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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक बालानां कृते

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१६. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

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बालानां कृते

विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम

भाषापाक

डॊ शशिधर कुमर- किछु सचित्र बाल कविता

 

पाकल आम

(छवि वा सन्दर्भ आधारित ६ गोट कविता)

 

आम ‍‍१ - विभूति आनन्द.jpg

 

 

कहियो - कहियो सभ किछु ठीक रहितहुँ, पर्याप्त समय रहितहुँ, लाख प्रयासक बावजूदहु किछु नञि लिखाइत अछि । कहियो तकर ठीक विपरीत, मोन चहुचङ्ग रहितहँ, बिना कोनो खास प्रयत्नक, बहुत कम समयमे अनायसहि बहुत किछु लिखा जाइत अछि । सएह भेल ‍१० जून २०१६ ई॰क भोरमे । फेसबुक फोलल, श्री बिभूति आनन्दजीक (मैथिली वरिष्ठ लेखक) प्रोफाइल फोटोक रूपमे आमक झब्बाक छवि लागल छल । झब्बामे चारिटा आम छल आ ताहिमे एकटा पाकल (पीयर ढाबुस), एकटा अधपक्कू आ शेष दू टा काँच (किंवा डम्हाएल) छल । झब्बा नीक लागल - ताहि सन्दर्भ पर एक टा कविता लीखल । तकरा बाद पाँचटा आओरहु कविता धरा-धर अपनहि-आप लिखा गेल ।

 

 

 

०१

 

एक अधवयसू − दू टा जुआन ।

संगहि एक गोट पाकल आम

सुन्नर  समय −  विहंगम  दृश्य,

तीन पीढ़ी केर  भेल  मिलान ।।



 

जिनगीक गति  छी एहने भैय्या,

सब  अबटीमे  पाकल आम

समयक चालि ने बदलल कहियो,

तूबत बनि सब  पाकल आम ।।



 

समय  हाथ  -  जीबू  मस्तीमे,

जिनगी केर नञि कोनहु ठेकान ।

कनितहि रहब, हँसब कहिया फेर,

उलहन − देव  भेलाह  बेइमान ।।



 



 

०२



 

एक    परम    पाकल     प्रबुद्ध,

दोसर पकबा लए  प्रेरित अछि ।

तेसर - चारिम   से  देखि  रहल,

खेला देखि  अचम्भित  अछि ।।



 

पहिलुक अछि  सत्ता  हथिअओने,

आनक सत्ता  लए  काल बनल ।

दोसर   सोचए,   तूबए   पाकल,

तखनहि तँऽ  गुरूघण्टाल बनब ।।



 

तेसर - चारिम छी  मूक  प्रजा,

सब देखि रहल आ सोचि रहल ।

सत्ताक  समर  नञि  प्रतिभागी,

परिणाम मुदा सब भोगि रहल ।।



 

 

०३

 

एक  गुरू  छथि  दीप्त  ज्ञानसँ,

दोसर  किछु  अवभासित छथि ।

तेसर - चारिम नव शिष्य हुनक,

संगति बैसल आह्लादित छथि ।।



 

कहथि  गुरू - ई  ज्ञान  थिकहि,

बँटलासँ  कहियो  नञि  घटैछ ।

अज्ञानक    अम्मत    टिकुला,

ज्ञानहि बल मधुर रसाल बनैछ ।।



 

सद्-ज्ञान गुरूक छी झलकि रहल,

पीताभ मधुर आमक फल सनि ।

संगतिमे अम्मत काँच आम सेहो,

बदलि रहल पाकल फल सनि ।।

 

०४

 

एक   दूइर  दोसरहुँकेँ  करैछ,

से  संगति  केर  प्रभाव  छै ।

पाकल देखि  कऽ काँच  पकैए,

फऽड़क  सहज  स्वभाव  छै ।।



 

एक जँ  उजिआएल,  दोसरहुमे

उजिअएबा  केर  भाव भरैछ ।

जँ  केओ  बुड़िआएल  समूहमे,

सभक भविष्यक काल बनैछ ।।



 

