
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-५
स्वतंत्रता सेनानी 'विद्यालंकार'
एकटा शिशुक जन्म काल, हुनकर जन्म-स्थानक वातावरण/परिवेश केहन छलैक, तकर प्रभाव हुनकर व्यक्तित्व पर पड़ब स्वाभाविके छै। जेना एखनुक 'इंटरनेट' आ 'ए आइ' बला जमाना मे जनमल बच्चा लेल लोक रहरहाँ बाजैत रहैए, "आइ काल्हि के बच्चा...बाप रे ! सभ किछु पेटे सँ सीखि क' बहराइत अछि जेना।" तहिना सभ युग मे तत्कालीन वातावरणक प्रभाव सँ प्रभावित रहिते टा अछि कोनो बच्चा। तँ सएह बात चरितार्थ होइत बुझना जाइत अछि 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्वक अवलोकन करैत। इतिहास मे बहुत बेसी रुचि नहिओ रखनिहार विद्यार्थी केँ एतबा जनतब तँ निश्चिते हेतनि जे भारतीय स्वतंत्रता संग्रामक समय जे छलए (1857 सँ 1947 धरिक) तकर बहुआयामी प्रभाव कोन तरहेँ देशक आम नागरिकक जीवन पर पड़ल छलनि। ई एकटा राजनीतिक आन्दोलन मात्र नहि रहि गेल छलए; अपितु समाज, अर्थव्यवस्था, शिक्षा आ लोकक मानसिकता मे सेहो क्रांतिकारी बदलाव आनैत जा रहल छलए। आ ताहि मे गाँधी जीक महती भूमिका रहलनि। गाँधीजी स्वतंत्रता संग्राम सँ आम जनता केँ सेहो जोड़ि लेने छलाह। कृषक, मजदूर, महिला आ युवा, सभ समान रूप सँ एहि संग्राम मे अपन भागीदारी देबा लेल तत्परता देखौलनि। सन् 1885 मे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसक स्थापनाक संग भारतक राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन मे जे एकटा नवचेतना जागृत भेल से 1905क स्वदेशी आंदोलनक समय धरि आरो विस्तार पौलक। देशक एही वातावरण एवं परिवेश मे तत्कालीन दरभंगा जिलाक (आब मधुबनी जिलाक) कोइलख गाम मे मैथिल ब्राह्मणक एक उच्च कुल मे 17 जुलाइ 1901 ई. मे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क जन्म भेल छलनि। कोइलख गाम नीक कुलक ब्राह्मण, पण्डित आ विद्वानक लेल प्राचीन कालहि सँ प्रसिद्ध रहल अछि। 'विद्यालंकार'क पिता स्व. नरसिंह ठाकुर संस्कृत तथा फारसीक विद्वान छलाह आ ओ मिरजापुर महंतक ओतए तीस बरख धरि काज करैत रहल छलाह।
तँ से जे कहैत रही, कोनो बच्चाक व्यक्तित्व हुनकर जन्म कालक वातावरणक प्रभाव सँ प्रभावित रहिते टा अछि। सएह विद्यालंकार'क व्यक्तित्व पर सेहो तत्कालीन भारतीय समाजक जे वातावरण छलैक, तकर प्रभाव भरपूर छलनि। स्वतंत्रता संग्रामक परिणाम स्वरूप भारतीय समाज आत्मबोध, आत्मगौरव आ आत्मनिर्भरताक दिशा मे अग्रसर भऽ रहल छलए। अंग्रेजी शासनक शोषण सँ भारतीय समाजक विभिन्न वर्ग त्रस्त छलए; जे देशक हरेक नागरिकक हृदय मे राष्ट्रवादक तीव्र लालसा उत्पन्न होएबाक कारण बनल। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मात्र स्वतंत्रता प्राप्त करबाक माध्यम नहि रहि गेल, अपितु ई एकटा सांस्कृतिक पुनर्जागरण, सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय चेतना ओ लोकतांत्रिक मूल्यक पुनःस्थापनाक संग्राम सेहो बनि गेल। ई संघर्ष भारतीय इतिहासक एकटा गौरवशाली अध्याय अछि, जे स्वतंत्रताक मूल्य, एकजुटता आ देशभक्तिक संदेश दैत अछि। गांधीजीक प्रभाव मे 'सत्याग्रह', 'भूख हड़ताल', 'जेल जाएब', 'कर नहि देब', इत्यादि नब-नब तरीका आम जनता सभ सेहो अपनौलनि। आ ओहि आम जनता मे एकटा श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' सेहो छलाह। स्वदेशी आंदोलन मे पार्टिसिपेट केलनि। जेलक यात्रा सेहो कएलनि महानुभाव।
1920 ई.क दिसम्बर मे गाँधी जीक बिहारक यात्रा यद्यपि अल्पकालीन छलनि, परन्तु ओहि सँ मिथिला मे असहयोग आन्दोलनक गम्भीर प्रभाव पड़लैक। मेधावी छात्र लोकनि (जाहि मे बाद मे अनेक गोटे भारतक राजनीतिक जीवन मे उच्च स्थान प्राप्त कएलनि) ओहि समय मे स्कूल एवं कॉलेजक बहिष्कार कएलनि, जाहि मे सँ एक छलाह श्रीकान्त ठाकुर। 1921 ई.क प्रारम्भ मे किछु राष्ट्रीय स्कूल स्थापित कएल गेल आ किछु वर्तमान स्कूल केँ विश्वविद्यालय सँ असम्बद्ध करबाए राष्ट्रीय संस्थान मे परिणत कएल गेलैक। एहन शिक्षण संस्थान सभ सरकार सँ अनुदान लेब बन्द कऽ देलक। गाँधी जी निश्चित रूप सँ बिहार मे एक गोट राष्ट्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करबाक पक्ष मे छलाह। 5 जनवरी 1921 केँ बिहार राष्ट्रीय महाविद्यालय स्थापित भेलैक आ 6 फरवरी केँ ओही वर्ष राष्ट्रीय महाविद्यालय एवं बिहार विद्यापीठक औपचारिक उद् घाटन गाँधी जी कएलनि। बिहार विद्यापीठक उद्देश्य छल, प्रान्त भरि मे स्थापित कएल गेल सभ राष्ट्रीय विद्यालयक समायोजन, ओहि पर नियंत्रण तथा ओकर निर्देशन। 1922 ई. मे श्रीकान्त ठाकुर बिहार विद्यापीठ मे नामांकन करौलनि तथा ओतहि सँ 'विद्यालंकार'क स्नातक स्तरक डिग्री प्राप्त कएलनि। विद्यापीठक प्रधानाचार्य डॉ. राजेन्द्र प्रसाद छलाह। श्रीकान्त ठाकुर हुनकर अत्यधिक प्रिय छात्र बनि गेलाह। ओही समय मे विद्यालंकार'क मोन मे पत्रकारिताक माध्यम सँ देश सेवाक भावना दृढ़ भेलनि।
बालक श्रीकान्तक प्रारम्भिक शिक्षा अपन गामक पाठशाला सँ शुरू भेल छलनि। आ बाद मे (1913 ई. मे) मधुबनीक वाटसन हाइ स्कूल मे हुनकर नामांकन कराओल गेलनि। ओ मेधावी छात्र छलाह आ अपन कक्षा मे प्रथम स्थान प्राप्त करैत छलाह। मधुबनी मे हिनकर अभिभावक रहथिन, छपरा जिलाक सुखदेव नारायण। ठाकुर जी हुनका ओतए परिवारक सदस्य रूप मे रहैत छलाह। श्री सुखदेव नारायण थियोसोफिस्ट तथा थियोसोफिकल सोसाइटीक कर्मठ सदस्य छलाह। हुनका सँ श्रीकान्त ठाकुर बहुत प्रभावित भेलाह। देशक सेवा करबाक प्रेरणा ठाकुर जी केँ हुनके सँ भेटलनि।
