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विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

Videha

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१७

हितनाथ झा

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)

 

'प्रभात'मे प्रकाशित काशीकान्त मिश्र 'मधुप', कांचीनाथ झा 'किरण' एवं अनेक रचनाकार लोकनिक विशेष सन्दर्भक मैथिली कविता पूर्वक खण्ड सभमे प्रकाशित भेल अछि। प्रभातक उपलब्ध अंकमे मैथिलीक कुल कविता 46 अछि। धारावाहिक रूपें सेहो किछु कविक रचना छनि, जाहिमे प्रमुख चपाहीक प. ब्रजमोहन ठाकुर 'मोहन' छथि आ सम्पादकक ज्येष्ठ भ्राता प. चन्द्रनाथ झाक सेहो। दुनू कविक अनुवाद सेहो छनि जे धारावाहिक रूपसँ प्रकाशित होइत छल। सभ अंक उपलब्ध नहि रहलाक कारण कविताक ओहि अंकक उपलब्ध नहि होयब खण्डित सन लगैछ, किन्तु जतबे उपलव्ध अछि, ओहो पाठकवृन्दक समक्ष प्रस्तुत करबाक प्रयास करब। कोइलखक अतिरिक्त अनेक गामक रचनाकार लोकनिक सहयोग बनल रहलनि, से प्रभातक महत्वपूर्ण उपलब्धि अछि। एहि अंकक जे कविलोकनि छथि ओ कोइलखक अतिरिक्त्त रानीटोल, मंगरौनी, मंगरपट्टी गामक छथि। ब्राह्मणक अतिरिक्त आनो वर्णक छथि। एहि खंडमे दस कविता अछि। अग्रिम खंडमे बांकी कविता आ कोशिश करब जे कवि लोकनिक अन्य अवदानक विषयमे चर्चा करी आ मैथिलीक प्रसिद्ध आलोचकक मंतव्य सेहो अंकित करी।

'
प्रभात'मे प्रकाशित मैथिली कविता
माधव
रामचन्द्र झा, रानीटोल
आयल ऋतु वसन्त अव रे, नहि आयल कंत।
त्रिविध बयार लगैत तन रे, हो जीवक अन्त॥१॥
पिक गण सोर सुनीउ चहु रे, हिय फाटत मोर।
अव न सहब मदन सर रे, तन मन भेल भोला॥२॥
अलि सव लख घुमीउ घुमि रे, इच्छित कचनार।
मम अलि कतय भुलायल रे, तजि फल रतनार॥३॥
जौ नहि आजु मिलन हरि रे, होयत जिव कात।
रामचन्द्र धरू धैरज रे, अव ऐल " प्रभात "॥४॥
(
प्रभात- अंक-४, १९३३ई.)

॥ श्री मिथिला माता ॥
श्री मदनानन्द झा, मंगरपट्टी।

जननी अहिंक चरण हम धयलहुँ।

अहिं जगतारिणि, भव-दुख हारनि।
ई बुझि चरण पकड़लहुँ।।
अहिं दुष्टनाशनि, क्रूर विनाशनि।
तैं हम अहिंकेँ मनौलहुँ।।
अहाँ मायामय, ओ करुणामय।
अहिंक शरण तैं भयलहुँ।।
'
मदन' कहथि पुनि हे ! भव भालनि।
हमहुँ अहिंक पद गहलहुँ।।
(
प्रभात- अंक-४, १९३३ ई.)

रुपैया वर्णन
श्री रूप नारायण चौधरी, कोइलख।

जयति-जयति ठन्न-ठन्न शब्दकारी।

तोला भर तुलित तोल,
सोलह आने सुमोल।
गौर गात गोल-गोल,
सुख मम मन हारी।। जयति।।

छाती छवि छपित आप,
किंग इम्परर छाप।
पृष्टभाग मूल्य छाप,
इस्वी सन धारी ।।जयति।।

तुमहि गुरु तात, मात,
नारी,नात, यार, भ्रात।
तुम बिन नहि बनत बात,
कहत सब नर- नारी।।जयति।।

(
प्रभात : वर्ष-01, अंक-08 अगस्त-1933)
(
साभार : प्रभात वर्ष 01 , अंक 10 ,अक्टूबर 1933 )

कोइलख ग्राम

श्री केदारमणि झा, मंगरौनी

देखू , धन्य कोइलख ग्राम !

भूमि सुन्दर सजल हरियर उर्वरा सभ ठाम !!

