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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक बालानां कृते

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१६. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

बालानां कृते

विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम

भाषापाक

१.आशीष अनचिन्हार- बाल गजल २. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” किछु बाल कविता

आशीष अनचिन्हार

बाल गजल

अब्बा पीटै अम्मी चाहै हमरा

खाला भगबै मामू डाँटै हमरा

 

चुप्पे गेलहुँ घुमि एलहुँ मेला तँइ

बड़का भैया मारै पीटै हमरा

 

सभ दिनमे चलि एन्नी ओन्नी चलि जाइ

खाली दादा दादी राखै हमरा

 

हमरो आपा आबै गाबै नाचै

तँइ ओ सुंदर सुंदर लागै हमरा

 

सुंदर काकी देलथि अरफी बरफी

तँइ कक्का हँसुआ लऽ कऽ काटै हमरा

 

सभ पाँतिमे दस टा दीर्घ अछि।

तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि। टू टा लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।

खाला= मौसी

आपा=बड़की बहीन

 

डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” किछु बाल कविता

हंस (बाल कविता)

 

मूक हंस मैथिली Mute Swan Maithili 2.1.jpg

 

हंसक बीच  ने  बगुला  शोभए,

बड़   पुरान   ई  कहबी  छी ।*

बगुला   खेत - पथार  भेटैतछि,

हंस केहेन − नञि  देखने छी ।।*

 

सरस्वती माएक  वाहन अछि,

चित्रमे  हम  से  देखने छी ।*

अंग्रेजी केर ‘एस’ सनि गर्दनि,

बस  किताबमे  पढ़ने  छी ।।*

 

सुनै जो बौआ ! सुनै गे बुच्ची !

एहि  ठाँ   हंस  प्रवासी  छी ।

उत्तर  दिशि  अतिशीत क्षेत्र जे,

ताहि  ठामक  ओ वासी छी ।।*

 

एहि ठाँ जे  आबैत  हंस छल,

देह - पाँखि उज्जर होइ छल ।

लोलक  उद्गम - स्थल कारी,

लोल गाढ़ - पीयर होइ छल ।।*

 

शीत  समयमे   छल  आबैत,

कहियो  ओ उड़ैत हिमालयसँ ।

अपनहुँ ठाँ  देखना जाइत छल,

सटल  जे  क्षेत्र  हिमालयसँ ।।*

 

चर्चा  अछि  साहित्यमे  सौंसे,

मानसरोवर - श्वेत हंस  केर ।

करैछ  ईशारा  टपि  हिमगिरि,

ने बेसी काल रहैछ हंस फेर ।।*

 

विश्वक छै मौसिम बदलि गेल,

पहिनुक सभटा छै उनटि गेल ।*

बीतल कए बरख, कतेक पुस्त,

ने हंसक छी  आगमण भेल ।।*१०

 

सए बरख - हजार पता नञि से,

कहियासँ  हंस  निपत्ता  अछि ।

साहित्यमे  सौंसे  धवल - हंस,

पर दर्शन हएब सिहन्ता अछि ।।*१०

 

हंसक  ई  अर्थ  विशिष्ट  भेल,

सामान्य अर्थ बड़ व्यापक अछि ।

बहुविध  जलीय  पक्षी  शामिल,

कलहंस, राज आ जलपद अछि ।।*११

 

ओना तँऽ अप्पन शास्त्र कहैतछि,

हंस   होइत   अछि   उज्जर ।

मुदा   हंस  किछु  कारी  सेहो,

भेटैछ   एहि   धरती    पर ।।

 

किछु एहनो छी हंस जकर बस,

गर्दनि टा    कारी    होइए ।

जँ  बूझी अहँ  हंस धवल बस,

तँऽ    विश्मयकारी   होइए ।।*१२

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - ‘न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये वको यथा’ - संस्कृतहि युगक कहबी छै ।

* - छोटकी बगुला सभ तँऽ बहुतायतमे पानि लागल खेत - पथारसभमे देखबामे आबैत अछि । पर हंस अपना दिशि केओ नञ देखने अछि । जँ केओ देखने अछि तँऽ मात्र चित्रमे वा प्राणी उद्यानमे अथवा जँ केओ कीनि कऽ पोषने हो ।

* - धवल-श्वेत होयबाक कारण हिन्दू धर्म शास्त्रक अनुसार हंसकेँ माए सरस्वतीक वाहन मानल गेल अछि । देवी सरस्वतीक चित्र वा प्रतिमाक संग प्रायः हंसक चित्र वा प्रतिमा सेहो रहैत अछि । यद्यपि ओ चित्र वा प्रतिमा काल्पनिक होइत अछि पर परम्पराक आधारेँ बनैछ तथा ओ परम्परा अति प्राचीन अछि - हजारों वर्ष पुरान ।

* - किताबसभमे वर्णन रहैछ कि हंसक गर्दनि अंग्रेजी वर्णमालाक “एस” (S) आखर सनि होइत अछि ।

* * - अतिप्राचीन कालहिसँ भारतीय साहित्यमे हंसक प्रवासी होयबाक बात कहल गेल अछि जे कि हिमालयसँ सटल भू-भागमे हिमालय शिखरसँ उतरि मात्र शीतऋतुमे आबैत छल ।

* - पारम्परिक जनश्रुति ओ संस्कृत आ आन संस्कृतेतर साहित्यसभसँ ज्ञात होइत अछि कि हंसक धऽर आ गर्दनि धवल श्वेत वर्णक होइत छल जखनि कि लोल गाढ़ पीयर रंगक । लोल जाहि ठाम मूरीसँ जुड़ल रहैत छल ओहि ठामसँ आँखि धरिक स्थान कारी होइत छल ।

