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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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विदेह नूतन अंक
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कल्पना झा

मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-१०

'कूल डैड'/सहृदय पिता 'विद्यालंकार'

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विद्यालंकार' जीक सामाजिक उपलब्धि आ हुनकर सार्वजनिक छवि पर चर्चाक उपरान्त आब गप्प करब हुनकर व्यक्तित्वक दोसर पहलू, मतलब पारिवारिक जीवन मे हुनकर बात-व्यवहार पर। घरक भीतर हुनकर छवि केहन छलनि, ताहि पर गप्प करब सेहो आवश्यक अछि। कोनो सफल व्यक्तिक व्यक्तित्व पर चर्चा अपूर्णहि मानल जाएत, जँ हुनकर पारिवारिक जीवन पर चर्चा नहि कएल जाए। सफल व्यक्ति ओ नहि जे सामाजिक मंच पर सफलताक उच्चतम शिखर पर विराजित भऽ जाए, मुदा घरक भीतर घरक लोक हुनकर व्यवहार सँ परेशान रहथि। ओहुना सार्वजनिक छवि (public persona) नीक बना कऽ राखब ओतेक कठिन नहि छै जतेक कठिन घरक भीतर आजीवन संतुलित व्यवहार राखैत सभ संबंधक निर्वहन करब छै। मुदा से दुनू क्षेत्रमे सामंजस्य बैसबैत अपन प्रतिष्ठा बनौने रहलाह 'विद्यालंकार' जी। गृहस्थ धर्मक निर्वहन लेल सेहो ततबे तत्पर रहलाह आजीवन, जतेक देस आ समाज-सेवा लेल तत्पर रहलाह ओ। मतलब सामाजिक आ पारिवारिक जीवन मे कुशलतापूर्वक सामंजस्य बैसबैत एकटा आदर्श प्रस्तुत करबा मे सफल रहलाह, एहन जनतब भेटि रहल अछि हमरा।

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विद्यालंकार' जीक पारिवारिक जीवन पर चर्चा लेल सामग्री जुटेबाक क्रम मे अपन मसिया सासु (श्रीमती मंजुला झा) सँ पुछलियनि फोन पर, "नाना जी केहन पिता छलाह मौसी? कोनो संस्मरण सुनाबथु ने..." एहि प्रश्नक जवाब मे मौसी कहलनि, "आइ काल्हि बच्चा सभ बाजैत अछि ने, 'कूल', से तेहने छलाह बाबूजी। एकदम 'कूल डैड'। मोन नहि पड़ैए जे कहियो कोनो भाए-बहिन केँ जोरसँ चिकरि कऽ सोरो कएने हेथिन। डाँटब-मारब तऽ दूरक बात। परिवारक अन्य सदस्य सेहो इएह कहनाम छनि। एहि सन्दर्भ मे बेरा-बेरी परिवारक अन्य सदस्य सभसँ सेहो गप्प कएलहुँ हम।

छओ गोट पुत्री, अम्बा, त्रिपुरा, उर्मिला, मंजुला, सुशील, मधु आ दू गोट पुत्र ललन जी, मदन जीक पिता श्रीकान्त ठाकुर, धाकड़ पत्रकार बला चोला उतारि कऽ प्रवेश करैत छलाह घरक भीतर। घरक भीतर ओ एकटा जिम्मेदार पति आ पिता मात्र बनल रहलाह। पिताक मूलभूत कर्तव्य जे छै, माने सन्तानक लालन-पालन लेल अर्थोपार्जन करब, सुरक्षा आ संरक्षण सुनिश्चित करब, तकर निर्वहन तँ सहजहि कएबे कएलनि। एकर अतिरिक्त सभ धिया-पूताक शिक्षा-दीक्षा पर विशेष 'फोकस' रहलनि हुनकर। एकेडमिक शिक्षाक संग नैतिक शिक्षाक प्रति जागरूक छलाह ओ। जहिना स्वयं जड़ि सँ जुड़ल रहलाह, तहिना धिया-पूता केँ अपन परम्परा, अपन संस्कृति सँ जुड़ल रहब सिखौलनि। कहबाक माने धिया-पूताक व्यक्तित्व- निर्माण मे शिक्षा आ संस्कार, दुनूक महत्व केँ नीक जकाँ बुझैत छलाह 'विद्यालंकार' जी।

