प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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आशीष अनचिन्हार-संपर्क-8876162759

विशिष्ट आलेख संचयन केर सामान्य परिचय

 

हम जाहि पोथीक चर्चा कऽ रहल छी से थिक प्रो. डा. रामावतार यादवजी द्वारा लिखल "मैथिली आलेख सञ्चयन II (2015-2022)। ई 9 गोट आलेख केर संकलन अछि। प्रबुद्ध पाठक एवं शोधकर्ता, विद्वान लोकनि लेल ई लिखल गेल अछि मुदा हम एकर परिचय सामान्य पाठक एवं गैर शोधकर्ता लेखक लेल लीखल अछि। उम्मेद अछि जे हमर ई परिचय दूनू वर्ग मध्य पुल बनि कऽ सामने आएत। एहिसँ पहिने हिनक "मैथिली आलेख सञ्चयन (1989-2015)" प्रकाशित भेल छल। हमर एहि आलेखमे किछु पोथी, नाम आ शब्दमे ओकर लिंक देल गेल अछि, जे ब्लू रंगमे देखाएत, ताहिपर क्लिक करबै तँ ओ  पोथी, नाम आ शब्द खुजि जाएत।

 

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एहि पोथीक पहिल आलेख 'नाट्य-विमर्श: रमेश रञ्जनकृत डोमकछ नाटकक सन्दर्भमे' रमेश रंजनक नाटक 'डोमकछ'पर अछि। ई आलेख एहि नाटकक संपूर्ण आलोचना अछि, आलोचना माने चर्चा। मैथिलीमे आलोचना शब्दक भाव हिंदीसँ आयातित छै जकर माने भेल निंदा करब। जखन कि आलोचना शब्दक सभसँ सार्थक प्रयोग असमिया भाषामे होइत छै आ हम असमिये भाषा बला आलोचना मानै छी। असमिया भाषामे प्रेमी-प्रेमिका, वा कि पति-पत्नी वा कि माए-बेटा सेहो आलोचना करैत अछि अपनामे। मूलतः असमिया भाषामे यदि कोनो लोक आन लोकसँ वा कोनो बिंदुपर अपन बात कहै छै (दैनिक बातचीतकेँ) तऽ ओहि लेल आलोचना शब्द प्रयोग होइत छै, आ हमरा इएह अर्थ काम्य अछि। क्रियेटिभ रचना रचबाक जे प्रक्रिया छै ताहूपर एहि आलेखमे बात भेल छै। शब्दकोशक आधारपर डोमकछ नाट्यकेँ उल्लेखित कएल गेल छै।

 

दोसर आलेख 'नेपालक भाषा नीति आ मैथिली' नेपाल देश केर भाषा नीति आ ताहि मध्य मैथिलीक उपस्थितिपर चर्चा करैए। ओकर समस्या एवं मजबूतीपर सेहो चर्चा करैए। 

 

तेसर आलेख 'मैथिलीमे विलोम-सन्धि' गोविन्द झाजीक शब्दकोशक आलोचनासँ आ ताहिपर गोविन्द झाजीक एक पत्रसँ उपजल ई आलेख अछि, जाहिमे मैथिली शब्दक विचलनकेँ देखाओल गेल छै सेहो पूर्णतः अनुसंधानक संग। ई आलेख निश्चिते भाषामे रुचि रखनिहारे टा लेल छनि। ई आलेख मैथिली गजलकार लोकनिकेँ नीक जकाँ पढ़बाक चाही। 2009-2014 केर अवधिमे जखन हम मैथिली गजलक व्याकरण स्थिर करबामे लागल छलहुँ तखन ई प्रकरण सेहो हमरा सामने आएल छल आ एहन परिस्थितिमे गजलक काफिया (तुकांत, Rhyme) लेल की नियम हेतै, ओकर बहर (छंद, Meter) कोना निर्धारण हेतै से हम देखेने छलहुँ। ई अलग बात जे गजलक नियम सभकेँ कारण भारत-नेपालक 'किछु लोक' हमरा बहिष्कार केलाह जे एखन धरि हुनकर व्यवहारमे परिलक्षित होइत छनि। मुदा जाहि विधाक जे नियम छै से पालन हेबाक चाही। जँ कोनो पाठक मैथिली गजलमे अभिरुचि रखैत छथि से, हमरे द्वारा लिखल-  'मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास' पढ़ि सकै छथि।

