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पाखलो
मूल उपन्यास : कोंकणी, लेखक : तुकाराम रामा शेट,
हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस.मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह
पाखलो- भाग-७
(भाग-5)
शंभुक होटलमे रातिक भोजन कएलाक पश्चात् हम दीनाक घर दिस चलि देलहुँ। आइ बहुत काज केने रही तहि लेल सौंसे देहमे दरद छल। भूइयाँ पर पड़ितहि हमरा निन्न आबि जाइत, एहन बुझाइत छल।
बान्ह पर पहुँचबाक देरी नहुँ-नहुँ बसात सिहक’ लागल। आहा........ कतेक शीतल बसात छैक! बसात लगितहिं देहमे हरियरी आबि गेल। बगलमे एक दिस खेत-पथार आ दोसर दिस मांडवी नदी बहैत छलैक। बगलक नारियरक गाछसँ आवाज आबि रहल छलैक। चारू दिस अन्हारे-अन्हार छलैक। एहि अन्हारमे उपर भगजोगनी भुकभुक करैत छलैक। नदीक कारी पानिमे माछ सभ उछलैत छलैक आ ओकर लहरि भगजोगिनिएँ जकाँ दीप्यमान भ’ रहल छलैक। बान्हक बीचहि मे ब्रह्मबाबाक मंदिर नुकाएल रहैक। ओ मंदिर एकदम टूटि गेल रहैक। मंदिरक उपर चार नहि छलैक। मंदिरक चारू कातक देवाल सभमेसँ आगूक देवाल तँ एकदम्मे टूटि गेल रहैक। बाँकी तीनू देबाल पर सिम्मर, बर, अश्टीचे (गोवा प्रदेशक एकटा गाछ जाहिसँ लकड़ी प्राप्त होइत अछि) सन पैघ-पैघ गाछ सभ जनमि गेल छलैक। गोविन्दक विचारसँ ब्रह्मबाबाकेँ खुब पैघ खुलल मंदिर भेटल छनि।
ओ कहैत छल – एहि चारू गाछ पर आकास केर छत छैक आ एहि मंदिरमे ब्रह्मबाबा रहैत छथि।
चलैत – चलैत हम ब्रह्मबाबाक मंदिर लग पहुँच गेलहुँ आ एहि मंदिरमे हमरा एकबेर साँप नजरि आएल रहय, ओ स्मरण अबितहिं हमर सौंसे देह सिहरि गेल।
नेनपनमे एकबेर हम आ गोविन्द माछ मारबाक लेल नदी पर गेल छलहुँ। बहुत कालक बाद हमरा बंसीमे एकटा खर्चाणी (माछ) फंसल छल। ओकरा हम एकटा नारियरक सिक्कीमे गूथि लेलहुँ। बाटमे ब्रह्मबाबाक मंदिर भेटल। बंसी नीचाँ राखि हम दुनू ब्रह्मबाबाकेँ गोर लागबाक लेल गेलहुँ। ब्रह्मबाबाक कारी मूर्ति, मंदिरक टूटलका भागमे पाथरक ढेरक बीचमे छलनि। हम अपन हाथक माछ मंदिरक सीढी पर राखि देलहुँ। हम दुनू गोटे मूर्ति लग माथ टेकलहुँ। ने जानि कतएसँ ओहि मूर्ति लगक पाथर पर एकटा साँप आबि कए ठाढ़ भ’ गेलैक। हम दुनू गोटे बहुत डरि गेलहुँ आ पाछू हटि गेलहुँ। पछाति जा कए ओ साँप ओहि पाथरक ढेरमे ढूकि गेल। गोविन्द तँ डरक कारणेँ बुझू जे पाथरे बनि गेलाह। हम सभ भगवानक सीढी पर माछ रखने छलहुँ, एहिलेल हुनका खराप लागलनि की? हमरा मोनमे एहन भेल। हम आपस सीढी लग गेलहुँ आ ओतए राखल माछ उठाकए नदीमे फेकि देलहुँ। हमसभ पुनः ब्रह्मबाबाक पयर पर गिर कए हुनकासँ माफी माँगलियनि।
हम गोविन्दसँ पूछलियनि – माछ राखने छलहुँ एहिलेल ब्रह्मबाबाकेँ गोस्सा आबि गेलनि की? मंदिर भ्रष्ट भ’ गलैक की?
नहि यौ, एहन कतहुँ होइक? गामक लोकतँ हुनका माछो चढबैत छनि। गोविन्द जवाब देलक।
तखन साँप किएक देख’ मे आएल?
