
गजेन्द्र ठाकुर
परमेश्वर कापड़िक रचना-संसार- विस्तृत मैथिली साहित्यिक समीक्षा
भूमिका: परमेश्वर कापड़ि आ हुनकर रचना-संसार
परमेश्वर कापड़िक ६०० सँ बेसी रचना - लोककथा, आख्यान, पौराणिक कथा, व्यंग्य, सांस्कृतिक निबन्ध, भाषा-विमर्श, आत्मकथात्मक प्रसंग, पुरस्कार-विमर्श, राजनीतिक टिप्पणी, आ नाट्य-समीक्षा ई सभ मिलिकऽ हुनकर एक विशाल, बहुआयामी रचना-संसारक निर्माण करैछ। विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक दृष्टिसँ कापड़ि ओहि 'छोड़ल गेल' मैथिली साहित्यकारक श्रेणीमे अबैछ जिनका मुख्यधारा साहित्यिक संस्था प्रायः उपेक्षित कएने अछि।
ई समीक्षा हुनकर प्रत्येक रचना-विधाक विस्तृत विश्लेषण भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र, पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त, गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा, आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक चार स्तम्भपर कएल गेल अछि।
भाग १: लोककथा आ लोकाख्यान
१.१ 'हनुमान नाम स्मरणके महिमा': ई रचना मैथिली लोकआख्यानक शुद्ध परम्परामे रचित अछि। रावण-हनुमान-नवग्रहक प्रसंग कापड़ि अपन विशिष्ट 'बजैया-बोल' शैलीमे प्रस्तुत कएलनि अछि। रचनाक भाषा 'बजैया-बोल' मैथिलीमे अछि ।
रस-विचार: एहि रचनामे भक्ति-रसक प्रधानता अछि। हनुमानजीक करुणामय स्वभाव (नवग्रहपर दया), वीरत्व (रावणक लंका-दहन), आ दास्य-भक्ति - तीनू रसक सुन्दर समन्वय कएल गेल अछि। आनन्दवर्धनक 'ध्वनि' सिद्धान्तक अनुसार, हनुमानकेँ 'वर मांगबाक आवश्यकता नहि' - इ उक्ति गूहार्थ शक्तिक व्यञ्जना करैछ - जे ईश्वरकृपा माँगएसँ नहि, स्वयं-समर्पणसँ भेटैछ। नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'शब्द-प्रमाण' (Testimonial Knowledge) सिद्धान्तक अनुसार, नवग्रहक वचनवद्धता 'आप्त-वाक्य' (Authoritative Testimony) थिक। नव्य-न्यायमे आप्त-वाक्यक वैधता - प्रामाणिक वक्ताक उक्ति - ई भाव कापड़ि लोककथाक रूपमे प्रस्तुत कएने छथि। विदेह फ्रेमवर्क: मैथिली लोकसाहित्यमे रामायणी आख्यानक ई परम्परा - जाहिमे राम-हनुमानक स्थानपर नवग्रहक मोक्ष केन्द्रमे अछि - मिथिलाक अपन दृष्टिकोण थिक। ब्राह्मणी मुख्यधाराक बजाय लोकक हनुमान - ई विदेह समानान्तर इतिहासक महत्त्वपूर्ण अंश थिक।
१.२ 'लछमिनिञा कनिञा': ई रचना मैथिली लोककथाक सर्वोत्तम नमूना थिक। बुढ़बा-बुढ़िया-पुतौह-नढ़िया-कौआ-सांपक श्रृंखलाबद्ध आख्यान एक बुद्धिमती स्त्रीक साहस, चतुराई, आ अन्ततः पारिवारिक मेलक कथा कहैछ। भाषाक विशेषता: 'लबकनिञा', 'हड़हड़ही खटबनरी', 'पिठिया-ठोक धमक्का', 'नङटिनिञा रकमसनी', 'धीपल आइग-बाउल' - ई सभ 'बजैया-बोल' मैथिलीक अनमोल शब्द-सम्पदा थिक। कापड़ि ऐ शब्दसभकेँ साहित्यिक प्रतिष्ठा दै छथि- यएह हुनकर सबसँ पैघ योगदान अछि। रस-विचार: प्रारम्भमे भयानक रस (कनिञाक रातिमे नदी जेबाक दृश्य), तत्पश्चात् हास्य रस (बुढ़ियाक क्रोध आ गलतफहमी), आ अन्तमे