 

चारिम आलेख 'समीक्षा-आलेख' नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित 'प्रज्ञा मैथिली-नेपाली-अङ्ग्रेजी शब्दकोश' केर आलोचना अछि। एहि आलेखमे ओ संपूर्ण मैथिली शब्दकोशकेँ सामने रखैत अपन बात यादवजी रखने छथिन। एक दिस जहाँ हमरा लोकनि मात्र कथे-कविताक एकपक्षीय विवरण दऽ अपनाकेँ आलोचक मानि लैत छी तही ठाम यादवजी शब्दकोशक आलोचना करै छथि। कथा-कविताक एकपक्षीय आलोचना करबामे हमरा लोकनि देखबैत छियै जे हम सभ मेहनति बला काज कऽ रहल छी जखन कि वास्तविक मेहनति बला काज यादवजी करै छथि। ई आलेख वर्ष 2017 केर लिखल अछि तँइ एहि आलेखक संदर्भमे एक बात रेखांकित करबा योग्य अछि जे एहि आलेखमे विदेह शब्दकोशकक उल्लेख हमरा नहि भेटल (अथवा हमरे देखबामे नहि आएल) श्रुति प्रकाशन द्वारा गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा केर संयुक्त संपादनमे कुल चारि टा शब्दकोश प्रकाशित भेल अछि। पाठक लेल एहि चारू शब्दकोशक विवरण निच्चा देल जा रहल अछि-

1. Maithili-English Dictionary Vol. I  (2009)

2. Maithili-English Dictionary Vol. II  (2009)

3. English-Maithili Computer Dictionary (2009)

4. Videha English Maithili Dictionary, (2012)

 उदयनारायण सिंह 'नचिकेता' अपन एक आलेख विदेह सिरीजक शब्दकोशपर केंद्रित केने छथि जकरा हमरे द्वारा संपादित 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' नामक पोथीमे देखल जा सकैए। यादवजीक उपरोक्त आलेखसँ भारतक लेखक-आलोचक आ साहित्यकर्मी सभकेँ शिक्षा लेबाक चाही। ओना तऽ बहुत एहन काज, एहन आलेख छनि रामावतार जीक जाहिसँ लोककेँ सिखबाक चाही ताहिमे ईहो एकटा अछि जे डा. रामावतारजी लेल मात्र कृति आ ओकर गुण-दोष महत्व राखैत छनि, पद-पोस्ट, धन, जाति, संबंध आदिकेँ ओ कृति लग बिसरि जाइत छथिन। एहि गुणक अभाव भारतक लेखक-आलोचक-साहित्यकर्मी लग छनि।

 

पाँचम आलेख 'मैथिली भाषा-साहित्यक संरक्षण: चुनौती आ निदान' मे यादवजी मूलतः 'मैथिली मरि जाएत' नारा केर परीक्षण केने छथि। 'मैथिली मरि जाएत' एहि तरहक नारा बहुत पहिनेसँ लगैत रहल अछि विभिन्न विद्वान द्वारा। आ मैथिली मरत वा कि नै मरत ताहिपर चर्चा भेल छै एहि आलेखमे। बदलैत परिस्थतिमे मैथिलीकेँ कोना सबल बनाएल जा सकैए ताहूपर चर्चा केने छथि।

 

