
गजेन्द्र ठाकुर
मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-२) सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'गहन उगरास'
गहन उगरास - परमेश्वर कापड़ि
बहुआयामी नाट्यशास्त्रीय समीक्षा
'गहन उगरास'क ऐतिहासिक आ प्रकाशनक पृष्ठभूमि
समकालीन मैथिली नाट्य-परम्परा आ रंगमंचीय प्रयोगशीलताक क्षेत्रमे परमेश्वर कापड़िक नाटक 'गहन उगरास' एकटा ऐतिहासिक आ मीलक पत्थर थिक। प्रस्तुत नाट्य-कृतिक प्रथम संस्करणक प्रकाशन फागुन २०७३ मे पृथु प्रकाशन, जनकपुरधाम सँ भेल। एकटा विशुद्ध आ मौलिक नाट्य-कृतिक रूपमे लिखल गेल एहि पुस्तकक आवरण चित्र सुप्रसिद्ध मिथिला चित्रकार एस. सी. सुमन द्वारा आ सेटिङ तथा डिजाइन कुमार भास्कर द्वारा कयल गेल। परमेश्वर कापड़ि अपन एहि विशिष्ट नाटक कें मैथिलीक सुप्रसिद्ध आ ऐतिहासिक रंगकर्मी कुणालजी कें समर्पित कयलनि अछि, जिनकर रंगमंचीय सक्रियता आ नाट्य रचनाशीलता पर मैथिली भाषा आ साहित्य कें अनन्त गौरव अछि।
नेपाली रंगमंचक मूर्धन्य विद्वान डा. अभि सुवेदी एहि नाटकक संरचना कें "प्रयोगशील" घोषित करैत लिखने छथि जे नाटककार कापड़ि पारम्परिक दृश्य-विधान वा कृत्रिम सेनोग्राफी (scenography) क स्थान पर मानवीय सम्वाद आ सम्वादक आन्तरिक सम्बन्ध सँ रंगमंचक निर्माण कयलनि अछि। नाटकक मुख्य पात्र जिमदार अछि आ ओकर चारू कात सामाजिक सम्बन्धक बनब आ भथब चलैत रहैत अछि। नाटककार परमेश्वर कापड़ि व्यवस्था सँ ढुइस लैले जानल जाइत छथि। ओ स्वयंमे मैथिलीक एकटा जीवन्त शब्दकोश छथि, जकर प्रकर प्रमाण 'गहन उगरास'क खाँटी आ समृद्ध मैथिली शब्दावलीमे देखल जा सकैछ।
ऐतिहासिक रूप सँ, नेपालक सीमामे अवस्थित मिथिलांचलक रंगमंचीय आ सांस्कृतिक राजधानी जनकपुरधाम थिक। जकर आभाक मूल शक्ति वर्ष १९७९ मे स्थापित 'मिथिला नाट्यकला परिषद' (मिनाप) रहय, जकर उष्मा सँ मैथिली नाट्य चेतना जाग्रत रहैत छल। मुदा बीसम शताब्दीक अन्त होइत-होइत धीरेन्द्र-धूमकेतुजीक असामयिक निधनसँ जनकपुरक रंगमंच कने सेराए लागल। ताही समय भारतक पटनाक रंगमंच सेहो निष्क्रियताक शिकार भ' गेल, गाउँ-घरक पारम्परिक मंच पर अश्लील ऑर्केस्ट्राक कब्जा भ' गेल, आ विद्यापति पर्वक नाम पर चन्दा-चिट्ठाक व्यापार करैबला लोक पागक स्थान पर योग्य लोक कें दाग दै लागल। महेन्द्र मलंगियाक ’स्लैपस्टिक ह्यूमर’ सर्वहारापर उपहास करैत रहल। एहेन भीषण अन्हारमे जनकपुरमे 'मिनाप', 'आकृति', 'अछिंजल' आ 'भंगिमा' सन संस्था सभक प्रयास सँ मैथिली नाटकक पुनरुत्थान भेल। ठीक ताही समय नेपालक १० वर्षक माओवादी जनयुद्ध आ दोसर जनआन्दोलनक विभीषिका सँ उपजल यथार्थ सँ प्रेरित भ' क' रमेश रंजन 'सखी' नाटकक संग अएलाह आ परमेश्वर कापड़ि 'गहन उगरास'क संग।
नाटकक कथ्य संरचना, प्रतीक योजना आ सामाजिक-राजनैतिक यथार्थ
'गहन उगरास'क कथानक मुख्य रूप सँ दू भागमे विभक्त अछि, जे नेपालक सामन्ती संक्रमणकाल, जनयुद्धक सामाजिक प्रभाव आ सांस्कृतिक औपनिवेशीकरणक ऐतिहासिक विमर्श कें रूपकात्मक ढंग सँ प्रस्तुत करैत अछि। नाटकक आरम्भिक कालखण्ड नेपालक दोसर जनआन्दोलन (विक्रम संवत २०६२-६३) क बादक प्रतिगमन कालक राजनैतिक संकट थिक। राजशाही आ निरंकुश पंचायती व्यवस्थाक दमन शिथिल भ' रहल अछि, मुदा ज्ञानेन्द्रक सरकार बल-जबरदस्ती सत्ता कें अपन वशमे रखबाक अन्तिम चेष्टा क' रहल अछि, जखन कि दोसर दिस संविधान सभाक माध्यम सँ संघीय गणतन्त्रक लेल नव आन्दोलनक लहरि देशमे पसरल अछि।
प्रथम भागक सूक्ष्म कथ्य विश्लेषण