'सर्वेन्ट ऑफ इंडिया सोसाइटी' नामक संस्था लाला लाजपत राय चलबैत छलाह। श्रीकान्त ठाकुर हुनके कार्य सँ प्रभावित भऽ बिहार सँ बाहर जाए किछु करए चाहैत छलाह। मुदा डॉ. राजेन्द्र प्रसादक विचार नहि छलनि जे ठाकुर जी बिहार सँ बाहर जाइथ। ओ हुनका बिहारे मे रहि कऽ काज करबा लेल कहलथिन। राजेन्द्र बाबूक आदेश पर ओ मुंगेर जिलाक हबेली खड़गपुर मे राष्ट्रीय उच्च विद्यालयक प्रधानाध्यापकक रूप मे किछु दिन कार्य कएलनि।
सन् 1920 सँ हिन्दी पत्रकारिताक संसार मे दैनिक पत्रक एक गोट नवीन युगक श्रीगणेश भेलैक। भारत मे गाँधीक आगमन तथा स्वतंत्रता आन्दोलन मे एक नवीन युगक प्रादुर्भाव सँ सेहो हिन्दी पत्रकारिताक इतिहास प्रारम्भ होइत अछि। आ एही ठाम सँ स्वतंत्रता आन्दोलनक इतिहासक गाँधी-युगक प्रधान अध्याय प्रारम्भ भेल छलए। विद्यालय, महाविद्यालय आ विश्वविद्यालय छोड़निहार भारतक प्रतिभा-सम्पन्न छात्र आ छात्रा लोकनि बाद मे गाँधी जी द्वारा स्थापित विद्यापीठ सभ मे भर्ती भऽ विद्याध्ययन कएलनि आ किछु गोटे सक्रिय राजनीतिक संघर्ष सँ हटि हिन्दीक पत्रकारिता दिस डेग उठाए परोक्ष रूप सँ स्वतंत्रता आन्दोलन सँ जुड़लाह/जुड़लीह। पत्र द्वारा स्वतंत्रता आन्दोलनक कार्यक्रम ओ उद्देश्य केँ जन जन धरि पहुँचेबाक काज सर्वोपरि छल। तैं भारतक लगभग सभ प्रधान राजनेता एवं स्वतंत्रता आन्दोलन मे भाग लेनिहार राजनीतिज्ञ लोकनि प्रारम्भिक समय मे अथवा जीवन पर्यन्त पत्रकारिता सँ जुड़ल रहलाह। जाहि मे एकटा महत्वपूर्ण नाम अछि श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'।
गाँधी जी द्वारा स्थापित विद्यापीठ मे भर्ती भऽ विद्याध्ययन कएलाक उपरान्त राजेन्द्र बाबूक प्रेरणा तथा जगतनारायणक प्रोत्साहन सँ श्रीकान्त ठाकुर 1926 ई.क जनवरी सँ "महावीर" नामक हिन्दी साप्ताहिक मे कार्य आरम्भ कएलनि। जे पटना सँ प्रकाशित होइत छलए। एहि पत्रक सम्पादक छलाह जगतनारायण लाल। "महावीर" नामक हिन्दी साप्ताहिक मे श्रीकान्त ठाकुर केँ अधिक समय धरि मोन नहि लगलनि। ओ कोनो हिन्दी दैनिक मे काज करबाक इच्छुक छलाह। श्रीकान्त ठाकुरक ई प्रारब्धे छलनि प्राय: जे हुनका जीवन मे आगाँ बढ़बा लेल कहियो अवसरक प्रतीक्षा अधिक दिन नहि करए पड़लनि। कलकत्ता सँ प्रकाशित दैनिक स्वतंत्रक सम्पादक स्व. अम्बिका प्रसाद बाजपेयी 'विद्यालंकार' केँ बजौलथिन आ सह-सम्पादकक कार्यभार देलथिन। बाजपेयी जीक संग काज कएने 'विद्यालंकार'क प्रतिभा मे अद्भुत निखार अएलनि आ एहि निखरल प्रतिभा सँ युक्त सह-सम्पादक सँ बाजपेयी जी ततेक प्रभावित भेलाह जे युवक श्रीकान्त ठाकुर केँ सम्पादकीय लिखबाक पूर्ण छूट दऽ देलथिन, जखन कि सम्पादक ओ स्वयं बनल रहलाह।