शान्त रस (परिवारक मेल) - ऐ तीन रसक सफल क्रमिक प्रवाह अछि। भरत मुनिक 'विभाव-अनुभाव-व्यभिचारी' भावत्रयीक आधारपर ई रचना परिपूर्ण अछि। वक्रोक्ति: कुन्तकक वक्रोक्ति सिद्धान्तक अनुसार, 'मुर्दाके खाएला नढ़ियाके द'क'' - ई पंक्ति लोककथाक सबसँ वक्र कथन थिक। पुतौह न मुर्दाखोर अछि, न डाइन - ओ एक साहसी, लोभमुक्त स्त्री अछि। परन्तु ओकर साउसक दृष्टिमे सभ विकृत देखाइछ। ई वैपरीत्य वक्रोक्तिक सार थिक। स्त्री-विमर्श: पुतौह कनिञा- ओ तन्त्र-मन्त्र नहि जनैछ, ओ डाइन नहि- ओ एक साहसी, कार्य-कुशल स्त्री थिक जे पारिवारिक सुखक लेल असम्भव काज कएलक। मैथिली लोककथामे स्त्री-शक्तिक ई प्रतिच्छाया अनुपम अछि।
१.३ 'यज्ञ-सीता': 'यज्ञ-सीता' कापड़िक सर्वाधिक साहसिक, विवादास्पद एवं दार्शनिक रचना थिक। यज्ञकालमे निर्मित स्वर्णमयी सीता-प्रतिमासभक जीवन्त भ' रामसँ स्वीकृति माँगबाक कथा - ई मैथिली साहित्यमे विरल साहस थिक। मिथकक पुनर्व्याख्या: कापड़ि राम-एकपत्नीव्रताक मर्यादाकेँ प्रश्न करै छथि। यज्ञ-सीता बजैछ- 'एहनमे अपने हमरा ग्रहण किए नै करब?' ई पंक्ति मैथिली साहित्यमे स्त्री-अधिकार-विमर्शक एक नव अध्याय थिक। नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'व्याप्ति' (Invariable Concomitance) सिद्धान्तक अनुसार: 'जे यज्ञमे सहयोग दैत अछि, ओ अर्धाङ्गिनीक अधिकार रखैछ'- ई यज्ञ-सीताक तर्क थिक। राम ऐ व्याप्तिकेँ स्वीकार करै छथि परन्तु तकर विकल्प- द्वापरमे गोपी-रूपमे कृष्णसँ प्रेम – दै छथि। ई दार्शनिक समाधान उत्कृष्ट थिक। ध्वनि-विश्लेषण: रचनाक अन्तिम पंक्ति - 'ओ सबहेटा यज्ञ-सीता ब्रजमे गोपीसब बनलथि' - ई व्यञ्जना-स्तरपर एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक संदेश दैछ: हर उपेक्षित स्त्री अन्ततः अपन मोक्ष पबैछ।
१.४ 'पुण्यात्मा बाउ प्रसंग': ई रचना कापड़िक सबसँ मार्मिक, आत्मकथात्मक रचना थिक। मरणासन्न पिताक संग पुत्रक अन्तिम क्षणक वर्णन - ई मैथिली गद्यमे भावनात्मक उत्कर्षक उदाहरण अछि। भाषाक सजीवता: 'जखैन हम पोताके क'र घुमैलिऐ', 'छटपटाइछै', 'बड़ीकाले', ई सभ मैथिलीक अपन शब्द थिक जे हृदयकेँ सोझे छूबैछ। बाउक वाक्य - 'मर' कालमे अहिना कछमछी जुआरि अबैहइ' - ई मृत्युक मुँहमे बैसि कएल व्यंग्य-प्रेम-प्रकाशन अद्भुत थिक। करुण रस: अभिनवगुप्तक 'करुण रसक परिणति' (Ultimate Resolution of Pathos) सिद्धान्तक अनुसार, पिताक मृत्यु - करुणाक उत्कर्ष - पुत्रकेँ यएह बोध दैछ: 'बाप शब्दक अर्थ भाव डिक्शनरीमे नहि ताकल जा' सकैछ!' ई वाक्य भारतीय साहित्यक श्रेष्ठ उक्तिसभमे गनले जाएत। 'बाउ प्रसंग' मे लेखक अपन प्रमोशनक चिन्तामे पिताक मृत्युकाल बिताबैछ - यएह मानवीय दुर्बलताक स्वीकार्यता 'यथार्थवादी' साहित्यक लक्षण थिक।
१.५ 'लिम्मविनिञा कविनिञा': ई लोककथा नढ़िया-कौआ-साँप- जानवरसभक भाखा बुझैनिहारि बुतौहक कथा - मैथिली 'बीहनि कथा' (seed story) परम्पराक उत्तम उदाहरण थिक। कापड़ि एहि कथामे पशु-भाषा-विज्ञान (Zoolinguistics) आ लोक-परम्पराक अद्भुत समन्वय कएलनि अछि।