* - कैलास पर्वत पर मानसरोवरमे हंस रहैत अछि, ओतहिसँ ठण्ढीमे आबैत अछि आ फेर ओतहि चलि जाइत अछि । ई एकटा ईशारा थिक कि हिमालय वा हिमालयसँ आओरो आगाँ (उत्तर वा उत्तर-पच्छिम दिशि) हंस सभक मूल निवास स्थान अछि ।

* - विश्वक जलवायू आ मौसिम निरन्तर बदलैत रहैत अछि । केवल आजुक ‘हरित गृह प्रभाव’ तथा ‘वैश्विक गर्मी’ केर बात नञि अछि । किछु हजार वर्ष पहिनहु मौसिमक बदलावक संकेत आयुर्वेदक महान कृति “सुश्रुत संहिता”मे भेटैछ । जखनि कि हंसक प्रथमोल्लेख ऋग्वेदमे भेटैछ । आयुर्वेद अथर्ववेदक उपांग मानल जाइत अछि जे कि निश्चित रूपेँ ऋग्वेदसँ नऽव अछि ।

*१० - विगत कतेको सए अथवा हजार वर्षसँ हिमालयक दच्छिनमे आ खास कऽ दच्छिन-पूबमे हंसक प्राकृतिक रूपसँ आगमण नञि भेल अछि । ओहिसँ पहिने सम्भवतः “मूक हंस / म्यूट स्वान” (MUTE SWAN) ठण्ढीमे भारतक हिमालयसँ सटल क्षेत्रसभमे आबैत छल किएक तँऽ भारतीय वाङ्गमयमे वर्णित हंस केर विवरण ओकरहिसँ मेल खाइत अछि । ई हंस विश्व केर आन हंस आ जलपदक अपेक्षा कम हल्ला मचबैत अछि तेँ ओकरा अंग्रेजीमे “म्यूट स्वान” (MUTE SWAN) कहल जाइत अछि जकर मैथिली अनुवाद भेल “मूक हंस” । ई हंस पुर्ण रूपसँ बौक नञि होइत अछि अपितु अपेक्षाकृत कम बजैत अछि ।

*११ - “हंस” शब्द  जखन अगबे प्रयुक्त होइत अछि तँऽ ओहि शब्दसँ जाहि विशिष्ट चिड़ै केर बोध होइत अछि से अंग्रेजीमे “स्वान” (SWAN) कहबैत अछि जकर गर्दनि अंग्रेजीक “एस” आखर सनि होइत अछि । ई “हंस” शब्दक विशिष्ट अर्थ भेल । “हंस” शब्द  जखन हंस सदृश समस्त जलीय पक्षीक बोध करबैत अछि तखन ओहि मे हंस केर अलावे आन जलीय पक्षी (जेना कि - हंसक वा जलपद) सेहो आबैत अछि । ई “हंस” शब्दक सामान्य अर्थ भेल  । जखन हंस शब्द आन कोनहु विशेषण या उपसर्गक संग (यथा - कलहंस, राजहंस आदि) आबैत अछि तँऽ ओहिसँ तदनुरूप आन कोनहु जलीय पक्षीक बोध होइत अछि ।

*१२ - भारतीय वाङ्गमयमे यद्यपि मात्र धवल-श्वेत हंस केर चर्च भेटैत अछि पर पृथिवीक दच्छिनी गोलार्ध केर महाद्वीप सभमे कारी हंस सेहो भेटैत अछि । दच्छिनी अमेरिका महाद्वीपमे हंसक जे प्रजाति भेटैछ तकर गर्दनि आ मूरी कारी तथा धऽर उज्जर होइत अछि । ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपमे भेटए बला हंस केर मूरी, गर्दनि आ धऽर पूरा कारी होइत अछि ।

 

करिया हंस मैथिली BLACK SWAN CIGNUS ATRATUS MAITHILI 3.jpg

 

करिया गर्दनि बला हंस मैथिली BLACK NECKED SWAN CIGNUS ATRATUS MAITHILI 5 (3).jpg

चकोर (बाल कविता)

 

चकोर मैथिली CHUKAR PARTRIDGE MAITHILI 2.jpg

 

अहाँ  नील गगन केर  चन्दा,

हम  छी  धरतीक   चकोर ।

गाबै छथि  ई  गीत  भाइजी,

भऽ कऽ  बड़  भाव-विभोर ।।*

 

शायद   जिनगीमे    भैय्या,

देखल  ने  कहियो  चकोर ।

जँ देखता तँऽ  फेर ने कहता,

हम    धरतीक    चकोर ।।*

 

रातिमे बैसल एकटक चानकेँ,

देखल     करैछ    चकोर ।

साहित्यक छी  कोर−कल्पना,

साँच   ने  एहिमे   थोड़ ।।*

 

छोट लोल आ  छोटकी मूरी,

बड़की  टा  केर   पेट  छै ।

छोटकी दूटा पाँखि उड़ए नहि,

सौंसे  देह  बस  पेट  छै ।।*

 

तित्तिर बटेर सनि लड़ैछ ईहो,

करैछ  मनुक्खक मनोरंजन ।

इएह कारणेँ  राष्ट्र-चिड़ै कहि,

पाक  करैतछि अभिनन्दन ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* * - मैथिली सहित समस्त भारतीय साहित्यमे चान आ चकोरक उपमा-उपमेय रूपी उदाहरण प्रसिद्ध अछि । ओहने एकटा गीत केओ भाइसाहेब गाबैत छलाह आ ताहि पर आँगनक छोट मुदा नटखट भाए-बहीन सभक ई कटाक्ष भरल उक्ति अछि । ओ सभ गीतक भाव नञि बूझि शाब्दिक अर्थकेँ ध्यानमे राखि कटाक्ष कऽ रहल अछि जे चकोरक तँऽ सौंसे देहमे खाली पेटे छै तखन भाइजी ओकरा अपनासँ तुलना कोना कऽ रहल छथि; शायद भाइजी कहियो चकोर नञि देखने छथि ।

