल। सभ सोचने रहथि जे कर्फ्यू जँ मासो भरि धरि जाइए तैयो जरूरतिक सभटा समान मोहल्लेमे भेटि जाए।
दंगा मोहल्लाक छौड़ा सभक लेल एकटा विचित्र सन उत्साह देखेबाक मौसम भेल करै छल। थम्हू ने, हम सभ तँ हिन्दू सभकेँ धूरा चटा देबै.. की बुझै जाइए ई धोतीक फाँड़ बान्हैबला सभ.. छोड़ू डरपोक होइ जाइए ई सभ। .. एक मुसलमान दस हिन्दूपर भारी पड़त…हँसि कऽ लेने छी पाकिस्तान, लड़ि कऽ लेब हिन्दुस्तान..एहने सन वातावरण बनि जाइ छल। मुदा मोहल्लासँ निकलैमे सभक जान जाइ छलै। पी.ए.सी.क चौकी दुनू दिस छलै। पी.ए.सी.क बूट आ ओकर राइफलक बटक मारि कतेको गोटेकेँ मोने छलै, तँए बकथोथी धरि तँ ठीक मुदा ओइसँ आगाँ….
संकटसँ एकता अबै छै, एकता, अनुशासन आ व्यावहारिकता। सभ घरसँ एकटा छौड़ा
पहरापर रहत। हमर घरमे हमरा अलाबे, ओइ जमानामे हमरा छौड़ा नै मानल जा सकै छल
कारण हम पच्चीस बर्खसँ ऊपर भऽ गेल रही, छौड़ा तँ सैफे छल, तेँ ओकरा रतुका
पहरापर रहऽ पड़ै छलै। रातुक पहरा छातपर भेल करै छलै। किएक तँ मुगलपुरा नग्रक
सभसँ उपरका भागमे छल तेँ छातपरसँ सम्पूर्ण नग्र देखाइ दैत छल। मोहल्लाक
छौड़ा सभक संग सैफ पहरापर जाइ छल। ई हमरा, अब्बाजान, अम्मां आ साफिया- सभक
लेल नीक छल। जँ हमर घरमे सैफ नै रहितए तँ हमरे रातिमे बौआए पड़ितै। सैफकेँ
पहरापर जेबाक कारणसँ किछु सुविधा देल गेल छलै, जेना आठ बजे धरि ओकरा सूतऽ
देल जाइ छलै। ओकरासँ बाढ़नि नै दिआएल जाइ छल, आब घर बहारबाक काज सफियाकेँ दऽ
देल गेल छलै, जे ऐ काजकेँ एक्को रत्ती पसिन्न नै करैत छलि।
कहियो काल हमहूँ रातिमेमे छतपर चलि जाइत रही, लाठी-डण्टा, ठुहरी आ ईँटाक ढेर एम्हर-ओम्हर लगाओल गेल छल। दू-चारिटा छौड़ा लग देशी कट्टा, आ बेसी गोटे लग चक्कू छल।
(जारी....)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