भाग २: पौराणिक आ दार्शनिक निबन्ध
२.१ 'तत्ववोध' – आदिकाव्य: ऋग्वेदक नासदीय सूक्तक (10.129) मैथिली अनुवाद/पुनर्रचना थिक। 'केओ नहि तखन छल / नहि निर्जीवो / वायु नहि / नहि छल आकाश ओकर उपर' - ई पंक्तिसभ मैथिली कविताक दार्शनिक उत्कर्षक उदाहरण थिक। भारतीय दार्शनिक परम्परामे नासदीय सूक्त सृष्टि-रहस्यक सबसँ गूढ़ अन्वेषण थिक। कापड़ि एकरा मैथिली पाठक लेल सुलभ बनेने छथि। 'ईश्वरे ई जनैत छथि / आ शायद ओहो नहि जनैछ!' - ए अन्तिम पंक्ति भारतीय दर्शनक अज्ञेयवाद (Agnosticism)क मर्म थिक। नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'प्रत्यक्ष' (Perception) आ 'अनुमान' (Inference) दुनू सृष्टि-ज्ञानमे अपर्याप्त अछि- इएह नासदीय सूक्तक ध्वनि थिक। 'के जनैत अछि निश्चित रुपस'?'- ई प्रश्न नव्य-न्यायक 'प्रमाण-सीमा' (Limits of Valid Knowledge)क स्वीकारोक्ति थिक।
२.२ 'पुराणोक्त परिभाषा': नारद-स्मृतिसँ उद्धृत 'सत्य', 'धर्म', 'अहिंसा', 'असत्य', 'साधु' - ऐ पाँच तत्त्वक व्याख्या कापड़ि मैथिलीमे प्रस्तुत कएलनि अछि। 'धर्माधर्म विवेकेन वेदमार्गानुसारिणी: / सर्वलोकहितासक्ता: साधव: परिकीर्तिता:' - नारदक श्लोकक समावेश समीचीन थिक। ई रचना कापड़िक पाण्डित्यक प्रमाण थिक। ओ केवल लोककथाकार नहि, बरु शास्त्रीय परम्पराक ज्ञाता सेहो छथि। विदेह फ्रेमवर्कमे, ई शास्त्र-परम्परा आ लोकपरम्पराक समन्वय कापड़िक विशेषता थिक।
२.३ 'छिन्नमस्ता भगवतीक तान्त्रिक स्वरूप': ई कापड़िक सर्वाधिक विद्वत्तापूर्ण रचना थिक। मिथिला चित्रकलाक आधारपर छिन्नमस्ताक तान्त्रिक व्याख्या- सृष्टि-ध्वंस-पुनर्निर्माणक दार्शनिक व्याख्या- अत्यन्त गहन थिक। 'प्रकाश आ ध्वनिक अन्तर्प्रक्रिया एतेक भयानक आ प्रचण्ड होइत अछि जे सृजनक सम्वन्ध सर्जकस' एके झटकामे विच्छिन्न भ' जाइछ।'- ई वाक्य भारतीय तान्त्रिक दर्शनक मर्म थिक। 'माता आ शिशुक बीचक नाभिनालकेँ जाधरि काटल नहि जाइछ ताधरि नवजात शिशु स्वतन्त्र अस्तित्वमे आबि नहि सकैत अछि।' - ई जैविक रूपक छिन्नमस्ताक तान्त्रिक प्रतीकतन्त्रकेँ अद्वितीय तरीकासँ स्पष्ट करैछ। कापड़ि मिथिला-चित्रकलाक तान्त्रिक आधारकेँ वैज्ञानिक-दार्शनिक दृष्टिसँ व्याख्यायित करै छथि। ई मैथिली साहित्यमे दुर्लभ अछि।
२.४ 'आयुर्वेद आ धनतेरस': ब्रह्माजीक आयुर्वेद-रचना, त्रिसूत्र, आत्रेय-धान्वन्तर सम्प्रदाय, आ क्षीरसागर-मन्थनक वर्णन - ई रचना कापड़िक शास्त्रीय ज्ञानक प्रमाण थिक। 'तिलासंक्रान्ति मनक पावनि अछि', 'फगुआ मनक पाबनि', 'दुर्गापूजा आत्माक' - ऐ तीन-भागक वर्गीकरण कापड़िक दार्शनिक दृष्टिक परिचायक थिक।
२.५ 'विवाह-संस्कार आ अधिकार': विवाहक व्युत्पत्ति - 'वि+अव+हार' - आ कन्यादान-पाणिग्रहण-होमक दार्शनिक व्याख्या कापड़ि बहुत विद्वत्तापूर्वक कएलनि अछि। 'आब एहिमे जहियास' आय आ अधिकार तत्व ढुकलैए जीवन भार आ भाउर भ' गेल अछि' - ऐ अन्तिम वाक्यमे आधुनिक विवाह-विमर्शक व्यंग्यात्मक टिप्पणी अछि।