जहिना ओ देस लेल, समाज लेल, संस्था लेल, हीत-मीत लेल कर्तव्यनिष्ठ छलाह, तहिना आठो सन्तान लेल सेहो छलाह। एहन नहि छलनि जे समाजक लेल बेहाल छी आ अपन धिया-पूता दूरि भेल जा रहल अछि। अपन धिया-पूता केँ सन्मार्ग पर चलबाक प्रेरणा मात्र कहि-सुनि कऽ देब पर्याप्त नहि रहैत छै; धिया-पूताक सोझाँ अपन कर्मक माध्यम सँ सेहो आदर्श प्रस्तुत करब आवश्यक रहैत छै। धिया-पूता माता-पिताक व्यवहार सँ बहुत किछु सीखैत अछि। से 'विद्यालंकार' अपन कृत्यक रूप मे संयम, सहानुभूति आ सामाजिक जिम्मेदारी निभाबैत आदर्श प्रस्तुत करैत रहलाह धिया-पूताक सोझाँ। स्वाभाविके, धिया-पूताक चरित्र-निर्माण पर हुनकर आदर्श-व्यवहारक बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़लनि।

हमहूँ आब गृहस्थ जीवन मे प्रवेश कऽ चुकल दू टा युवा पुत्रक माए छी, तऽ हम अपन अनुभवक आधार पर कहि सकैत छी जे धिया-पूताक व्यक्तित्व-निर्माण लेल माता-पिता के बहुत रास मामला मे बड्ड बेसी सजगताक आवश्यकता रहैत छै। माने धिया-पूता केँ कतेक रोक-टोक कएल जाए, कतेक छूट देल जाए, सभ किछु मे एकटा सन्तुलन बना कऽ राखब आवश्यक रहैत छै। से सन्तुलन बनाबए मे कतहु-ने-कतहु चूक भेलनि 'विद्यालंकार' जी सँ। कारण हमरा मौसी सँ गप्पक क्रम मे पता चलल अछि जे मात्र पन्द्रह बरखक बएस मे हुनकर ज्येष्ठ पुत्र ललन जी (ऑफिशियल नाम अशोक ठाकुर) केँ गाड़ी (फोर व्हीलर) दऽ देल गेल छलनि ड्राइव करबा लेल। कने बेसीए 'कूल डैड' छलाह 'विद्यालंकार' जी। जतहु रोक-टोक करब आवश्यक छलनि, ततहु 'कूल' बनल रहलाह। तकर परिणाम ई भेलनि जे कइअक बेर गाड़ी ठोकि कऽ हाथ-पैर तोड़बा चुकल छलथिन पुत्र ललन जी।

स्वतन्त्रता भले बेसी देलथिन धिया-पूता केँ मुदा आत्मनिर्भरताक पाठ नीक जकाँ पढ़ौलथिन। आ तैं करियर-वाइज सफल छलथिन हुनकर दुनू पुत्र। ताहि दिन बेटी सभ करियर-वाइज सेट्ल होएबाक लेल पढ़ितहि नहि छलीह, तैं मौसी सभ बस ग्रेजुएशन धरि पढ़लि छथि। तकर बाद सभ अपन-अपन घर-गृहस्थी मे रमि गेलीह।

पिता 'विद्यालंकार'क स्नेह आ समय हुनकर सन्तान सभ केँ भेटलनि, जे हुनका लोकनिक मानसिक ओ भावनात्मक विकास मे सहायक रहलनि। आदर्श पिता जकाँ आत्मीयता देखबैत, अपन सन्तान सभ केँ ई विश्वास दिऔलनि जे अहाँ सभ जेहन छी, तेहने हमरा स्वीकार्य छी। हमर सिनेहक पात्र छी।

ओवरऑल मे देखल जाए तँ पिता-धर्मक पालन इमानदारी सँ करैत धिया-पूताक सुख-सुविधाक व्यवस्था करबा सँ लऽ कऽ हुनका लोकनिक उज्ज्वल भविष्य लेल उचित मार्गदर्शन दैत रहलाह अपना जीबैत काल धरि। मात्र शिक्षा आ करियरक क्षेत्र मे नहि अपितु एकटा नीक मनुक्ख बनबा लेल सेहो हुनका सभ केँ प्रेरित कएलनि। धिया-पूताक रुचि आ प्रतिभाक सम्मान करैत हुनकर सभक मार्गदर्शन करैत रहलाह। कहियो ककरो पर अपन विचार थोपलनि नहि । कोनो तरहक दबाव नहि देलनि। वास्तव मे 'कूल डैड'/सहृदय पिता एहने पिता केँ ने कहल जाएत ?

 

संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-

मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-7

मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-8

मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-9

विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि-

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24
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साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
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