नाटकक प्रथम भागक आरम्भ सामन्ती अवशेषक प्रतीक राजपूत जिमदार फुलगेन सिंहक ढहल-ढनमनाएल घर सँ होइत अछि, जकर एको टा बखारीमे अन्नक दाना नहि अछि। जिमदारक बाल-बच्चा सभ बाहरे रहैत अछि आ गामक धानुक (मनेजरा) ओकर सेवा-टहल आ भन्सा-भात करैत अछि। खौझाह बूढ़बा जिमदार फुलगेन सिंह ठेहुना-पिट्ठीमे गमछा लपेटने माछी मारैत अपन पुरान सामन्ती धाक कें स्मरण करैत अछि। गामक ढीठ आ पिङल धियापूता (टुनमा आ मुसना) जिमदारक ओसारी पर "हाथी अगत्त, घोड़ा अगत्त, अइ बाबा बियाहमे पोता चलत" आ "रेङ-रेङ-रेङ, तोरा पतलीमे बेङ" जकाँ पारम्परिक लोक-गीत गाबि क' ओकर उपहास करैत अछि। दू टा छौड़ी जट-जटिन खेलैत जिमदार कें "गामके अधिकारी ई जिमदरबा छै गे ना, कनही तराजू घटबी सेर छै गे ना" कहि क' ओकर शोषक चरित्र कें नंगा करैत अछि।
एहि बीच सती नामक एकटा मध्य-वयस्क महिलाक प्रवेश होइत अछि, जे जिमदार कें गारी-गलौज करबा सँ रोकैत अछि आ चेतबैत अछि जे आब सामन्ती दमनक युग समाप्त भ' गेल अछि आ "लात जुत्ता" लागब निश्चित छैक। तखनिए रंगमंच पर पाँच टा क्रान्तिकारी युवा लोकनिक प्रवेश होइत अछि:
फुलो खतबे: एकटा जुझारू दलित मानवाधिकार कार्यकर्ता।
दुखिया सादा: एम्नेस्टी इन्टरनेशनलक प्रतिनिधिक रूपमे शोषितक आवाज।
सुभद्र मंडल: एकटा सक्रिय राजनैतिक कर्मी।
ज्वाला प्रसाद सिंह (ज्वाला): माओवादी जनयुद्धक भूमिगत लड़ाकू, जे शोषकक अन्त लेल हथियार उठाने अछि।
विद्यापति यादव: प्रखर पत्रकार आ संचारकर्मी, जे कलम बले शोषक वर्ग कें नाङट करैत अछि।
जिमदार जखन अपन पुरान सामन्ती शोषणक घमण्ड देखाबैत कहैत अछि जे "बाप-दादा हवेलीमे गाइ चराबैत रहे आ कनियाँ सभ हवेलीक दासी बनैत छलीह", तखन क्रुद्ध भ' क' माओवादी लड़ाकू ज्वाला सिंह ओकरा एक झाप (एड़) मारैत अछि, जाहिसँ बूढ़ जिमदार थुरथुर काँपैत भूइँ पर खसि पड़ैत अछि। सभ युवा प्रतिगमनक विरुद्ध भ' रहल पैघ राजनैतिक सभामे रिपोर्टिङ आ सहभागिताक लेल चलि जाइत छथि। कनी कालक बाद सेवक दौड़ैत अबैछ आ बुढ़बा खोखना आ बुढ़िया कें रोइत-कनैत जानकारी दैत अछि जे स्कूलक राजनैतिक सभामे पुलिस अन्धाधुन्ध गोलीबारी कयलक, जाहिमे सतीक छातीमे दू टा गोली लागल आ ओ मरी गेलीह, ज्वाला सिंहक तत्क्षण मृत्यु भ' गेलै, फुलो अन्तिम साँस लेइत अछि, आ सुभद्र तथा विद्यापतिक स्थिति अत्यन्त गम्भीर अछि।
द्वितीय भागक रूपकात्मक आ सांस्कृतिक विमर्श
नाटकक द्वितीय भाग एकटा अतियथार्थवादी (Surreal) आ रूपकात्मक यात्राक रूपमे आरम्भ होइत अछि। बाबा अभेलबा आ ओकर लकवा-ग्रस्त बकलेलबा चेला (जे धान कुटैत सन थरथराइत चलैत अछि) हाथमे तुमरी-कमण्डल आ कम्मल लेने जनकपुरधामक दिश "लटक सटक सियारामा" भजन गाबैत जा रहल छथि। चेला अपन माथक मोटरी खसबाक बादो जोगिरा गाबैत अछि। जनकपुरधाम पहुँचि क' ओतय सूत'क लेल जमा भेल लोक सभ (लखना, बेचना, मंगला, जनका) जुटि जाइत छथि। जनका मल्लाह विवाह पंचमीक प्रसंगमे राम-सीताक बिआहक आख्यान सुनाबैत छथि। ओ कहैत छथि जे विवाहक बाद दशरथ दहेजक लेल हठ क' लेलक, तखन जनक अपन मूड़ी दशरथक आगूमे राखि देलनि। ई आख्यान मिथिलाक अनन्त सांस्कृतिक शोषणक रूपक थिक।
एहि बीच गेनमा आ फगुनी कें धरतीक रोदन सुनाइ दैत छै। सभ गोटे धरती खनैत छथि त' ओतय डगडग लाल खूनक धारा भेटैत अछि। विद्यापति स्पष्ट करैत छथि जे ई खून गोरखा राजा शाहवंश द्वारा २३०-२४० वर्ष पूर्व कयल गेल दमनक अछि। माटिक भीतर मैथिली भाषा, संस्कृति आ कलाक अवशेष भेटैत अछि, जे "एक भाषा एक भेष"क दमनकारी नीति सँ नष्ट कयल गेल रहय। बुलन्ती आ दुखियाक आह्वान पर महिला लोकनि पुनर्जीवनक गीत (छठि गीत, चैतावर, जट-जटिन) गाबैत छथि। अन्तमे विद्यापति मैथिलीक "गहन उगरास" (ग्रहण मुक्ति) आ नव संघीय नेपालमे स्वायत्त मिथिला प्रदेशक स्थापनाक लेल महाक्रान्तिक जुलुश निकालैत छथि।