* - मैथिली सहित समस्त भारतीय साहित्यमे चान आ चकोरक जे खिस्सा-पिहानी बताओल गेल अछि से बस साहित्यिक प्रलाप थिक । ओहिमे वास्तविकता लेशमात्रो नञि अछि ।

* - बटेर आ तित्तिर जेकाँ चकोर केर लड़ाएब सेहो किछु समुदायमे प्रसिद्ध अछि । तेँ ओ मनोरंजक पक्षीक श्रेणीमे आबैत अछि । पाकिस्तानक ओ राष्ट्रिय चिड़ै अछि ।

 

 

हंसक या जलपद (बाल कविता)

 

हंसक जलपद मैथिली Goose Geese Gander Maithili 1.1.jpg

 

हम हंसक, जलपद सेहो कहबी,

लोक  तँऽ  हमरो  हंस कहैए ।*

हंस  भेल  भारतसँ  अलोपित,

लोक  तँऽ  हमरे  हंस बुझैए ।।*

 

हंस ओ  बत्तख  दुहुक  बीचमे,

हमरहि  तँऽ  स्थान   आबैए ।

की बेजाए  हंसहि सनि  हमरो,

जगमे जञो सम्मान  भेटैए ??

 

ओहुना  जगमे  कहाँ कतहु छै,

“नीर - क्षीर - विवेकी”  हंस ? *

ग्रीवक  वक्रता  आ  आकारकेँ,

बिसरि जाइ तँऽ  छीहे  हंस ।।*

 

ओहुना हंसक  प्रतिनिधि रूपमे,

हमरहि  अहँ  सब  बूझी हंस ।

ने विशिष्ट तँऽ,  व्यापक अर्थमे,

हमरा  मानि  सकै  छी  हंस ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* -  आकार-सुकार आ आन गुणधर्मक आधार पर “हंसक” समूहक जलीय पक्षी “हंस” तथा “बत्तख” केर बीचक जैव श्रृंखलामे अबैछ । तेँ साहित्यमे बहुधा स्पष्ट नामकरण ओ वर्गीकरणक अभाव देखल जाइछ आ उपरोक्त तीनू शब्द भ्रामक रूपेँ परस्पर पर्यायी जेकाँ प्रयुक्त होइत आयल अछि ।

* - भारतमे (विशेष कऽ पुबारी भारत ओ नेपालमे) कतेको सए किंवा हजार वर्षसँ हंसक प्रवास नञि होयबाक कारण उपरलिखित तथ्य क्रमशः आओरो बलगर होइत गेल अछि ।

* - नीर-क्षीर विवेकी हंस अर्थात दूध आ पानिकेँ फेंटला पर पृथक करएबला हंस विश्वमे कतहु नञि होइत अछि । ई मात्र साहित्यिक गल्प थिक, वास्तविकता नञि ।

* - ग्रीवा सुरेबगर वक्रता आ देहक आकारकेँ जँ छोड़ि देल जाए तँऽ हंस ओ हंसकमे बेसी अन्तर नञि ।

* - ओहुना सम्पुर्ण भारतीय उपमहाद्वीपमे वास्तविक “हंस” केर अनुपस्थितिक कारण सैकड़ों बरखसँ प्रतिनिधिस्वरूप हंसकेकेँ हंस मानल जाइत रहल अछि

 

चकबा या चकेबा (बाल कविता)

 

चकबा चकेबा मैथिली Ruddy shelduck Maithili 3.2.jpg

 

साम - चक, साम - चक, चक माने की ? *

चकसँ  चकेबा − से  बुझही ।।

 

चकबा - चकेबा एक्कहि बात ।

संस्कृतमे  कहबए  चक्रवाक ।।*

 

एकरे नाम छी ब्राह्मिणी हंस ।

कर अबाज जेना करइछ हंस ।।*

 

चक्रबद्ध निकसए छै अबाज ।

तेँ   कहबैछ  ओ  चक्रवाक ।।*

 

सामा दाइकेँ  पड़लन्हि  श्राप ।

तेँ ओ भए गेलीह  चक्रवाक ।।*

 

ई छी एकटा  चिड़ै केर नाम ।

बसए  चिड़ै जे  दोसर ठाम ।।*

 

उत्तर - भर  ठण्ढा  जे प्रदेश ।

ततहिसँ आबए  अपना  देश ।।*

 

ठण्ढीमे  आबए  एहि   ठाम ।

शान्त जलाशय  कर विश्राम ।।

 

कोशीक कछेड़,  कोशी  बैराज ।

एकर  प्रिय - स्थली - प्रवास ।।*

 

कहुखन  बड़का  पोखरि बीच ।

पानिमे  बत्तख सनि  ई जीव ।।*

 

रातिमे   विचरए    सर्वाहारी ।

लोल पछलुका पाँखि छै कारी ।।*

 

स्वर्णिम बिचला देह आ पाँखि ।

उज्जर  गर्दनि  कारी  आँखि ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - संदर्भ पाँती − “साम-चक, साम-चक अबिहऽ हे” − मिथिलाक विशिष्ट पाबनि “सामा - चकेबा”सँ । एहि पाबनिक कथामे सामा दाइ श्रापक कारण चकेबा चिड़ै भऽ गेल छलीह ।

* - तत्सम “चक्रवाक” केर तद्भव रूप अछि “चकबा” या “चकेबा”

* - हंस सनि आबाज निकालबक कारण एकरा संस्कृत साहित्यमे “ब्राम्हिणी हंस” सेहो कहल गेल अछि ।

* - चकेबाक ई हंसवत आबाज चक्रबद्ध रूपमे नकलैत अछि (A SERIES OF LOUD NASAL HONKING NOTES/CALL) तेँ संस्कृतमे एकर नाम पड़ल “चक्रवाक” (चक्र = चक्रबद्ध तथा वाक् = बोल/आवाज) ।