भाग ३: सांस्कृतिक निबन्ध आ समकालीन टिप्पणी
३.१ 'भारु की मोरु?!': ई कापड़िक सांस्कृतिक-ऐतिहासिक निबन्धक उत्कृष्ट उदाहरण थिक। भारु (भारतीय रुपैया) आ नेरु (नेपाली रुपैया)क अर्थ-विस्तार करैत ओ विद्यापति आ मलंगियाजीक नेपाल-भारत द्विधाक प्रसंगमे मैथिली साहित्यिक इतिहासकेँ पुनर्विचारक निमन्त्रण दैछ। 'विद्यापति नेपालमे आबि, घर-घरारी अरजि, पोखरि इनार खना, कृतकार्य क' ध', आजीवन विद्यापति एतहि मरि-खपि गेलाह, तैयो उ भारु?' - ई प्रश्न मैथिली साहित्यिक राष्ट्रवादक मर्मकेँ छूबैछ। कापड़ि मैथिली-नेपालक पहचानकेँ स्वतन्त्र आ स्वाभिमानी रूपमे स्थापित करबाक पक्षमे छथि। महेन्द्र मलंगियाजीक गिनिज-बूक प्रमाणपत्र-प्रसंगमे कापड़ि एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठबै छथि: 'मलंगियाजीके नाट्य माइजन' कहल जाओ तखन कि हुनका 'नेपालक मैथिली नाटककार' कहब अनुचित अछि? ई मैथिली-नेपाल राजनीतिक पहचानक विमर्श थिक।
३.२ 'मैथिली लोकरंगमंच: मैथिली लोकनाट्यपर कापड़िक निबन्ध मैथिलीक रंगमञ्च-इतिहासक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज थिक। 'मैथिली संस्कृतिक अपन विभिन्न अवयव आ उपादानसब छै, माने लोकभाषा, लोक नाच नाट्य, गीत गाथादि' - ई वाक्य मैथिली सांस्कृतिक समग्रताक दृष्टि प्रकट करैछ।
'परबहा' गामक वर्णन: 'परबाह अहा'- ई नामव्युत्पत्ति रोचक आ सांस्कृतिक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि। जे लोक अपन भाषा-साहित्य-संस्कृति-रंगमञ्चक परबाह करैछ - ओ 'परबहा' थिक। शब्द-विलासक ई उदाहरण कापड़िक भाषा-चेतनाक परिचायक थिक।
३.३ 'लोकभाषा मैथिली की जय!': ई कापड़िक भाषा-चिन्तनक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। 'वेद-पुराण, धर्म-दर्शन आ कला-विज्ञानक भाषा देववाणी... एतेक ने सकबेधक' गछेरल रहैक, जे मरि गेलै' - ई संस्कृतक मृत्युक समाजशास्त्रीय व्याख्या थिक। कापड़ि मैथिलीक भविष्यकेँ लोकभाषाक रूपमे देखैछ, ने कि 'बभन-भाषा' (मानक मैथिली)क रूपमे। ऐ रचनामे कापड़ि डा रामावतार यादवक 'मानक मैथिली' आन्दोलनपर सूक्ष्म व्यंग्य करै छथि - 'बोङपादी ऐंठलक बभन-भाषा'। विदेह समानान्तर फ्रेमवर्कक दृष्टिसँ ई विमर्श महत्त्वपूर्ण थिक: मैथिलीकेँ लोकक भाषा रहबाक चाही, ने कि पण्डित-शास्त्रीक।
३.४ 'सीतासखी गंगासागर': जनकपुरक गंगासागर सरोवरक दुर्दशाकेँ कापड़ि पौराणिक-काल्पनिक कथाक रूपमे प्रस्तुत करै छथि। गंगासागर 'झखरी बुढ़ियाक रूप धऽ' महाकुम्भ जाइछ - ई प्रतीकात्मक कल्पना अद्भुत थिक। ओत' गंगाजलक शुद्धतासँ आत्मग्लानि होइछ आ जनकपुरवासी सभकेँ कोसै छहि। ई व्यंग्य-कथन सहर-नगरपालिकाक उपेक्षापर टिप्पणी थिक।
भाग ४: व्यंग्य-रचना