किछु समयक बाद रमाशंकर त्रिपाठी तथा मदनलाल चतुर्वेदीक संग लोकमान्य साप्ताहिकक प्रकाशन प्रारम्भ कएलनि, जे बाद मे दैनिक पत्र मे परिणत भऽ गेल। श्रीकान्त ठाकुर ओकर संयुक्त सम्पादक बनलाह। सन् 1932 मे लोकमान्य छोड़ि विश्वामित्रक सम्पादक नियुक्त भेलाह। अप्रैल 1941 मे 'विद्यालंकार' दैनिक विश्वामित्रक बम्बई संस्करणक सम्पादकक भार उठौलनि। एहि भारक निर्वहन ओ अगस्त 1943 धरि कएलनि। आ से बड़ कुशलता सँ कएलनि। 1942 मे अगस्तक क्रान्तिक समय मे श्रीकान्त ठाकुर केँ ओहि क्रान्तिक केन्द्रस्थल बम्बई मे रहबाक अवसर प्राप्त छलनि। ओहिठाम रहैत ओ स्वतंत्रता आन्दोलनक अन्तिम लड़ाइ मे बहुत सक्रियताक संग काज केलनि। ओ भारत छोड़ो आन्दोलन मे हिन्दीक एकटा प्रमुख दैनिकक प्रधान सम्पादकक हैसियत सँ प्रमुख घटना सभ मे परोक्ष रूप सँ भाग लैत रहलाह तथा ओहि अवधि मे आन्दोलनकारी लोकनिक भूमिगत क्रिया-कलाप मे मददि करैत रहलाह। कतोक फरारी केँ अपन कार्यालय आ निवास स्थान पर नुका कऽ रखलनि। संगहि हुनका लोकनिक काज लेल धन सेहो इकट्ठा कएलनि।
फेर एक बेर 1944 ई.क अक्टूबर मे श्रीकान्त ठाकुर कलकत्ताक दैनिक लोकमान्य सँ जुड़लाह आ अक्टूबर 1945 धरि प्रधान सम्पादकक रूप मे काज करैत रहलाह। नवम्बर 1945 मे हुनका बनारसक दैनिक 'आज'क प्रधान सम्पादक बनबाक निमंत्रण भेटलनि आ ओ तकरा सहर्ष स्वीकार कऽ लेलनि। ओहि समय मे देशक सर्वोच्च हिन्दी दैनिक 'आज'क हालत बहुत खराब भऽ गेल छलैक। ओकर मालिक दैनिकक हालत मे सुधार करबाक लेल सभ सँ उपयुक्त सम्पादक श्रीकान्त ठाकुर केँ बुझलनि। ओहि समय धरि श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' हिन्दी दैनिकक प्रधान सम्पादकक रूप मे अपन धाख देश भरि मे जमा चुकल छलाह।
पत्रकारिता केँ समाजक विचार ओ साहित्यक संवाहिकाक रूप मे जानल जाइत रहल अछि। समाजक निर्माण मे साहित्य, सिनेमा आ पत्रकारिता, मतलब पत्र-पत्रिकाक महती भूमिका रहल अछि। "समय आ समाजक सन्दर्भ मे सजग रहि कऽ आम नागरिकक भीतर दायित्व बोधक चेतना जागृत करबाक कला केँ पत्रकारिताक संज्ञा देल गेल अछि। असत्य, अशिव आ असुन्दर पर सत्यम् शिवम् सुन्दरम् क शंखध्वनि पत्रकारिता थिक। पत्रकारिता अभिव्यक्तिक एक गोट मनोरम कला थिक। एकर कार्य जनता आ जन नेता लोकनिक समक्ष लोक-कल्याण संबंधी कार्यक सूची प्रस्तुत करब थिक। पत्रकारिता केँ कला आ वृत्तिक संग जन सेवाक रूप मे सेहो परिभाषित कएल गेलैक अछि।
स्वतंत्रता सँ पूर्वक पत्र सभक स्वतंत्रता-संग्रामक हेतु अस्त्र-शस्त्रक रूप मे प्रयोग भेलैक तथा अंग्रेज शासकक कोप भाजन बनि भारतीय पत्र पत्रिका सभ समाज केँ एकटा नब दिशा प्रदान कएलकैक। यंग इंडिया, हरिजन, आज, स्वदेश, कर्मभूमि, प्रताप, रणभेरी, सेनापति सदृश अनेक पत्र भारतीय जनमानस केँ अत्यधिक प्रभावित कएलकैक। महर्षि अरविन्द, भूपेन्द्र नाथ दत्त, डॉ. एनी बेसेन्ट, गोपालकृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, विपिन चन्द्र पाल, चितरंजन दास, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, महात्मा गांँधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, आदि अनेक नेता लोकनि राष्ट्रक सेवा निमित्त