* - मिथिला सहित सम्पुर्ण भारतवर्षमे चकेबा प्रवासी पक्षी (MIGRATORY BIRD) केर रूपमे आबैत अछि । एकर मूल स्थान उतरबारी एशिया (रूसक साइबेरिया क्षेत्र) आ दच्छिन-पूब यूरोप अछि जाहि ठाम सालहु भरि भारतक अपेक्षा मौसिम ढण्ढा रहैत अछि । ठण्ढीक समयमे ओहि क्षेत्रसभमे असहनीय ढण्ढी पड़बाक कारण ई चिड़ै पड़ाए कऽ वा प्रवास कऽ हिमालय केँ नाँघि भारतीय उपमहाद्वीपमे आबैत अछि आ एहि ठामक पैघ ओ मीठ पानिक जलाशयसभमे, वा शान्त बहैत नदीक कछेड़ वा बाढ़िक पानिसँ बनल दलदली क्षेत्रसभमे देखल जा सकैत अछि । नेपाल स्थित कोशी-बैराजमे कोनहु एक समयमे एहि चिड़ै केर उपस्थिति चारि हजार (4000) धरि देखल गेल अछि ।

* - पानिमे हेलैत काल ई स्वर्णाभ-पीयर पाँखियुक्त बत्तख सनि लागैत अछि । कहुखन - कहुखन सिल्ली जेकाँ सेहो लागैत अछि पर चकेबा आ सिल्ली दुहु दू चिड़ै केर नाम थिक ।

* - एकर लोल आ पछिला नाङ्गरि परहक पाँखि कारी होइत अछि । शेष पाँखि ऊपर सँ स्वर्णाभ-पीयर आ भीतरसँ उज्जर होइत अछि । वक्ष तथा उदर सेहो स्वर्णाभ-पीयर रहैत अछि । माथ, गर्दनि आ मुख्य पंखक पछिला हिस्सा प्रायः उज्जर सनि रहैत अछि ।

नाङ्गरि/लाङ्गरि आ नाङ्गर मैथिलीमे श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द अछि -

·        नाङ्गरि/लाङ्गरि - पूँछ (TAIL)

·        नाङ्गर - प्रायः एक पएरसँ विकलाङ्ग (HEMIPARESIS / HEMIPARALYSIS / HEMIPLEGIC); दुहु पएरसँ विगलाङ्ग तथा चलबा वा ठाढ़ हएबामे असमर्थ “लोथ” (PARAPARESIS / PARAPARALYSIS / PARAPLEGIC) कहल जाइत अछि ।

 

बत्तख (बाल कविता)

 

बत्तख मैथिली DUCK TEAL MAITHILI 3.jpg

 

हंस आ हंसकसँ हम छोट ।

ओकरा सभसँ कम्मे मोट ।

तइयो उड़ि नञि  पाबैत छी ।।*

 

हमरामे  बहुते वैविध्य ।

बेसीतर  नहिञे  उड़ैछ ।

जलक्रीड़ा  केर  आदति छी ।।*

 

नञि उड़ैछ बत्तख संज्ञा ।

जँ उड़ैछ  हंसक उपमा ।

उड़बासँ  हंस  कहाबैत छी ।।*

 

चितकाबर उज्जर कारी ।

पीयर  भूरा  मटियाही ।

पएर  पीयर - नारंगी  छी ।।*

 

पानिमे हेलएमे माहिर ।

डुम्मी काटएमे माहिर ।

उड़बा केर बदला इएह सही ।।*

 

अंडा छी कम्मे स्वादिष्ट ।

पर बूझू  बहुते पौष्टिक ।

तेँ अहँ पोषैत - पालैत छी ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - हंस ओ हंसक केर तुलनामे बत्तख बहुत छोट आ हल्लुक होइत अछि पर तइयो बेसीतर बत्तख उड़ि नञि पाबैत अछि ।

* - अंग्रेजीक DUCK शब्द केर क्षेत्र बहुत व्यापक अछि; तहिना मैथिलीक “बत्तख” केर क्षेत्र सेहो । एकर अन्तर्गत कतेको वंशक जलीय पक्षीक बहुतो जाति ओ प्रजाति आबेत अछि जाहिमे बेसीतर नञि उड़ि सकैत अछि ।

* -  DUCK या “बत्तख” शब्दक अन्तर्गत आबए बला बेसीतर चिड़ै उड़ि नञि पाबैत अछि । पर एकरहि अन्तर्गत उपविभाग SHELDUCK मे आबए बला चिड़ै नीक उड़ान भरैत अछि आ प्रवासी प्रकृतिक होइत अछि । मैथिलीमे प्रायः नञि उड़ि सकए बला DUCK केँ “बत्तख” कहल जाइत अछि पर उड़ए बला DUCK केँ व्यापक स्वरूपमे “हंस” कहि देल जाइत अछि । एहेन किछु DUCK  केर लेल मैथिलीमे विशिष्ट नाम सेहो अछि, यथा - चकेबा, सिल्ली आदि ।

* - देहक रंग जे हो पर अपना दिशि प्रायः बत्तखक पएरक रंग पीयर वा नारंगी सनि होइत अछि ।

* - ओना तँऽ प्रायः हर बत्तखमे कमोबेश हेलबाक आ गोंता लगएबाक क्षमता होइत अछि, पर समुद्री परिवेशमे भेटए बला बत्तख बहूत गँहीर गोंता लगाबएमे माहिर होइत अछि ।

* - जे केओ अण्डा खाइत छथि तनिका कथनानुसार बत्तखक अण्डा मुर्गीक अण्डाक अपेक्षा कम स्वादिष्ट होइत अछि । यूनानी आ पारम्परिक चिकित्सामे एकरा विशेष पौष्टिक ओ औषधीय गुण सम्पन्न मानल जाइत अछि ।

 

 

पपीहा (बाल कविता)

 

पपीहा मैथिली Common Hawk Cuckoo Hierococcyx varius Brainfever bird Maithili 2.jpg

 

पपीहा, देखू देखि रहल अछि पपीहा ।

पपीहा, जा कऽ सभसँ कहत पपीहा ।

पपीहा, देखू  चुप नञि रहत पपीहा ।*

पपीहा, मुदा  केहेन  होइछ पपीहा ??