१. पोथीक सामान्य परिचय आ संरचना
परमेश्वर कापड़िक मैथिली नाटक गहन उगरास (अर्थात् 'ग्रहण उग्रास'क अपभ्रंश) गहन समाजिक पीड़ाक उद्गार अछि जे २०७३ फागुनमे पृथु प्रकाशन, जनकपुरधामसँ प्रकाशित भेल। ई नाटक दू भागमे बँटल अछि - प्रथम भाग आ द्वितीय भाग - जाहिमे नेपालक मिथिला क्षेत्रक सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितिकेँ केन्द्रमे राखि नाट्य-कथानक विकसित कयल गेल अछि। पात्र-योजनाक विचारसँ नाटकमे अनेक वर्गीय प्रतिनिधि उपस्थित छथि - जिमदार फुलगेन सिंह (शोषक सामन्त), टुनमा-मुसना (हास्यकर बालक पात्र), छौड़ी-१ आ छौड़ी-२ (विद्रोही स्त्री-स्वर), फेकुआ (युवा पात्र), हिरोइन (नव-सांस्कृतिक विकृतिक प्रतीक), बुलन्ती, सुवंश, सुभद्रा, ज्वाला, दुखिया, फूलो, सती (सर्वहारा जनसमूह), बुढ़बा-बुढ़िया (वृद्ध दम्पती), विद्यापति (सांस्कृतिक चेतनाक प्रतीक-पात्र), जनका, बेचना, लखना (मिथिलाक सामाजिक जीवनक विभिन्न वर्ग), आ फोनबला (आधुनिक संचार-माध्यमक प्रतीक)। पात्र-सूचीक विविधता स्वयं सिद्ध करैत अछि जे नाटककार समाजक कोनो वर्गकेँ दृश्यसँ बाहर नहि राखल चाहलनि।
२. भारतीय नाट्यशास्त्रक दृष्टिएँ
भारतीय नाट्य सिद्धान्त आ 'थिएटर ऑफ द रूट्स'क परिप्रेक्ष्यमे तुलना
भारतीय नाट्यशास्त्रक रस सिद्धान्त (विशेषतः करुण, वीर आ रौद्र रस) गहन उगरासमे पूर्णतः अनुप्राणित अछि। सुरेश अवस्थीक 'थिएटर ऑफ द रूट्स' (जड़ि सँ जुड़ावक रंगमंच) आन्दोलनक सिद्धान्त औपनिवेशिक पाश्चात्य यथार्थवादी रंगमंचक विरुद्ध देसज लोक-विधाक पुनर्जीवनक आन्दोलन थिक। हबीब तनवीर, रतन थियम, बी. वी. कारंत आ के. एन. पणिक्कर लोक-अनुष्ठान आ देसज परम्परा कें आधुनिक राजनैतिक चेतना सँ जोड़ने छलाह।
मैथिली नाट्य आन्दोलनमे परमेश्वर कापड़ि 'गहन उगरास'मे एहि रूट्स आन्दोलनक दर्शन कें नवीन रूपमे प्रस्तुत कयलनि अछि। मैथिली रंगमंचमे पारम्परिक 'नाच' (यथा जट-जटिन, झिझिया, लोकगीत) कें केवल मनोरंजनक साधन मानल जाइत रहय, जकर कोनो लिखित आलेख नै होइत रहय। मुदा रामभरोस कापड़ि ’भ्रमर’ आ परमेश्वर कापड़ि एहि लोक-नाच कें वर्ग-संघर्ष आ औपनिवेशिक दमनक विरुद्ध एकटा प्रखर राजनैतिक हथियार बना देलनि। नाटकक द्वितीय भागमे जखन जट-जटिनक गीत बजैत अछि, त' ओकर सम्वाद प्रवासी जीवनक दारुण यथार्थ कें अभिव्यक्त करैत अछि। ई लोक परम्परा कें जीवन्त आ गतिशील बनबायब थिक, जे 'थिएटर ऑफ द रूट्स'क मूल मान्यता अछि।
(क) पञ्चसन्धि आ वस्तु-संरचना
भरतमुनिक नाट्यशास्त्रमे वस्तुकेँ मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श आ निर्वहण - एहि पाँच सन्धिमे विभाजित कयल गेल अछि। गहन उगरासकेँ एहि साँचामे देखी तँ मुखसन्धि नाटकक आरम्भिक दृश्यमे प्रस्तुत होइत अछि जखन जिमदारक आँगनमे धान-भण्डार रिक्त अछि आ बालक टुनमा-मुसना खेल करैत जिमदारपर व्यंग्यात्मक गीत गाबैत अछि। प्रतिमुखसन्धि तखन उभरैत अछि जखन जनआन्दोलनक लहरि आबि जिमदारक सत्ता-व्यवस्थाकेँ चुनौती देबय लगैत अछि। गर्भसन्धिमे हिरोइनक प्रवेशसँ सांस्कृतिक विघटनक आ आर्थिक पलायनक समस्या उठैत अछि। विमर्शसन्धि ओहि दृश्यमे अभिव्यक्त होइत अछि जखन विद्यापतिक प्रतीकात्मक उपस्थितिमे सर्वहारा जनसमूह अपन मुक्तिक मार्ग खोजैत अछि। निर्वहणसन्धि - अर्थात् समाधान-बिन्दु - एहि नाटकमे सुस्पष्ट रूपेँ अनुपस्थित अछि, जे एकटा महत्त्वपूर्ण नाट्यशास्त्रीय न्यूनता थिकैक।