एक शराबी इएह  चाहैत अछि,

मित्रहु  बैसि  शराब पिउबए ।

मुदा तपस्वी  सदिखन चाहैछ,

संगीक तप - जंजाल तजए ।।



 

संगति केर  महिमा छी भारी,

एहि झब्बामे से  बुझा रहल ।

पाकल  देखि   पकैए  दोसर,

तेसर-चारिम छी डम्हा रहल ।।



 

 

 

 

 

०५

 

देखि सुपुक - पाकल - गोपीकेँ,

मोन  करय  खएतहुँ ओकरा ।

बहुत ऊँच छी, चढ़ि नञि तोड़ब,

फेंकि  रहल  छी  तेँ झटहा ।।



 

गछपक्कू  तँऽ  गछपक्कू छी,

दोसर  पालहु  पर पका लेबै ।

संगमे कँचका सेहो खसल तँऽ,

गोड़ि  अनाजमे  पका  देबै ।।



 

ई  की  भेलै ! गछपक्कू  तँऽ,

अपनहि तूबल आओर खसल ।

हमर मोन भगवानहु बुझलन्हि,

हापुस आम ओ बिहुँसि रहल ।।



 

सुपुक = सुपक = सुपक्व

 

गोपी = सुपक्व निदग्ग पीयर वा लाल-पीयर गछपक्कू आम

 

हापुस = रत - रत करैत सुपक्व गछपक्कू आम (मराठी आदि भाषामे "हापुस" आमक एक गोट प्रकारक नाम थिक, मुदा मैथिलीमे ताहि अर्थमे नञि प्रयुक्त भऽ कऽ निर्दिष्ट अर्थमे प्रयोग होइछ)

 

आमक बिहुँसब = गछपक्कू आम जखन बेसी ऊँचाईसँ तूबि कऽ माटि पर खसैछ तँऽ ओ एक वा एकाधिक स्थान पर (प्रायः ऊपरमे या बगलमे/पार्श्वमे) फाटि जाइछ । एहि घटनाकेँ आमक बिहुँसब ओ एहेन आमकेँ बिहुँसल आम कहल जाइत अछि ।

 

 

 

०६

 

पाँचहु आङ्गुर  नञि छी समान,

नहिञे   दू   गोटे   संसारमे ।

भाँति - भाँति  केर  लोक भेटैए,

अप्पन    सभक   समाजमे ।।

 

एक्कहि  आमक   झब्बामे  छै,

काँच,  डम्हाएल  आ  पाकल ।

तहिना  समाजमे  लोक  थिकै,

अपना - अपनी काजेँ  पागल ।।

 

किछु प्रबुद्ध, किछु अतिप्रबुद्ध,

सामान्य तथा किछु  निर्बुद्धी ।

सुजन - सुबुद्धि सेहो  बहुतहि,

किछु  रहैछ अनेरहु  दुर्बुद्धी ।।

 

ओहुना ई सभ किछु बदलैत छै,

समय - वयस - अनुभव संगे ।

सबहक अप्पन अलगहि महत्त्व,

आ काज आबैछ  अपना ढंगे ।।

 

पाकत जञो सभटा  आम संग,

एक्कहि बेर भऽ  जायत ढेरी ।

तेँ तकर व्यवस्था प्रकृति करैछ,

पकबैछ ओ आम  बेरा - बेरी ।।

 

कबार (बाल कविता)

 

कबार मैथिली GLOSSY IBIS MAITHILI 1.2.jpg

 

छी कंकूर - सहोदर,  पर हम

ओकरासँ  किछु  छोट  छी ।

नाङ्गरि पातर छोट-क्षीण मोर,

ओक्कर  तँऽ  चौकोर  छी ।।*

 

कंकूरहि  सनि  लोल   हमर,

आ  देहक  कारी  रंग  छी ।

माथ  सेहो   एकवर्णी  कारी,

लाल ने  ओक्कर  रंग छी ।।*

 

