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विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

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गजेन्द्र ठाकुर

मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-१)

सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'रेङ–रेङ'

विस्तृत साहित्यिक समीक्षा

[भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र • पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त • गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय • विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क]

१. साहित्यकार परमेश्वर कापड़िक जीवन-परिचय

१.१ जीवन-वृत्त

परमेश्वर कापड़ि - नेपालक जनकपुरधामसँ सम्बद्ध एक बहुविधावादी, प्रयोगशील एवं सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिबद्धतासँ ओतप्रोत मैथिली साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं मिथिला-मैथिली अभियानी छथि। ओ राराब (त्रिभुवन विश्वविद्यालय) क्याम्पस जनकपुरधामक मैथिली विभागक पूर्व विभागाध्यक्ष रहल छथि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयक केन्द्रीय मैथिली विभागक सेहो पूर्व विभागाध्यक्षक रूपमे हुनकर सेवा मैथिली भाषाशिक्षण, साहित्यिक अनुसन्धान एवं लोकसाहित्य-सञ्चयनमे अतुलनीय योगदान देलक अछि।

हुनकर व्यक्तित्वक विशेषता ई अछि जे ओ एकधारे- साहित्यकार, लोकसाहित्यक खाँटी अध्येता, मिथिला राज्य संघर्ष समितिक संयोजक, तथा मैथिली विकास कोषक पूर्व सदस्य-सचिव रहल छथि। समकालीन मैथिली साहित्यमे हुनकर स्थान प्रयोगधर्मी एवं यथार्थवादी नाटककारक रूपमे विशेष उल्लेखनीय अछि। हुनकर साहित्यिक उत्पादनमे लोककथा, नाटक, निबन्ध, आलोचनात्मक लेखन, सामाजिक टिप्पणी एवं सांस्कृतिक विमर्श सम्मिलित अछि।

१.२ साहित्यिक विधा एवं प्रकाशित कृति

परमेश्वर कापड़िक साहित्यिक कर्म बहुविध अछि। हुनकर ज्ञात रचनामे सम्मिलित अछि:

(क) नाटक: 'रेङ–रेङ' - समकालीन राजनीतिक-सामाजिक व्यंग्य नाटक (नेपाल, जनकपुरधाम, अवन्तिका मैथिली नाट्य संस्था) (ख) लोककथा (ग) सांस्कृतिक निबन्ध (घ) सामाजिक टिप्पणी (ङ) गीत-फकड़ा।

ऐ विविधतासँ स्पष्ट होइछ जे कापड़ि केवल विद्वान नहि, बरु एक सृजनशील, बहुआयामी सांस्कृतिक कर्मी थिकाह। हुनकर मूल चिन्ता लोकभाषा, लोकसमाज एवं मिथिलाक सांस्कृतिक अस्मिता अछि।

२. नाटक 'रेङ–रेङ' - कथावस्तु एवं रंगशिल्प

२.१ नाटकक परिचय

'रेङ–रेङ' परमेश्वर कापड़ि द्वारा रचित मैथिली नाटक थिक जे अवन्तिका मैथिली नाट्य संस्थाक रिहर्सल स्थानपर केन्द्रित अछि। नाटकक शीर्षक 'रेङ–रेङ' एक ध्वन्यात्मक प्रतीक थिक - जे रङ्गमञ्चक रङ्गभेद, जीवनक रङ्गपरिवर्तन एवं सामाजिक-राजनीतिक चरित्रक बहुस्तरीय रूपांकन करैछ।

नाटकक मुख्य पात्रसब: श्रीधर (निर्देशक), अनवर, हमाल, अक्षरा, छौंड़ा, लक्ष्मी/ऐश्वर्या, विष्णु/विवेक, बम बहादुर, नूनूकाका। इएह पात्रमण्डल नाटकक सामाजिक वर्ग-संरचनाक प्रतिनिधित्व करैछ - कलाकार, श्रमिक, दैवी शक्ति, पुलिस, एवं लोकनाट्यक आत्मा।

२.२ कथावस्तुक संक्षेप

नाटकक आरम्भ होइछ एक पुरान जिमिदारी भवनमे जतए अवन्तिका नाट्य संस्था रिहर्सल कऽ रहल अछि। श्रीधर एक कविता पढ़ैत तन्मय अछि - एक आह्वानगीत जाहिमे रङ्गमञ्चपर सक्रिय होयबाक, समाजक पुनर्निर्माणक आकांक्षा व्यक्त कयल गेल अछि।