(ख) रस-विचार
नाट्यशास्त्रमे आठ वा नव रसक संकल्पना प्रतिपादित अछि। गहन उगरासमे करुण रस सर्वाधिक प्रभावी रूपेँ प्रवाहित होइत अछि - वृद्ध दम्पतीक विलापमे, महिलाक परदेश-गमन सम्बन्धी गीतमे, आ बुलन्तीक एकमात्र पुत्रविरह-वेदनामे। वीर रस द्वितीय भागक जनआन्दोलन-दृश्यमे उभरैत अछि। बीभत्स रस जिमदारक शोषणक वर्णनमे अनुभव होइत अछि। हास्य रस टुनमा-मुसनाक बालसुलभ व्यंग्यात्मक संवादमे प्रकट होइत अछि। किन्तु शृंगार रस - जे भरतमुनिक मतेँ रसराज थिकैक - एहि नाटकमे प्रायः अनुपस्थित अछि। भाष्यकार अभिनवगुप्तक रसध्वनि-सिद्धान्तक दृष्टिएँ नाटकक भाषा व्यंजनात्मक शक्तिसँ समृद्ध अछि, किन्तु साहित्यिक परिष्कारक अभावमे ध्वनि पूर्णतः विकसित नहि भऽ सकल अछि।
(ग) नायक-प्रकार आ पात्र-वर्गीकरण
नाट्यशास्त्र धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित आ धीरप्रशान्त - चारि प्रकारक नायकक उल्लेख करैत अछि। गहन उगरासमे कोनो एकटा केन्द्रीय नायक नहि अछि। विद्यापति प्रतीकात्मक रूपेँ धीरप्रशान्त नायकक भूमिकामे आबैत छथि - सांस्कृतिक चेतनाक आह्वाहक। जनसमूह नायक थिक, जे भारतीय लोकनाट्य-परम्परासँ अधिक मेल खाइत अछि बजाय शास्त्रीय संस्कृत नाट्यपरम्पराक। ई एकटा सचेत नाट्यशास्त्रीय चयन कहल जा सकैत अछि।
(घ) अंकसंख्या आ नाट्यविधान
नाट्यशास्त्रमे दशरूपकक वर्णन अछि - नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार आदि। गहन उगरास शास्त्रीय नाटकक लक्षणसँ भिन्न, प्रकरणक अधिक निकट अछि कियाक तँ एहिमे सामाजिक जीवनक यथार्थ चित्रण अछि, राजकीय कथानक नहि। किन्तु लोकनाट्यक परिप्रेक्ष्यमे ई नाटक विदापत नाच, जट-जटिन, आ सामा-चकेवाक सामूहिक गायन-परम्परासँ बेशी सम्पर्क राखैत अछि। जाहि प्रकारसँ महिला-पात्र लोक मुरेठा बान्हि एवं सांस्कृतिक गीत गबैत मंचपर आबैत छथि, ओ मिथिलाक लोकनाट्य-परम्पराक सजीव निरन्तरता थिकैक।
३. पाश्चात्य नाट्यशास्त्रक दृष्टिएँ
पाश्चात्य आ चीनी नाट्य सिद्धान्तक संग तुलनात्मक मीमांसा
पाश्चात्य नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्तक 'महाकाव्यात्मक रंगमंच' (Epic Theatre) आ 'विमुखता प्रभाव' (Verfremdungseffekt/Alienation effect) दर्शक कें कथानक सँ भावुकताक स्तर पर विलग राखि क' तार्किक विवेचनक अवसर दैत अछि। ब्रेख्तक ई सिद्धान्त पारम्परिक चीनी नाट्य शैली (विशेषतः मेई लानफांगक अभिनय) सँ प्रभावित रहय। चीनी रंगमंचमे 'चतुर्थ देबाल' (Fourth Wall) कें तोड़ि क' दर्शक सँ सोझ संवाद कयल जाइत अछि।
चीनी स्पोकन ड्रामा (Huaju) क प्रणेता हुआंग जुओलिन एहि पद्धति कें 'शिएयी' (Xieyi / Essentialist Theatre) रंगमंचक नाम सँ प्रस्तुत कयलनि, जाहिमे प्रवाहिता (Fluidity), लचीलापन (Flexibility), त्रिविमता (Sculpturality), आ संकेतात्मकता (Conventionality) मुख्य अछि।
'गहन उगरास'क नाट्य-शिल्प पूर्णतः 'शिएयी' आ ब्रेख्तक सिद्धान्तक मैथिली रूपान्तरण अछि। डा. अभि सुवेदीक अनुसार, नाटकमे कोनो यथार्थवादी दृश्य-विधान (Scenography) केर स्थान पर पात्रक सम्वाद आ सम्बन्ध मंचक निर्माण करैत अछि नाटकक दृश्य परिवर्तन अत्यन्त प्रवाहमयी आ लचीला अछि; दृश्य बिनु पर्दा खसने समकालीन समय सँ सोझे २४० वर्ष पूर्व सिमरौनगढ़क दमन आ ऐतिहासिक विस्थापनक दिश चलि जाइत अछि। चेला बकलेलबाक थरथराइत चलब आ जिमदारक लाठी लपेटि क' बैसब प्रतीकात्मक रूढ़िवादिता (Conventionality) कें स्पष्ट करैत अछि।
यहूदी (Yiddish) नाट्य सिद्धान्तक संग तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य आ विस्थापन विमर्श