सालक किछु  एहनहु महीना,

लोहाक बीझ सनि रंग हमर ।

देहक चमक  बढ़ल - बदलल,

हरियर-कारी छी पंख हमर ।।*

 

कंकूरक सनि भलहि लोल छी,

अलगहि पर सब ढंग हमर ।

हम  नञि भेटब  दूर चऽड़मे,

पानिक श्रोतक  संग हमर ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

 

* - करांकुलक अंग्रेजी नाम BLACK NAPED IBIS अछि आ कबारक GLOSSY IBIS, तेँ दुहुमे बहुत नजदीकक सम्बन्ध अछि । तथापि, दुहुमे बहुत किछु भिन्नता सेहो अछि आ तेँ प्राणीशास्त्रक वर्गीकरणमे सेहो दुहु अलग - अलग वंशक चिड़ै अछि । करांकुलसँ कबारक आकार छोट होइत अछि । करांकुलक नाङ्गरि चौकोर होइत अछि जखनि कि कबारक अपेक्षाकृत कम चौकोर ओ छोट ।

* - कबारक आकार-सुकार देखबामे करांकुलहि सनि लागैत अछि । लोलक आकृति सेहो कंकूरहि सनि रहैछ । पर, कबारक माथक ऊपरमे कंकूर जेकाँ लाल रंग नञि रहैत अछि ।

* - सालक किछु महीना एहन होइत अछि जाहिमे कबारक देहक रंग भूरा-कारीसँ बदलि बीझायल लोहाक रंगक (RUSTY COLOUR) आ चमकयुक्त (GLOSSY) भऽ जाइत अछि । दुहु पंखक रंग बदलि कऽ कजरी सनि गाढ़ चमकैत हरियर भऽ जाइत अछि ।

* - करांकुलक विपरीत कबार जलाशयक आस-पासक क्षेत्रमे भेटैत अछि । पानिक श्रोतसँ बेसी दूर ई चिड़ै नञि देखाइ दैछ ।

 

करांकुल (बाल कविता)

 

करांकुल कड़ांकुल कराङ्कुल मैथिली BLACK  RED NAPED IBIS MAITHILI 2.3.jpg

 

एत्तेक  मेहनति  किएक  करै  छेँ ?

अपन स्वास्थ्य पर ध्यान ने दै छेँ ।

कारी - झामरि  देह भेल छौ,  अनमन्न तोँ कंकूर लागै छेँ ।।

 

जे कंकूर  छै  सएह  करांकुर

इएह कालकण्टक करांकुल

एकरहि उपमा रोजहि बाजथि,  तइयो तोँ एकरा ने चिन्है छेँ ।।*

 

चिड़ै  ई  कारी,   धुत्थुर - कारी ।

लेशहि  उज्जर,  आँखियहु  कारी ।

माथक लाल रंग केर कारण, भ्रमसँ तोँ  लालसर  बुझै छेँ ।।*

 

प्रायः   छोट    झुण्डमे   भेटैछ ।

बाध - बोन  आ  चऽड़मे  भेटैछ ।

पानिक श्रोतसँ  दूरहि देखही,  धारक कातमे किएक ताकै छेँ ।।*

 

लोल एकर किछु खास लागैत छै ।

बिनु  बेँतक  गैंतीसँ  मिलैत छै ।

या फेर तकरहि सनि आकृति छै, जकरा तोँ तरुआरि कहै छेँ ।।*

करांकुल कड़ांकुल कराङ्कुल मैथिली BLACK IBIS MAITHILI 2.2.jpg

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - कंकूर केर उपमा अपना दिशि बहुत प्रचलित अछि, पर बहुत कम्महि लोककेँ बूझल अछि जे कंकूड़ या कंकूर एक टा चिड़ै केर नाम थिक । किछु लोक कंकूर शब्दक उत्पत्ति कंकाल शब्दसँ मानैत छथि − शायद ओहो लोकनि सही छथि । सूखि कऽ कंकूर भऽ गेलेँ - कंकालसँ कंकूरक उद्गम दिशि ईशारा करैछ । चिड़ै दिशि ईशारा करैत बाँकी उद्धरण उपरुका कवितामे देल गेल अछि ।  