 

कू - कू - कू - कू  कोइली गाबए ।

पी - पी   पपीहा  राग  अलापए ।

किछु कोइली सनि  लागि रहल ओ,

लोल  बाज केर  भ्रम  उपजाबए ।।*

 

बहुत किछु कोइलीसँ मिलए पपीहा ।

लागए खन एक्के कोइली - पपीहा ।

बहुत  केओ  कह  पर्याय  पपीहा ।

मुदा छी अलगे  कोइली - पपीहा ।।*

 

भरण-परजीवी  कोइली सनि ओहो ।

आन  चिड़ैकेँ  धोखबै  छै   ओहो ।

अपन  ने  खोंता  बनबै  छै  आ,

अनकहि खोंता  अण्डा दैछ ओहो ।।*

 

बहुत  धोखेबाज  चिड़ै छै  पपीहा ।

केवल  नर  गाबए  गीत  पपीहा ।*

गीत,  धोखा  केर  गीत  पपीहा ।*

अहाँ देखितहुँ  ने चिन्हब पपीहा ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - ई तीनू पाँती एक टा पुरान हिन्दी फिल्मी गीतक मैथिली अनुवाद थिक । फिल्मक नाम छल “फरियाद” जे सन ‍१९६४ ई॰मे बनल छल । एहि गीतमे कहल गेल बातकेँ वास्तविकतासँ कोनहु सम्बन्ध नञि थिक । पर मोनमे एक टा जिज्ञासा अवश्य होइत अछि कि आखिर ई “पपीहा” नामक चिड़ै देखबामे केहेन होइत अछि ।

* - कोइली आ पपीहा एक्कहि परिवारक चिड़ै अछि । दुनुकेर आवाज मनुक्खक लेल कर्णप्रिय थिक । पपीहा केर लोल “बाज” नामक चिड़ै जेकाँ आगाँसँ मुड़ल होइत अछि तेँ अंग्रेजीमे एकरा HAWK CUCKOO  कहल जाइत अछि ।

* - बहुत लोक कोइली आ पपीहाकेँ एक-दोसराक पर्यायी नाँओ बुझैत छथि पर से नञि - दुहु भिन्न चिड़ै थिक ।

* - सभ प्रकारक कोइली आ पपीहा शिशु-भरण परजीवी (BROODING PARASITE) होइत अछि । ओ अपन अण्डा कौआ, करिया धनछुआ, धनछुआ या एहि तरहक आन चिड़ैसभक खोंतामे दैत अछि जे कि शिशु-भरण पोषक (BROODING HOST) केर भूमिका निमाहैत अछि । शिशु-भरण परजीवी अपन अण्डा चोड़ा-नुका कऽ शिशु-भरण पोषकक खोंतामे दऽ दैत अछि आ शिशु-भरण पोषक अपन अण्डाक संग-संग परजीवीक अण्डाकेँ सेहो सऐत अछि, अण्डासँ बच्चाकेँ निखालेत अछि आ खोअबैत-पिउपैत अछि । उड़बा जोकर भेलापर परजीवी कोइली या पपीहाहक बच्चा अपना-अपना झुण्डमे भागि जाति अछि आ ताहि बच्चाकेँ भागि गेला पर स्त्री/मादा कौआकेँ उदास होइत सेहो देखल गेल अछि ।

* - नर/पुरुष कोइली जेकाँ केवल नर/पुरुष पपीहा “पी - पी” केर आवाज निकालैत अछि, मादा/स्त्री पपीहा नञि ।

* - पपीहा “पी - पी” केर आवाज वास्तवमे कौआ आदि केँ खौंझएबाक लेल निकालैत अछि । कौआ खौंझा कऽ अपन खोंता छोड़ि नर/पुरुष पपीहाकेँ खेहाड़ैत अछि आ ताहि बीचमे मादा/स्त्री पपीहा अपन अण्डा ओहि कौआक खोंतामे धऽ दैत अछि । कोइलीक “कू - कू” केर आवाज सेहो इएह तरहक आवाज अछि ।

* - कएक बेर पपीहा सामने रहितो अछि तँऽ साधारण लोक ओकरा नञि चीन्हि पाबैत अछि, ओकरा “बाज” बुझबाक धोखा कऽ बैसैत अछि ।

पपीहा, कोइली आ मएना भूआ खाए मे माहिर (EXPERT) होइत अछि । ओकरा बूझल रहैत छै कि भूआ (CATERPILLARS / CATERPILLAR LARVAE) केर कोन भाग विषाह छै । भूआक विषाह भागकेँ ओ अपन चाङ्गुरसँ दाबि कऽ आ गाछक ठोस डाढ़ि पर रगरि कऽ हटा दैत छै आ खा जाइत अछि ।

सिल्ली (बाल कविता)

 

सिल्ली मैथिली lesser indian whistling duck teal maithili 8.jpg

 

झुण्डक - झुण्ड आबै छै, उतरए पोखरि - डबरा - खत्ता ।

सर्वेक्षण कऽ  पहिने  देखैछ,  कत्तऽ  मनुक्ख  निपत्ता ।।*

 

जाहि ठाम  मनुखक सञ्चर,  ने उतड़ए ओ ताहि ठाम ।

आबादीसँ   दूर   जलाशय,   ठण्ढी - सिल्ली - धाम ।।

 