यहूदी यिडिश रंगमंच (Yiddish Theatre) क विकास पूर्वी यूरोपमे अशकेनाजी यहूदी लोकनिक यिडिश भाषामे भेल रहय। एकर मूल जड़ि 'पूरीम' पर्वक अवसर पर खेलल जायवला प्रहसन 'पूरीमश्पिल्स' (Purimshpils) मे रहय, जाहिमे समकालीन सामाजिक विसंगति आ धनी वर्ग पर तीक्ष्ण प्रहार कयल जाइत रहय। मैथिलीक 'विवाह पंचमी झाँखी' आ मिनापक 'महामूर्ख सम्मेलन'क व्यंग्यात्मक नाटक पूरीमश्पिल्क यथार्थवादी आ हास्यात्मक शैलीक अत्यन्त निकट अछि।
यिडिश रंगमंचमे 'ब्रोडर सिंगर्स' (Broder Singers) घुमक्कड़ संगीतकार छलाह, जे वेशभूषा बदलि क' व्यंग्यात्मक आ हास्यास्पद प्रहसन प्रस्तुत करैत छलाह, जकरा सँ अब्राहम गोल्डफाडेन व्यावसायिक यिडिश रंगमंचक नीव रखलनि। 'गहन उगरास'क आरम्भिक दृश्यमे जिमदार फुलगेन सिंहक दुआरि पर धियापूताक प्रहसन आ द्वितीय भागमे अभेलबा बाबा आ बकलेलबा चेलाक प्रहसन ब्रोडर सिंगर्सक देसज आ हास्यात्मक नाट्य-पद्धति सँ मेल खाइत अछि।
यिडिश रंगमंचमे 'शुंड' (Shund / Popular trash theatre) बनाम 'साहित्यिक रंगमंच' (Literary Theatre) क जे संघर्ष रहय, तकर विश्लेषण करैत Itsik Manger लिखने छलाह जे शुंड रंगमंच वास्तवमे बिना कोनो एकेडेमीक अभिनय कयल जायवला 'मुक्त मंच' थिक, जाहिमे लोक-इच्छाक स्वतन्त्र प्रस्फुटन होइत रहय। मैथिली नाट्य आन्दोलनमे सेहो 'शुंड' (लोक नाच, कीर्त्तनिया) आ शिष्ट साहित्यिक रंगमंचक मध्य संघर्ष रहल अछि, जकरा 'गहन उगरास'मे लोक-संस्कृतिकेँ राजनैतिक मुक्ति सँ जोड़ि क' पाटि देल गेल अछि।
विस्थापन, वैदेशिक रोजगारी आ स्मृति-दंश (Nostalgia)
यिडिश रंगमंचक सर्वाधिक पैघ आधार 'विस्थापन' (Diaspora), पलायन (Migration) आ स्मृति-दंश (Nostalgia) रहय। पूर्वी यूरोप सँ पलायन क' अमेरिका पहुँचल गरीब यहूदी लोकनि अपन 'श्तेतल' (Shtetl - यहूदी ग्राम) क स्मृतिमे नाटक आ 'मेइन श्तेतल बेल्ज' जकाँ गीत गाबि क' अपन दुःख बिसरैत छलाह।
'गहन उगरास' आधुनिक मैथिल विस्थापनक एहि tragedy कें अत्यन्त प्रखरता सँ प्रस्तुत करैत अछि।1 खाड़ी देश (कतार, सऊदी अरब) मे 'कफाला' (Kafala) प्रथाक दमनकारी चंगुलमे फँसल मैथिल प्रवासी (मुण्ढा) आ ओकर घर पर एकल जीवन जी रहल 'खाड़ी विधवा' (Hiroine) क मध्य पीसिओक सम्वाद यिडिश विस्थापन नाट्य-सिद्धान्तक मैथिली रूपान्तरण थिक। एतय एड्सक आशंका, कण्डमक प्रयोग आ चारित्रिक संशयक दंश प्रवासी जीवनक स्मृति-दंश (Nostalgia) आ विस्थापनक भयंकर यथार्थ कें स्पष्ट करैत अछि।
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नाट्य सिद्धान्तक धारा |
प्रमुख प्रणेता / मूल दर्शन |
'गहन उगरास' मे एकर यथार्थ प्रयोग आ विश्लेषण |
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भारतीय 'थिएटर ऑफ द रूट्स' |
सुरेश अवस्थी, हबीब तनवीर, रतन थियम।8 |
पारम्परिक जट-जटिन, झिझिया, छठि गीत आ लोक आख्यानकें (जनकक आत्मोसर्ग) वर्ग-संघर्ष आ राजनैतिक क्रान्तिक माध्यम बनाओल गेल अछि। |
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पाश्चात्य महाकाव्यात्मक रंगमंच |
बर्टोल्ट ब्रेख्त। |
चतुर्थ देबालक भ्रम कें तोड़ब; दर्शक कें भावुकताक स्थान पर तार्किक आ वैचारिक क्रान्ति सँ जोड़ब; प्रतीकात्मक अभिनय। |
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चीनी 'शिएयी' रंगमंच |
मेई लानफांग, हुआंग जुओलिन। |
प्रवाहिता, लचीलापन, त्रिविमता आ रूढ़िवादिता; समकालीन समय सँ सोझे सिमरौनगढ़क २५० वर्ष पूर्व दमनक समयमे संक्रमण। |