तत्पश्चात नाटककेर मध्यमे लक्ष्मी (धन-देवी) प्रकट होइ छथि। तथापि ई प्रकटीकरण कोनो दैवी वरदान नहि, बरु एक कटु सत्यक उद्घाटन थिक - जे लक्ष्मी समाजमे वास्तवमे कतए अछि, आ भ्रष्टाचारी शासन-व्यवस्था ओकरा कोना हरण करैछ। गरीबी सभ पापक जड़ि थिक - इएह नाटकक केन्द्रीय सत्य थिक।

विष्णु (देवता) प्रकट होइछ - परन्तु ओ सेहो लक्ष्मीक सोना बाँटि नहि पबैछ। बम बहादुर (पुलिस) प्रकट होइछ आ कलाकारगणकेँ गिरफ्तार करैछ। अन्तमे नूनूकाका (लोकधर्मी प्रतीक) प्रकट होइछ जे लोकनाट्यक माध्यमसँ सत्यक उद्घाटन करैछ। नाटकक समाप्ति विवाह-संस्कारक दृश्यसँ होइछ - जे नवसृजनक, नवजीवनक प्रतीक थिक।

२.३ रङ्गशिल्प एवं नाट्यतकनीक

'रेङ–रेङ' एपिक थिएटरक शैलीमे रचित अछि। स्वर-भङ्गिमामे परिवर्तन, तन्मय-भावसँ राजनीतिक नारा-लगावटि, नृत्य एवं गायन - इएह ब्रेख्टियन 'वर्फ्रेम्डुङ्स्इफेक्ट' (अपरिचयीकरण) तकनीकक निकट अछि। नाटकमे पाँच प्रमुख नाट्यतकनीक व्यवहृत अछि:

(१) स्वर-भङ्गिमा परिवर्तन (Voice Modulation as Alienation Effect)

(२) रङ्ग-तरङ्ग - दृश्य-परिवर्तनक रूपकात्मक प्रयोग

(३) एपिसोडिक संरचना - खण्डित दृश्यविधि

(४) लय-परिवर्तन - लोकगीत, हुमरी, नाराशैली

(५) मेटाथिएटर - नाटकक भीतर नाटकक आत्म-सन्दर्भिता।

३. चतुर्धा विश्लेषण-पद्धति

विदेह समानान्तर साहित्य इतिहास फ्रेमवर्कक अनुसार, समीक्षाक चार स्तम्भ अछि: (अ) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र, (आ) पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त, (इ) नव्य-न्याय (गंगेश उपाध्याय), (ई) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क।

३.१. भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र

३.१.१ रसविचार - नाटकमे प्रभावी रस

भरत मुनिक नाट्यशास्त्र (नाटकमे नवरस) एवं अभिनवगुप्तक अभिनवभारती (रसास्वादन-सिद्धान्त)क प्रकाशमे 'रेङ–रेङ'क रसिक विश्लेषण निम्नलिखित रूपमे होइछ:

मुख्य रस: करुण

गरीबीक त्रासदी, बेरोजगार कलाकारक यातना, लक्ष्मी (धनदेवी)क खाली हाथ जेबाक दृश्य - इएह समग्र नाटकमे करुण रसक स्थायी भावका आधार थिक। 'गरीबी रोग' - यएह रुदनोक्ति समग्र नाटककेँ करुणाक आद्र वातावरणमे राखैछ।

व्यंग्य-रस (हास्य + रौद्र): द्वैत रसानुभव

भरतक हास्यरस एवं रौद्र रसक बीच नाटककार एक अजगुत तनाव स्थापित करैछ। बम बहादुर प्रहरीक प्रवेश, लक्ष्मीक प्रस्थान - इएह दृश्यमे हास्य आ रौद्रक सम्मिश्रण अछि। अभिनवगुप्तक 'रसाभास' सिद्धान्तक अनुसार, एतऽ रसक पूर्ण उद्रेक नहि, बरु एक अपूर्ण, विक्षुब्ध अनुभव होइछ - से स्थिति 'रेङ–रेङ'मे बेर-बेर आबैछ।