४.१ 'एहने जनकपुर?': जनकपुर उपमहानगरपालिकाक बदहाल सड़क, मच्छर-पालन, आ नेताक उदासीनतापर ई व्यंग्य अछि। 'महान उपमहानगरपालिकाक वडा नं. १६ पुलचौकक, २०५१ सालमे... बिलटू पजियारक बिकट पालीमे धाके-धौसे... मटिया सड़क निर्माण भेलै, तकर किछु छेंट... ऐ तीस बरखक अभ्यन्तरमे, एको छौ/टेलर माटि नै पड़ने' - ई लेखन स्थानीय पत्रकारिताक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। 'तब, हे यौ जनकपुर्र! विकास नामक सूरदासके घीउ, पातपर गड़गरएनहि बूझब!?' - ई 'सूरदासके घीउ' मुहावरा मैथिली व्यंग्य-साहित्यमे एक मणि थिक। विकासक घीउ - जे अन्धकेँ नहि देखैछ - ई नकारात्मक राजनीतिपर अद्वितीय व्यंग्य थिक।
४.२ राजनीतिक व्यंग्य-श्रृंखला: कापड़िक व्यंग्य-श्रृंखला 'हगना-पदना', 'धोती-गमछा', 'बगड़िया-सङहतिया' - ई काल्पनिक संवाद-रूपमे लिखल गेल अछि। नेपाली राजनीति - जेन-जी आन्दोलन, मधेशी दलक पतन, बालेन शाह, उपेन्द्र यादव, केपी ओली – ऐ सभपर व्यंग्य सटीक अछि।
भाषाक बहुलता: ई नेपालक भाषाई यथार्थकेँ जीवन्त रूपमे प्रकट करैछ। 'रे, बुझ'बला बात ई छै जे ओकर काठमाडौंबाली कनिञा मैडम...' - ई भाषाई मिश्रण (Code-mixing) कापड़िक रचनाशैलीक महत्त्वपूर्ण लक्षण थिक।
व्यंग्य-रसक दृष्टि: भरत मुनिक हास्य-रसमे छह प्रकारक हास्य वर्णित अछि - आत्मस्थ, परस्थ, उभयस्थ, श्लील-अश्लील-सामान्य। कापड़िक राजनीतिक व्यंग्य 'परस्थ' हास्यक श्रेणीमे अबैछ - जे दोसरक मूर्खता आ दुर्बलतापर हँसैछ। ऐ हास्यक उद्देश्य मात्र मनोरंजन नहि, बरु सामाजिक जागरण थिक।
४.३ 'जनकपुर नगरपालिका-विमर्श': रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर'क दुइ पुस्तकक विमोचन कार्यक्रमपर व्यंग्य कापड़िक निर्भीक आलोचनात्मक दृष्टिक उदाहरण थिक। 'मधेश प्रज्ञा प्रतिष्ठानक अपने अध्यक्ष होइतो मैथिली विकास कोषमे विमोचन किए?' - ई प्रश्न मैथिली साहित्यिक संस्थागत राजनीतिपर सोझ प्रहार थिक। ऐ रचनामे कापड़िक व्यक्तित्वक एक महत्त्वपूर्ण पक्ष प्रकट होइछ - ओ संस्थागत भ्रष्टाचार आ अवसरवादिताक विरुद्ध स्पष्टवादी छथि। 'अपनेके साँच बोलबाक साहस लोकमे घटि गेल अछि' (अरुण आर्यक उक्ति) - ई कापड़िपर सटीक लागू होइछ।
भाग ५: साहित्यिक समीक्षा आ आलोचना-लेखन
५.१ 'धीरेन्द्र प्रेमर्षिक हिन्दी गजलक पाठकीय उहापोह': ई कापड़िक सर्वश्रेष्ठ समीक्षात्मक लेखन थिक। प्रेमर्षिक हिन्दी गजलकेँ पढ़ैत हुनकर प्रतिक्रिया - 'आहि रे वा, ई त' हिन्दी गजल अछि!' - ई एक मैथिली साहित्यकारक भाषाई प्रतिबद्धताक उदाहरण थिक। परन्तु कापड़ि व्यापक दृष्टिसँ ओहि गजलक मूल्यांकन करै छथि: 'हिनक रचनाक भाषा-साहित्यक सौष्ठवके समग्रताके निरेखने अवधारने, मान' पड़त जे एहि रचनाके माध्यमस' हिनक भाषिक रवानी गजलक रचनागत विन्यास बेछप आ सरस अछि।' - ई निष्पक्ष समीक्षाक आदर्श नमूना थिक।
आलोचना-सिद्धान्त: 'कोनहुं रचनाक समीक्षा, निष्पक्ष भाव आ उदार दृष्टिए बिना व्यामोहस' कएने स्वच्छ समालोच्य होइछ' - ई वाक्य कापड़िक आलोचना-दर्शनक सूत्र थिक। मैथिली समीक्षामे ई 'निर्व्यामोह' (bias-free) दृष्टि अत्यन्त दुर्लभ थिक।
५.२ 'डा विमलक गजलक आन्दोलनी ताव-तेवर':