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यहूदी यिडिश रंगमंच |
अब्राहम गोल्डफाडेन, इट्सिक मंगर। |
'पूरीमश्पिल्स' आ 'ब्रोडर सिंगर्स' जकाँ देसज प्रहसन; खाड़ी विस्थापनक स्मृति-दंश आ यिडिश विस्थापनक त्रासदीक सादृश्यता। |
(क) अरस्तूक अनुकरण-सिद्धान्त आ त्रय-एकता
अरस्तू अपन काव्यशास्त्रमे कहलनि जे त्रासदी उत्तम मनुष्यक अनुकरण थिकैक जे कातार्सिस - अर्थात् दर्शकक भावशुद्धि - उत्पन्न करैत अछि। गहन उगरासमे अरस्तूक त्रय-एकताक (समय, स्थान, कर्म) स्थूल अनुपालन नहि होइत अछि - नाटकक स्थान गाम, पी सी यो (पुलिस चौकी), मेला-मैदान, जुड़शीतल-घाट, इत्यादि बदलैत रहैत अछि आ समय-विस्तार बर्खक बर्ख धरि बुझाइत अछि। किन्तु एकक सर्वश्रेष्ठ अरस्तूवादी तत्त्व - कर्म-एकता - एहिमे आंशिक रूपेँ उपस्थित अछि, किएक तँ सभ घटना शोषण-मुक्तिक एकटा केन्द्रीय संघर्षक चारूकात घूमैत अछि।
अरस्तूक महान त्रासदी-सिद्धान्तक दृष्टिएँ एहि नाटकमे पेरिपेटिया (भाग्य-परिवर्तन) जिमदारक पतनमे देखल जा सकैत अछि - जे एकबेर सर्वशक्तिमान छल तेकरा अन्तमे बालकसभ 'कुत्ता हुलका दू, बिलाइ लुधका दू' कहैत खेहाड़ैत अछि। किन्तु अनागनोरिसिस (सत्य-साक्षात्कार) स्पष्टतया अनुपस्थित अछि, जे नाटककेँ पूर्ण क्लासिकल त्रासद संरचनासँ रोकैत अछि।
(ख) ब्रेख्त-प्रभाव: दूरीकरण-नाट्य
गहन उगरास पर सर्वाधिक स्पष्ट प्रभाव जर्मन नाटककारक वैयक्तीकरण-विरोधी नाट्य-पद्धतिक देखाइत अछि। डा. अभि सुवेदीक भूमिका स्वयं स्पष्ट करैत अछि जे ई नाटक 'प्रयोगशील' अछि आ 'मानुष नैं दृश्यविधान आ "सेनोग्राफी" का निर्माता हुन् र तिनले नैं "गहन उगरास" को नाट्यकलेवर बनाएको छ।' ब्रेख्तक महाकाव्यात्मक नाट्य-परम्पराक अनुरूप एहिमे कथासूत्र बारम्बार टूटैत अछि, पात्र सभ जनगीत गबैत नाट्य-भ्रम (theatrical illusion) तोड़ैत छथि, आ दर्शककेँ भावनात्मक तादात्म्यक स्थानपर बौद्धिक प्रतिक्रिया दिअ लेल प्रेरित कयल जाइत अछि।
टुनमा-मुसनाक हास्यपूर्ण गीत - 'हाथी अगत, घोड़ा अगत, अइ बाबा बियाहमे पोता चलत' - एकटा स्पष्ट ब्रेख्तीय हस्तक्षेप थिकैक जे दर्शककेँ यथार्थक विद्रूपताकेँ सचेतनतासँ देखय लेल बाध्य करैत अछि।
(ग) स्तानिस्लावस्कीक मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद
स्तानिस्लावस्की जे पात्रक आन्तरिक जीवनक गहन खोजपर बल दैत छलाह, ओहि दृष्टिएँ गहन उगरासमे पात्रक मनोवैज्ञानिक गहराई न्यून अछि। बुलन्तीक पुत्र-विछोहक पीड़ा, हिरोइनक दोहरा जीवनक अन्तर्द्वन्द्व - एहि ठाम किञ्चित् संवेदनशील नाट्य-क्षण उपस्थित अछि, किन्तु पात्रक व्यक्तित्व-निर्माण (characterisation) समग्रतामे अपूर्ण रहल अछि। एहि दृष्टिएँ नाटककार सामाजिक उद्देश्यकेँ पात्रक व्यैक्तिक विकासक उपर प्राथमिकता देबऽ चाहलनि अछि।
(घ) अस्तित्ववादी नाट्यधारा
काम्यू आ सार्त्रक अस्तित्ववादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ नाटकक आभ्यन्तरिक शोक - लोक जीवैत अछि मुदा व्यवस्था ओकर जीवनक अर्थ छीनि लैत अछि - एकटा अनुगूँज सुनाइत अछि। बुलन्तीक एकटा उद्गार एहि जखन ओ कहैत छथि जे पुत्र घरसँ पड़ायल, मुह नहि देखल - एहिमे एकटा असम्बद्ध, नियतिहीन जीवनक अस्तित्ववादी पीड़ा ध्वनित होइत अछि।
४. इजरायली नाट्य-चिन्तनक परिप्रेक्ष्यमे