* - बहुत लोक एकर माथ परक लाल रंग देखि एकरा भ्रमवश लालसर चिड़ै कहैत छथि − से गलत थिक । चिड़ै केर सम्यक जानकारी रखनिहार/-रि लोकनि जनैत छथि कि लालसर आन चिड़ै थिक ।

* - उड़ए बला अधिकांश पैघ चिड़ै कोनहु-ने-कोनहु प्रकारक जलाशयक नजदीकमे भेटैछ । मुदा, करांकुल प्रायः जलाशयसँ बहुत दूरक घासयुक्त मैदानी क्षेत्रमे भेटैत अछि । कखनहु - कखनहु जलाशयक आस - पास सेहो भेटि सकैत अछि ।

* - एकर लोल केर आकृति विशिष्ट प्रकारक होइत अछि जे कि देखबामे बिना बेंतक गैती (PICK AXE) या फेर भीतर दिशि वक्रित तरूआरि (INWARD CURVED SWORD) सनि लागैत अछि ।

IBIS BEAK COMPARISON 3.jpg

 

राजहंस या हंसावर (बाल कविता)

 

राजहंस हंसावर मैथिली FLAMINGO MAITHILI 3.jpg

राजहंस हंसावर मैथिली FLAMINGO MAITHILI 7.3.jpg

राजहंस हंसावर मैथिली FLAMINGO MAITHILI 8.2.jpg

 

राजहंस हंसावर मैथिली FLAMINGO MAITHILI 5.jpg

 

हउए   देखियौ   अरुण - क्रुञ्च,

वाह ! केहेन रमणगर  लागैत छै ! *

सागर तट पर झुण्डक - झुण्ड ओ,

केहेन   सोहनगर   लागैत  छै !! *

 

खन  सारस  सनि   ठाढ़  भेल छै,

खन   हंसहि  सनि   हेलैत  छै ।*

हंसहि   सनि   देखियौ   गर्दनि,

ओ  पानिसँ अनुखन खेलैत छै ।।

 

केओ कहैछ - छै  राजहंस इएह,

केओ  कहैछ  -  हंसावर  छै ।*

अपना  दिशि   नञि  छै  भेटैत,

ओकरा  बड़ रुचिगर सागर छै ।।*

 

हंसहि सनि  एकरहु  तँऽ  मूँहमे,

छन्नी  सनि  किछु  लागल छै ।

कादो   सानल   पानिसँ   सेहो,

स्वच्छ आहार  ओ  छानैत छै ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - प्राचीन हिन्दू धर्मग्रण्थसभमे जाहि अरुण क्रुञ्च नामक चिड़ैकेँ अग्निदेवताक वाहन बताओल गेल अछि से इएह चिड़ै थिक ।

* - ई चिड़ै समुद्र तट पर रहब पसिन्न करैत अछि आ तेँ अपना दिशि नञि भेटैत अछि । भारतमे विशेष कऽ पछबारी समुद्रतटीय घाट पर ई चिड़ै आबैत अछि आ किछु संख्यामे पुबारी समुद्रतटीय घाट केर क्षेत्रमे (यथा - उड़ीसाक चिल्का झीलमे) सेहो । ई प्रबासी चिड़ै (MIGRATORY BIRD) थिक । गर्मीमे अफ्रिकाक समुद्री तटसँ भागि प्रायः दच्छिन-पच्छिम एसियाक आ यूरोपक समुद्र तट पर आबैत अछि आ ठण्ढीमे पुनः ओतहि चलि जाइत अछि ।

* - ठाढ़ भेल ई चिड़ै लाल रंगक सारस (क्रुञ्च या क्रौञ्च) जेकाँ लागैत अछि आ तेँ संस्कृतमे एकर एकटा नाम अरुण क्रुञ्च अछि । पानिमे हेलबा काल ई अनमन्न हंस सदृश लागैत अछि, हंसहि सनि एकर गर्दनि अंग्रेजीक S वर्ण जेकाँ देखाइ दैत अछि । एकर आबाज सेहो हंसहिसं मिलैत अछि । इएह कारणेँ राजहंस सेहो कहबैत अछि ।