पत्रकारिता सँ अपन संबंध जोड़लनि। महान साहित्य विशेषज्ञ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, लाला खड्ग बहादुर मल्ल, अम्बिका प्रसाद व्यास, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रताप नारायण मिश्र, मुंशी प्रेमचन्द, बाबूराव विष्णु पराड़कर, माखन लाल चतुर्वेदी, लक्ष्मण नारायण गर्दे, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' कृष्ण दत्त पालीवाल पत्रकारिता केँ राष्ट्रीय नव जागरणक साधन स्वीकार कएलनि तथा एक मिशनक रूप मे एकरा त्यागशील संघर्षमय परम्पराक नियामक मानलनि।
एतेक स्पष्टीकरण देलहुँ, ई स्पष्ट करबाक लेल जे हाथ मे कलम धएने, पत्रकारिता मे संलिप्त एकटा बुद्धिजीवी सेहो स्वतंत्रता सेनानीक रोल अदाए कऽ सकैत अछि, से बुझबा मे (विश्वास करबा मे) ककरो संशय नहि रहए। आ एहने स्वतंत्रता सेनानी छलाह श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'। कलमे हुनकर अस्त्र-शस्त्र छलनि। ओहि कलम केँ मजबूती सँ पकड़ने रहबाक शक्ति दैत रहलनि हुनकर नैतिकता। नैतिकताक संग पत्रकारिता करैत ता धरि स्वतंत्रता आन्दोलनक हिस्सा बनल रहलाह, जा धरि ब्रिटेनक चंगुल सँ अपन भारत देश पूरणतया मुक्त नहि भऽ गेल।
नोट : श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्व ओ कृतित्व पर किछु लिखबा लेल हमरा सुरेश्वर झा द्वारा लिखल गेल मोनोग्राफ पढ़ब आवश्यक छल, जे साहित्य अकादमी, दिल्ली सँ प्रकाशित अछि। सुरेश्वर झा द्वारा देल जनतब केँ हम अपना ढंग सँ प्रस्तुत कएलहुँ अछि एहि आलेख मे। अक्षरशः नकल नहि कएल अछि। कतहु-कतहु एकाध पैराग्राफ लेलहुँ अछि। सेहो अक्षरशः नहि। तैं पृष्ठ संख्या मेन्शन नहि कएल अछि।
संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर
'विद्यालंकार'एवं
हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर
'विद्यालंकार'एवं
हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर
'विद्यालंकार'एवं
हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-4
विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-16
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-17
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-18
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-19
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-20
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-21
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-22
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-23
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-24
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा
'व्यास'
एवं हुनक परिवारक योगदान-25
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