ई कापड़िक सर्वाधिक विस्तृत समीक्षात्मक लेखन थिक। डा राजेन्द्र विमलक गजलक वैचारिक पक्ष, भाषाई शक्ति, आन्दोलनकारी ऊर्जा - तीनूक समग्र मूल्यांकन कापड़ि कएलनि अछि।
'जोड़ि बाँहि बाँहस', जोरस' आवाज दियौ / रोटी चोरओने अछि, पेट ओकर फाड़ि लिय।'
उपर्युक्त शेरपर कापड़िक टिप्पणी: 'हिनक ई आक्रोश बहुत आक्रमक तथा विष्फोटक अछि' - ई सूक्ष्म आलोचनात्मक मूल्यांकन थिक। कापड़ि रस-निष्पत्तिक भारतीय आलोचना-परम्पराक उपयोग अन्तर्निहित रूपमे करै छथि।
कापड़िक विमल-समीक्षामे विशेष महत्त्वपूर्ण पक्ष थिक हुनकर 'वैचारिक गजल' (Ideological Ghazal) सिद्धान्त। कापड़ि कहै छथि जे विमलक गजलक वैचारिक पक्ष 'सामाजिक-सांस्कृतिक संचेतना, जीवनमूल्य, अपन संस्कृति प्रतिक निष्ठा भाव आ लोक प्रतिवद्घताक राग गजि-गजिक' भरल' - ई विशेषता सामान्य गजलकेँ 'महान गजल' बनाबैछ।
भाग ६: आत्मकथात्मक आ स्मृति-प्रसंग
६.१ 'हमरो घरमे मैथिलीक बड़ मान': 'सराइन' प्रसंग: कापड़ि अपन घरनीकेँ 'सराइन' (सर + स्त्रीलिङ्ग) कहै छथि। ई भाषाई नवनिर्माण मैथिलीक विशिष्ट उदाहरण थिक। 'जेना - मास्टरक स्त्रीलिङ्ग मास्टरनी, तहिना डागडरक डागडरनी, सिंहक सिंहनी!'- ई सादगी बला हास्य कापड़िक व्यक्तित्वक परिचायक थिक। ऐ रचनामे घरक जीवनक माधुर्य, 'जंतसारी गीत गबैत अदौरीक घाइट पिसैत बौआमाय' - ई चित्र मैथिली गद्यमे ग्राम्य जीवनक अनुपम दस्तावेज थिक।
६.२ 'पहिने जनि-जति... अदौरीके घाइट': पुरान आ नव घरनीक तुलनापर ई लघु रचना - 'लिखिया लिखिक' चिक्कन-ढुढुर' बनाम 'फैन्सी डेकोरेसन' - ई सांस्कृतिक परिवर्तनपर मार्मिक टिप्पणी थिक। 'अदौरीके घाइट आ तिसियौरीके बेसन पिसैत, जंतसारी गीत गबैत, हमर ई बौआमाय!' - ई चित्र मैथिलीक श्रेष्ठ गद्य-काव्यमे स्थान रखैछ।
६.३ बौआ-बाबू-पोताक जनमदिन-प्रसंग: 'चिन्नीके लडू टेंढ़ो, केहुना मीठे होइछ!' - कापड़िक दाइक ई उक्ति लोकज्ञानक उत्तम उदाहरण थिक। 'जे ननू से गर्भे ननू!' बौआ प्रभुकेँ 'पृथु' नाम राजा पृथुक आधारपर देबाक कारण बतेबाक शैली कापड़िक परम्पराबोधक परिचायक थिक।
६.४ 'जनकपुरधाम विकास-विमर्श': कापड़ि मिथिला आन्दोलनी शहीद दिवस: जनकपुर उपमहानगरपालिकाक बदहाली, परबहा महोत्सव- ऐ सभपर सतत लेखन करै छथि। ई समाज-प्रतिबद्धताक उदाहरण थिक। 'मिथिला शहीद अमर रहए!' - ई आह्वान-वाक्य मात्र नारा नहि, कापड़िक जीवन-दर्शन थिक। ओ मिथिला राज्य-संघर्ष समितिक संयोजक रहिचुकल छथि - ई प्रतिबद्धता हुनकर साहित्यमे सर्वत्र दृष्टिगोचर होइछ।
भाग ७: नाट्य-विमर्श आ रंगमञ्च-चिन्तन
७.१ 'रेङ-रेङ' नाटक-प्रसंग: अयोध्यानाथ चौधरीजीक 'रेङ-रेङ' पढ़िक' दएल प्रतिक्रिया - 'रंग-रेखाके अपन दर्शन आ मनोविज्ञान होइछ' - ई मिथिला-चित्रकलाक रसदर्शनकेँ नाट्य-शिल्पसँ जोड़बाक प्रयास थिक। 'ई मौगीआनी कचनी-भरनी लिखियाटा नहि, बरु आधुनिक चित्र-विद्या कलाक सबटा उर्जा आवेगस' महिमा-मण्डित अछि' - ई टिप्पणी 'रेङ-रेङ'केँ दृश्यकला आ नाट्यकलाक संगमपर स्थापित करैछ।
७.२ मैथिली नाट्यक विकास-विमर्श:
विराट मैथिली नाट्य कला परिषद्, जनकपुरधाम अन्तर्राष्ट्रिय नाट्य महोत्सव, परबहा सांस्कृतिक महोत्सव - ऐ सभपर कापड़िक लेखन मैथिली नाट्य-इतिहासक समकालीन दस्तावेज थिक। ओ केवल दर्शक नहि, सक्रिय सहभागी आ आलोचक छथि।
कापड़िक महत्त्वपूर्ण नाट्य-चिन्तन: 'जनकपुरमे अभिनेता/अभिनेत्री बहुते छथि, धरि आधुनिक वैश्विक रंगमंच, रंग-दर्शन, नाट्य-संचेतना, कलावाद, एकर मुख्य प्रवृत्ति...क अभाव' - ई सटीक निदान थिक।
७.३ 'टटकाल दर्शन' नाटक-प्रसंग: 'टटकाल दर्शन'क कथ्य-शिल्प, डा वीरेन्द्र पाण्डेक अंग्रेजी समीक्षा-प्रकाशन - ई प्रसंग कापड़िक नाट्य-लेखनकेँ अन्तर्राष्ट्रिय स्तरपर मान्यता भेटबाक आह्लादक दृष्टान्त थिक। 'एहि नाटकके कथ्य-शिल्प आ रंगमंचीय प्रविधिक संगहि एकर प्रदर्शनीय जोगार भजार'- कापड़ि व्यावहारिक नाट्यकर्मी छथि, मात्र सैद्धान्तिक नहि।
भाग ८: ऐतिहासिक-पौराणिक आख्यान:
८.१ 'आल्हा-रुदल': पाण्डवक पाँचोभाइक कलियुगमे आल्हा-रुदल-ब्रह्मानन्द-लाखन-वीर मलखान रूपमे अवतरणक कथा - ई पौराणिक-लोकगाथाक सुन्दर समन्वय थिक। युधिष्ठरक अतृप्त अभिलाषाकेँ - 'महाभारतमे हम कहां एकौटा कौरव मार' पइली!' - कृष्ण कलियुगमे पूरा करैछ। ई आख्यान मैथिली लोकगाथा-परम्पराकेँ दार्शनिक आधार दैछ। आल्हा-रुदल लोकगायनक ब्रह्माण्डीय सन्दर्भ - पाण्डव-पुनर्जन्म - एकरा केवल मनोरंजनसँ उपर उठाबैछ।
८.२ 'सीतासखी गंगासागर': पौराणिक-काल्पनिक एवं समकालीन सामाजिक व्यंग्यक अद्भुत सम्मिश्रण। गंगासागर सरोवरकेँ 'झखरी बुढ़िया' रूपमे मानवीय कएल गेल अछि जे महाकुम्भ जाइछ। ई 'Personification' (व्यक्तीकरण) क उत्कृष्ट मैथिली प्रयोग थिक।
भाग ९: बालसाहित्य आ बालगीत:
९.१ 'आनन्द मनोरंजनस' उमटाम भरल-पूरल बाल लोकसाहित्य': कापड़ि मैथिली बाल-लोकसाहित्यक महत्त्वकेँ रेखांकित करै छथि। 'ई कहियो नै सठ', निङहट'बला अकूत अनमोल नैसर्गिक सम्पदा अछि' - ई वाक्य बालसाहित्यक प्रति हुनकर गम्भीर दृष्टिक परिचायक थिक। रोशन जनकपुरीजीक नातिक खेलगीत - 'रे बौकला, रे बौकला! / किए टोकले?' - ई बालगीतक रिदम, अटर-पटर-पन मैथिली बालगीतक विशेषता थिक जे कापड़ि सहेज रखलनि अछि।
९.२ गीत-फकड़ा परम्परा: 'रेङ रेङ'क गीत-फकड़ा (घेघड़ा देम्ड बजनिञा) - ई लोकशैलीमे नाटकक सांस्कृतिक ऊर्जाकेँ प्रकट करैछ। कापड़ि लोकगीत-परम्पराकेँ आधुनिक नाट्य-रचनाक अंग बनबैछ।
भाग १०: समग्र आलोचनात्मक मूल्यांकन
१०.१ रचनाकारक शक्ति: परमेश्वर कापड़िक रचना-संसारक सबसँ पैघ शक्ति थिक - हुनकर मैथिलीक शुद्धता आ जीवन्तता। 'लबकनिञा', 'हड़हड़ही', 'धतपताए', 'छगुनाए', 'हपसि-लपकि', 'कुथरैत-भथरैत' - ई सभ शब्द मैथिलीक जीवित परम्पराक प्रमाण थिक। दोसर शक्ति - साहस आ स्पष्टवादिता। राजनीतिक व्यंग्यमे, साहित्यिक संस्थागत आलोचनामे, भ्रष्टाचार-विरोधमे - कापड़ि कहियो 'चौरनिया लोकप्रियता'क लोभमे नहि पड़ला। तेसर शक्ति- बहुविधावादिता। लोककथा, पौराणिक आख्यान, व्यंग्य, आत्मकथात्मक प्रसंग, साहित्यिक समीक्षा, नाट्य-लेखन, दार्शनिक निबन्ध - सभमे सहज गति।