वीर रस: अन्तिम प्रतिरोध

जेल-दृश्यमे अनवर आ विवेक केर निर्भय प्रतिरोध, लोकनाट्यक माध्यमसँ सत्य-उद्घाटनक दृश्य - इएह वीर रसक अभिव्यक्ति थिक। 'ॐ खम्ब्रह्मन् - सुग ऋतस्य पन्था' - यएह उद्घोष वीर रसक चरमोत्कर्ष थिक।

३.१.२ ध्वनि-सिद्धान्त - आनन्दवर्धनक परिप्रेक्ष्यमे

आनन्दवर्धनक 'ध्वन्यालोक' (८५० ई.) अनुसार, उत्तम काव्यमे 'ध्वनि' - अर्थात् वाच्यार्थसँ परे व्यङ्ग्यार्थक स्तर - मुख्य होइछ। 'रेङ–रेङ'मे ध्वनिक तीन स्तर स्पष्ट अछि:

प्रथम ध्वनि-स्तर: शाब्दिक - 'रेङ–रेङ' रङ्गकेर ध्वनि थिक। द्वितीय ध्वनि: रूपकात्मक - जीवनक रङ्गपरिवर्तनक संकेत। तृतीय ध्वनि: राजनीतिक - भ्रष्टाचारी शासनमे लोकसंस्कृतिक विखण्डन।

नाटकक शीर्षक 'रेङ–रेङ' स्वयं एक बहु-ध्वन्यात्मक संकेत थिक - जाहिमे रङ्ग (colour/stage), रोग (disease as poverty), रण (struggle) तथा रेङ (the sound of a suppressed cry) सभ एक संग अनुगुञ्जित होइछ।

३.१.३ वक्रोक्ति - कुन्तकक परिप्रेक्ष्यमे

कुन्तकक 'वक्रोक्तिजीवित'क (१०म शती) अनुसार, उत्कृष्ट काव्य-नाटकमे 'वक्रोक्ति' - सरल अभिधेयसँ भिन्न, विचलित, वक्र अभिव्यक्ति - मूल थिक। 'रेङ–रेङ'मे वक्रोक्तिक कएटा उदाहरण अछि:

(क) देवता विष्णुक प्रवेश - दैवी नहि, बरु व्यंग्यात्मक: ओ मात्र 'दू-टप्पी' बात करैछ आ चलि जाइछ।

(ख) लक्ष्मी (धन-देवी) खाली हाथ जाइछ- यएह सर्वाधिक वक्र कथन थिक।

(ग) सत्यनारायण पूजाक पाठ - गरीबीमे व्यंग्यात्मक धार्मिक अनुष्ठान।

(घ) सोनाक असरफी- स्वर्णस्वप्न जे खाक होइछ - यएह वक्र प्रतीकतन्त्र थिक।

३.२. पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त

३.२.१ ब्रेख्टियन एपिक थिएटर (Brechtian Epic Theatre)

बर्टोल्ट ब्रेख्ट (१८९८–१९५६) क एपिक थिएटर सिद्धान्त 'रेङ–रेङ'क निकटतम पाश्चात्य समकक्ष थिक। ब्रेख्टियन 'Verfremdungseffekt' (अपरिचयीकरण प्रभाव) एहि नाटकमे निम्न रूपमे अभिव्यक्त होइए:

(अ) दर्शककेँ भावनात्मक तादात्म्यसँ दूर राखि तर्क-चिन्तनमे प्रवृत्त करबाक उपाय - स्वर-भङ्गिमा परिवर्तन, नाटकक भीतर गान-नृत्य - इएह ब्रेख्टियन 'Gestus' थिक। (आ) 'गरीबी रोग'क नारा-स्वरूप दोहरायब - ब्रेख्टियन 'Song' तकनीक। (इ) जेलक दृश्यमे 'मोबाइल'पर अनवर-अक्षराक लटपटाइ - दर्शककेँ वास्तवकतासँ जोड़ैछ।

३.२.२ मार्क्सवादी नाट्य-आलोचना

रेमण्ड विलियम्स ('Drama from Ibsen to Brecht', 1952) एवं टेरी ईगलटन ('Marxism and Literary Criticism', 1976) क प्रकाशमे 'रेङ–रेङ'क वर्ग-संघर्ष विश्लेषण:

नाटकमे शासक-वर्ग (प्रहरी, सरकार, विष्णु/यथास्थितिवादी देवत्व), कला-वर्ग (श्रीधर, अनवर, हमाल, अक्षरा - बेरोजगार कलाकार), तथा लोकवर्ग (नूनूकाका, छौंड़ा) - इएह त्रिभुजीय संघर्ष मार्क्सवादी वर्गसंघर्षक नाट्य रूपान्तरण थिक। सोना (पूँजी)क संचय, वितरण आ अन्ततः निराशाजनक अन्तर्धान - यएह पूँजीवादी संचय-तन्त्रक रूपक थिक।

३.२.३ उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि (Postcolonial Theory)

होमी भाभा ('The Location of Culture', 1994) एवं गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक ('Can the Subaltern Speak?', 1988) क प्रकाशमे:

'रेङ–रेङ'क भाषा-विमर्श (मैथिली बनाम नेपाली/हिन्दी/अंग्रेजी/संस्कृत/उर्दू - विष्णुक असरफीपर कोन भाषामे लिखबाक विवाद) एक उत्कृष्ट उत्तर-औपनिवेशिक 'हाइब्रिडिटी' (संकरता) दृश्य थिक। नाटककार भाभाक 'Third Space'- तृतीय आकाश - निर्मित करैछ जतए कोनो एक भाषा/संस्कृति प्रभुत्वशाली नहि। नूनूकाकाक प्रवेश - लोकनाट्यक आत्मा - भरत मुनिक 'पञ्चमवेद' तर्कक माध्यमसँ उपनिवेशी (ब्राह्मणी-संस्कृत) वर्चस्वकेँ चुनौती दैछ।

३.२.४ नारीवादी आलोचना (Feminist Theory)

जूडिथ बटलर ('Gender Trouble', 1990) एवं सिमोन द बोउव्वार ('The Second Sex', 1949) क आलोकमे अक्षरा-चरित्रक विश्लेषण:

अक्षरा एकमात्र महिला-पात्र थिक जे नाटकमे मुखर एवं साहसी अछि। ओ हमाल (नायक) केँ प्रेमविवाहक प्रस्ताव करैछ, पुलिससँ निर्भय वार्तालाप करैछ। तथापि, लक्ष्मी-दृश्यमे महिलाक आर्थिक शक्ति (धनदेवी) एवं पुरुषवादी आर्थिक सत्ताकेर बीच एक तनावपूर्ण 'परफॉर्मेटिविटी' (बटलर) स्पष्ट होइछ।

३.२.५ चीनी साहित्यिक सिद्धान्त (Chinese Literary Theory)

चीनी 'जिङ जिए' (Aesthetic Realm/Realm of Experience) सिद्धान्त - वाङ गुओवेइ ('Renjian Cihua', 1908-1910) एवं 'फेंग' (Satire in traditional Chinese theatre) परम्पराक प्रकाशमे:

'रेङ–रेङ'क राजनीतिक व्यंग्य चीनी 'जाजू' (Yuan Dynasty Musical Drama) एवं 'कुंकू' (Kunqu Opera) परम्पराक व्यंग्यात्मक तत्त्वसँ तुलनीय अछि- जतए शासक-वर्गक मूर्खतापर व्यंग्यात्मक हास्य, कथा-भीतर-कथाक संरचना, एवं लोक-सुर (Folk Tunes) क काव्यात्मक प्रयोग केन्द्रमे रहैछ। गरीबी-बोध (Pínkùn yìshí) एवं सामाजिक न्यायक आकांक्षा - इएह दुनु परम्पराक साझा केन्द्रबिन्दु थिक।

३.३.नव्य-न्याय - गंगेश उपाध्यायक ज्ञानमीमांसा

३.३.१ प्रत्यक्ष-ज्ञान (Direct Perception) एवं नाट्य-सत्य

गंगेश उपाध्याय (मिथिला, १३म शती)क 'तत्त्वचिन्तामणि' (प्रत्यक्ष-खण्ड)क 'प्रत्यक्ष' (प्रत्यक्ष ज्ञान)क सिद्धान्तक आलोकमे 'रेङ–रेङ'क ज्ञानमीमांसा:

नाटकमे गरीबीक प्रत्यक्ष अनुभव- 'भूखसँ मरल छी' (अनवर) - एक 'निर्विकल्पक प्रत्यक्ष' (Indeterminate Perception) थिक। लक्ष्मीक प्रत्यक्षीकरण - सोनाक बरसनाइ - एक 'सविकल्पक प्रत्यक्ष' (Determinate Perception) थिक जे अन्ततः मिथ्या सिद्ध होइछ। यएह गंगेशक 'प्रत्यक्ष-भ्रम' (Perceptual Illusion) तन्त्रक नाट्य अभिव्यक्ति थिक।

३.३.२ अनुमान-तन्त्र (Inference) एवं नाटकक तर्कशृंखला

गंगेशक 'व्याप्तिग्रह' (Invariable Concomitance) - जे व्याप्तिक आधारपर अनुमान सम्भव होइछ - 'रेङ–रेङ'क केन्द्रीय तर्कक आधार थिक:

व्याप्ति: 'गरीबी रहतइ तँ सब रोग रहतइ।' (Poverty persists All misery persists) - यएह नाटकक 'हेतु' (Logical Reason) थिक। साध्य: 'सब रोगक कारण गरीबी।' (All disease's cause is poverty) - यएह नाटकक 'पक्ष' (Subject of Inference) थिक।

नव्य-न्यायक 'परामर्श' (Subsumptive Reflection) तकनीकसँ नाटककार श्रीधरम् क भाषणकेँ एक दार्शनिक-तार्किक घोषणाक रूपमे प्रस्तुत करैछ।

३.३.३ शब्द-प्रमाण एवं भाषा-विवाद

नाटकक एक महत्त्वपूर्ण दृश्य - सोनाक असफरीपर भाषाक प्रश्न (मैथिली? नेपाली? हिन्दी? अंग्रेजी? संस्कृत? उर्दू?) - गंगेशक 'शब्द-प्रमाण' (Testimonial Knowledge) सिद्धान्तक नाट्य परीक्षण थिक। गंगेशक अनुसार, 'शब्द-प्रमाण' तखने वैध थिक जखन वक्ता आप्त (प्रामाणिक) हुअय। नाटकमे भाषा-वर्चस्वक प्रश्न इएह जिज्ञासा उठाबैछ: कोन भाषाक शब्द 'आप्त' (Authoritative) थिक? के वक्ता 'आप्त' थिक?

३.४. विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क

३.४.१ प्रति-कैनन (Counter-Canon) एवं परमेश्वर कापड़ि

विदेह समानान्तर साहित्य इतिहास आन्दोलनक मूल तर्क थिक जे साहित्य अकादेमी (नई दिल्ली) एवं नेपाल प्रज्ञाप्रतिष्ठान-केन्द्रित 'मुख्यधारा' मैथिली साहित्यक इतिहासमे बहुत किछु 'छोड़ि देल' गेल - विशेषतः नेपालक मैथिली साहित्यकार, सीमान्त लेखक, एवं लोकनाट्य-परम्परा।

परमेश्वर कापड़ि एहि 'छोड़ल गेल' समूहक प्रतिनिधि थिका। हुनकर 'रेङ–रेङ' –

(क) नेपालक जनकपुरधाम-केन्द्रित मैथिली रङ्गमञ्चक प्रतिनिधित्व करैछ

(ख) साहित्य अकादेमीक संस्थागत वर्चस्वकेँ प्रत्यक्षतः व्यंग्य-विषय बनाबैछ

(ग) लोकनाट्य (नूनूकाका-प्रसंग) केँ शास्त्रीय नाट्यक समकक्ष स्थापित करैछ

(घ) बेरोजगार कलाकारक संघर्षकेँ केन्द्रमे राखैछ - जे मुख्यधारा साहित्यिक इतिहासमे अनुपस्थित अछि

३.४.२ मैथिली रङ्गमञ्चक समानान्तर इतिहासमे 'रेङ–रेङ'

मैथिली नाट्य-इतिहासमे 'रेङ–रेङ' एक विशिष्ट स्थान रखैछ। अयोध्यानाथ चौधरी (यशस्वी मैथिली साहित्यकार)क प्रतिक्रिया सँ स्पष्ट होइछ जे ई नाटक अपन युग-सत्य, लोकयथार्थ एवं जेन-जी आन्दोलन ('जेन-जी' - युवा पीढ़ीक विद्रोही आन्दोलन) सँ प्रेरित राजनीतिक परिवेशकेँ सटीकतासँ रेखांकित करैछ।