छठम आलेख 'कखनहु आठ-आठटा कहारवाला पालकीमे बैसल त' कखनहु हौदा-कसल हाथीपर सवार एकगोट फिरिङ्गी मैथिली-सेवकः संक्षिप्त जीवनवृत्त' मूलतः जीवनी अछि जे कि प्रारंभिक मैथिलीक शब्दकोश निर्मातामेसँ एक फ्रान्सिस ब्युक्याननक जीवनी अछि। हरेक जीवनी अपना-आपमे इतिहास होइत छै से ईहो जीवनी एक प्रकारक इतिहासे अछि। पाठक चारिम आ छठम आलेखकेँ एक समयमे पढ़ता तँ हुनका लेल लाभकारी हेतनि।

 

सातम आलेख 'मध्यकालीन मध्य मैथिलीक भाषावैज्ञानिक वर्णन - विश्लेषण नेपालमण्डलक नेवार नृपलोकनि-विरचित ओ नेपाल राष्ट्रिय अभिलेखालयमे अनुरक्षित मैथिली नाट्य तथा गीति-कृतिसभक हस्तलिखित नेवारी पाण्डुलिपिक परिपेक्ष्यमे' नेवार राजा सभ द्वारा नेवारी लिपिमे लिखित मैथिली रचनाक पांडुलिपिक आधारपर ओहि समयक भाषा (मध्यकालीन मैथिली)क व्याकरणिक वर्णन अछि जे कि पूर्णतः भाषावैज्ञानिक आलेख अछि। जे कियो प्राचीन रचनामे रुचि आ पांडुलिपि विज्ञानमे रुचि रखैत छथि से एहि आलेखकेँ अवश्य पढ़थि। नेवार राजा लोकनिक मैथिली विकासमे की योगदान छनि से एहि आलेखसँ नीक जकाँ चिन्हित होइत अछि। नेपाल एवं भारत दूनू पार मिला कऽ नेवारी लिपिमे लीखल गेल प्राचीन साहित्य केर आधुनिक प्रकाशन कते भेल, के सभ केलनि तकर सभ जानकारी एहि आलेखमे अछि।

एहि ठाम ई जनतब देब आवश्यक जे विदेह पत्रिकाक किछु अंक सेहो नेवारी लिपिमे उपलब्ध अछि जे विदेहक साइटपर ओकर हरेक अंक जकाँ सभ लेल बिना कोनो मूल्य, बिना कोनो ताम-झामकेँ सभ लेल राखल गेल अछि। 

 

आठम आलेख 'मैथिली भाषाक वर्तमान अवस्थितिद' संक्षिप्त टिप्पणी' वर्तमानमे नेपालक मैथिलीक स्थिति-परिस्थितिपर विचार करैत लिखल गेल अछि। ई अलग बात जे पाठक एहि आलेखसँ भारतक मैथिलीक स्थिति-परिस्थिति सेहो बुझि सकैत छथि जे कि एहि आलेख केर विशेषता भेल।

 

नवम आ अंतिम आलेख 'ब्रिटिश लाइब्रेरी, लन्दनक Asia, Pacific and African Collections मे अनुरक्षित ओ भारतविद्याशास्त्रज्ञ हेनरी टोमस कोलब्रुककृत Comparative Vocabulary शीर्षकक अद्यतन अपठित, अशोधित, एवम् अप्रकाशित हस्तलिखित पाण्डुलिपिमे उपलब्ध अमरसिंह-विरचित संस्कृतक प्रख्यात कोश-ग्रन्थ अमरकोषःक 370 शब्दक मैथिली पर्याय-विहङ्गम दृष्टि' कोलब्रुक द्वारा लिखल गेल कोशग्रंथक पांडुलिपि जे कि ब्रिटिश लाइब्रेरीमे सुरक्षित छै ताहिपर आलेख लीखल गेल छै। ईहो आलेख पूर्णतः भाषावैज्ञानिक आलेख अछि। जँ पाठक चारिम, छठम आ एहि नवम आलेखकेँ एक संगे पढ़ता तँ हुनका लेल विशेष लाभकारी रहतनि।

