प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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शैलेन्द्र मिश्र- संपर्क-7600744801

डॉ रामावतार यादव : मैथिली भाषा- साहित्यक असाध्य काज साधवला एकटा निष्काम कर्मयोगी 

 

मैथिलीक अकासमें उदीयमान नक्षत्र जेकां चमकैत डॉ यादवक पदार्पण कोनो चमत्कार सं कम नहि । मैथिली बड्ड सौभाग्यशाली छथि जे एक सं एक वरद-पुत्र के जननी छैथ आ ताहि से हुनकर ऐश्वर्य आ यश दिनों दिन बढ्ले जा रहल छैन्ह । व्यक्तिगत रूप सं हमरा हुनका सं एक्को बेर प्रत्यक्ष रूपसं भेंट नै अछि लेकिन टेलीफोन ,इ-मेल, व्हाट्सप्प आदिक माध्यमससं कतेको साल से हम  हुनकर लगातार संपर्क में छी तें इ नै बुझा रहल अछि जे हमरा हुनका सं भेंट नै अछि । तकर कारण कही त हुनकर मृदु स्वभाव ओ एकटा जागरूक अभिभावकक गुण, जौं यदि हम हुनका फोन केनाइ बिसरियो जाइ छि त ओ हमरा नै बिसरै छैथ एकटा नियमित अंतराल पर वार्तालाप होइत रहैया आ हुनका सं बहुत किछु सिखैत रहै छी । एतेक दिनक संपर्कक आधार पर यदि कही त आदरणीय यादव जीक मैथिली भाषा ओ साहित्यक प्रति माश्चर्य आ दायित्व भाव विरल छैन्ह।

    सुगौलीक संधि भलेही मिथिला के दु –खंड में बांटि देलक लेकिन दुनु भाग में एक –से –बढि विद्वान छैथ । जखन कखनो मैथिलीक चर्चा होइत छै त एखनो दुनु पार के समग्र आधार पर कोनो बात के देखल जाइ छै ।   डॉ यादवक कृति सं देखल जाय त हुनकर ख्याति मैथिलीक एकटा बहुत प्रतिष्ठित भाषाविद के रूप में छैन्ह । हुनकर लिखल मैथिलीक व्याकरण A Reference Grammar of Maithili जर्मनी सं प्रकाशित अछि आ सार्वकालिक रूप से एकटा एहेन पोथी अछि जे मैथिली के ठोस पहिचान दिएबा में सफल अछि । दोसर बात हिनकर लिखल ई पोथी शोध पर आधारित छै जाहि में जंर्मनी के भाषा प्रयोगशाला में कंठ में फ़ाइबर ऑप्टिकल तार के मददसं शुद्ध उच्चारण के लेल काज कएल गेल छै ।

    हिनकर आलेख ,पोथी ओ विभिन्न अवसर पर देल गेल व्याख्यान मैथिलीक एकटा धरोहर छै जाहिसं मैथिलीक डंका देश –विदेश में त फहरेबे कएल , नव पीढ़ी  सेहो लाभ उठा रहल अछि आ मैथिली भाषा के असली स्वरूप  बुझबा में  इ पोथी बहुत सहायक छै । जहिना डॉ शुभद्र बाबु द्वारा लिखल गेल ‘The Formation of the Maithili Language’ एकटा प्रसिद्ध आ कालजयी कृति छै तहिना डॉ रामावतार बाबुक अँग्रेजी भाषा में लिखल व्याकरण के बुझल जाय ।        

डॉ रामवातार बाबूकें सिर्फ भाषाविद कहनाइ हम व्यक्तिगत रूपसं उचित नै मानैत छी  ,जखन हुनकर अन्य कृतित्व के देखल जाय त ओ भाषाविद के संगहि एकटा निक साहित्यकार, उत्कृष्ट कोटि के अनुवादक , मैथिली भाषाक संरक्षक आ टिप्पणीकार सेहो छथि । लेकिन अइ सभक  मूल में छै  आदरणीय यादवजीक अपन मातृभाषा क लेल प्रेम ।   हमरा सन एकटा साधारण मनुख डॉ रामावतार बाबुके बारे में लिखी तकर योग्य नै छी लेकिन भाइ आशीष अनचिन्हार जीक समर्पणता ओ तत्परताक सामने हम अइ आलेख के लेल मना नै क सकलौं ,सच कही त जेहने-तेहने आलेख से हम अइ महत्वपूर्ण काज में अपन उपस्थिति दर्ज़ करा आदरणीय रामावतार बाबु सन लिविंग लिजेंड के चरण –कमल में एकटा फूल अर्पित क रहल छी । हम हिनकर लिखल किछु पोथीक अध्ययन केलौं जाहि आधार पर किछु पोथीक संबंध में हमर विचार प्रस्तुत अछि :- 

