VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
Twitter / X Facebook Archive

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

Videha

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.

प्रीति कुमारी

अशिक्षाक शिकार: केवट समाज (शोध आलेख)

आधुनिक कालमे हरेक वर्ग आ जाति- उपजाति लेल प्रगतिक मूलमंत्र थीक शिक्षा। देश स्वाधिन होईत समय पुरुष वर्गके अपेक्षा नारी शक्तिमे साक्षरता दर बहुत कम छल। से अगुआएल समाजक स्त्रीगणमे लुअर प्राइमरी स्कूल स्तर धरि पढ़ाय हेबाक जोर पकड़ि लेने रहैक। मुदा पछुआएल समाजक लोक अपना बहिन- धी केँ इसकूल नहिं पठाबथि। एक दशक धरि १० प्रतिशत पुरूख अपर प्राइमरी आ ५ प्रतिशत पुरुष मध्य विद्यालय आ २ प्रतिशत पिछरल आ दलित समाजके छात्र मैट्रिक तक पहुँच सकल छलैथ। इयह कारण रहैक जे केवट समाज'क सर्वहारा लोक निरक्षर रहि गेल, शिबाए धनीक लोक अपना धीयापुताकेँ पढ़ा लिखा सकलाह। एहि समाजक अधिकतर लोक भूमिहीन किसानी श्रमिक बनल रहलैक। देहात क्षेत्रमे किछु गामक श्रीमन्त केवट केर स्वामित्वमे गुजर - बसर करय सँ अधिक जोतसीम खेत रहनि,जे कालान्तरमे निलामी युग रहलाक कारणेँ बंदोबस्त आ केवाला द्वारा अर्जित कयलासन्ता रकबामे जयदाद बढ़ोतरी भेलनि। बेर - बेर रौदी'क अकाल आ वाढ़िक दहार सँ टुट- पुजिया काश्तकार केर माली हालत बढ़ दयनीय स्थितिमे आबि गेलैक। धान,मरुआ सबैया - डौढ़ा सलाना पर ऋण लैत उपजाएल अन्न मालिक - महाजनके बेमाक करय पड़ैन। फेर जर्जर गरीबी पछारि दैन। बेसितर पुरुष बेगारि आ मौगि - मेहेर कुटाउन- पिसौन कय बाल बच्चा पोसथि। से छौरा - छौरी ढेरबा वयसधरि बकरी,गाय- महींस' क चरवाहि करैक। एखुनका मोदी युग जहांति अलेल अन्न- वस्त्रके सुविधा नहिं छलैक। तैयो खनदानी जनश्रुति मजगूत बनोने ईमानदारी सँ कष्टप्रद जीवन खेपि लैथि।
. पौराणिक काल सँ सप्तऋषि'क आधार पर गोत्र नामकरणमे काशयव ऋषिके वंशज सँ केवट कूलके - गोत्र रूपेँ मान्यता होइत आबि रहलैक अछि। चौधरी,सनवानी,तेलियागाथ आ कोलगाथ गोत्र मछुआरा समाजमे छैक। भारतवर्षमे ई एक आदिकालीन जाति निवास करैत आबि रहल छैक। एहि प्रसंग वर्णन प्रमाण रूपेँ शास्त्र - पुराणमे भेटैछ। हालमे ' दिव्य दृष्टि ' मैथिली पोथीमे संक्षिप्त रुपेँ एक पाठ सँ हम गुरू पूर्णिमा मादे पढल। जनतब पाबि आरो अधिक जानबाक पियास मोनमे हमरा जागल। उत्तर प्रदेश आ बिहार मे केवटकेँ राम सँ ,त्रिपुरामे शैव परंपरा सँ आओर असाममे वैष्णव संत शंकरदेव'क अनुयाई बतौल गेल छै। प्रसिद्ध नृवंश विज्ञानी रसेल आ हिरलाल सन् १९१६ मे भारतके केन्द्रीय पान्तके जनजातिय आ जातीमे विवरण लिखकेँ दर्शेने छैथ ई एक मिश्रित जाति छै,जकर संवन्ध आर्य सं नहिं छैक। एच एच रिजले १८९१ ई० मे बंगालक जाति आ जनजाति केँ रेखांकित करैत एकर रक्त संबंध आदिवासी सँ रहबाक तथ्य सुकारलनि अछि।
मागी नाव न केवट आना !
कहई तुम्हार मरमु मै जाना !!
चरण कमल रज कहुँ सबु कहई !
मानुष करनि मुरि कछु अहई !!
केवट शव्दक पहिल प्रयोग गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरित मानसके अयोध्या काण्डमे कयने छथि। उपरोक्त पाँति सँ ई बुझाइत छैक जे केवट कौम नाह चलाएके नदी,नाला कात बसल, बालू बूरूज पर बसि गंगा नदीक छीटपर कांकैर ,तारभूज आ सजमैन आन तरकारी खेती कय गुजर- बसर करय बाला मूलनिवासी थीक।