 

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सामान्य पाठक एवं गैर शोधकर्ता लेखक किए पढ़थि ई पोथी-


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प्रो. डा. रामावतार यादवजीक ई पोथी मात्र पोथी नहि विश्वास छै जाहिमे यादवजी अनेकानेक पोथी पढ़ि ओकर सार तत्व आ ताहिपर अपन निष्कर्ष देने छथि। सामान्य पाठक एवं गैर शोधकर्ता लेखक एहि पोथीकेँ विश्वसनीयता लेल पढ़थि।

कमसँ कम भारतक मैथिलीमे ई देखल जाइए जे किछु लेखक अपन पाइ, पद-पोस्ट, उम्र वा अन्य प्रभावसँ लेखक बनि जाइत छथि आ बिना पढ़ने अपन लेखकेँ शोध आलेख कहऽ लागै छथि। बिना पढ़नेसँ हमर मतलब जे ओ कथित लेखक कोनो एक हिंदी वा मैथिलीक नीक पोथी लै छथि, आ ओहि पोथीमे देल गेल रेफरेंसकेँ अपन आलेखमे उतारि दै छथि, एवं एना देखबै छथि जे जेना ओ रेफरेंसमे देल सभ पोथी पढ़ने छथि, जखन कि वास्तविकता उल्टा होइत छै। बादमे जखन ओहि कथित आलेख सभहक परीक्षण होइत छै तऽ ओहिमे लेख आ ओ कथित लेखक दूनू फेल भऽ जाइत छथि।

 

2) किछु गैर शोधकर्ता लेखक अपन लेख लेल मेहनति करै छथि, तथ्यो जुटा लै छथि मुदा ओ ओहि तथ्य सभकेँ अपन आलेखमे जँइ-तँइ प्रयोग कऽ लै छथि। एना केलासँ लेख तँ सफल भऽ जाइत छै मुदा प्रो. डा. रामावतार यादवजीक ई पोथी पढ़लासँ ई ज्ञात होइत अछि जे आलेख कोना लीखी, ओकर फार्मेट (ढाँचा) कोना राखी जाहिसँ ओतबे तथ्यमे ओ आलेख देश-विदेशक विश्वविद्यालयक वा शोध पत्रिकाक शोधपत्र भऽ जाए। हमरा जनैत एहि कारणसँ एहि पोथीकेँ अवश्ये पढ़बाक चाही। 

 

3) कोनो साहित्यकेँ शब्दकोश एवं अन्य मानकग्रंथक आँखिसँ कोना देखल जाए ताहि लेल सामान्य पाठक, एवं गैर शोधकर्ता लेखक एहि पोथीकेँ अवश्य पढ़थि।

 

4) हरेक देशक अपन नीति होइत छै आ ईहो बात सत्य जे हरेक देश, दोसर देशक नीक नीतिकेँ अनुसरण करबाक प्रयास करैत छै। एकर विपरीत कोनो देशक नीतिमे जे समस्या छै ताहूपर दोसर देशक नजरि रहैत छै। भारत नेपालमे मैथिली कॉमन भाषा छै। तँइ जँ कोनो जिज्ञासु भारतक आँखिसँ नेपालक भाषा नीति देखए चाहथि तिनका ई पोथी अवश्य पढ़थि।

 

5) यदि कोनो जिज्ञासुकेँ संक्षिप्त रूपमे मैथिली शब्दक विचलन एवं मैथिली शब्दकोशक इतिहास जनबाक हो तिनका सभकेँ ई पोथी अवश्य पढ़बाक चाही।

 

6) कोनो भाषायी समस्याकेँ भाषायी तरीकासँ कोना सही कएल जाए ताहि लेल पाठककेँ ई पोथी पढ़बाक चाही।

 

 

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