इजरायली नाटककार हनोक लेविन (१९४३-१९९९) जे आधुनिक इजरायली रंगमंचक केन्द्रीय स्तम्भ छलाह, ओ राजनैतिक व्यंग्य आ जनसामान्यक यन्त्रणाकेँ नाट्य-रूप देबामे सिद्धहस्त छलाह। गहन उगरासक जिमदार-विरोधी व्यंग्यात्मक संवाद, बालपात्रक मुखसँ सत्ताक उपहास, आ सामूहिक विरोध-गीत - एहि सभमे लेविनेस्क कटुता आ प्रत्यक्षतासँ साम्य देखल जा सकैत अछि। इजरायली रंगमंचमे जाहि प्रकारेँ साधारण नागरिकक आर्त-स्वर नाट्य-मंचक भाषा बनैत अछि, कापड़ि ओही परम्पराक समानान्तर कार्य मिथिलाक माटि-पानिसँ कयल अछि। किन्तु इजरायली नाट्य-परम्परामे जे दर्शनात्मक घनत्व देखाइत अछि, ओहि गहराईकेँ गहन उगरास सम्पूर्णतया प्राप्त नहि कऽ सकल अछि।
५. चीनी नाट्य-परम्पराक दृष्टिएँ
चीनी नाट्यपरम्पराक - विशेषतः युआन ओपेराक आ माओ-युग-परवर्ती राजनैतिक रंगमंचक - केन्द्रीय विशेषता थिकैक गीत, नृत्य, आ संवादक एकत्रीकरण, जाहिमे सामूहिक चेतनाक स्वर मुखरित होइत अछि। गहन उगरासमे लोकगीतक बारम्बार प्रवेश - जुड़शीतलक गीत, होरीक गीत, पगरी-गीत, दहेज-विरोधी स्वर - एहि अर्थमे चीनी नाट्य-शैलीसँ कार्यात्मक साम्य राखैत अछि। विद्यापतिक पात्रक रूपेँ मिथिलाक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रतीककेँ मंचपर प्रस्तुत करब चीनी नाट्य-परम्पराक ओहि प्रवृत्तिक स्मरण दिअबैत अछि जाहिमे ऐतिहासिक-मिथकीय पात्र समकालीन राजनैतिक सन्देशक वाहक बनैत अछि।
६. नाटकक प्रमुख विशेषतासभ
प्रथम - राजनैतिक स्पष्टवादिता: नाटक नेपालक राजशाही, माओवादी जनयुद्ध, दोसर जनआन्दोलन, प्रतिगमनी ज्ञानेन्द्र शासन, संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रक स्थापना - एहि सभ ऐतिहासिक घटनाकेँ सोझे मंचपर आनैत अछि, ओ एकटा स्पष्ट राजनैतिक साक्ष्य थिकैक। आब मिथिलाक भारतीय भाग एहि इतिहाससँ बाहर भऽ एकर नाट्य-प्रस्तुति देखैत अछि- ई एकटा विशेष भू-सांस्कृतिक स्थितिमे नाट्य-साहित्यक निर्माण थिकैक।
द्वितीय - भाषिक स्तरीकरण: जिमदारक भाषा आ मजदूरसभक भाषामे स्पष्ट अन्तर अछि। स्त्री-पात्रक भाषा आ पुरुष-पात्रक भाषामे सेहो स्वर-भेद देखाइत अछि। विद्यापतिक संवाद साहित्यिक-उद्बोधक स्वरमे अछि। फोनबलाक माध्यमे आधुनिक संचार-संस्कृतिपर व्यंग्य कयल गेल अछि। ई बहुस्तरीय भाषिक संरचना एकटा प्रौढ़ नाट्यशिल्पकारक पहचान दैत अछि।
तृतीय - स्त्री-स्वरक महत्त्व: नाटकमे छौड़ी-१ आ छौड़ी-२ जिमदारकेँ खुलेआम गाली दैत खेहाड़ैत छथि - 'ऐ बाबाके ताबामे नेर गुरका दू, कुत्ता हुलका दू, बिलाइ लुधका दू।' बुलन्ती आ सुभद्रा सेहो प्रतिरोधक स्वर उठबैत छथि। महिला-पात्रक एहि सशक्त उपस्थितिसँ नाटक मिथिलाक पितृसत्तात्मक सामाजिक ढाँचाकेँ नाट्य-भाषामे चुनौती दैत अछि।
चतुर्थ - सांस्कृतिक-अनुष्ठानिक तत्त्वक समावेश: जुड़शीतलक जल-छिटाइ, होरी-उत्सव, लोकगीत, पगरी-बन्धन - एहि सभ लोकानुष्ठानिक तत्त्वकेँ नाट्य-कथानकमे सहजतापूर्वक बुनल गेल अछि। ई गहन उगरासकेँ केवल राजनैतिक नाटकसँ उठा साँस्कृतिक स्मृतिक दस्तावेज बनाबैत अछि।
पञ्चम - दहेज-प्रथाक आलोचना: नाटकक एकटा महत्त्वपूर्ण अंशमे लखना, जनका, बेचना - तीनू मिलि दहेज-प्रथाकेँ व्यंग्यात्मक रूपेँ उठबैत छथि। 'बूझ जे रजा जनके पालीस’, अपना सब ओत’, दहेज-परथा शुरू भेल हौ' - एहि संवादमे राजा जनकक सांस्कृतिक प्रतापकेँ सामाजिक कुरीतिसँ जोड़बाक एकटा व्यंग्यात्मक दृष्टि देखाइत अछि।
७. नाटकक प्रमुख सीमासभ
प्रथम - कथानकक शिथिलता: नाटकमे घटना-प्रवाहक कोनो कसल संरचना नहि अछि। एक दृश्यसँ दोसर दृश्यक सम्बन्ध प्रायः संयोगात्मक अछि, कार्य-कारण-सम्बन्ध नहि। भरतमुनिक सुत्रधार-परम्परा वा ब्रेख्तक स्पष्ट दृश्य-विभाजन - किछुओ नहि अछि। दर्शक वा पाठककेँ कथाक सूत्र स्वयं जोड़य पड़ैत छनि।