उतड़ए  शान्त जलाशय,  खेलए - कूदए - भूख मेटाबए ।

कनिञे कालमे  उड़ए झुण्ड,  ताकए फेर नऽव जलाशय ।।

 

बत्तख सनि  लागए धरती पर,  दूर - गगन पानिकौआ ।

सिल्ली  हेंजक-हेंज आबैछ,  एकसरि प्रायः  पानिकौआ ।।*

 

मिथिलामे  बुझले अछि सभकेँ,  जीहक  बड़  चटकार ।

मांसु लेल  सिल्ली केर होइतछि,  गामे - गाम शिकार ।।

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - पानिकौआ आ सिल्ली दुहु चिड़ै पानिमे उतड़बासँ पहिने पूरा क्षेत्र केर आकाशीय सर्वेक्षण करैत अछि आ मनुक्खसँ सुरक्षित दूरी देखलाक बादे पानिमे उतरैत अछि । ई सर्वेक्षण एक वा एकाधिक बेर ताहि क्षेत्रविशेषक चक्कर काटि कऽ कएल जाइत अछि । पानिकौआ ई सर्वेक्षण प्रायः एकल स्वरूपमे करैत अछि जखनि कि सिल्ली सामुहिक रूपसँ ।

* - पानिमे हेलैत काल सिल्ली बत्तख सनि लागैत अछि जखनि कि आकाशमे उड़ैत काल पानिकौआ सनि । पर बत्तख एतेक ऊँच कखनहु नञि उड़ैत अछि आ पानिकौआ एतेक पैघ झुण्डमे कहियो नञि देखाई दैत अछि ।

 

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पानिकौआ या पानिकौर (बाल कविता)

 

पानिकौआ पानिकौर मैथिली cormorant shag maithili 2.jpg

 

पाछाँ कौआ सनि छै कारी,  या कारी नर कोइली सनि ।

आगाँ ककरो कारी - उज्जर, या छाउरक छै रंग जेहेन ।।*

 

कोनो जलाशय,  जतऽ मनुक्खक,  आबाजाही कम हो ।

ताहि भीड़*लग, गाछ बाँस पर, पानिकौआ हरदम हो ।।

 

आँखि गड़ओने, पोखरिक पानिमे, बैसल एकटक ताकए ।

देखिते माछ, ओ आबए चट दऽ,  लूझि लोलमे भागए ।।

 

बहुधा  माछ पकड़बा लए ओ,  पानिमे  गोंता  मारए ।

भीजल पाँखिकेँ, ऊँच गाछ पर,  फोलि हवामे सुखाबए ।।*

 

पानिमे  हेलबासँ  पहिने,  ओ  करैछ  क्षेत्र  सर्वेक्षण ।

दूरी उचित मनुक्खसँ तखनहि,  पानिक बीच पदार्पण ।।*

 

कारी हंस वा बत्तख सनि ओ,  पानिमे हेलैत  लागैछ ।

मनुखक आहटि दूरहुसँ जँ,  चट दऽ उड़ि कऽ भागैछ ।।

 

जलकर - माछक व्यवसायीकेँ,  करैछ बहुत नोकशान ।

बान्हि छकाबए करिया पन्नी,  बूझए  उतड़ल  आन ।।*

 

एहि धरती केर एक द्वीप पर,  पानिकौआ छी एहनो ।

उड़ि ने सकै ओ पंख अछैतो, उड़ै छल पहिने कखनो ।।*

 

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - पानिकौआ (उच्चारण - पैनकौआ) या पानिकौर (उच्चारण - पैनकौर) केर पछिला भाग (पीठ दिशका भाग) भीजल रहला पर एकवर्णी कौआ सनि कारी लागैत अछि जखनि कि सुखाएल रहला पर कारी तँऽ अवश्ये रहैत अछि पर कारीक मात्रामे तर-तम भाव बुझना जाइछ । अगिला भाग (पेट दिशका भाग) कोनहु प्रजातिमे कारी, कोनहुमे उज्जर वा कोनहुमे छाउरक रंग सनि कारी होइत अछि । लोल सेहो छाउरक रंग सनि होइत अछि ।

पानिकौआ पानिकौर मैथिली cormorant shag maithili.jpg

* - भीड़ - ई शब्द मैथिलीमे अनेकार्थक अछि -

·        भीड़ - पहिल अर्थ भेल “मेला-रेला” या “जनसमूह”

·        भीड़ - दोसर अर्थ भेल “पोखरिक भिण्डा”

एहि ठाम दोसर अर्थ (भिण्डा) अभिप्रेत अछि ।

* - पानिकौरक लेल पानिसँ भीजल अपन पंखकेँ सुखाएब आवश्यक थिक । ताहि हेतु ओ कोनहु गाछक ऊँच डाढ़ि पर वा बाँसक छुपुङ्गी पर अपन पंखकेँ पसारि कऽ बैसि जाइत अछि आ हवामे ओकरा सुखबैत अछि ।

पानिकौआ पानिकौर मैथिली cormorant shag maithili 4.2.jpg

* - पानिकौआ आ सिल्ली दुहु चिड़ै पानिमे उतड़बासँ पहिने पूरा क्षेत्र केर आकाशीय सर्वेक्षण करैत अछि आ मनुक्खसँ सुरक्षित दूरी देखलाक बादे पानिमे उतरैत अछि । ई सर्वेक्षण एक वा एकाधिक बेर ताहि क्षेत्रविशेषक चक्कर काटि कऽ कएल जाइत अछि । पानिकौआ ई सर्वेक्षण प्रायः एकल स्वरूपमे करैत अछि जखनि कि सिल्ली सामुहिक रूपसँ ।