बड़का राजहंस मैथिली GREATER FLAMINGO MAITHILI 1.1.jpg

* - किछु लोक अरुण क्रुञ्च नामक चिड़ै केर पर्यायी नाँओ राजहंस सेहो मानैत छथि तँऽ किछु लोक एकरा हंसावर कहि सम्बोधित करैत छथि ।

* - एहि चिड़ै केर लोलक भीतर एकटा छन्नी सनि संरचना (SIEVE LIKE STRUCTURE) होइत अछि जकर मदतिसँ कादो भरल पानिमेसँ सेहो अपन खएबा जोग बस्तुकेँ स्वच्छ स्वरुपमे प्राप्त कऽ लैत अछि आ बाँकी अनावश्यक पदार्थकेँ बाहरहि छोड़ि (छाड़ि) दैत अछि । एहि तरहेँ कहि सकैत छी जे प्राचीन शास्त्रसभमे वर्णित नीर - क्षीर विवेक (नीर = कादो वा निर्माल्ययुक्त पानि; क्षीर = पोषक तत्त्वसभ) केर गुण राजहंसमे पाओल जाइछ ।

किछु विशेष बात -

·         ई चिड़ै अपना दिशि (सम्पुर्ण मिथिलामे) नञि भेटैत अछि । तेँ एकर कोनहु आन मैथिली नाम नञि अछि । एहना स्थितिमे हम एहि ठाँ ओकर संस्कृतहि नामकेँ तत्सम स्वरूपमे मैथिली नामक रूपमे प्रयोग कयल अछि ।

 

·         मैथिली तँऽ मैथिली, संस्कृतहुमे राजहंस नाम केर सन्दर्भमे बहुत मत - मतान्तर अछि । परञ्च, संस्कृतक प्रशिद्ध ग्रण्थ अमरकोशमे देल गेल राजहंसक विवरण एहि चिड़ैसँ बेसी मेल खाइत अछि । संगहि आनहु बहुत रास गुण-धर्म केर मिलानक आधार पर आइ-काल्हि बेसीतर विद्वान एकरहि राजहंस मानैत छथि । अमरकोशक अनुसार राजहंसक विवरण निम्न प्रकारेँ अछि -

 

Ø  ……… राजहंसास्तु ते चक्षुचरणैर्लोहितैः सितः ……….।।

Ø  अर्थात्, राजहंस ओ थिक जे सित वर्ण (किछु धूसर उज्जर; नञि कि स्वच्छ उज्जर) केर अछि आ जकर चक्षु (आँखि) ओ चरण (पएर) लोहित (लाल वा ललौन) वर्णक अछि ।

 

·         जाहि ठाम ई चिड़ै नञि पाओल जाइत अछि (मिथिलामे सेहो) ओहि ठामक सहित्यकारलोकनि आ लोकसभ राजहंस चिड़ै केर रूपमे अपना मन केर कल्पनाक अनुसार गढ़ि लैत छथि । अथवा, राजहंस शब्दक प्रयोग तँऽ करैत छथि पर राजहंसकेँ प्रत्यक्षतः चिन्हबाक झंझटिसँ दूरहि रहैत छथि ।

 

·          हिन्दीमे देल गेल एकटा आओर नाम अछि - हंसावर । ई नाम फादर कामिल बुल्के (अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश) द्वारा देल गेल छल । पर, हिन्दीअहुमे आब एहि शब्दक प्रयोग कम भऽ गेल आ एहि चिड़ै लेल राजहंस शब्दक प्रयोग होइत अछि ।

 

·         लॅमिङ्गो (राजहंस) केर विश्वमे कुल छओ (बेसीतर प्रणीशास्त्री द्वारा मान्य) जाति अछि-

 