पाठशाला संस्कृतक अछि बीच गामक ठाम ।

दिव्य शिक्षा देथि गिरिजा दत्त शर्मा नाम ।।

स्कूल एम.ई. ,फ्री तहूपर पढ़ै सब बिन दाम ।

धन्य चन्द्रावती जगमे अमर जनिकर नाम ।।

एल . पी . इसकूल अछि अछि भव्य सेहो धाम ।

तेजनारायण गुरूजी उद्यमी अविराम ।।

पण्डितो छथि पास बी. ए. भले मानुष योग ।

तनिक की हम नाम भाखब ,छथि कतेक एहिठाम।।

(
प्रभात'-अंक १०, १९३३ ई.)

विपरीत वाण
राम चन्द्र झा, रानीटोल।

आजु रैनि हम देखल सजनी गे,
रंग सुरंग अ ना रे ।
तिहि पर मन शुक मोहल सजनी गे,
यहि सम फल नहि आरे।।

कुमुद रंग स रंजित सजनी गे,
मुख पर शोभित गर ले ।
मलय पवन स वासित सजनी गे,
कोमल अति मृदु कमले।।

कर युग तापर लपकल सजनी गे,
लपकल चख दुहु ता रा।
किन्तु मुरछि पुनि फिरल सजनी गे,
लखि तिहि पर मनि आरा।।

'
रामचन्द्र' सुनुअ सव सजनी गे,
छल कर करम अभागे।
भ्रम वश फल महि तोरल सजनी गे,
छल नहि मन अनुरागे।।

(
नोट:- यदि यहि तरहक पद्यक रसास्वादन करबाक इच्छा हो तँ दरभंगा कन्हैयालालसँ हमर बनाओल तिरहुति गीत पुष्पांजली माँगि सकैत छी।)

(
प्रभात-अंक-११,१९३३ ई.)

परमुण्डे फलाहारी
(
श्री रामचन्द्र झा 'चन्द्र', रानीटोल

अपना नै चेत अछि, धूरो नै खेत अछि
पेटे महासेतु अछि त तकरा भरत की।
मन नै संतोष अछि, जीभ अति चोख अछि
बाजब सरोख अछि, त पैघत्वे करत की।।

वनैत अति दानी छी,होइत अभिमानी छी,
भीतरीक कृपाणी छी,त कहु निमहत की।
बड़ बड़ राज सव, दैत दैत थाकि गेल,
ताहि ठाम देहाती के ठकने चलत की ।।
(
प्रभात- अंक १२,१९३३ ई.)

॥विरिहिनि विलाप॥
रामचन्द्र झा 'चन्द्र', रानीटोल।

की कहु सखि हम निज अपमाने !
सगर राति हम निन्द गमाओल,
राखल नहि मोर माने॥१॥

आनक कहल सुनै छथि प्रियतम,
हमर कहल लग तीते।
बुझैत छलहुँ हमरे ओ हैता,
पुरुषक नहि पर तीते॥२॥

आनक सुख आनक शुभ चरचा,
आनहि के अपनावथि।
हमर दुख कहियो ने बुझलनि,
पोछि न नोर सुखावथि॥३॥

यहि दुख स अव तजव नेह ई,
अव न रहव एहि गेहे।
जहिठा अपन केओ नहि सूझय,
तहि ठा कोन सनेहे।॥४॥

'
रामचन्द्र' धैरज धरु विरिहिनि,
चित्त करू समधाने।
चतुर चित्त अपना के चिन्है,
अपन हैत नहि आने॥५॥

(
प्रभात-अंक-१२, १९३३ई.)

उषा स्वप्न
श्री सूर्यनारायण वर्मा, रानीटोल।

अंतरिक्ष के छत पर मुग्धित, छला सुधाधर राजित।
सस्मित वदन हर्ष उत्फुल्लित, छला ताड़िका सज्जित।।
अर्ध निशा निस्तब्ध दिशा छल,सिक्त चन्द्रिका धरणी।
सिहकि-सिहकि वायु संचारथि, कामदेव तन रमणी।।


देखि कलाधर कुसमित कुमदिन, अपन छटा छहराबथि।
कोकी कोक विरह सँ आकुल, कुहकि कुहकि पिक बाजथि।।
पूर्ण समुज्ज्वल सिता यामिनी, लय मन मुग्ध कराबथि।
मन्मथ अपन शक्ति वसुधापर, अंतरिक्षसँ लाबथि।।