पानिकौआ पानिकौर मैथिली cormorant shag maithili 6.4.jpg

* - पानिकौआ आ सिल्ली दुहु माछ खाइत अछि आ तेँ व्यावसायिक रूपेँ माछ पोषनिहार लोकक लेल हानिकर अछि । तेँ ओसभ डोरीमे बीच-बीचमे करिया पन्नीकेँ (पॉलीथीन) बान्हि पोखरिक एक भीड़सँ दोसर भीड़ धरि टाँगि दैत छथि । आकाशीय सर्वेक्षण करए काल पानिकौआ आ सिल्ली एकरा पहिनेसँ उतरल आन पानिकौआ या सिल्लीक समूह बूझि धोखा खाए जाइत अछि आ ओहि जलाशयक पानिमे नञि उतड़ैत अछि ।

पानिकौर - पानिकौआ केँ छकएबाक प्रबन्ध ४।३.jpg

* - प्रशान्त महासागरक (GALAPAGOS ISLANDS) गॅलापॅगॉस द्वीपसमूह पर पानिकौरक एक टा एहेन प्रजाति थिक जकरा पाँखि तँऽ छै पर ओ उड़ि नञि सकैत अछि । मतलब कि उड़नाइ बिसरि गेल अछि आ तेँ ओकर पंख बहुत छोट भऽ गेल छै आ देह भारी । एकरा  गॅलापॅगॉस पानिकौआ या गॅलापॅगॉस पानिकौर (GALAPAGOS CORMORANTS) कहल जाइत अछि । एकर वैज्ञानिक नाँओ फॅलॅक्रॉकॉरेक्स हॅरीसी (Phalacrocorax harrisi) थिक ।

 

कठखोद्धी या कठखोधी (बाल कविता)

 

कठखोद्धी कठखोधी मैथिली Black Rumped Flameback Woodpecker Maithili 3 Ss.jpg

 

काठ  खोधै छै  अपना  लोलसँ,

कहबै   छै    तेँ    कठखोद्धी ।

जे धरती  पर  माटि  खोधै  छै,

से  ने  बुझियौ   कठखोद्धी ।।

 

काठ  खोधि   बनबइए  धोधरि,

गाछे  -  गाछे    कठखोद्धी ।

गाछे  नञि  लकड़ीक  उपस्कर,

खाम्हो   खोधैछ  कठखोद्धी ।।

 

माटिखोद्धी   केर  पातर  लोल,

कठखोद्धी   केर   मोट   छै ।

माटिखोद्धी केर  नमगर  लोल,

कठखोद्धीक  किछु  छोट छै ।।

 

माटिखोद्धी केर  माथक कलगी,

पीयर  आओर   विभक्त   छै ।

कठखोद्धी  केर  लाले   टुहटुह,

जँ  छै   तँऽ   संशक्त   छै ।।*

 

पीठ - पाँखि पर स्वर्णिम पीयर,

मूल   रंग   चितकाबर   छै ।

अपना  ठाँ  इएह  बेसी  भेटत,

जगक विविधता  व्यापक छै ।।*

 

चिड़ै छै पर गाछहु पर ओ तँऽ,

सरपट   दौड़ै - भागै    छै ।*

नाङ्गरिकेँ ओ आड़* बना कऽ,

टिका  गाछ  पर  बैसए छै ।।

 

लोलसँ ठक-ठक करइत गाछमे,

धोधरि   सेहो   बनाबै   छै ।

अपनहु  ओहिमे  बास  करैए,

आ   दोसरोकेँ   बसाबै  छै ।।*

 

काठक   अन्दरमे   जे  कीड़ा,

परजीवी   बनि   पैसल  छै ।

तकरा खा कऽ  पेट  भरए  ओ,

गाछक  जिनगी   बढ़बै  छै ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - माटिखोद्धी केर माथक कलगी नारंगी-पीयर रंगक ओ अरीय रूपसँ विभक्त होइत अछि । जखनि कि आपना दिशि सामान्य रूपसँ भेटए बला कठखोद्धीक माथक कलगी लाल रंगक होइत अछि आ माटिखोद्धीक कलगीक तुलनामे संशक्त होइत अछि । विश्वक आन भाग मे पाओल जाए बला कठखोद्धीक किछु प्रजातिमे या तऽ कलगी नञि होइत अछि या आन रंगक सेहो होइत अछि ।

* - विश्वमे कठखोद्धीक बहुत तरहक बगए-बानी अछि पर अपना दिशि बेसीतर एहने भेटैछ ।

* - चिड़ै होयबाक बावजूदो ई गाछ पर उदग्र रूपेँ (VERTICALLY) तेजीसँ दौड़ि सकैत अछि । ई एकर विशेषता अछि ।

* - आड़ = गाछ पर अपनाकेछ एक स्थान पर बेसी काल टिकएबाक लेल आ काठ खोधए काल देह हिलए-डोलए नञि ताहि हेतु कठखोद्धी अपन नाङ्गरिकेँ मजगूत आड़ जेकाँ उपयोगमे आनैत अछि ।

* - माटिखोद्धी गाछमे वा काठमे धोधरि नञि बनबैत अछि जखनि कि कठखोद्धी बनबैत अछि । ओहि धोधरिमे पहिने अपने रहैत अछि आ बादमे छोड़ि देला पर ओहि परित्यक्त धोधरिकेँ आन चिड़ै (जेना कि - सुग्गा) वा दोसर कोनहु जीव ओकरा अपन खोंता या घऽरक रूपमे प्रयोग करैछ ।

* - गाछक अन्तः परजीवीक (ENDO PARASITES) रूपमे जे कीड़ा-मकोड़ा गाछमे घुसल रहैत अछि आ गाछक लेल नोकशानदायक होइछ तकरा आ तकर अण्डा ओ बच्चाकेँ कठखोद्धी खा जाइत अछि । एहि तरहेँ कठखोद्धीक पेट भड़ैत अछि आ संगहि गाछ सभक आयुर्दा बढ़ैत अछि ।

 

 