कालांतरमे केवट समाज के आठ कुरी बनि गेलैक जे दू धारामे कब्बडिक डांढ़ि जेकाँ एक भाग नोनीयां , निषाद,गोढ़ि ,सुरहिया, खुलवट आ तियर रहल ,से माछ मारैक हुनर अपनेलक। दोसर भाग केउट , कैवर्त, हलदार आ चाई रमैनी कहार कृषि काजकेँ अपनाबैत खेतिहर बनल। एहि मुख्य काजक अतिरिक्त समयानूकूल छिटपुट रूपेँ आनो लोकक पेशाके क्षणिक रूपें अपनाबैत मानवीय जीवन सुदृढ़ करयमे आगू बढ़लैक । सामाजिक वेव्यस्था अनूकूल कोनू -कोन राज्यमे भारतवर्षक केवट समुदाय केँ अनूसूचित जाति आओर अतिपिछड़ा जाति ; पिछरा वर्गमे राखल गेलैक। गोवा आ महाराष्ट्र राज्यमे कामथ उपनाम ब्राह्मण कहबैत छथि। केवटके उपनाम (टाईटल) कामैत,कामति, चौधरी, भंडारी, कापड़ी,कापड़, मड़र, मंडल, शर्मा,वर्मा, राय , प्रसाद, कुमार, व्यास, आनन्द, डरेडार, घीबहा,सगहा, गढ़बाईत, सिंह, पंडित, दास,महतो , विश्वास,कमती, केवट आ कामत आदि छिरियाएल बुझाईत छैक। दोसर दिस मल्लाह समाजमे सहनी, निषाद, मल्लाह आ मुखिया उपनामे संगठित होईत गजगज करैत। देखाईछ। ई समाज मुख्यतः भारत आ नेपाल देशमे अपन जातीयता आधार पर बेटी - रोटीके संबंध बनाय वियाह दान निमाहैत आबि रहल छैक। पंजाब ,चन्द्रिगढ, हरियाणा, लुधियाना, राजस्थान इत्यादि ठाम ई चौधरी कहाबैत छैक। छत्तीसगढ़मे निषाद,जलछत्री आ पार्कर कहाबैत छैक। आब एशियाके अतिरिक्त दोसरो महादेशमे पसरल केवट समाज अन्तर गोतरीय वियाहक समर्थनमे जुबक - जुवती अन्तर्जातीय प्रेम विवाह करैछ , सामाजिक माईन दियेबाक लेल यथेष्ट परियासमे रहैत अछि। एक सर्वेक्षण अनुसारे हालहिमे गामसँ पलायन करैत मिथिलांचल केर पर्वासी नगर- शहरमे स्थापित भेल छैक। आ अन्तर जातीय वियाहक व्यक्तिगत मान्यताकेँ बढ़ेबाक विकृतिके सामाजिक रेवाजमे बदलवाक लेल मूल निवास स्थल आबिकय सामाजिक प्रथा जेकां खाएन पीन, छेका - तिलक , फलदान, वरतुहारी आ मटकोर- कुमरन धरिक' गृहपूजाक आयोजन सम्पन्न करैत देखल जाईछ। एहि काजमे जातीय मान्यजन आ मुखपुरूख सेहो अपन प्रभाउ घटैत पबैत अछि। पहिलुकबा मानता अनुसारे वियाह,गैत श्राध आ सामाजिक ताना- बानाके विपरीत पेयलापर मैनजन देबान (छरीदार) दोखीकेँ जुरवानामे ग्रामीत/ सबहैति एकसंझू भतभोज लैत सुआक्षण देल करथि। बेसीतर केवट समाज अपना जातीय समगोत्रीय वियाहकेँ अदौ सँ मर्यादा निमाहैत गरिमापूर्ण व्यवस्थामे अछि। मिथिलाके बिहार प्रांतमे मधुबनी, दरभंगा , समस्तीपुर, सुपौल,सहरसा, मधेपुरा, बेगूसराय , मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर, अररीया, कटिहार, पूर्णिया आ भागलपुर जिलामे सघन आबादी छैक। बिहार जातीय गणनानुसार नऊ लाख ३७ हजार ८६१ कियोट आ दूई लाख ६५ हजार ९४३ लगधक कैवर्त मल्लाह समाजमे ३४,१०,०९३ आ विंद जाति १२,८५,३५८ केर आवादी'क उल्लेख कयल गेल छैक। नेपाल अधिराज्यके तराई क्षेत्रक जिला यथा- धनुषा, महोतरी, सिरसा,सप्तरी सर्लाही, सुनसरी आ मोरंगमे सघन रुपेँ निवास करैत छैक। एहूठाम कैवर्त अनुपातमे कम छैक। गर्वाईत केयट केर जातीय उपाधि मण्डल छैन। हुनका घरमे गौंसाई पित्तर नहिं होईछ, जहनकि कियोट केर घरमे हिन्दू पध्दति सँ चौदहो देवानक अराधना होईछ। मण्डलीकरणके दौरमे खतबे आ अमात तथा यादव एवं गंगौता समाजके टाईटिल सेहो मंडल छैक। राजपूत आ भूमिहार जातिक आवादी कम रहैत ऐ समाज सं राजनीतिक लाभमे बढ़ बेशी छैक।
देखल जाईछ एक शिशुक नामकरण सँ लऽ कऽ मुरन ,सतनारायणके पूजा, घर देखी, भुमिपूजन , घरवास, वियाह आ श्राध ओ बरखीमे ब्रह्मण पूरोहीत आ महापात्र सँ गरूड़ पुराण आ अनुष्ठान करेबाक चलैन आबि रहल छैक। किछु परिवारमे अपने सजातीय धर्माचार्य सँ पंडित बाला काज करेबाक नव चलैन सेहो स्थापित भेलैक अछि। मुदा कर्म काण्डके पोषक नमरदार लोकनि अपवादमे वैदिक रीति अपनेने छैक। अधिकतर लोक तै केँ जागरूक लोकक चलाकी बुझि मृत्यु भोज बाबत मिश्रित प्रतिक्रिया रखैत छै। समाज शास्त्र सँ कोनू सरोकार नहिं राखि शिक्षित समाज निर्माणमे वाधक छै। तेँ अनपढ़ के बीच प्रजातांत्रिक व्यवस्थामे मूरखक बोलबाला अछि।

- प्रीति कुमार,ी बी.ए., बीएड.

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।