 

1.     A Reference Grammar of Maithili, Mouton de Gruyter Berlin. New York. (1996)

मैथिली व्याकरणक इ पोथी बहुत वर्खक शोध के बाद लिखल गेल छै आ एकर इ विशिष्टता छै जे पहिल बेर  मैथिली भाषा के केंद्र में राखि, पूर्व में लिखल गेल मैथिली व्याकरण सभक विश्लेषण केला क पछाति एकटा जरूरी काज बुझि एकरा लिखल गेल अछि । पूर्व में लिखल व्याकरण सभ में मैथिली भाषा में संस्कृत व्याकरणक नियमक अनुसार व्याख्या क़यल गेल छै परंच डॉ यादव अपन पोथी में उदाहरण सहित बहुत रास पूर्व मान्यता के ध्वस्त केने छैथ ।

प्रमुख बात जे मैथिली में संस्कृते जेकाँ जे आठ टा कारकक व्याख्या कएल गेल छल तकरा ओ कहलाइथ जे इ मैथिलीक कारक नहि भ मैथिली भाषा में प्रयुक्त संबोधनक प्रकार छी । हिनकर अइ पोथी के यूरोप में भारतीय भाषा अध्ययनक लेल एकटा अनिवार्य पोथी के रूप में संदर्भ ग्रंथ आ आधार पुस्तक के रूप में मानल जाइत छै । एखनो झारखंड में कतेको छोट-छोट भाषा आ बोली के लेल कएल जा रहल शोध में इ पोथी अपन महती भूमिका निमहा रहल अछि । अइ दुरूह काजक लेल ओहि समय में उपलब्ध कतेको भारतीय भाषा, यूरोपीय भाषा आ अफ्रीकी भाषा सभक उपलब्ध व्याकरणक आ भाषा विज्ञानक अध्ययन क लिखलैथ ।

हिनकर इ व्याकरणक पोथी prescriptive नहि भ descriptive अछि । मैथिली भाषा क एकटा अनमोल धरोहर । पोथीक अध्ययन कएलाक बाद हमरा इ कहबा में संकोच नै भ रहल अछि जे इ व्याकरण मैथिली भाषाक मूल प्रकृति के हिसाब सं लिखल गेल एकटा महत्वपूर्ण काज अछि ।      

2.  "A Facsimile Edition of a Maithili Play: 'Bhupatindramalla’s Parsuramopakhyana-natak' (2011 )

    भूपतिन्द्रमल्ल द्वारा परसुरामोपाख्यान नाटक नेपालक मिथिला में लिखल मध्यकालीन नाटक अछि । सबसे महत्वपूर्ण बात ई जे रामावतार यादव जी द्वारा कठिन मेहनति सं नेवारी लिपि से देवनागरी लिपि आ तकर अँग्रेजी में अनुवाद प्रस्तुत केने छैथ जे बहुत उत्कृष्ट छै । एहि काजक विशेष महत्व छै जे इ नेवारी लिपि में लिखल अछि । उल्लेखनीय गप इ जे नेवारी लिपि  तिरहुता लिपि आ देवनागरी लिपि जेकां  इंडो आर्यन लैड्ग्वेज परिवारक सदस्य नहि दोसर भाषा परिवार यानि तिबतो-बर्मन परिवारक सदस्य अछि आ अइ तथ्य से मैथिली भाषाके एकटा विशिष्ट बनबैत अछि  जे मैथिली भाषा साहित्यक रचना चारि टा लिपि यानि तिरहुता, कैथी , देवनागरी ओ नेवारी लिपि में कएल गेल छै ।  