पानिडुब्बी या मछरेंगा (बाल कविता)

 

पानिडुब्बी मछरेंगा मैथिली kingfisher maithili 7.jpg

 

मत्स्यरंक संस्कृतक छी हम, अंग्रेजीक किंगफिशर ।

पानिडुब्बी सभ लोक कहैए, मिथिला माटिक ऊपर ।।*

 

मछरेंगा सेहो हमरे नाम छी, संस्कृतहिसँ निकलल ।

दच्छिन-पूब विदेहक भू पर, नाम ईहो अछि भेटल ।।*

 

नील-हरित छी पीठ-पंख,  आ श्वेत श्याम वक्षोदर ।

लाल-नारंगी चटक रंग सेहो,  बीचमे फेंटल फाँटल ।।*

 

लाल-नारंगी-कत्थी-कारी,  चटक रंग  छी  लोलक ।

कायक तुलना पैघ लोल छी,  से अपनहुँकेँ बूझल ।।*

 

कएटा जाति-प्रजाति हमर,  सौंसे संसारमे पसरल ।

पर मिथिलासहिते भारतमे,   बेशी  एहने  भेटत ।।*

 

माछ प्रिय हमरा छी बहुत,  तेँ एहने सभटा नाम ।

बेरि - बेरि काटी हम डुम्मी,  पानिडुब्बी तेँ नाम ।।*

 

कोनहु जलाशय नहरि-नदी  वा पोखरि-डबरा-खत्ता ।

काते-काते  बैसल देखब,  झुकल गाछ वा खुट्टा ।।

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - मैथिलीमे एकर दू टा नाम अछि । पहिल अछि “पानिडुब्बी चिड़ै” (उच्चारण - पैनडुब्बी) जे कि माछ पकड़बा लेल बेर - बेर गोंता लगएबाक (वा झपट्टा मारबाक) कारण पड़ल होयत । दोसर पर्यायी नाम अछि “मछरेंगा” जे कि सम्भवतः संसकृत नाम “मत्स्यरंक” केर तद्भव रूप थिक ।

* - एकर किछु प्रजातिमे लालछौंह पीयर वा नारंगी रंग सेहो भेटैछ आन किछु प्रजातिमे नञि ।

* - पूरा शरीरक तुलनामे एकर लोल बेस नमगर, मोट आ ठोसगर बुझना पड़ैछ ।

* - विश्वमे पानिडुब्बी चिड़ै केर कएक टा जाति - प्रजाति पाओल जाइत अछि जाहिमे कोनहु पीयर रंगक तँऽ कोनहु नारंगी, कोनहु भूरा तँऽ कोनहु चितकाबर रंगक सेहो होइत अछि ।

माटिखोद्धी या माटिखोधी (बाल कविता)

 

माटिखोधी माटिखोद्धी मैथिली HOOPOE MAITHILI 1.jpg

 

बैसल - बैसल  माटि  खोधै छेँ,

माटिमे  की  तोँ  ताकै   छेँ ?

गाछ लोलसँ ठक - ठक करइत,

कठखोद्धी  सनि  लागै  छेँ ।।*

 

हम ने  अनेरो  माटि खोधै छी,

कीड़ा − खएबा लेल  तकै छी ।

गाछक छालकेँ खोधि-खाधि कऽ,

सेहो  अपन आहार  तकै छी ।।*

 

काठ खोधि  ने  धोधरि  बनबी,

कठखोद्धीसँ  भिन्न छी  हम ।*

हमर लोल  पातर - नमगर छी,

माटि खोधक  उपयुक्त जेहेन ।।*

 

माथ - वक्ष - गर्दनि छी  पीयर,

पीयर - नारंगी  अछि  कलगी ।

खोधए काल माटि − पंखा सनि,

शोभए  माथ  हमर  कलगी ।।*

 

पछिला भाग पाँखि आ नाङ्गरि,

श्वेत - श्याम   एकान्तर  छी ।

कठखोद्धी  देखब ने  माटि पर,

हमरा - ओकरामे  अन्तर छी ।।*

 

संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - नमगर आ पातर लोलसँ माटि वा गाछक अलगल छाल पर बेरि - बेरि आघात करबाक कारण अपना दिशि सामान्य लोक एकरा प्रायः कठखोद्धी बूझि लैत अछि ।

* - माटिखोद्धी माटिक तऽरसँ आ गाछक छालक भीतरसँ कीड़ा-मकोड़ा आ ओकर अण्डा बच्चाकेँ ताकि कऽ खा जाइत अछि ।

* - माटिखोद्धी गाछक छालक भीतरसँ मात्र कीड़ा-मकोड़ाकेँ ताकि भक्षण करैत अछि; कठखोद्धी जेकाँ काठकेँ खोधि कऽ धोधरि नञि बनबैत अछि ।

* - माटिखोद्धीक लोल कठखोद्धीक लोलक अपेक्षा बहुत पातर आ नमगर होइत अछि जे किछु नम (भीजल) माटि आ गाछक अलगल छाल खोधबाक लेल विशेष उपयुक्त अछि नञि कि मजगूत काठ खोधबाक लेल ।

* - माटिखोद्धीक माथ पर नारंगी-पीयर रंगक कलगी (CROWN) होइत अछि । ई कलगी मुर्गाक कलगी जेकाँ अविभक्त नञि भऽ कऽ अरीय ढंगसँ (RADIALLY) विभक्त वा खण्डित रहैत अछि । माटि खोधबा काल ई कलगी पंखा जेकाँ फुजि जाइत अछि (FANNING) वा पसरि जाइत अछि ।

* - माटिखोद्धीक पछिला भाग पर एकान्तर क्रममे कारी आ उज्जर रंगक पट्टी रहैत अछि । माटिखोद्धी जेकाँ कठखोद्धीकेँ माटि खोधैत नञि देखब ।

  

 

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