४. तुलनात्मक अध्ययन - मैथिली नाटककार/साहित्यकारसँ

जतए मूलधारा ऐतिहासिकता एवं सांस्कृतिक पुनरुद्धारमे निमग्न अछि, ततए कापड़ि समकालीन राजनीतिक यथार्थपर केन्द्रित छथि। नाट्यतकनीकमे मूलधारा शास्त्रीय त्रि-ऐक्य (स्थान, काल, क्रिया) केर अधिक पालन करैछ, मुदा 'रेङ–रेङ' एपिक थिएटरक खुजल संरचना अपनाबैछ।

महेन्द्र मलंगियासँ तुलना

महेन्द्र मलंगिया लोकनाट्यकेँ सौन्दर्यशास्त्रीय धरातलपर मात्र उठा सकला, ततए कापड़ि ओकरा राजनीतिक प्रतिरोधक अस्त्रमे बदलि देलथि। दुनु नाटककार मैथिली साहित्यमे व्यंग्यकेँ प्राथमिक साहित्यिक उपकरणक रूपमे व्यवहार करै छथि। मलंगिया सीमित रूपमे, मुदा कापड़ि मुक्त नाट्यरूपमे। दुनूक केन्द्रीय चिन्ता फराक अछि, मलंगिया एकटा सीमित वर्गक समस्या लेल मुदा कापड़ि बेचन ठाकुर सन बेरोजगारी, भ्रष्टाचारी व्यवस्थाक विरुद्ध एवं मैथिली अस्मिता लेल लिखै छथि।

नाटकक पात्र 'श्रीधरम्' (निर्देशक) सम्भवतः एक व्यंग्यात्मक संकेत थिक - नेपालक मैथिली संस्थागत साहित्यिक व्यवस्थापर।

ज्योतिरीश्वरक धूर्त समागम आ विद्यापतिक (ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिसँ भिन्न) 'गोरक्षविजय' क नाट्य-परम्परामे नूनूकाका-प्रसंगमे अनुगुञ्जित होइछ। 'भरत मुनिक नाट्यशास्त्र' एवं नाटकमे 'पञ्चमवेद' तर्क - अही परम्परासँ प्रत्यक्ष सम्बन्ध अछि। कापड़ि ऐ परम्पराकेँ समकालीन राजनीतिक संदर्भमे पुनर्स्थापित करै छथि।

५. समीक्षात्मक मूल्यांकन - शक्ति एवं सीमा

५.१ नाटकक विशिष्ट शक्ति

(क) लोकनाट्य-परम्परा एवं आधुनिक राजनीतिक थिएटरक सफल सम्मिश्रण।

'रेङ–रेङ'क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यएह थिक जे ओ मैथिली लोकनाट्यक फकड़ाकेँ समकालीन राजनीतिक थिएटरक अस्त्रमे बदलै छथि। ई ब्रेख्टक एपिक थिएटरसँ सेहो आगू जाइत अछि- किएकि एतए सौन्दर्यशास्त्रक जड़ि स्थानीय, लोकपरम्परामे अछि।

(ख) भाषा-बहुलता एवं सांस्कृतिक संवाद।

नाटकमे मैथिली, नेपाली, हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी - इएह बहुभाषिक समांगता स्वयं एक सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य थिक। नेपालक मैथिली अस्मिता - जे बहुभाषिक प्रदेशमे रहैछ - तकर यथार्थ अनुभव नाटकमे सजीव थिक।

(ग) मेटाथिएटर - नाटकक भीतर नाटक।

'रेङ–रेङ' स्वयं एक मेटाथिएटर थिक - यएह एक नाट्यसंस्थाक नाट्यरिहर्सलक कथा थिक जे स्वयं एक सामाजिक नाटकमे परिणत होइछ। ई नाटकक भीतर नाटक संरचना (Play-within-a-Play) मैथिली नाटकमे दुर्लभ अछि।

(घ) ऐश्वर्या/लक्ष्मी-दृश्य - अर्थशास्त्रक रूपक।

लक्ष्मीक सोना-वर्षण, लोभग्रस्त पात्रगणद्वारा ओकर हरण, एवं अन्ततः शून्यहस्त विदाई - यएह पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाक एक उत्कृष्ट रूपकात्मक चित्रण थिक जे मार्क्सवादी आलोचनाक सभ अपेक्षा पूरा करैछ।