हम..............।
चुप रहू, पाखलो भेलहुँ तँ की भेल? पछिला बेर तँ हम इमली आ आँवला रखने छलहुँ, तखनहुँ मंदिर भ्रष्ट भेल छलैक की? नहि ने, अहाँ चुप रहू आ ककरो किछु नहि बतेबैक।
हम ब्रह्मबाबाक मंदिर लग पहुँचि गेलहुँ। मंदिरक चारू कात पहाड़ छलैक आ बीचमे मंदिर। रातुक अन्हारमे मंदिर कारी देखाइत रहैक। उपर तरेगणसँ भरल देहबला अकाश। घरक बीचला देबाल आ मठौत एहि दुनूक बीच दए इजोत अबैत रहैक। ओहने इजोत अकाश आ पहाड़क बीच पसरि रहल छलैक।
हम अपन जूता खोललहुँ आ ब्रह्मबाबाकेँ गोर लागलहुँ। रातिक अन्हारमे ब्रह्मबाबाक मूर्ति नहि देखा पड़ैत रहैक। हमरा भेल जे जेना ब्रह्मबाबा एतए अन्हारक एकटा बड़का टा रूप ल’ कए पूरा संसार पर पसरि गेल छथि।
ब्रह्मबाबा केर मंदिर बहुत सिद्ध छैक। मांडवी नदीक कछेर पर एहि गाम केँ बसौनिहार आदिपुरूख वैह छथि। पहिने ई गाम बाढ़िमे डूबि जाइत छलैक मुदा मांडवी नदी पर बान्ह बान्हि ओ एहि गामक सृष्टि केने रहथि। हुनका मरलाक उपरान्त एहि गामक लोक सभ हुनकर स्मरणमे ई मंदिर बनौने छल। एहि तरहेँ ई मंदिर आ ब्रह्मबाबाक द्वारा बनाओल गेल ई बान्ह दुनू बहुत पुरान अछि।
हम ब्रह्मबाबा द्वारा बनाओल गेल ओहि बान्ह दए चलि रहल छलहुँ। आ एहि बान्हक कारणेँ बसल गाममे हम, माने पाखलो रहैत रही।
दिनाक बैसकी घरमें सभ दिन जकाँ हम चटाय बिछा कए बैसि गेलहुँ। दिनाक बेटा एकटा चिट्ठी आनि हमरा हाथमे थमा देलक। ओ चिट्ठी गोविन्देक छलैक। बहुत दिनक बाद ओ हमरा चिट्ठी लिखने रहय। हमरा बड्ड प्रसन्नता भेल।
गोविन्दक संग घूमब-फिरब, केगदी मैदानक पोखरिमे नहाएब, हेलब ई सभ सोचैत-सोचैत हम चटाय पर सूति गेलहुँ। हम माथ धरि कंबल ओढ़ि लेलहुँ। बहुत राति बीति गेलैक मुदा हमरा निन्न नहि आबि रहल छल। हमरा मोनमे केगदी मैदानक पोखरिक चित्र बेरि-बेरि आबि जाइत छल। लील रंगक आकाश केर प्रतिबिंब पानिमे चमकैत छलैक। आकासक रंगीन मेघक पोखरिक लहरि पर हेलब। आकाश अपन रूप पोखरिक पानिमे देखि मोनहि-मोन खूब प्रसन्न होइत छल। ‘ई रूप नीक नहि अछि’ ई सोचि ओ अपन रूपकेँ नव रूपमे रंगैत छल आ मेघक वस्त्र पहिरैत छल।
पोखरिक लग केबड़ा झाड़ ओ केबड़ाक गाछ सभक बड़का टा जंगल रहैक, ओ पोखरिक महार केबड़ाक झाड़ीसँ भरल रहैक। केबड़ाक झाड़ पर फूल फूलाइत अछि। ओहि दिन हमसभ नहएबाक लेल गेल छलहुँ। केबड़ा फूला गेल छलैक। पीयर-पीयर केबड़ा हरियर-हरियर पातसँ बाहर आबि, अपन जी देखा-देखा कए कबदा रहल छलैक। पूरा वातावरण केबड़ाक सुगन्धसँ भरल रहैक। हम आ गोविन्द पोखरिमे कूदि गेलहुँ। दुनूगोटे हेलैत-हेलैत केबड़ाक द्वीप लग पहुँचलहुँ। द्वीप पर केबड़ाक बहुत घनगर जंगल रहैक। दुनू गोटे केबड़ाक झाड़क अंदर घूसि केबड़ाक फूल तोड़ए लागलहुँ। फूल तोड़ि पोखरि पार केलहुँ। ओ सभटा पोखरिक कछेर पर राखि देलियैक। बादमे बेंग जकाँ हमसभ पोखरिमे डुबकी लगौलहुँ। भरि दम साँस घीचि ओहिना पानिमे डूबि गेलहुँ, तँ ओहि साँसक संगे बाहर भेलहुँ। सौंसे देह डूबल छल, मुदा माथक केश हेलैत नारियर सदृश बुझाइत छल।
