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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक बालानां कृते

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१६. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

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बालानां कृते

विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम

भाषापाक

केदार कानन

सहज आ मिलनसार छलाह रेणुजी

 

 

ओ रमानंद लाल दास छलाह जे लेखनमे रमानंद रेणु भेलाह। सुपौल जिलासँ सटल उसमामठक निवासी। आरंभिक रचना सभ हुनक गीत विधामे हमरा सभकेँ प्राप्त होइत अछि। बादमे ओ नवकवितासँ जुड़लाह आ एहि विधाकेँ श्रीसंपन्न कएलनि। गद्य लेखनमे जखन उतरलाह तँ कथा आ उपन्यास विधामे प्रचुर लेखन कएलनि। हुनक लेखनक समालोचना तँ समालोचक आ आलोचक करताह मुदा हम मानैत छी जे ओ वास्तविक अर्थमे एक श्रेष्ठ मनुख छलाह। सहज-सरल आ मिलनसार। हुनक व्यक्तित्व आकर्षक छल।

रेणुजी मैथिलीमे पहिल एहन लेखक भेलाह जे राजकमल चौधरीक बंगलाक चर्चा कएलनि। 1967 मे, फरवरी मासमे  सुपौलमे आयोजित नवकविता सेमिनारमे ओ भाग लेने छलाह। प्रायः हमरा सभकेँ बूझल अछि जे इएह सेमिनार राजकमल चौधरीक अंतिम सेमिनार साबित भेल। फरवरी मासमे सुपौलमे  संपन्न भेल ई ऐतिहासिक द्विदिवसीय समारोह अनेक अर्थमे महत्वपूर्ण छल। एहि समारोहक (कविगोष्ठीक) अध्यक्षता राजकमले केने रहथि। एहि वर्षक जूनमे राजकमल हमरा सभकेँ छोड़ि अनंत अकाशमे नुका गेलाह। सुपौलक समारोह समाप्त भेलाक बाद राजकमल अपन कुछु लेखक मित्रकेँ अनुरोधपूर्वक अपन गाम महिसी लऽ गेल छलाह। ओहिमे रमानंद रेणु सेहो रहथि। राजकमलक अपन प्रभामंडल छल। अपन चमक, अपन व्यक्तित्व आ अपन बहुआयामी प्रतिभाक कारणे सभ हुनकासँ जुड़ऽ चाहैत छल। जखन ई लोकनि महिसी पहुँचलाह तँ हिनका सभक भव्य स्वागत कएल गेलनि। रमानंद रेणु, जीवकांत, कीर्तिनारायण मिश्र आदिक संग राजकमल तृप्त रहथि। पहिल बेर ओहि बंगलाक चर्चा रमानंद रेणु कएलनि जे महिसीमे "फूल बाबनूक बंगला' नामे ख्यात छल। ओहि फैघि सन गाममे अपना तरहक ई विशिष्ट आ मनोहारी बंगला राजकमल बहुत मनोयोगसँ बनबौने छलाह। सुनैत छी जे अज्ञेय ओहि भंगलाक गृहप्रवेशक अवसरपर उपस्थित रहथि से राजकमलक इच्छा रहनि। अनेक इच्छा जकाँ राजकमलक ईहो इच्छा हुनका संग चलि गेलनि।