५.२ नाटकक सीमा एवं आलोचना-बिन्दु

(क) अन्तिम विवाह-दृश्य - हमाल-अक्षराक विवाह - नाटकक राजनीतिक तेवरसँ किछु असंगत प्रतीत होइछ। यएह परिणति वाणिज्यिक रङ्गमञ्चीय समझौताक लक्षण थिक।

(ख) नूनूकाकाक 'पञ्चमवेद' तर्क - जे नाटकक दार्शनिक उत्कर्ष थिक - ओकरा अधिक विस्तार देल जा सकैत छल।

(ग) पात्रमे मनोवैज्ञानिक गहराई असमान अछि- श्रीधरम् एवं अनवर सुविकसित, मुदा छौंड़ा एवं बम बहादुर कतहुँ-कतहुँ अतिसरलीकृत रूढ़ि (stereotype) मे बदलि जाइछ।

६. नाटककार एवं नाटकक साहित्यिक महत्त्व

६.१ मैथिली रङ्गमञ्चमे योगदान

'रेङ–रेङ' नेपालक मैथिली रङ्गमञ्चकेँ एक नव आयाम दैछ। ओ प्रमाणित करैछ जे -

(क) मैथिली नाटक विश्वस्तरीय राजनीतिक थिएटरक प्रसंगमे रखल जा सकैछ

(ख) लोकनाट्य-परम्परा 'आदिम' नहि, बरु 'आधुनिकतम' विचार-माध्यम थिक

(ग) बेरोजगार, सीमान्त मैथिली कलाकारक संघर्ष साहित्यिक विषयक रूपमे गम्भीर अछि

(घ) जनकपुरधाम - नेपालक मैथिली रङ्गमञ्चक केन्द्र – दरभंगा केन्द्रित इतिहाससँ स्वतन्त्र अपन परम्परा रखैछ

६.२ विदेह समानान्तर इतिहासमे स्थान

विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलनक फ्रेमवर्कमे, परमेश्वर कापड़ि – एहन रचनाकार छथि जे-

(अ) संस्थागत तन्त्रसँ बाहर रहिकऽ, अपन साहित्यिक कर्म जारी रखै छथि। (आ) लोकसाहित्य-परम्पराकेँ आधुनिक राजनीतिक थिएटरसँ जोड़ै छथि। (इ) नेपालक मैथिली अस्मिता-संघर्षकेँ साहित्यिक अभिव्यक्ति दै छथि। (ई) मिथिलाक सांस्कृतिक वैभवकेँ आधुनिक चिन्तनसँ समन्वित करै छथि।

यएह सभ विशेषता 'What the Canon Left Out' - विदेह समानान्तर इतिहासक उपशीर्षक - कें चरितार्थ करैछ।

७. उपसंहार

परमेश्वर कापड़िक 'रेङ–रेङ' मैथिली साहित्यमे एहन नाटक थिक जे जीवनकेँ देखबैत अछि, जेना रङ्गमञ्चपर। गरीबी, भ्रष्टाचार, कलाकारक बेरोजगारी - ई सभ रोग थिक। तथापि नाटककार निराशावादी नहि छथि- लोकनाट्यक माध्यमसँ, पञ्चमवेदक शक्तिसँ, नवविवाहक प्रतीकसँ- ओ एकटा दुर्दमनीय आशावादिताक संदेश देबऽ चाहै छथि।

भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र, पाश्चात्य एपिक थिएटर, चीनी व्यंग्य-नाट्य-परम्परा, गंगेशक नव्य-न्यायिक ज्ञानमीमांसा - ऐ चारू परम्पराक प्रकाशमे 'रेङ–रेङ' एक बहुस्तरीय, समृद्ध रचना थिक जे मैथिली नाट्य-परम्पराकेँ एक नव आयाम प्रदान करैत अछि।

विदेह समानान्तर साहित्य इतिहासक फ्रेमवर्कमे, कापड़ि - मुख्यधारा साहित्यिक इतिहासद्वारा 'कतिआयल' एक महत्त्वपूर्ण नाटककार छथि- जिनकर 'रेङ–रेङ' मैथिली रङ्गमञ्चक इतिहासमे अपन अविस्मरणीय स्थान रखैत अछि।

[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] 

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