हमरा गाम क्षेत्रफल आन गामक अपेक्षा कने पैघ छैक। गाममे खेतक मैदान, जंगल ओ पहाड़ हमरा सभकेँ घूमबाक लेल कम्महि भेटैत छल। नाह ल’ कए नदीमे घूमैत-फिरैत रही। नदीमे नहएलाक पश्चात् हेलिकए नदी पार करैत रही। अज्ञातवासक कालमे पांडव लोकनि द्वारा बनाओल गेल पोखरिमे हमसभ नहएबाक लेल जाइत रही। ओ पोखरि बहुत सुन्नर रहैक। पैघ-पैघ पाथर पर पोखरिक चारू दिस नीक चित्रकारी कएल गेल रहैक। चारू दिससँ सीढी होइत लोक पोखरिमे ढूकैक छल। पोखरिक चारू दिस खोदल गेल मेहराब परक कलाकृति सभ। सभ मेहराबक भीतर दू-तीनटा कक्ष इजोतसँ भरल। एहि कक्ष सभक देबालक खाम्ह पर लेपटाएल लत्ती, चिड़ै-चुनमुनी द्वारा कएल गेल बीट (बिष्टा), विभिन्न प्रकारक आकृति बना नेने रहैक। एहन बुझाइत रहैक जेना मेहराबक सुन्नर कक्षक बीच पाषाण केर पोखरिमे शिलाखण्ड पर भगवान अमृत-कलश राखि देने होथि आर ओहि निर्मल पानिकेँ देखिकए जेना कौआक आँखि चंचल भ’ रहल हो, ओहिना ओकरा देखि ककरहुँ प्राण प्रसन्नतासँ भरि जाइक। एहने पानिमे हमसभ नहाइत छलहुँ। नहएलाक बाद गोविन्द मेहराबक कक्षमे जा कए कोनो ऋषि-मुनि जकाँ ध्यानस्थ भ’ बैसैत रहथि। तखन ओहि पाषाणकेँ देखि बुझा पड़ैक जे बुझू महाभारतक काल घुरि एलैक।
पछिला किछु सालक स्मृतिसँ हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल। ओह......हमर माय! हमर साँस केओ बन्न क’ देलक, हमरा गरमे फंदा बान्हि देलक, हमरा एहने लागल। हम आ गोविन्द जखन एहि पोखरिमे नहा रहल छलहुँ तखनहिं भट बाबू ओहि बाटे जा रहल छलाह। हमरा पोखरिमे नहाइत देखि – पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक, पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक...... चिकर’ लागलाह। हुनकर चिकरब सुनि ओतए पाँच – छओ लोक जमा भ’ गेलाह। भट बाबू हुनका लोकनिकेँ आदेश देलथिन, जे ओ सभ हमर कान घीचि बाहर आनथि। ओ लोकनि हमर कान घीचैत हमरा बाहर आनलथि। बादमे भट बाबू अपन छड़ीसँ हमरा खूब मारलथि। ओ सभ हमरा मारैत-मारैत सांतेरी मंदिर धरि ल’ गेलाह। भरि गामक लोक हमरा देखबाक लेल ओतए जमा भ’ गेलाह। ओ लोकनि हमरा सांतेरी मंदिरक सीढ़ी पर नाक रगड़बाक लेल बाध्य केलथि। हम अपन नाक रगड़लहुँ। माँफी माँगलहुँ। बादमे ओ हमरा पोखरिक लग बला स्तंभ (खाम्ह)सँ बान्हि देलनि। काल्हिए हम पीयर नारियर तोड़ने छलहुँ। सभक संग ढोल आ ताशा बजाकए शिगमो खेलने छलहुँ आर आइ हम स्वयं गामबलाक लेल एकटा तमाशा बनल रही।
क्रमशः
श्री तुकाराम रामा शेट (जन्म 1952) कोंकणी भाषामे ‘एक जुवो जिएता’—नाटक, ‘पर्यावरण गीतम’, ‘धर्तोरेचो स्पर्श’—लघु कथा, ‘मनमळब’—काव्य संग्रह केर रचनाक संगहि कैकटा पुस्तकक अनुवाद, संपादन आ प्रकाशनक काज कए प्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे ख्याति अर्जित कएने छथि। प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास—‘पाखलो’ पर हिनका वर्ष 1978 मे ‘गोवा कला अकादमी साहित्यिक पुरस्कार’ भेटि चुकल छनि।
डॉ
शंभु कुमार सिंह
जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।
सेबी फर्नांडीस