द्वितीय - पात्रक अपूर्ण विकास: विद्यापतिक प्रतीकात्मक उपस्थिति महत्त्वाकांक्षी अवश्य अछि, किन्तु ओकर नाट्यात्मक सम्भावना पूर्णतः उपयोग नहि भेल अछि। हिरोइनक पात्र सांस्कृतिक विकृतिक प्रतीक बनाओल गेल अछि किन्तु एकर सामाजिक-आर्थिक मूल-कारणक गहन अन्वेषण अनुपस्थित अछि। जिमदारक पात्र एकायामी शोषक थिक, ओहिमे मानवीय जटिलताक अभाव अछि।
तृतीय - अन्तकेँ लऽ कऽ अस्पष्टता: नाटकक अन्तिम दृश्यमे जुलूस, नारा, आन्दोलन - सभ किछु एकत्रित अछि किन्तु कोनो स्पष्ट नाट्य-परिणति नहि अछि। 'समाज-संस्कृतिपर लागल गहनके, उगरास कर' - एहि संवादसँ नाटकक शीर्षककेँ सार्थक कयल गेल अछि, किन्तु ई काव्यात्मक समापन नाट्यात्मक समापन नहि थिकैक। भारतीय नाट्यशास्त्रमे आवश्यक निर्वहण-सन्धि आ पाश्चात्य नाट्यशास्त्रमे आवश्यक परिणाम (denouement) - दुनूक अभाव एकटा रचनात्मक सीमा थिकैक।
चारिम - मंचनक जटिलता: नाटकमे अनेक स्थान, बहुसंख्यक पात्र, लोकसंगीत-प्रस्तुति, दूर-दूरसँ आबैत जनआन्दोलनक ध्वनि - एहि सभक मिथिलाक सीमित साधन-सम्पन्न रंगमंचपर मंचन करब अत्यन्त कठिन अछि, मुदा असम्भव नहि अछि।
डा. अभि सुवेदी भूमिकामे लिखैत छथि जे 'नाटक निर्देशकक कसबट्टी पर सए प्रतिशत सही उतरत, दर्शकक कसबट्टी पर त सहजिहिं' - नाटकक मंचनीयता एकर सीमा नहि थिकैक।
८. नाटकक ऐतिहासिक महत्त्व
नेपालीय मिथिलाक मैथिली नाट्यसाहित्यक सन्दर्भमे गहन उगरास एकटा महत्त्वपूर्ण कृति थिकैक। जनकपुरमे मिथिला नाट्यकला परिषद (१९७९) केर स्थापनाक परवर्ती नाट्य-परम्पराक एकटा विशिष्ट प्रतिनिधि-कृतिक रूपमे एकरा देखल जा सकैत अछि।
९. समेकित नाट्यशास्त्रीय तुलासँ निष्कर्ष
गहन उगरास एकटा राजनैतिक-सामाजिक उद्देश्यसँ प्रेरित, लोकनाट्य-परम्पराकेँ आधुनिक राजनैतिक नाट्यसँ जोड़बाक महत्त्वाकांक्षी प्रयास थिकैक। भारतीय नाट्यशास्त्रक रस-सिद्धान्तमे करुण रसक सफल प्रवाह, लोकनाट्य-परम्पराक सजीव उपयोग, आ सामूहिक नायकत्वक संकल्पना - एहि तत्त्वसभमे ई नाटक उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करैत अछि। ब्रेख्तीय दूरीकरण-पद्धतिक आंशिक उपयोग आ राजनैतिक स्पष्टवादिता एकर आधुनिकताक प्रमाण अछि।
किन्तु कथानकक संरचनात्मक शिथिलता, पात्रक मनोवैज्ञानिक गहराईक अभाव, निर्वहण-सन्धिक अनुपस्थिति, आ मंचनक व्यावहारिक जटिलता - एहि सीमासभसँ नाटककेँ मुक्त नहि कहल जा सकैत अछि। तथापि मैथिली नाट्यसाहित्यक सन्दर्भमे परमेश्वर कापड़िक एहि कृतिक ऐतिहासिक महत्त्व आ सांस्कृतिक योगदान निर्विवाद अछि।
निष्कर्ष आ दूरगामी सांस्कृतिक प्रभाव
परमेश्वर कापड़िक 'गहन उगरास' मैथिली रंगमंचक केवल एकटा प्रयोगशील नाटक नहि थिक, अपितु ई समकालीन विश्वक प्रमुख नाट्य सिद्धान्तक व्यावहारिक समन्वय क्षेत्र थिक। भारतीय 'थिएटर ऑफ द रूट्स'क देसज ऊष्मा सँ युक्त रहितो ई ब्रेख्तक वैचारिक दूरी आ चीनी 'शिएयी' शैलीक प्रवाहिता कें सहजता सँ आत्मसात करैत अछि। यहूदी यिडिश रंगमंच जकाँ ई विस्थापनक आन्तरिक टीस आ 'शुंड' तत्वक लोक-सामर्थ्यकें साहित्यिक आन्दोलनक मुख्यधारा मे समाहित करैत अछि।
नाटककार कापड़ि अपन शब्दकोशीय समृद्धता आ लोक-जीवनक मर्मज्ञताक बले एक एहेन रंगमंचक सृष्टि कएलनि अछि जे क्षेत्रीय स्तर पर नेपालक मधेश आन्दोलन आ जनयुद्धक विसंगति पर प्रहार करैत वैश्विक स्तर पर भाषायिक आ अस्मिताक संकट सँ जूझि रहल सम्प्रदाय कें मुक्ति-चेतनाक नव मार्ग दर्शबैत अछि। 'गहन उगरास'क ई प्रयोगशीलता मैथिली नाट्य साहित्यक इतिहासमे एकटा चिरस्थायी कीर्त्तिमान प्रमाणित होइत अछि।
[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]
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