१०.२ सीमा आ आलोचना-बिन्दु: (क) सोशल मीडिया-संरचनाक सीमा: अधिकांश रचना फेसबुक-पोस्टक रूपमे लिखल गेल अछि। ई माध्यमक सीमाबद्धता - संक्षिप्तता, तात्कालिकता – कखनो काल विषयक गहराईकेँ सीमित करैछ। दीर्घ निबन्ध आ शोध-लेखमे हुनकर प्रतिभा अधिक निखरि सकैत छन्हि। (ख) व्यंग्यमे व्यक्तिगत आक्रमण: कखनो व्यंग्य व्यक्तिगत स्तरपर उतरि आबैछ - रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर'पर आलोचना, अन्य साहित्यकारपर टिप्पणी - ई कखनो-कखनो साहित्यिक आलोचनाक बजाय व्यक्तिगत विवादक रूप लैछ। (ग) एकसूत्रता: कखनो-कखनो एक्के विषय - जेन-जी आन्दोलन, मैथिली-भाषा-संघर्ष - बेर-बेर दोहराओल जाइछ। रचनात्मक वैविध्य आरो बढ़ि सकैत अछि।
१०.३ विदेह समानान्तर इतिहासमे स्थान: परमेश्वर कापड़ि विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलनक एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ थिकाह। ओ नेपालक मैथिली साहित्यकेँ भारत-केन्द्रित मुख्यधारासँ स्वतन्त्र पहचान दै छथि। मैथिलीक खाँटी रूपकेँ साहित्यिक प्रतिष्ठा दै छथि। लोककथा, लोकनाट्य, लोकगीतकेँ उच्चसाहित्यक समकक्ष स्थापित करै छथि। मिथिला-राज्य-संघर्षकेँ साहित्यिक-राजनीतिक अभियानक रूपमे एकजुट करै छथि। संस्थागत पुरस्कार-तन्त्रसँ बाहर रहिकऽ अपन रचना-धर्म जारी रखै छथि।
१०.४ तुलनात्मक स्थान: मैथिली साहित्यमे कापड़िक तुलना - सांस्कृतिक संरक्षण, नाट्यधर्म, राजनीतिक यथार्थवाद, आन्दोलनी ऊर्जा- ऐ सभसँ सभ धाराकेँ अपन एक व्यक्तित्वमे समाहित करै छथि। ओ ने मात्र साहित्यकार, बरु एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक आन्दोलनकर्मी थिकाह।
उपसंहार
परमेश्वर कापड़िक रचना-संसार मैथिली साहित्यक एक बहुमूल्य अध्याय थिक। लोककथाक जीवन्त भाषा, पौराणिक आख्यानक दार्शनिक तत्त्व, व्यंग्यक निर्भीक कलम, आत्मकथात्मक प्रसंगक मार्मिकता, साहित्यिक समीक्षाक निष्पक्षता - ई सभ हुनकर बहुआयामी प्रतिभाक प्रमाण थिक। 'मिनाप बहुत बडका अभियान छी' – ई कापड़िक अपन उक्ति हुनकर जीवन-दर्शनकेँ सारभूत रूपमे प्रकट करैछ। मैथिला/मिथिला अभियान - भाषा-साहित्य-संस्कृति-रंगमञ्च - ई सभ मिलिकऽ एक सम्पूर्ण मिथिला-चेतनाक निर्माण करैछ। कापड़ि ऐ चेतनाक जीवित प्रतिनिधि छथि।
भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र, पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त, गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा, आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क - ऐ चारू दृष्टिसँ कापड़ि एक महत्त्वपूर्ण, बहुआयामी, साहसी आ प्रतिबद्ध मैथिली रचनाकार थिकाह जिनका विदेह समानान्तर साहित्य इतिहासमे केन्द्रीय स्थान प्राप्त होएब उचित आ आवश्यक अछि।
[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]
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