तँ कहैत रही जे राजकमलक ओहि बंगलाक चर्चा पहिल बेर रमानंद रेणुजी केने रहथि जखन राजकमलक आतिथत्यक बाद ई लोकनि अपन-अपन गाम घुरल रहथि। ई लेख संस्मरणक रूपमे राजकमलक मृत्यु 19 जून 1967 बाद "आखर" (कलकत्तासँ प्रकाशित)मे प्रकाशित भेल छल। "आखर" प्रकाशनक जड़ि सुपौले छल। एहिठामक सेमिनारमे आखरक प्रकाशनक योजना बनल छल। तकर एक सहभागी रेणुजी सेहो छलाह। महिसीमे, साँझमे तारास्थान दिस टहलैत अपन अतिथि लोकनिकेँ राजकमल बंगट मिसरक गायन सुनाबए चाहैत रहथि। एकरो चर्चा रेणु केने छथि बंगट झाक रूपमे। मुदा ओ बंगट मिसर छथि झा नहि। संयोग जे तारानंद वियोगी एखने दू-तीन सप्ताह पहिने सुपौल आएल रहथि तँ हमरा आ सुभाषचंद्र यादवकेँ बंगट मिसरक गायन ( जकरा ओ अपन मोबाइलमे टेपित केने रहथि) सुनौलनि। बंगट जी जिबैत छथि आ हुनक कार्यस्थल एखन सिंहेश्वर थिकनि जतऽ ओ प्रवचन आदि दैत छथि आ अपन गायन कलाक प्रयोग सेहो करैत छथि। हुनक मूल नाम थिकनि पंडित ताराकांत मिश्र। गामक नाम बंगट  मिश्र।

मोन पड़ैत अछि जे रेणुजीसँ भेंट करए जाइत रही तँ ओ अपन एक्सचेंज आफिसमे भेटैत छलाह। मोबाइल आ लैपटापक जमाना नहि छल। एक्का-दुक्का लोक लग चोंगा बला फोन रहैत छलनि। ओही एक्सचेंज आफिससँ फोन अथवा तार (टेलीग्राम) कएल जाइत रहै। ओ आफिसमे बहुत लोकप्रिय छलाह आ आनो स्टाफ सभ सम्मानक दृष्टियें हुनका देखैत रहनि। ओ कतबो व्यस्त रहथि, मोन अछि जे आफिससँ निकलि बिनु जलखै आ चाहक घुरए नहि दैत छलाह। कुशल-क्षेम आ हालचाल, गाम-घरक हाल-सूरति पुछैत रचनादिक विषयमे अवश्ये चर्चा करथि।

राय साहेबक पोखरि लहेरियासराय, बला घरोपर अनेक बेर हुनका ओतए जयबाक अवसरि हमरा भेटल रहए। ओ जतेक सिनेह आ आतुरताक संगे भेंट आ गप्प करैत छलाह से दुर्लभ छल। अत्यंत स्नेहिल आ मिलनसार। संवेदनशील तेहन जे जखन हुनक हेठ पुत्रक असामयिक निधन भऽ गेल रहनि तँ ओ अत्यंत मर्माहत स्थितिमे दीर्घ कविता ( जे "ओकरे नाम"सँ प्रकाशित भेल) लिखलनि, प्रायः एक्कै रातिमे वा एकै सप्ताहमे। बहुत दिन धरि ओ अवसादमे रहला। स्वाभाविक छल। मुदा साहित्य प्रतिकूलो स्थितिमे मनुखकेँ उबारैत अछि रेणुजी सेहो उबरलाह आ फेर साहित्य सृजनक अनंत श्रृखंलामे जुड़ि गेलाह।

मैथिलीमे अथवा कोनो साहित्यमे एकै टा दुख नहि छै। एकैटा समस्या नहि छै। अनेक दुख आ समस्यासँ रचनाकार संघर्षरत रहैत छथि। रेणुजी जतेक लिखलनि, नीक वा बेजाए एहिपर चर्चा के करत? ई एक पैघ प्रश्नचिन्ह थिक। जीवनक सभ किछुकेँ दोसर प्राथमिकता बूझि पहिल प्राथमिकता लेखनकेँ देबए बला लेखककेँ अन्ततः (अन्ततः नामसँ रेणुजीक एक कविता संग्रह सेहो छनि) की भेटैत छनि।

आवश्यक अछि जे रमानंद रेणुक साहित्यिक अवगाहन हो, ओकर मूल्याकंन हो, ओहिपर चर्चा ओ विमर्श हो, सेमिनार हो.... तखन पाठक हुनक हुनक रचना संसारक मर्म बूझि सकताह आ रेणुजीकेँ तखने वास्तविक रूपमे चीन्हि सकब।

 

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