सोना सन कमनीय कान्ति तन, नव यौवन सुकुमारी।
रूप गर्विता भृकुटी कुटिला, वाणा सुरक कुमारी।।
सुतलि छली काम मद मातलि, अपना शयनागारे।
लंक चारि सन लय पर्यंको, सुखद निन्द विस्तारे।।


दुनू गोल कपोल दशे सँ, चिकुर फरक फहराबथि।
श्रेणी वद्ध गन्ध भृंग लय, जनु छत्ता निज साजथि।।
आबि झरोखे वदन विलोकिय, शशि स्वरूप निज भूले।
शीतल किरण सुधा सरसावैत, छला तनिक अनुकूले।।


शीतल मन्द समीर तनिक तन, परसि मनोज जगावथि।
अविवाहित तन गन्ध मधुर लय, मलय पवन प्रस्तारथि।।
सुखद निन्द मे मगन बालिका, स्वप्न देखलनि सुन्दर।
कामरूप कमनीय कान्तिमय, जनिक वादन छनि शशिकर।।


अरुण अधर इन्दीवर लोचन, उर बैजयन्ती माला।
तरुण वयस घनश्याम वदन इव परम् प्रिये जे वाला।।
श्री यदुनाथ कुमार वदन शशि, उषा सेज पर राजथि।
कुसुमायुध जनु अस्त्र साजि कय, कामिनि वदन सताबथि।।


मदन मोद काँ दुसह वेग कय, सहि सकली नहि वाला।
झट पट तन मन अर्पण कयलन्हि, शान्ति कर' लेल ज्वाला।।
हाव भाव मन दुनुक परस्पर, एक छलन्हि भय गेले।
अधर सुधा रस चाखय कारण, युवा प्रगट रुचि कैले।।


मदनातुर जे उषा नायिका, हुनक मनोरथ जानलि।
उदित उमंग प्रेम मे सरवरि, पूर्ति करब मन ठानलि।।
उभय परस्पर हाथ बढ़ोलनि, शशि सम्मुख शशि कैले।
किन्तु हाय तेहि अवसर मे झट, निन्द अधम टुटि गेले।।


चक्षु खोलि कय चहु दिशि ताकलि, अकचकाय से बाला।
किन्तु कतहु नहि पावलि प्रियतम, रोदन कैलि बेहाला।।
हे प्राणेश हृदय के वल्लभ, हमरा तजि कत गेलो।
प्राण तजब हम अही कष्टसँ,एहेन निठुर किय भेलो।।

(
प्रभात-वर्ष-२, अंक- १, १९३४ ई.)

गोपी विलाप
श्री रामचन्द्र झा, रानीटोल।

आज चलू मम सदनम प्रिय हे !
श्याम सरोज तन पीत वसन धरि पाणिमहे पद चपलम।।

जखन मिलत हरि युग करकंजे, उर सौं मिलत उरोजम।
तखन सरस सस भीजत तनमन, जन्म बुझव शुभ सफलम।।

जँ नहि आजु चलव हरि संगे,सुचि न करव मम सयनम।
तजब मदन विरहाकुल तन हम, धरि मन तुअ पद कमलम।।

जेहि पद पदम् पराग परसि कै, पाहन भै बर वदनम।
'
रामचन्द' ताही संग गोपी केलि चहत निज भवनम।।

प्रिय हे आजु चलू मम सदनम।।
(
प्रभात-वर्ष-२, अंक-१,१९३४ ई.)

प्रार्थना
श्री जितेन्द्र मणि झा
(
तारा संस्कृत विद्यालय, मंगरौनी)

तारा अहिंक कैल फेर ध्यान।
ग्राम जाहिमे नीति विद्या सँ पुनः करै अभिमान॥ तारा॥

ग्रामिक गण सभ नाम गान कय नित्य धरथि ई ध्यान।
अहिंक सुपद सँ संघ युवक मे राखथि लोलुप मान ॥ तारा ॥

जाहि मिथिला मे नाम विस्मृत छल भेल कतेक अपमान।
बहुत दिनन पर ओतय चलल छी जहाँ अचल अछि धाम ॥ तारा॥

दीन युवक सभ द्रव्य हीन भय साहस कय सुज्ञान।
छात्र ' जितेन्द्र' करुणामय सागर मूर्ति बनाबथि ताम ॥ तारा॥

(
प्रभात-वर्ष-२,अंक-१, १९३४ ई.)

संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9
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