Ø  GREATER FLAMINGO - Phoenicopterus roseus - बड़का राजहंस / गुलाबी राजहंस

Ø  LESSER FLAMINGO - Phoenicopterus minor - छोटका राजहंस

Ø  CHILEAN FLAMINGO - Phoenicopterus chilensis - चीलीक राजहंस

Ø  JAMES’ (or JAMES’S) FLAMINGO - Phoenicopterus jamesi - जेम्सक राजहंस

Ø  ANDEAN FLAMINGO - Phoenicopterus andinus - एण्डीज पहाड़क राजहंस

Ø  AMERICAN FLAMINGO - Phoenicopterus ruber - अमेरिकाक राजहंस

उपरोक्त जातिसभमेसँ (BIOLOGICAL SPECIES) पहिल दू गोट भारतमे भेटैत अछि । राजहंसक छओ जातिसभमेसँ पहिल केर संख्या विश्वभरिमे सभसँ बेसी अछि ।

 

सिरोली या सिरोली मएना (बाल कविता)

 

सिरोली मएना मैथिली ASIAN PIED STARLING MYNA MAITHILI 1.4.jpg

 

छी मएने सनि,   वा मएने छी,

पर  चितकाबर   रंग   हमर ।

बोली  मीठ छी,  सएह  कारणेँ,

एहेन सनि  छी  नाम  हमर ।।*

 

केओ  कहथि  स्थान  सिरोई,

ताहिसँ  बनल  सिरोली  छै ।*

पर  मीठगर   बोलहि   कारण,

हम्मर तँऽ नाम सिरोली छै ।।*

 

साधारण मएना  सनि  ने  हम,

भेटब   घर - आङ्गन   बेसी ।

ढीठ  ओतेक  नञि  तेँ  हमरा,

देखब ओत्तहि, नञि जन बेसी ।।*

 

हल्लुक - पीयर लोल हमर छी,

नेने  जड़िमे   किछु   लाली ।

सुग्गा  सनि  अनुकरण  करी,

हमहूँ  तँऽ  मनुक्खक बोली ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - पुर्वोत्तर भारतक मणीपुर राज्यमे एकटा स्थान अछि सिरोई / सिरोही जाहि ठाम सिरोई राष्ट्रिय उद्यान (SIROHI / SHIRUI NATIONAL PARK) या यैंगैंगपोक्पी लोकचाओ वन्यजीव अभयारण्य थिक जकर स्थापना सन् 1982 ई॰मे कयल गेल छल । अन्तर्जाल पर उपलब्ध जानकारी इएह कहैत अछि कि सिरोई नामक स्थानक आधार पर एहि मएनाक नाम सिरोई मएना पड़ल जे कि बादमे सिरोली मएना भऽ गेल । परञ्च हमरा ई बात पचि नञि रहल अछि कारण कि -

·        सिरोली मएना पूरा दछिनबारी एसियामे मैदानी (PLAINS) आ निचला तराई (LOWER FOOTHILLS) क्षेत्रमे पाओल जाइत अछि, तखन फेर मात्र मणीपुरहि के सिरोई केर विशेषण किएक ?

·        सिरोई राष्ट्रिय उद्यान केर स्थापना सन् 1982 मे भेल पर मिथिलामे एहि चिड़ै केर नाम सिरोली बहुत पहिनहिसँ अछि (मिथिलाक किछु अतिवृद्ध महिला लोकनि बतओलन्हि) ।

·        अपना दिशि लोक सभक (विशेष कऽ किछु अतिवृद्ध जानकार महिला लोकनि) अनुसारेँ सिरोली (सिरोली मएना) केर बोली मएना (साधारण घरैया मएना) केर बोलीक अपेक्षा मधुर होइत अछि तेँ एकर एहेन नाम अछि ।

·        ई चिड़ै गाबएबला पक्षीक (SINGING BIRDS) श्रेणीमे आबैत अछि जे कि किछु सीमा धरि नामकरणक पाछाँ ओकर आबाजकेँ कारण होयबाक पुष्टि करैछ ।

* - सिरोली साधारण मएना जेकाँ ढीठ नञि होइत अछि आ तेँ घर आङ्गनमे जाहि ठाम मनुक्खक आबर-जात बेसी हो ताहि ठाम नञि देखाइ देत । गाम-घऽरमे कने कात -करौटमे आ प्रायः छोट-छोट झुण्डमे सिरोली देखबामे आओत ।