वस्तुतः  परसुरामपाख्यान –नाटक के उत्पत्ति पुराण में छै आ अइ नाटकक कथा निम्न प्रकार सं छै:-

कन्नौजक राजा रेणुकें अपन विवाहयोग्य पुत्री जकर नाम रेणुकाक लेल सुयोग्य वर चुनवाक हेतु एकटा स्वयंवरक आयोजन करबाक इच्छा होइत छैन्ह तें ओ स्वयंवरक आयोजन करैत छैथ  । ओइ स्वयंवर में कतेको प्रतापी राजा ओ राजकुमारगण अबैत छैथ परंच रेणुका सभके ठोकरा के जमदग्नि नामक एकटा ऋषि के अपन होमय वला पतिक रूप में चुनैत छैथ । अइ चुनाव सं कुपित भ राजा आ राजकुमार सभ राजा रेणुक विरुद्ध युद्द ठानि दैत अछि । अइ युद्ध में राजा रेणु आ जमदग्नि विजेता रहलाह आ अपन शत्रु राजा सभक संहार सेहो केलाह । एकर पश्चात रेणुका ओ जमदग्निक विवाह वैदिक विधि आ परंपरासं सम्पन्न भेल । विवाहक उपलक्ष्य में देवराज इन्द्र हिनका कामधेनु गे सेहो उपहार में देलखिनह । किछु दिनक बाद  रेणुकाक पुत्रक रूप में भगवान विष्णु अपन नव अवतार परसुरामक रूप में में प्रकट होइत छैथ ।  देवाधिदेव महादेवक ओ भगवान गणेशक मार्गदर्शन में परसुराम फरसा चलेबाक कला में निपुण भ जाति छैथ । लेकिन जमदग्निक मोन में रेणुकाक चरित्रक प्रति शंका उत्पन्न भ जाइत छैन्ह । रेणुकाक उपर झूठ चरित्रहीनताक कलंकक आरोप लगाके जमदग्नि अपन पुत्रसभ के माता के गरदनि कटबाक आदेश देलखिन । दु –टा पुत्र द्वारा आज्ञाक पालन नै क सकबाक कारण पिताक श्रापक भागीदार बनि प्राण गमौलनि  , जखनकि परसुराम अपन पिताक आज्ञाक आंखि मुनि पालन करैत अपन माताक मुड़ी काटि देलाह ।  परसुरामक पिताक प्रति  आज्ञाकारिता ओ समर्पण भावसं प्रसन्न भ जमदग्नि रेणुका आ दुनु पुत्र के पुनर्जीवित क दैत छेथिन्ह ।

माहिष्मतीक राजा सहस्रार्जुन जमदग्निसं कामधेनु गे क मांग करैत अछि जकरा ओ आइ कहि नकारि दैत  छेथिन्ह जे कामधेनु गे  स्त्रीधन अछि जे रेणुकाक संपत्ति अछि ।  सहस्रार्जुन बलजोरी कामधेनु गे के लके चलि जाति अछि आ छद्मपूर्वक जमदग्निक हत्या क दैत अछि । रेणुका अइ बात सं अत्यंत दुखी ओ क्रोधित भय अपन पुत्र के पिता जमदग्निक हत्याक प्रतिशोध लेब लेल प्रेरित करैत छेथिन्ह । परसुराम सहस्रार्जुनसं युद्द कय ओकर हत्या क दैत छेथिन्ह  । नाटक एत समाप्त भ जाति अछि । “

 

नेवारी लिपि में लिखल गेल अइ मध्यकालीन मैथिली  नाटक के सभक समक्ष अनवाक पाछु  आदरणीय रामावतार बाबुक कतेको वर्खक मेहनति अछि नहि त एतेक निक मैथिली नाटकसं हम सभ प्रायः अपरिचित रहितौं । आब हुनकर मेहनति के नमूना चित्रक माध्यम सं सेहो राखि रहल छी । 

 

 

 

 

 

 

 

 

नेवारी लिपि  में लिखल गेल मैथिली नाटकक पांडुलिपि 

देवनागरी लिपि में लिप्यांतरण       

रोमन लिपि में लिप्यंतरण

 

अँग्रेजी भाषा में अनुवाद

 

(शीघ्रहि संपूर्ण आलेख प्रस्तुत कयल जायत) 

 

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