* - पिञ्जरामे पोषला पर सिरोली सेहो सुग्गा जेकाँ मनुक्खक बोलीक नकल करैत देखल गेल अछि ।

 

साही मैथिली INDIAN PORCUPINE MAITHILI 2.3.jpg

साही (बाल कविता)

साहीक काँट तँऽ सुनने हएबहक ।

सुनने की - देखने सेहो हएबहक ।

साहीक काँटमे “साही” की ??

 

“साही” मूस - गणक  छी प्राणी ।*

मूससँ  बहुते  पैघ - से  जानी ।

सौंसे  देहे  “काँट”  बुझी ।।

 

दिन भरि बियरिमे रहैत अछि ।

बाहर  रातिएमे निकसैत अछि ।*

रक्षा-कवच ई “काँट” कही ।।

 

कारी - उज्जर   काँट  छियै ।*

उपनयनहुमे    काज   छियै ।*

पहिलुक लेखनी इहो बुझी ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - मूस आ साही − दुहु एक्कहि कुलक सदस्य अछि । ओहि कुलक नाम अछि रॉडेण्शिया (RODENTIA)

* - ई बिलेशय प्राणी अछि आ माटिक नीचाँमे बिलमे रहैत अछि । संगहि रातिचर (NOCTURNAL) प्राणी सेहो अछि ।

* - साहीक काँट (QUILS / SPINES) परिवर्तित रोइयाँ (MODIFIED HAIR) थिक जकर रूप-रंग ओ आकार साहीक प्रकार तथा सहीक वयस पर निर्भर करैछ ।

 

साहीक काँट मैथिली PORCUPINE QUIL SPINE MAITHILI 2.jpg

 

* - उपनयनमे शिखा-विभाजनक विधमे (बरुआक टीककेँ ३ भागमे बँटबाक बिधमे) साहीक काँटक काज पड़ैछ ।

* - पहिने अपना दिशि भीत (माटिक देबाल) पर चित्र बनएबा काल चित्रक खाका (OUTLINE / ROUGH DIAGRAMME) बनएबा हेतु सेहो प्रयुक्त होइत छल ।

 

                  यूरेसिया (यूरोप आ एसिया) तथा अफ्रिका महादेशकेँ पुरना दुनिञा (OLD WORLD) आ उतरबारी तथा दछिनबारी अमेरिका महादेशकेँ नवका दुनिञा (NEW WORLD) कहल जाइत अछि । साहीक जे जाति (SPECIES) जाहि ठामक मूल निवासी अछि ताहि अनुसारेँ ओकरा सभकेँ पुरान दुनिञाक साही (OLD WORLD PORCUPINES - ORDER HYSTRICIDAE) नऽव दुनिञाक साही (NEW WORLD PORCUPINES - ORDER ERETHIZONTIDAE) कहल जाइत अछि । साही रहितहुँ दुनु समूहमे बहुत बेसी अन्तर अछि ।

 

डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह”,  ग्राम रुचौल, पो॰ मकरमपुर, जिला दरभंगा, पिन ८४७२३४,  ई मेल - videha19@yahoo.com

 

 

डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह”,  ग्राम रुचौल, पो॰ मकरमपुर, जिला दरभंगा, पिन ८४७२३४,  ई मेल - videha19@yahoo.com

 

 

डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह”,  ग्राम रुचौल, पो॰ मकरमपुर, जिला दरभंगा, पिन ८४७२३४,  ई मेल - videha19@yahoo.com

 

 

डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह”,  ग्राम रुचौल, पो॰ मकरमपुर, जिला दरभंगा, पिन ८४७२३४,  ई मेल - videha19@yahoo.com

 

 

डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह”,  ग्राम रुचौल, पो॰ मकरमपुर, जिला दरभंगा, पिन ८४७२३४,  ई मेल - videha19@yahoo.com

 

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।